Monday, April 1, 2013

काव्यसंग्रह पगडंडियाँ: आधारभूमि और लक्ष्यविन्दु

                                              
मननशील मन जब सत्य और समाज के विभिन्न आयामों से परिचित होता है तब वह परिचय और उसकी प्रतिक्रया ही शब्दों का आवरण ओढकर कथन और कलम द्वारा एक विशिष्ट स्वरुप ग्रहण करती है. लाक्षणिक भाषा में ये विशिष्ट उदगार ही पगडंडियाँ हैं. किसी पगडण्डी का प्रवर्तक तो उसका रचनाकार ही होता है लेकिन जब उसके अनुयायी अनेक हो जातें हैं और धरती पर अपने पगचिह्नों की लकीर छोड़ते हैं, तब वह एकल न होकर पगडंडी बन जाती है. पगडण्डी ही कालांतर में पुष्टपरिपुष्ट होकर, व्यावहारिक रूप से पालित-पोषित होकर एक दिन खडंजा, डामर, कंक्रीटपथ और राजपथ भी बन जाया करती है. इस काव्य-संग्रह में संकलित २८ युवा रचनाकारों में से अनेक रचनाएँ मन और ह्रदय के प्रकोष्ठ से निकलकर चौड़ीसड़क, विस्तृतपथ की आशा जगती हैं. विशेषरूप से वे रचनाएं जो किसी न किसी दार्शनिक आधार, वैज्ञानिक सोच अथवा लोकमंगल की भावना से ओतप्रोत हैं, भले ही उनके शब्द और स्वर, भाव और भंगिमा कुछ कठोर ही क्यों न हो गए हों. ध्यान रहे लोकलुभावानी शब्दों वाली पगडंडियाँ मंरेगा मार्ग की तरह होती हैं जो बाढ़ की कौन कहे बरसात भी नहीं झेल पाती हैं. लेकिन लोकमंगल पथ डामर और कंक्रीट से बने होते हैं तभी आधारपथ बन पाते हैं; जिनसे कई नई पगडंडियाँ निकलती भी हैं और जुडती भी हैं. ये पगडंडियाँ ही सांस्कृतिक चेतना का, आर्थिक समृद्धि का  नैतिकतादायित्व और कर्त्तव्यबोध का पथ प्रसस्त करती हैं जो किसी भी सभ्य समाज के लिए अनिवार्य तत्व माने जाते हैं.

सैद्धांतिक अभिव्यक्ति मष्तिष्क-प्रसूता होने के कारण जहाँ शुष्क और जटिल होते हैं, वहीँ काव्य ह्रदय-प्रसूता होने के कारण सरस और सरस होने के साथ-साथ रोचक भी होता है. यद्यपि दोनों ही प्रकार की अभिव्यक्तियाँ प्रखर चिंतन की देन हैं, लेकिन जो मष्तिष्क का चिंतन है वह दर्शन है, विज्ञान है, गणित है और जो ह्रदय का चिंतन है, वह कविता है. इस तथ्य पर विचार करते हुए मेरी लेखनी ने इसके अंतर को और भी स्पस्ट करते हुए लिखा है –”“....जो चिंतन है वह दर्शन है / अभिव्यक्ति है जो वह कविता है / दर्शन है विधा एक ज्ञान की / इसकी दशा निराली है / कविता है हमें मार्ग दिखाती / भावों में अभिव्यक्ति कराती / होता फिर गूढ़ सत्य अनावृत्त / जो है त्रिभुज वही वर्ग और वृत्त / बिना अभिव्यक्ति हम रुक नहीं पाते / यह मानव की अपनी प्रवृत्ति. इन पगडंडियों में इसी कथन का व्यावहारिक रूप दृष्टिगत होता है. इस मानवीय प्रवृत्ति के कारण ही यह रचनाकार सीधे सृष्टिकर्ता से (प्रकारांतर से शासक वर्ग से) बिना लागलपेट के प्रश्न करता है ओ क्षितिज पर रहनेवाले देख क्या हाल तेरी क्षिति का है आज? वहीँ प्रशासन से पूछता है ऐ भाष्कर सुन रहे हो.... साथ ही साथ समाज से भी दो टूक शब्दों में पूछता है –“शांति सभी को प्यारी है, क्यों दहसत की चिंगारी है?. लेकिन यह पगडंडी ही है जो इसका रहस्योद्घाटन भी करती है, उसकी सटीक नजर और पारखी दृष्टि से कुछ भी छिप नहीं पाता. वह डंके की चोट पर कहती है कि नफ़रत की यह चिंगारी आखी बुझे तो बुझे कैसे? क्योकि थम गया दंगा क़त्ल हुआ आवाम का / आ गए घर जलानेवाले हाथ में मरहम लिए. ऐसे ही अनेकानेक प्रश्न, जिज्ञासा और समाधान, कोरी बाल जिज्ञासा नहीं है. ये सशक्तं मन की अभिव्यक्तियाँ हैं. कहीं हमें बच्चा न मान लिया जाय इसलिए रचनाकार अपनी बैटन पर बल देने के लिए स्पष्ट करता है –“ मैया मैं बड़ा हो गया हूँ इसलिए बता रहा हूँ..... समाज का जो वर्ग अभी भी अर्द्धनिद्रा में है वह जगे, आलस्य दूर करे और अनुसरण करे अपनी मनपसन्द पगडण्डी का. जिंदगी के तमाम उतार-चढ़ाव से जूझने का मन्त्र भी है इसमें और हौसला भी – “ जिंदगी तुझे सहते सहते जीना हमने सीख लिया है / जब तक तुम रुला पाती हँसना हमने सीख लिया है / ... कौन कहता है कि ठुकराए हुए की कद्र नहीं होती है / हमसे पूछो, जिंदगी उसके बाद ही तो शुरू होती है. कहना न होगा कितनी बड़ी आशा, कितना बड़ा साहस, ऊर्जा और सामर्थ्य भरा है इस अभिव्यक्ति में. अशांति दूर होगी और शांति मिलेगी, ऐसा सबल आश्वासन इन पगडंडियों से मिलता है. पथ यदि सरल भी हो, चिकना और चौड़ा भी हो लेकिन पथिक को प्रेरणा और उत्साह न मिले तो वह निरर्थक ही है, महत्वपूर्ण है प्रेरणा शक्ति. अतिरिक्त साहस और संबल जो बच्चों के साथ साथ बूढों के लिए भी समान रूप से उपयोगी हो.

इस प्रकार इन रचनाओं में जीवन के विभिन्न रंग-रूप हैं, रुढिवादिता के प्रति जहाँ प्रखर क्षोभ विद्रोह और प्रतिक्रिया है; वहीँ प्रगतिशीलता को प्रबल समर्थन भी. इस संग्रह में जहाँ विज्ञानं है, तर्क है, वहीँ आध्यात्मिकता नैतिकता और पौराणिकता का पूत भी है. इन पग डंडियों का शिखर विन्दु एक ही है –‘लोकमंगल. भू की परिधि से ये पगडंडियाँ फूटतीं हैं और आड़े-तिरछे रास्ते, अवरोधों को पार करती हुयी केंद्र तक जा पहुचती है. इनमे बाँकपना है, गिले-शिकवे हैं, उतार-चढ़ाव-घुमाव है. इसीलिए तो काव्यरूप में हैं. यदि ये सीधी होतीं तो गणित होती और तब इनकी संज्ञा पगडंडी नहीं, त्रिज्या होती. अध्यात्म, पंथ और पथ: इन पद डंडियों से विस्तार पता है और और विज्ञानं त्रिज्या तथा जीवा से.

वास्तवमें ये पगडंडियाँ  काव्य-ह्रदय का उच्छ्वास हैं, विकासशील हैं और इनमे भी विस्तृतपथ और राजपथ वही बन पाएंगी जिनमे मस्तिष्क की सीमेंट, तर्क की गिट्टी पड़ी हो और जबतक उसपर व्यावहारिकता की रोलर नहीं चलेगी तबतक न तो वह पैदल चलने वालों के लिए सुगम होगी और नहीं मोटर वाहनों के लिए. इतना तो निर्विवाद सत्य है कि ये कविताये हमें झकझोरती हैं, मनन-मंथन और अनुगमन के लिए प्रेरित भी करती हैं. यदि ये कवितायें समाज की प्रतिगामी सोच को बदलने की शुरुआत भी क्र सकें तो यही इनकी सफलता और सार्थकता होगी. कई रचनाओं में यह सामर्थ्य भी है और क्षमता भी. लेकिन गतिशील तो समाज को होना है. रूचि के अनुसार व्यक्ति, परिवार और समाज यदि इसे स्वीकार करे तो वह कल्याणकारी ही होगा, ऐसा विश्वास किया जाना चाहिए. शहरों जैसी चौड़ी सडक न पाने पर भी पग डंडियों का महत्व कम नहीं हो जाता.  बहुसंख्यक आबादी को सड़क से घर तक, घर से खेतखलिहान-नहर नदी तक, प्राथमिक विद्यालय से प्राथमिक चिकित्सालय तक जो पहुचती हैं हमें, आपको, नन्हे-मुन्नों को: वे पगडंडियाँ ही तो हैं.

हिदयुग्म द्वारा प्रकाशित और अंजु रंजु मुकेश की त्रिमूर्ति द्वारा सम्पादित यह साझा काव्यसंग्रह पगडंडियाँ निश्चय ही उपयोगी और संगह्नीय कृति है. वैयक्तिकता और सामाजिकता को आधार बनाकर रची गयी इस काव्यसंग्रह की भाषा और काव्य-शिल्प पर विचार करना बहुत महत्वपूर्ण नहीं रह जाता. हिंदी भाषा से इतर अन्य भाषिक शब्दों को स्थान देने से हिंदी साहित्य समृद्ध ही हो रहा है, ऐसा मेरा मानना है. हाँ, ग्राह्यता के लिए अत्यधिक उतावलापन उचित नहीं, मांग के अनुरूप प्रयोग को ही उचित कहा जा सकता है. हमरी शुभकामनायें, मंगलकामनाएं सभी के साथ हैं....
                                                                                                         

                                                                                           - Dr. Jai Prakash Tiwari   




           

Thursday, March 7, 2013

अध्यात्म के मूल तत्त्व

तत्त्व  रूप जग  एक है, नाम  और रूप अनेक .
एक अनेक से भिन्न नहीं, तत्त्व तत्त्व सब एक.

ग्रन्थ  वही  है अर्थ  नए,  नूतन  सरस  नवीन .
मूल  वही  है  फूल नए,  जानत  सकल  प्रवीण.

एक रंग में  सात रंग है, सात रंग मिल एक.
ब्रह्म  ही  राम-रहीम है, दोनों  ही  है  एक.

ब्रह्म वही सदग्रंथ वही, भाषा और लिपि अनेक.
ऋषि मुनि  साधु फकीर, गावत निजहि विवेक.

कहे अभेद जो भेद बिना, सगुण बिना कहे निर्गुण.
है कोई ज्ञानी विज्ञानी, कोई फकीर या साधु निपुण?

शुभ - अशुभ के द्वन्द में, क्यों घुट रहे हो तुम?
अशुभ में ही शुभ छिपा, शुभ - अशुभ हो तुम.

बंधन और मुक्ति भवर में, क्यों उलझ रहे हो तुम.
जुड़ना मोह से बंधन है, छूटना ही मोह से मुक्ति.

                   
                              डॉ जय प्रकाश तिवारी

Tuesday, March 5, 2013

सम्बन्ध दर्शन और कविता का

क्षण क्षण के बीच जो अंतराल
वह भी तो एक क्षण ही है
कण कण के बीच में जो दरार
उसमे भी तो कोई कण ही है

ढूंढते ढूँढते अंतराल को
मापते मापते इस दरार को
जो चिंतन है वह दर्शन है,
अभिव्यक्ति है जो वह कविता है.

दर्शन है विधा एक ज्ञान की
इसकी तो दशा निराली है
कविता है हमे मार्ग दिखाती
भावों में अभिव्यक्ति कराती

होता फी गूढ़ तत्व अनावृत्त
जो त्रिभुज, वही वर्ग और वृत्त
बिना अभिव्यक्ति रह नहीं पाते
यह मानव की अपनी प्रवृत्ति

समझाते हैं जब मन को अपने
अध्यात्म रूप वह बन जाता
दिखलाना हो जब औरों को
विज्ञानं रूप में सामने आता

तुम बोलो तब क्या अंतर है -
विज्ञान और अध्यात्म जगत में
जो वहिर्मुखी विज्ञान है वह
अंतर्मन में जो प्रज्ञान है व्ह.

दोनों हैं दो पार्श्व ज्ञान के
बुद्धि चेतना सत्ता प्रज्ञान के
संवेग से हैं दोनों चंचल
संवेग रहित हैं शांत अविचल.

जो भेद मान लिया हमने
वह ज्ञान नहीं, अज्ञान है
अभेद जिसने देख लिया
उसी के पास तो ज्ञान है.

Wednesday, February 27, 2013

अशक्त नारी, सशक्त नारी

 
(भाग-१)
नर  से जो द्विगुणित है नारी,
वह नारी क्यों आज है हारी?
शक्तिस्रोत है नाभि में जिसके,
आखिर उसकी क्या लाचारी?

सृजन - पालन जो करती है
वह ध्वंश नाम से क्यों घबराती?
जिस पथ सब सरल चाल चलते,
उस पथपर भी वह बल खा जाती

जो स्नेह लुटाती लाल पर अपने
वह वधू का काल क्यों बन जाती?
कुछ वधुएँ भी होती हैं ऐसी जो
सासू माँ को क्या खूब छकाती .

खाने को वह गम खाती है
और पी जाती सब खारा पानी,
फिर भी जाए छलक कभी तो
स्वयं को वह कठघरे में पाती

सिसक सिसक कर जीवन जीती
और जीवन, चैका - बेलन - रोटी
लांघा जब चौखट उसने आज
उठा लिया है जब बेलन हाथ

यह समाज उसपर चिल्लाता
हो पति या बेटा हाथ उठाता
उस हाथ को नारी रोक न पाती
अब भी जाने क्या है लाचारी?

निकली जब घर से बाहर आज
उसे मिला दुशासन का समाज
दुशासन के लम्बे -लम्बे हाथ
दुर्योधन का उसपर वरद हाथ?

एक दुशासन के कारण ...
कभी हुआ यहाँ था भीषण रण
तब राजतंत्र था, अब लोकतंत्र
कैसी प्रगति, जब वही आचरण?

गृह अन्दर नारी का शासन है
पर घर-घर एक दुशासन है
दुशासन तो घर में ही पलता
माँ आखिर उसको समझ न पाती

कहती  जिसको लाल ! लाल!!
वही करता  नारी को  हलाल,
यह नारी के लाल की करनी है
नारी का शव, ये टुकडे लाल.

(भाग-२)

छोडो नारी तुम ममता को
छोडो मान और प्रभुता को
तेरी असली शक्ति तो समता है
क्यों छोड़ दिया इस समता को?

समता से नाता जोड़ोगी
यह प्र्स्भुता दौड़ी आएगी
हर दृष्टि थर्राएगी तुमसे
नहीं ध्वंश की बारी आएगी

दुशासन नजर न आएगा
घर बैठे शोक मनायेगा
घुट घुट कर वह मर जाएगा
दुर्योधन भी तब घबराएगा .

अब लाल जिसे भी बोलोगी
मुह में मिसरी जब घोलोगी
यह जग होगा तेरा ही लाल
तू है एक माँ, तू रहेगी माँ .

हो प्रकृति स्वरूपा, बनो प्रकृति
सृजन-पालन में रहो प्रवृत्त,
जननी बन जा, तू जगजननी
जय हे जननी, जय जगजननी !


- डॉ जय प्रकाश तिवारी

Thursday, September 20, 2012

स्वर्गलोक में भी हुआ “हिंदी-दिवस’” पर साहित्यिक परिचर्चा: देर से प्राप्त एक रिपोर्ट


‘हिंदी दिवस’ के अवसर पर इस वर्ष स्वर्गलोक में भी साहित्यिक चर्चा-परिचर्चा का आयोजन किया गया. हिंदी साहित्य की गद्य विधा को घिस-घिस कर चमकाने वाले आचार्य महावीर प्रसाद दिवेदी जी ने संयोजकत्व का दायित्व स्वर्गलोक में भी कुशलता से निभाया. मैंने देखा कई स्व-नामधन्य चिन्तक, साहित्यकार और समीक्षक बैठे थे वहाँ, कुछ मंच पर और बहुत से गोष्ठी की अग्रिम पँक्तियो में. राजनीतिक समीक्षक होने पर घोर अफ़सोस मुझे उस समय हुआ जब मैं इस आयोजन स्थल पर देर से पहुँचा. भारतीय नेताओं के सानिध्य और प्रभामंडल में होने के कारण सम्मेलनों में देर से पहुचने की आदत सी अब बन चुकी थी, मुझे सुखद हैरानी हुई कि कार्यक्रम अपने ठीक निर्धारित समय पर प्रारम्भ हो चुका था और इस समय अपने पूरे उत्कर्ष पर था. मैं तो यह भूल ही गया था कि यह ‘साहित्यिक विचारगोष्ठी’ है, कोई राजनितिक सभा नहीं. मुझे साहित्यिक पत्रकार के रूप में ही आमंत्रित भी किया गया था, लेकिन कहते हैं न कि आदत जो एकबार बिगड जाय, तो बदलने में समय लेती है. साहित्यिक रूचि-रुझान के कारण अपने को कोसता हुआ, कुछ अधीर और निराश सा होकर घुटन और घबराहट में ही इन गूढ़-गंभीर साहित्यिक बातों को लिपिबद्ध करने में जुट गया. निराला, प्रसाद, महादेवी, गुप्त जी  और दिनकर जी जैसे बड़े साहित्यकारों / समीक्षकों को न सुन पाने का दर्द मुझे अंतर से कचोट रहा था. इसके बावजूद भी जो कुछ मिला और जितना भी लिपिबद्ध मैं कर पाया, वह बहुत दूर तक हम-आपका पथप्रदर्शन करेगा, मार्गप्रशस्त करेगा. ऐसा मेरा विश्वास है. इसलिए इस अनुभव में सबको साझेदार बनाना चाहता हूँ. जब मैं इस गोष्ठी में पंहुचा तो देखा, वहाँ आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी गोल-गोल ऐनक लगाये अध्यक्षीय आसान पर विराजमान थे. आचार्य महाबीर प्रसाद दिवेदी जी सञ्चालन कार्य कर रहे थे, यह उनकी कड़क-मिजाजी, अनुशासनप्रियता और प्रबंधकीय योग्यता ही थी कि सबकुछ इतना शांतिमय और सुव्यवस्थित ढंग से चल रहा था. आचार्य हजारी प्रसाद दिवेदी मुख्य अतिथि और मैथिलीशरण गुप्त जी विशिष्ट अतिथि के रूप में मंचस्थ थे. साथ में मुंशी प्रेमचंद, नन्द दुलारे वाजपेयी, इलाचंद जोशी, श्यामसुन्दर दास, अज्ञेय, पन्त जी, निराला जी, महदेवी वर्मा जी तथा किनारे डॉ. देवराज मंचस्थ थे.

इस समय डायस पर खड़े होकर अपने विचार रख रहे थे डॉ. विद्यानिवास मिश्र जी. वे इस परिचर्चा गोष्ठी में साहित्य की परिभाषा को लेकर विमर्श कर रहे थे. उन्होंने कहा– “साहित्य की सबसे सटीक परिभाषा यही है कि जितनी बार वह दोहराया जाय, जितनी बार वह पढ़ा जाए उतनी बार जिया जाये, सही अर्थ में जिया जाए, उतनी बार पाठक या श्रोता के द्वारा नया रचा जाये. यह बार-बार उसका रचा जाना उसकी सबसे सटीक पहचान है. जब साहित्यकार सोचता है कि इसमें बार-बार रचे जाने कि क्षमता आये तो निश्चित ही आगे की सोचता है और अपने ज़माने में रहते हुये अपने बाहर जाकर सोचता है ....... कुछ चीजें जीवन ही होती हैं. जीवन के लिए अमृत होती है, जीवन का भविष्य ही होती है. कविता या साहित्य जीवन का भविष्य है. जीवन का मनोरंजन नहीं है. जीवन की उपभोग सामग्री नहीं है, यह जिंदगी का ऐसा हिस्सा है जो आता है तो बहुत सी चीजें नई कर देता है. घाव भी नए करता है लेकिन साहित्य जब घाव करता है तो उसमे भी ऐसी अनुभूति होती है, यह घाव शायद सबको ही करकता होगा न? सबका घाव होने से घाव ऐसा लगता है कि इसके लिए कुछ करना चाहिए. अपना होता है तो केवल खीज होती है. जब सबका होता है तो दूसरे ही प्रकार की प्रतिक्रिया होती है”. डॉ. राम विलास शर्मा ने वहाँ एक नया प्रश्न उठाया, ‘साहित्य मनुष्य के लिए? या ‘मनुष्य साहित्य के लिए?’. अपना दृष्टिकोण रखते हुये उन्होंने तर्कपूर्ण शब्दावली में कहा - “जैसे मनुष्यों के बाहर मनुष्य की सत्ता नहीं है वैसे ही सुन्दर वस्तुओं से बाहर सौंदर्य की सत्ता नहीं है और तमाम सुन्दर वस्तुएं तमाम सुन्दर भाव-विचार मनुष्य के लिए हैं, उसकी सेवा करने के लिए नहीं है. साहित्य भी मनुष्य के लिए है, साहित्य का सौंदर्य मनुष्य के उपयोग के लिए है, मनुष्य साहित्य के लिए नहीं है. लेकिन अवकाश भोगी सज्जन तमाम जनता का अस्तित्व असिलिये सार्थक समझते हैं कि वह उनके लिए उपयोग कि वस्तुएं उत्पन्न करती हैं. इसे वे सनातन ईश्वर-कृत नियम मानते हैं. इसी नियम के अनुसार वह साहित्य को जनता के लिए नहीं मानते, वर्ण जनता को साहित्य के लिए मानते है.”. मुंशी प्रेमचंद ने कहा - “जिसे संसार दुःख कहता है, वह कवि के लिए सुख है. धन और ऐश्वर्य, रूप और बल, विद्या और बुद्धि- ये विभूतियाँ संसार को चाहे कितना ही मोहित कर लें, कवि के लिए यहाँ जरा भी आकर्षण नहीं है. उसके मोह और आकर्षण की वस्तु तो बुझी हुई आशाएं और मिटी स्मृतियाँ और टूटे हुये हृदय के आंसू हैं. जिस दिन उन विभूतियों से उसका प्रेम न रहेगा; उस दिन वह कवि न रहेगा. दर्शन जीवन के इन रहस्यों से केवल विनोद करता है, कवि उनमे लीन हो जाता है.... ज्ञानी कहता है, ओठों पर मुस्कराहट न आये, आँखों से आँसू न आये, मैं कहता हूँ, अगर तुम हँस नहीं सकते, तो तुम मनुष्य नहीं, पत्थर हो. वह ज्ञान जो मानवता को पीस डाले , ज्ञान नहीं है, कोल्हू है”. .. माथे पर पसीने की बूँदें छलक आयीं थी. रुमाल निकल कर पसीने को पोछकर अब वे पुनः माइक के सामने थे – ....“अज्ञान की भांति ज्ञान भी सरल, निष्कपट और सुनहले स्वप्न देखने वाला होता है. वह इसके विरुद्ध व्यवहार को अमानुषीय समझ वह यह भूल जाता है कि भेड़ियों ने भेड़ों कि निरीहता का जवाब सदैव पंजों और दांतों से दिया है. वह अपना एक आदर्श संसार बनाकर उसको आदर्श और मानवता से आबद्ध करता है और उसी में मग्न रहता है. यथार्थता कितनी आगम्य, कितनी दुर्बोध, कितनी अप्राकृतिक है, उसकी ओर विचार करना उसके लिए मुश्किल हो जाता है.”
   
अब अपना विचार प्रकट करने की बारी अज्ञेय जी की थी. अज्ञेय जी ने अपने बेबाक स्वरों और अपनी अनूठी शैली में बोलना शुरू किया. भेड़ियों का सामना करने के लिए एक सामाजिक विद्रोह की आवश्यकता होती है. इस आवश्यकता को रेखांकित कर रचनाकार, सहित्यकार सामाजिक भेडिओं की आँख का किरकिरी बन जाता है. इस लिए सहित्य सृजन को अज्ञेय जी ने मृत्यु का आह्वान माना. उन्होंने इसी विन्दु से बोलना प्रारम्भ किया - “साहित्य का निर्माण, मानो जीवित मृत्यु का आह्वान है. साहित्यकार को निर्माण करके और लाभ भी तो क्या, रचयिता होने का सुख भी नहीं मिलता, क्योकि काम पूरा होते ही वह देखता है, ‘अरे, यह तो वह नहीं है जो मैं बनाना चाहता था’, वह मानो क्रियाशीलता का नारद है, उसे कहीं रुकना नहीं है- उसे सर्वर्त्र भडकाना है, उभारना है, जलना है और कभी शांत नहीं होना है- कहीं रुकना नहीं है .... मूर्ति का निर्माण हो सकता है, मृत्तिका का नहीं. उसी मिटटी से अच्छी प्रतिमा भी स्थापित की जा सकती है, बुरी भी, पर जहाँ मिटटी ही न हो, वहाँ कितने ही प्रचार से, कितनी भी शिक्षा से, कितने भी जाज्वल्यमान  बलिदान से मूर्ति नहीं बन सकती. विद्रोही हृदय को विद्रोही गदन की आवश्यकता है. उसी प्रकार जैसे मृत्तिका को कलाकार के स्पर्श की...  कुछ क्षण रुक कर वे फिर बोले – “शायद मृत्यु का ज्ञान और जीवन की कामना एक ही चीज है. यह बहुतबार सुनने में आता है कि जीना वही जनता जो मारना जनता है, यह नहीं सुना जाता कि जीवन सबसे अधिक प्यारा उसको होता है, जो मारना जनता है, पर है यह भी ध्रुव सत्य. लोग समझते हैं कि जो जीवन को प्यार करते हैं, वे मृत्यु से डरते हैं. बिलकुल गलत. जो मृत्यु से डरते हैं वे जीवन से प्यार कर ही नहीं सकते, क्योकि जीवन में उन्हें क्षण भ्रर भी शांति नहीं मिल सकती.” आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी जी ने कहा – “साहित्य की अतिशयोक्तियाँ इन्द्रधनुष-सी जीवन के स्थूल, अकाल्पनिक रूखे अस्तित्व को मनोरम बना देती हैं. साहित्य में मनुष्य का जीवन ही नहीं, जीवन कि वे कामनाएं, जो अनन्त जीवन में भी पूरी नहीं हो सकतीं, निहित रहतीं हैं. जीवन यदि मनुष्यता कि अभिव्यक्ति है तो साहित्य में उस अभिव्यक्ति की आशा-उत्कंठा भी सम्मिलित है. जीवन यदि सम्पूर्णता से रहित है तो साहित्य उसके सहित है.तभी तो उसका नाम साहित्य है. तभी तो साहित्य जीवन से अधिक सारवान और परिपूर्ण है तथा जीवन का नियामक और मार्गद्रष्टा भी रहता आया है.”. आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने कविता के अलौकिक शक्ति को रेखांकित करते हुये कहा – “कवि की कल्पना शक्ति तीव्र होती है. इस कल्पना शक्ति के द्वारा वह कठिन बातों को ऐसे अनोखे ढंग से सबके सामने रखता है कि वे सहज ही समझ में आ जाती है. इसी शक्ति से वह अनजाने पदार्थो के दृश्यों का चित्र इतना मनोहर खिचता है कि पढ़ने या सुनने वाले एकाग्रचित हो जाते हैं और उस बात पर प्रेम पूर्वक विचार करते हैं. फिर कवि अपने अवलोकन और कल्पना से ऐसी शिक्षा देते हैं कि वह न तो आज्ञा का रूप धारण करती है और न अपना स्वाभाविक रूखापन ही प्रकट करती है, किन्तु भीतर ही भीतर मन को उकसा देती है”. द्विवेदी जी ने अपनी बातों पर बल देकर कहा– मैं साहित्य को मनुष्य की दृष्टि से देखने का पक्षपाती हूँ. जो मनुष्य को दुर्गति, हीनता और परमुखापेक्षिता से बचा न सके, जो उसकी आत्मा को तेजोदीप्त न बना सके, जो उसके हृदय को परदुखकातर और संवेदनशील न बना सकेउसे साहित्य कहने में मुझे संकोच होता है.” फिर वे साहित्य में भाषा प्रोयोग की बात पर उतर आये. इसके लिए तप और साधना की अनिवार्यता बताई. इस विन्दु पर अपना दृष्टिकोण रखते हुये उन्होंने स्पष्ट किया कि- “सीधी लकीर खींचना टेढा काम है. सहज भाषा पाने के लिए कठोर तप आवश्यक है. जबतक आदमी सहज नहीं होता तबतक भाषा का सहज होना असंभव है. स्वदेश और विदेश के वर्तमान और अतीत के समस्त वाँग्मय का रस निचोडने से वह सहज भाव प्राप्त होता है. हर आदमी क्या बोलता है या क्या नहीं बोलता, इस बात से सहज भाषा का अर्थ निश्चित नहीं किया जा सकता. क्या कहने या क्या न कहने से मनुष्य उस आदर्श तक पहुच सकेगा, जिसे संक्षेप में ’मनुष्यता’ कहा जाता है यही मुख्य बात है.

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में इस विमर्श को एक नया आयाम देते हुये, काव्य को नए रूप में परिभाषित करते हुये अपना मत प्रस्तुत किया. साहित्य के कार्य-व्यापारों की ओर लक्षित करते हुये उन्होंने एक रेखा चित्र कुछ यूँ खींचा - “यदि खिले हुये फूलों को देखकर वह न खिला, यदि सुन्दर रूप सामने पाकर अपनी भीतरी कुरूपता का उसने विसर्जन न किया, यदि दींन-दुखी का आर्तनाद सुन वह न पसीजा, यदि अनाथों और अबलाओं पर अत्याचार होते देख क्रोध से न तिलमिलाया, यदि बेढब और विनोदपूर्ण दृश्य या उक्ति परन हंसा, तो उसके जीवन में रह क्या गया? ..... जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की यह मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है. हृदय की इसी मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आयी है, उसे कविता कहते हैं. इस साधना को हम भावयोग कहते हैं और कर्मयोग और ज्ञानयोग का समकक्ष मानते हैं..... जो केवल विलास या शारीर सुख की सामग्री ही प्रकृति में ढूँढा करते है उनमे उस रागात्मक ‘सत्त्व’ की कमी है जो व्यक्त सत्ता मात्र के साथ एकता की अनुभूति में लीन करके हृदय के व्यापकत्व का आभास देता है. सम्पूर्ण सत्ताएँ एक ही परम सत्ता और सम्पूर्ण भाव, एक ही परम भाव के अंतर्भूत हैं. अतः बुद्धि की क्रिया से हमारा ज्ञान जिस अद्वैत भूमि पर पहुचता है उसी भूमि तक हमारा भावात्मक हृदय भी इस सत्व रस के प्रभाव से पहुँचता है. इस प्रकार अंत में जाकर दोनों पक्षों की वृत्तियों का समन्वय हो जाता है. इस समन्वय के बिना मनुष्यत्व की साधना पूरी नहीं हो सकती”. अंत में पन्त जी ने सभी साहित्यकारों और पाठकों का धन्यवाद ज्ञापित किया, और इस प्रकार परिचर्चा का समापन हुआ.

वापस घर लौटते समय सोच रहा हूँ, साहित्य यदि मनुष्य के लिए ही हो तो क्या होगा? क्या  साहित्याकर एक चाटुकार नहीं बन जायेगा? क्या एक चारण, एक भाट और रागदरबारी बनकर ही नहीं रह जायेगा? साहित्य, केवल साहित्य के लिए भी नहीं होना चाहिए.... कोई ईश्वर को माने या न माने, यह उसकी अपनी मर्जी. लेकिन वह सत्य को तो मानेगा. साहित्य का श्रेय और प्रेय यही सत्य होना चाहिए. इस सत्य को सुन्दरम बनाने का दायित्व साहित्य का ही है. चिन्तक, वैज्ञानिक और दार्शनिक भी अपनी अभिव्यक्ति साहित्य के ही माध्यम से कर पाता है. इसलिय साहित्य ही वह विधा है जो सत्य को भी, दार्शनिक अभिव्यक्ति को भी रगडता है, घिसता है पूरे कौशल और तन्मयता के साथ, उसकी रुक्षता को घिसकर हीरे जैसी निखार लाकर मानव के लिए उपयोगी भी बनाता है और संग्रहणीय भी. यह हीरा लोहे की तिजोरी में नहीं मानव के मन-मस्तिष्क में रहता है. सत्य रूखा होता है, सूखा होता है, कटु होता है. इस सत्य में माधुर्य और सरसता यह साहित्य ही लाता है. वही सत्य को ‘कटु सत्य’ से ‘सुन्दर सत्य’, ‘सत्यम सुन्दरम’ बनाता है. यही ‘सत्यम सुंदरम्’ कल्याणकारी समाज की संरचना करेगा और ‘शिवम’ बनकर उसमे कल्याण की अन्तःशक्ति प्रवाहित करेगा. तब समाज में केवल दो हाथ-पैर वाले मनुष्य मात्र नहीं रहेंगे, रहेगी उसकी आभा ‘मनुष्यता’ और ‘मानवता’ भी. इस मानवता के अभाव में क्या मानव समाज भी केवल एक पशु-समाज बनकर ही नहीं रह जायेगा? इसलिए यह ‘मानवता’ ही साहित्य का एकमात्र लक्ष्य होना चाहए. लेकिन यहाँ भी हमें मुंशी प्रेमचंद की चेतावनी को याद भी रखना होगा -....“अज्ञान की भांति ज्ञान भी सरल, निष्कपट और सुनहले स्वप्न देखने वाला होता है. वह इसके विरुद्ध व्यवहार को अमानुषीय समझ वह यह भूल जाता है कि भेड़ियों ने भेड़ों कि निरीहता का जवाब सदैव पंजों और दांतों से दिया है. वह अपना एक आदर्श संसार बनाकर उसको आदर्श और मानवता से आबद्ध करता है और उसी में मग्न रहता है. हमें इस आत्ममुग्धता को दूर करना होगा. साहित्य को प्रभुता और मानवता में से यदि एक का वरण करना हो तो निश्चित रूप से मानवता को ही वरण करना चाहिए. इसके लिए ज्ञान दृष्टि और समत्व भाव की भी आवश्यक है. लौह और स्वर्ण में समत्व भाव दृष्टि रखनी होगी. शायद इसी का संकेत करते हुये विद्वान समीक्षकों ने अपने संबोधन में ‘तप’, ‘साधना’, ‘कर्मयोग’, ‘ज्ञानयोग’, ‘भावयोग’ जैसी शब्दावली का प्रयोग किया है. विना साधना के मानवता विकसित नहीं हो सकती. इस मानवता में ही दिव्यता है. यह दिव्यता ही ईश्वरत्व है, यह दिव्यता ही प्रकाश है, यह दिव्यता ही अमृतत्व है. साहित्य का उद्देश्य इसी लक्ष्य की प्राप्ति होनी चाहिए और यही है भी. तभी तो साहित्य विनती करता है स्वर-संगीत की देवी से –
      हे माँ!
      मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो.
      मुझे अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो.
      मुझे मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलो.

                                     
                                 प्रस्तुति: अनाम दास ‘स्वर्गवासी’
                                  ग्राम पोस्ट - भरसर
                                  जिला- बलिया निवासी  

Wednesday, September 12, 2012

काव्य-संग्रह ‘कस्तूरी’: जैसा मैंने समझा (अंतिम भाग - ५)


प्रेम है शाश्वत एक तरंग, निर्मल - स्वच्छ धवल है रंग
सृष्टि पूर्व उपजा यह प्रेम, है सृष्टि का करण यही प्रेम.
प्रकृति प्रेम में ही अनुरक्त, लेकिन प्रकृति प्रेम अवरक्त.
प्रकृति नटी,पुरुष निर्लिप्त, इसके गति में नहीं सश्लिष्ट.

         यह सच है, प्यार जब भी अपने सर्वोच्च शिखर का संश्पर्श करता है, उसकी अभिव्यक्ति लडखडा ही जाती है. शब्दों के बोल छोटे पड जाते है, उपमाएं और उपमान अपना दामन छुड़ाने लगते है, और ऐसी स्थिति में प्राप्त होते हैं- कुछ संकेत, कुछ विम्ब, कुछ प्रतीक. काव्य-संग्रह ‘कस्तूरी’ में प्यार का यह शिखर विन्दु भी है कुछ इस रूप में – ‘तुम जब भी छूते हो, मैं बेहोश हो जाती हूँ / फिर तुम छोकर मुझे होश में लाते हो / पास आ तो जाऊं मैं भी तुम्हारे लेकिन / मैं भी जल जाती हूँ / और तुम भी झुलस जाते हो / कहते हो खुद को मासूम / और राज बन मेरे दिल में उतर जाते हो’. याद है मुझे, ऐसे ही एक प्रश्न कि प्यार क्या है? इसके उत्तर में मनीषी चिन्तक डॉ. राम गोपाल चतुर्वेदी जी का उत्तर था– “प्रेम का पुरस्कार ईश्वर को भक्ति मार्गियों ने दिया था. यह भक्ति मार्ग सूफीवाद के समकक्ष है और सूफीवाद में खुदा और उसके मुरीदों के मध्य आशिक –माशूक का सम्बन्ध माना गया है. इश्क का ही हिंदी पर्याय प्रेम है और इश्क या प्रेम में रति भाव का प्राधान्य रहता है. शास्त्रों में रति को उद्गीथ कि संज्ञा दी गई है. छान्दोग्य उपनिषद में एक वामदेव्य साम का उल्लेख है जिसमे रति सुख को उद्गीथ माना गया है. उद्गीथ और आनंद में कोई तात्विक भेद नहीं है. उद्गीथ प्रक्रिया है और आनंद उसका परिचय”. कस्तूरी के रचनाकार भी इस उद्गीथ की प्रक्रिया से कई-कई बार गुजरते हैं. उनके मन में तरह-तरह के भाव उठते हैं, तरंगें हिलोरें मारती हैं और ये चिन्तक उनका रसास्वादन और वर्णन कर आनंदित होते है. मन में उठने वालों भाव के रूप-स्वरुप अलग-अलग है. देवीदुर्गा की आराधना - वंदना में इन विविध मनोभावों का एक विषद परिचय मिलता है. प्रसंगवश उनका उल्लेख शायद हमारी राह को, परिचर्चा को और आसान बना दे. इससे विषय- -सामग्री और विषय-वस्तु को समझने में भी सरलता ही होगी. ये मनोभाव हैं– बुद्धि, क्षुधा, छाया, शक्ति, तृष्णा, जाति, लज्जा, शांति, श्रद्धा, काँति लक्ष्मी, वृत्ति, स्मृति, दया, तुष्टि, मातृत्व और भांति.

प्रेम भी एक उपासना है इनमे से कई मनोभावों का प्रभावी-चित्रण और प्रभावी अभिव्यक्ति हुआ है. आदर्श की उपासना, चरम और परम की उपासना. प्रेमी की यह उपासन ही जब अभिव्यक्ति का विषय बनती है तो काव्य और साहित्य का सृजन होता है. इस सृजन में भावों को उभारने वाले कारक और साधन, आलंबन या उद्दीपन कहे जाते हैं. यह आलंबन भाव देखकर, सुनकर याँ अनुमान के आधार भी उत्पन्न होते हैं. यह लौकिक भी हो सकती है और पारलौकिक भी. भावनाओं का प्रस्तुतीकरण ही साहित्य है और साहित्य से वैयक्तिक मन और समाज दोनों भाव विभोर हो उठते हैं. कस्तूरी को पढकर ऐसे ही भाव उठ रहे है. भाष-शैली की दृष्टि से कहीं-कहीं परिष्कार की आवश्यकता है लेकिन भाव सम्प्रेषण में बाधक नहीं है. सृजनात्मक भाव श्रेष्ठ समाज की संरचना करता है, आत्म-समीक्षा के लिए प्रेरित करता है. इसलिए कहना चैये साहित्य समाज का दर्पण ही नहीं, प्रेरक भी है. इस प्रकार प्रेरक साहित्यकार की जिम्मेदार और भी बढ़ जाती है. यदि और खुलकर कहा जाय तो सहिय्कार समाज को बनाने, सवारने और मिटने की दावा है. यह विज्ञान रूप में सिद्दांत तथा संतरूप में दुआ है. यह समाज ही है, आज का समाज भौतिकता का समज, विज्ञान का समाज, प्रौद्योगिकी का समाज जिसने छीन लिया है माँ प्रकृति के मुह से मृदुलता की लोरी भी, अपने दंभ में- ‘लोरी छीनकर / तुमने ही उसे काली का रूप दिया है / और इस रूप में वह संहार ही करेगी / सिर्फ संहार’. लेकिन क्यों? क्योकि इस विज्ञान और प्रौद्योगिकी मिलकर माँ प्रकृति का दोहन-शोषण निर्दयता पूर्वक कर रहे हैं.

विज्ञान है परिकल्पनाओं का परीक्षण, उनका गणितीय मान, और तकनीक है विज्ञान का वह लाडल-पुत्र जिसके एक हाथ में है ‘सृजन’ और दूसरे हाथ में है ‘ध्वंश’ की चावी. इस तकनीक के ‘ट्रिगर’ और ‘बटन’ पर शासन और वर्चस्व है, संकल्पना और परिकल्पना रुपी उँगलियों का. इस परिकल्पना के मूल में है यह विचार कि वह भाई को समझता क्या है- एक ‘मित्र’ अथवा ‘शत्रु’? अब विज्ञान स्वयं तो है बूढा-लाचार, उसने थमा दिया है अपनी मशाल बन्दर के हाथ मे. यह बन्दर ही है जिसका अपना कोई निजी घर-द्वार नहीं होता, यह जब भी जलाएगा, होगा वह किसी दूसरे का छप्पर. मेहनत और खून-पसीने से छाई गई एक कुटिया. तकनीक अश्वत्थामा रुपी विज्ञान का वह अस्त्र है जिसे छोड़ा तो जा सकता है, परन्तु उसके द्वारा रोका नहीं जा सकता. तो कौन समझायेगा विज्ञान के इस बिगडैल पुत्र को? वही श्रीकृष्ण जिन्होंने मोड दिया था अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र को. आज भी वही मोड़ेगा, विज्ञान के इस बिगडैल पुत्र के अस्त्र को. इसलिए उन्ही श्रीकृष्ण को एकबार पुनः याद किया गया है इस ‘कस्तूरी’ में – ‘युद्ध भूमि में उतरना था / विस्वास करो या न करो / सारथि श्रीकृष्ण बने / दिया उपदेश / क्या है छल! क्या है भ्रम! / विश्वास भरने को नरक का द्वार भी दिखाया / जिन्हें महारथी माना था / उनका असली रूप दिखया’. जब असली रूप दिख गया तो ये चिन्तक शांत बैठने वाले ही कब थे, जुट गए समाज सृजन के कार्य में अपने-अपने हुनर के साथ. शय्स संवेदी चिन्तक उस तकनीक से ही पूछता है – ‘ऐ तुम! / ‘मैं’ बनकर तुम्हे जो मिला / क्या उसे आज उपलब्धि मानते हो / या अब एक ‘मैं’ ही रह गया तुम्हारे पास? / और हम की तलाश में / तुम खुद में प्रलाप करते हो?”.

इस प्रकार ‘कस्तूरी’ के संवेदी चिंतकों ने काल को, काल की गति को पहचान लिया है. प्रेम करने वाला डरता तो नहीं, लेकिन संवेदी होने के नाते अपनी अनुभूति को अभिव्यक्त तो करता ही है. मीठे अनुभव भले ही विस्मृत हो जांय, खट्टे और तीक्ष्ण अनुभूति कभी भूलती नहीं. वह लेखनी के संस्पर्श को छटपटाती है और जब भी लेखनी का साथ पाती है, वह रंग जाती है पूरे पृष्ठ को, पृष्ठों को, अपनी वेदना से, अपनी पीड़ा से.- ‘कोई मुझसे प्रेम नहीं करता / सब मुझसे बचते फिरते रहते हैं / सुनिए मेरा नाम है बुरा वक्त / ... समय है बड़ा बलवान / कि इस किस्मत के आगे / जीतते – जीतते क्यों हर जाता है इंसान / क्यों भाग्य का खेल / ९९ पर खत्म होकर फिर शून्य(०) से शुरू हो जाता है?’. शून्य एक अज्ञात राशि है, अंजान संख्या है. इस प्रकार जीवन के विभिन्न थपेडों को झेलते हुये युवा अन्वेषी मन एक रहस्य कि चादर ओढ़ लेते है, रहस्यवाद के क्षेत्र में पहुच जाते हैं, अंतर्मुखी हो दार्शनिकता की चादर ओढ़ लेते हैं. और पुष्टि करते हैं कविवर पन्त के इस कथन की –“वियोगी होगा पहला कवी आह से उपजा होगा गान, निकल कर आँखों से चुपचाप बही होगी कविता अंजान”. लेकिन दार्शनिक की कविता अंजन कब तक रहती? वह ढूढ़ ही लेता है इस शून्य का मूल्य. इस शून्य का मान – ‘शून्य, शून्य और सिर्फ शून्य / पता नहीं फिर भी लगता है / कुछ बचता है कहीं शून्य से परे / स्वयं का बोध / या कोई कड़ी / अगली सृष्टि की / ... कुछ ऐसा है जो / बचता है शून्य के बाद भी’. बिलकुल सही बात है वंदना जी! ‘शून्य’ जो शून्य तो है ही, प्रकारांतर से वही पूर्ण भी है. यही पूर्णता  आवर्ती गति करती रहती है- धनात्मक आवर्त सृष्टि है और ऋणात्मक आवर्त प्रलय. दूसरे शब्दों में धनात्मक आवर्त पूर्णता है और ऋणात्मक आवर्त शून्यता. और यह शोध किया जा चुका है कि पूर्ण में से पूर्ण घटने पर भी पूर्ण ही अवशेष बचता है. शास्त्र वचन है - पूर्णस्य पूर्णम आदाय पूर्ण मेव अवशिष्यते’. इस तरह इस टीम ने एक पूरी यात्रा कर ली है, शून्य से अनन्त और अनन्त से शून्य तक की.

यह तो हुई भावनात्मक यात्रा, अध्यात्मिक यात्रा. यह लौकिक यात्रा वहाँ जाकर पूरी होती है जहाँ जब पहले प्रश्न, परम जिज्ञासा का उत्तर मिलता है. प्रश्न था - जिंदगी के सफर में जो खुशियों का नगर है, वह कहाँ है..? वह कहाँ है...? उत्तर मिला– वह यहीं है.., यहीं है.., यहीं है... यहीं... जहाँ.. तुम रहते हो! जहाँ तुम्हारा जन्म हुआ है... जहाँ की मिटटी में खेल कर पाले-बढे हो.., जहाँ का अन्न-जल ग्रहण कर तुम प्रश्न करने लायक बने हो! तुम्हारी प्यारी जन्म-भूमि. तुम्हारा अपना प्यारा देश- ‘भारत वर्ष’. संवेदी मन निष्कर्ष प्राप्त कर बोल ही तो उठता है – ‘नहीं चाहता विश्व भ्रमण / भातर दर्शन की आशा है / मैं गली – गली में रमण करूं / मन जनम –जनम का प्यासा है / .. हर नगर राज्य मैं देख सकूँ / अपना समाज मैं देख सकूं / कल विश्व-गुरु कहलाया क्यों / वो नीव आज मैं देख सकूं’. इस प्रकार इस ‘कस्तूरी’ की खोज में यह युवा रीम निकल पड़ी थी, भटक रही थी, वह कस्तूरी मिली उनके अपने ही घर में, उनकी ही नाभि में. इस प्रकार इस काव्य संग्रह का नाम ‘कस्तूरी’ रखा जाना औचित्य पूर्ण है. यह सर्वांश में अपने नाम को सार्थक करती है.

     डॉ. जय प्रकाश तिवारी
   संपर्क- ९४५०८०२२४०


Kasturi

(Hardcover, Hindi)
by 

Anju Anu Chaudhary

 (Edited By), 

Mukesh Kumar Sinha

 (Edited By)
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Monday, September 10, 2012

‘कस्तूरी’: जैसा मैंने समझा (भाग - ४)



संवेदनाये समीक्षक की जब जोर मारती
 मौन के सारे निहितार्थ खोलती.
                    मौन भी मुखर तब हो जाता,
और उस शून्य में अनन्त
                         प्रकट हो ही जाता.
 सहस्रदल कमल
   खिल जाता.

प्रेम तत्व के अनुसन्धान में यह विमर्श और आगे बढ़ता है, गतिशील होता है. अब इस प्रेमानुसंधान में ऐसे भी क्षण आते हैं जब शोधार्थी यह समझ नहीं पता कि इस प्रेम की सत्यता क्या है? यह शरीरी है या अशरीरी? यह प्रत्यक्ष है या परोक्ष? इसकी वास्तविकता क्या है? अंत में संवेदी मन स्वयं से पूछ ही बैठता है कि – ‘तेरा मिलना ख्वाब है या हकीकत / बस बंद पलकों में कैद रहती है तू / जुगनू को सितारा समझ भटकता रहा / कस्तूरी है तू या फिर एक छलावा?’. कौन पहचानेगा इसको? अरे वही जिसने प्रेम किया हो, जिसे प्रेम हुआ हो, जिसने प्रेम को जिया हो. वही पहचानेगा और वही कह भी सकेगा – ‘तू रो मुझमे, और अपने अश्क / पलकों से मेरी बहने दे’. यह है अनुराग की वह भाषा जो हम-उम्र या प्रेमी-प्रेयसी के बीच के संवाद रूप में प्रकट है. इसी प्रकार अनुराग का एक दूसरा परिदृश्य भी है यहाँ, स्नेह और श्रद्धा के रूप में, माँ से स्नेह-संवाद के रूप में – ‘माँ / तुमने सब दिया / जन्म और सुख के सभी आधार / पर पुत्री को क्यों / न दिया सेवा का अधिकार?’ प्रकारांतर से यह प्रश्न माँ के माध्यम से समाज से भी हैऔर सामाजिक व्यवस्था से भी. इस प्रकार यह ‘काव्य-संग्रह’ प्रेम प्रसंग के माध्यम से सामाजिक विमर्श के विभिन्न पहलुओं का सूक्ष्म संस्पर्श करता है, अवसर और अवकाश ढूँढता है. परिमार्जन और शोधन के लिए चिह्नित करता है, ऐसा कोई भी प्रयास रचनात्मकता की श्रेणी में ही रखा जायेगा. अभी हल ही में पुत्री द्वारा मुखाग्नि दिए जाने का कम से कम दो उदहारण समाचार पत्रों की सुर्ख़ियों में था जिसे मने रूचि लेकर पढ़ा भी था..

प्रेम तत्व के इस अन्वेषण की एक विशेषता और भी है. यहाँ प्रेमी युगल के मध्य संबोधन को लेकर एक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण भी है जहाँ ‘आप’, ‘तुम’ और ‘तू’ के प्रयोग को लेकर एक औचित्यपूर्ण विवेचन देखने को मिलता है. और यहाँ अंततः छुपा हुआ अपना स्व, अपना अहम, स्वाभिमान जाग्रत हो उठा है – ‘मैं तुम्हे और तुम मुझे / मेरे ही नाम से पुकारेंगे / अपना – अपना वजूद लिए हम / एक दूसरे के / उम्र भर रहेंगे’. और जहाँ मान - स्वाभिमान – अभिमान – गुमान प्रकट हो उठे, वहाँ प्रेम कहाँ? इसलिए सावधानी की आवश्यकता है यहाँ. लेकिन प्रेम में सावधानी हो भी नहीं सकती. जहाँ प्रेम में सुधि-बुद्धि सब खो जाय, वहाँ सावधानी के लिए अवकाश भी कहाँ? इसलिए प्रेम के सन्दर्भ में उसकी व्याख्या में प्रयुक्त शब्दों के अभिधात्मक अर्थों तक ही पाठक या समीक्षक को उलझ कर नहीं रह जाना चाहिए. लक्षणात्मक और व्यंजनात्मक शब्द-शक्तियों की शरण में भी अवश्य ही जाना चाहिए. शब्दों का अपना महत्व तो है लेकिन एक सीमा तक ही, उसके आगे नहीं. जबकि प्रेम की गति संकेत, प्रतीक और मौन तक है. इस युवा पीढ़ी को इसका संज्ञान है, तभी तो वे कह सके हैं – ‘शब्द मुखर हो जाते हैं / किन्तु / मोल उन शब्दों का नहीं / जो प्रभावित करने की आकांक्षा में / निकले थे / शब्दों का जाल तो प्रपंच भी हो सकता है / मोल तो स्वयं निष्ठां / स्वयं की आस्थाओं का है’. यह निष्ठा और आस्था की चरमावस्था ही तो है कि प्रेयसी ने अपने साजन में ही प्रभु का साक्षात्कार कर लिया. यह भाव प्रवणता-सघनता नहीं तो और क्या है?  यहाँ अनुराग का वह भाव प्रकट हुआ है जिसे भक्ति की संज्ञा दी गई है. अब देखिये न नायिका का विह्वल सा उत्तर – ‘तुम बिलकुल / कृष्ण का रूप लगते हो सजना / अब तुम ही कहो / मुझे किसी भगवान की कया जरूरत / मैं तुमको जो देख लेती हूँ / आँख खुलते ही’. लेकिन यह तो आदर्श की चरम स्थिति है और वर्तमान में वह आदर्श कहीं नजर नहीं आता. इसलिए वर्तमान में जीने वाला प्रेमी तुरत ही इसका प्रतिवाद करता है और छोड़ जाता है एक अत्यंत महार्व्पूर्ण प्रश्न – ‘हमें तो आज में जीना है / क्योकि आज जो है वही सत्य है / और सत्य ही शिव है / तो फिर शिव की तरह / सुन्दर क्यों नहीं होता / शिव, जिनका न कोई आदि है / न अंत / विल्कुल प्रेम की तरह / तो फिर सत्य क्यों / प्रेम की तरह कोमल नहीं होता?
                        क्रमशः
                                 डॉ. जय प्रकाश तिवारी
                                  संपर्क – ९४५०८०२२४०


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