Tuesday, February 6, 2018

कौन, किसने डाला डेरा?

पाकर मुझे नितांत अकेला
यह कौन, किसने डाला डेरा?
छू-छूकर मेरे तन-बदन को
वासंती हवाएँ गुदगुदा रही हैं
उनको क्या मालूम कि मेरे 
दिल का दर्द वे बढ़ा रहीं हैं ।
अरे, मेरी बात न पूछो तुम
हर दर्द यहाँ मेरा सहचर है
बैठा हूँ चुपचाप, मौन धर
इसका यह मतलब तो नहीं
कि अकेला है, घर खाली है
यह प्रतीक्षा रत बनमाली है।
मुंह खोला तो छलक पड़ेंगे
तेरे नयनों से ही खारा- खारा
गमगीन, उतप्त, गरम आँसू
देखो तुम अल्हड़ हो मदमाती
तुम ठंडी पवन का झोंका हो
इस तरह पास क्यों आ रही?
क्या तेरा भी मन भर गया है
ठंडे, मीठे इस सरिता जल से?
क्यों पीने ये अश्रु यहाँ आई ?
नहीं छोड़ा करते घर को यूँ ही
जा, लौट जा वापस घर को तू
हाँ, लौट जा वापस घर को तू ।
यदि देर हुई जग यह टोकेगा
तुझे घर मे घुसने से रोकेगा
चाहे जितना दे लो सफाई
तेरी बात न कोई समझेगा
देनी होगी तुझे अग्नि-परीक्षा
पवित्रता अपनी बताने को
मेरे कहने से भी कुछ ना होगा
मानेगा यहाँ कोई भी नहीं।
निर्जन है, बदन छुया न होगा
रूप गंध किसी ने पिया न होगा
किससे क्या बतलाओगी तुम
जा, लौट जा वापस घर को तुम॥
जयप्रकाश तिवारी

Saturday, February 3, 2018

मैं और मेरा जीवन


जीवन सुख दुख का मिश्रण
खट्टा - मीठा एक घोल सा
सरल- शांत - घट - मोम सा॰
हमी बनाए गरल हैं, इसको
यह जल है, मेघ है, व्योम सा.
खोलना चाहोगे, खुल जाऊंगा
परत - परत भी मैं हो जाऊंगा
चाल चलोगे लेकिन कोई यदि
अभेद्य दुर्ग सा बन जाऊंगा।
सरल नहीं, गरल ही समझो
गूढ रहस्य एक बन जाऊंगा ।
माना तुम सबल, बुद्धिमान हो
फिर भी मैं हाथ नहीं आऊँगा
कभी भी साथ नहीं आउंग,
बन के पवन बहता ही रहूँगा
लेकिन सूनी होगी मुट्ठी तेरी,
न मिश्रण हूँ मैं, न यौगिक हूँ
विशुद्ध तत्व मैं बन जाऊंगा
भारहीन, रूप रंगहीन मैं
विस्तृत व्यापक हूँ ऊर्जा सा,
मेरी ही शक्ति दमकते हो तुम
मैं हूँ 'सांत', मैं ही 'अनंत सा'॥
डॉ जयप्रकाश तिवारी

Sunday, January 28, 2018

तूने जिंदा कवि को मार दिया



हाँ, कविताओं को मैं पढ़ता हूँ
और कविता भी मैं लिखता हूँ
कवि की चाह, पढें सब कविता
डरता हूँ, कविता पढे न कविता,

ठन जाएगी, कविता-कविता में
मैं कहाँ संभाल पाऊँगा कविता
कविता - कविता के इस द्वन्द्व में
पिस जायेगी बेचारी मेरी कविता।
नहीं खोना चाहता कविता को
इसलिए संभालता हूँ कविता
चलो यह एक अच्छी बात हुई
भा गयी, कविता को कविता,

अरे अब पिसने की बारी, मेरी है
बच पायेगी नहीं अन्तः कविता
अरे कविता को कौन बचाएगा
लिखने लगी कविता, कविता।

पाला जिस कविता को मैंने
आँसू अपना पिला - पिलाकर
कविता ने उसे बाजार दे दिया
हँस - हँसकर, खिल खिलाकर,

कविता को कविता लिखने का
किसने यह अधिकार दे दिया?
कविता मेरी, दयाकर मुझपर
तूने जिंदा कवि को मार दिया।

पहुंचा संदेश जब छापाखाना
कुछ अर्थी को लेकर आ गए
कुछ लगे तलासने मेज मेरा
कुछ डायरी लेकर भाग गए ,

अभी मरा नहीं, मैं जिंदा हूँ
कविता-कविता रटता ही रहा
कविता ने मारा, कविता से
कविता-कविता कह रोता रहा

कविता छापने के बदले मे
प्रकाशक ने थोपी थी कविता
ला, अब ला, तू मेरी कविता
ले जा, अपनी प्यारी कविता,

नहीं जाऊंगा, प्रकाशक पास
क्या छोड़ दूँ , लिखना कविता?
नहीं, छोड़ नहीं सकता लिखना
लिखुंगा स्वांतः सुखाय कविता॥
- जयप्रकाश तिवारी

Tuesday, January 9, 2018

मैं और मेरा जीवन

जीवन सुख दुख का मिश्रण
खट्टा - मीठा एक घोल सा
सरल- शांत - घट - मोम सा॰
हमी बनाए गरल हैं, इसको
यह जल है, मेघ है, व्योम सा.
खोलना चाहोगे, खुल जाऊंगा
परत - परत भी मैं हो जाऊंगा
चाल चलोगे लेकिन कोई यदि
अभेद्य दुर्ग सा बन जाऊंगा।
सरल नहीं, गरल ही समझो
गूढ रहस्य एक बन जाऊंगा ।
माना तुम सबल, बुद्धिमान हो
फिर भी मैं हाथ नहीं आऊँगा
कभी भी साथ नहीं आउंग,
बन के पवन बहता ही रहूँगा
लेकिन सूनी होगी मुट्ठी तेरी,
न मिश्रण हूँ मैं, न यौगिक हूँ
विशुद्ध तत्व मैं बन जाऊंगा
भारहीन, रूप रंगहीन मैं
विस्तृत व्यापक हूँ ऊर्जा सा,
मेरी ही शक्ति दमकते हो तुम
मैं हूँ 'सांत', मैं ही 'अनंत सा'॥
डॉ जयप्रकाश तिवारी

Friday, January 5, 2018

माँ की चरणों मे बैठकर

इस जीवन के बीते कई बरस
कहीं धूप खिला कहीं साया है
इस अनुभव के हैं विविध रंग 
मेरे रग रग में यही समाया है
माँ छोड़ गयी, एक महापुराण
ये शब्द नहीं, शब्दों मे प्राण
शब्द ही तो गीता का उपदेश
शब्द ही रामायण का संदेश
शब्द मे वेद उपनिषद निर्देश
शब्द के भाषा- बोली कई देश 

इन शब्दों की कोई माया है?
या है निहितार्थ का माधुर्य?
किसी शिल्पी की कृति है यह
या प्रज्ञा का अपना उत्कर्ष?
किसमे इतनी प्रतिभा है, और
कौन हो गया इतना समर्थ ?
दयानिधान की दया मिले जब
और करुणा, करुणानिधान की
तब जाकर कहीं मिलता आशीष
ऐसे ही नहीं कोई बनता मनीष.

भाई पूजा करनी पड़ती है यहाँ
अरे ! एक नहीं, अनेको बार
पूनम की शीतल चांदनी हो
या अमावस की घोर अंधकार
सबके जीवन मे तृष्णा है
निदान सबकी यह कृष्ण है
कृष्णा होना कोई सरल नहीं
अमृत सुधा है, गरल नहीं
गोदी जिसके खेलती नेहा
माथे पर रोली - चन्दन है
निशा -राकेश, संधि वेला मे
सबका ही यहाँ अभिनंदन है ,

करना पड़ेगा स्वीकार सबको
जन्म-मृत्यु दो छोर जीवन के
जिया जन्म तो मारना ही है
यही, यही तो सच्चा ज्ञान है
ज्ञान - योग यह सरल नहीं
पीयूष है यह, कोई गरल नहीं
नरेंद्र को कितने जानते है
सब स्वामी को पहचानते हैं.
कवीन्द्र रवींद्र की बात अलग
भोले के नाथ तो राम ही हैं
राम के नाथ हैं बोलो कौन?
मेरे प्रश्न पर क्यों सब मौन?

उमा - रमा- अनुसुइया सबकी
अपनी अपनी अलग कहानी है
किसी के लिए 'विनोद, परीक्षा
किसी की संकट में जवानी है,,
खिलता प्रकाश जिसका यहाँ
तिमिर को जो जय करता है
विद्या के अभाव में वही
मंजु - पुष्प को भी डँसता है.
उम्र बीत गयी दम्भ न गया
मन से लोभ प्रीति ना गया
यहाँ बैठे- बैठे यह सोच रहा हूँ
अरे क्या पाया, क्या खो गया?

जिसने लहू पिलाकर पाला था
कोई देवी थी वह, या काजी था
विलीन हो गयी परम सत्य में
नाम जिसका - 'देवराजी' था,
ऐसे ही नहीं यह नाम पड़ा था
देवों को उसने किया था राजी
मरते दम तक उपवास किया
किसमें इतना दम? बोलो जी !
मृत्यु को उसने टाल दिया था
एक नहीं, कई बार किया था
इतनी दृढ इच्छा-शक्ति थी उसमे
उसने अपना स्व-धर्म जिया था.
वह चली गयी, पर छोड़ गयी
क्या छोड़ गयी, यह सोचना है
जिस पल्लव-पुष्प को छोड़ गयी
मिलकर उसको अब सींचना है.
जयप्रकाश तिवारी

Thursday, December 21, 2017

'माँ' जीवन की मेरे
संबल थी, आशा थी
मेरे व्यक्तित्व की 
सम्पूर्ण परिभाषा थी,
उसकी इच्छा ही थी, 
मेरे लिए संविधान
मैं  सुनता रहा, 
जग कहता रहा, 
पागल एक इंसान

डॉ जयप्रकाश तिवारी

Friday, September 29, 2017

आत्मा और आत्मस्थ

प्रवचन सुना, जाना मैंने 
पढ़ा शास्त्र तो जाना मैंने 
आत्मा हूँ मैं, काया नहीं, 
ब्रह्म-रूप कोई माया नहीं।  
आत्मा हूँ पर आत्मस्थ नहीं 
तट हूँ पर अभी तटस्थ नहीं ,
कर रहा हूँ खूब मैं भाग दौड़
एक रोगी हूँ मैं, स्वस्थ नहीं।
कहीं बना हुआ नागफनी मैं
कहीं बना हुआ हूँ अमर बेल
घास - फूस सा जीवन मेरा
बन सका कभी अश्वत्थ नहीं। .
मैं नाच रहा एक लट्टू बनकर
अभी उदय हुआ है, अस्त नहीं
निकलूं बाहर, मैं भी यह देखूं 
एक नदी सा हूँ मै, तटस्थ नहीं.
अब होऊं तटस्थ तो बात बने
अभी चंचल हूँ, ध्यानस्थ नहीं
संवेदना बढे तो कुछ बात बने
वेदना बढे... तो कुछ बात बने,
बढ़ गयी है वेदना इतनी अब
कर्मनिष्ठ हुआ, समाधिष्ठ नहीं
ध्यान-ज्ञान विलीन कर्म में
कर्मनिष्ठ हूँ मैं, समाधिष्ट नहीं .
मिट गया भेद तेरे- मेरे का
अज्ञेय नहीं हूँ, ज्ञेय हूँ अब
योगी हूँ और गृहस्थ भी हूँ
आत्मा हूँ और आत्मस्थ भी हूँ.
डॉ जयप्रकाश तिवारी