Monday, July 17, 2017

पागल पथिक मैं पंडित हूँ
निज हाथों से ही दंडित हूँ
दुनिया को समझ नहीं पाता
इतना जर्जर और खंडित हूँ,
फिर भी है पौरुष शेष बहुत
हो जाऊँ कैसे शून्य हृदय?

रस नेह भरा है पोर - पोर
जाता छ्लक मेरा यह हृदय
माथे से लगा लूँ चरण धूलि
सुपात्र अगर कोई मिल जाये
उसे त्याग दूँ सूखे पत्ते जैसा
कुपात्र अगर कोई हो जाये,

कोमल हृदय इतना है मेरा
हर आँसू देख पिघल जाता
है कठोर बतलाऊँ कितना
रिश्तों की परवाह न करता
यदि बात समझ मे आ जाये
तो तप्त चट्टान, मैं पर्वत हूँ
यदि बात समझ मे आ जाये
सुरभित सा शीतल शर्बत हूँ।

यह नयी नहीं है व्यथा कोई 
सदियों से यही करता आया 
संवेदना की सुंदर कुटी मेरी 
वेदना के संग - संग रहता हूँ,
यह बीड़ा तब से उठा रखी है 
जीवन को जब से समझा है. 
जन्म- मृत्यु  छोर हैं उसके
जीवन को किसने समझा है?

सदियों से यही तो होता आया 
जहर मिला, कभी तीर मिला
आग मिली, कभी पीर मिला 
घात-प्रतिघात औ नीर मिला,
कभी भी, हार नहीं मानी मैंने 
चल रहा है अबतक सिलसिला।
ब्रूनों, सुकरात, कौटिल्य कहो  
तुलसी, कबीर या बुद्ध कहो 
कहो महावीर या पग की घास 
मैं 'जय' हूँ, इनका ही 'प्रकाश' ।

अरे तेरी भी औकात है क्या 
जो सजा मुझे कभी दे सके
मैं नहीं किसी से डरता हूँ 
डरता हूँ केवक एक प्रभु से ,
मेरी कृष्ण कहानी कोई नहीं 
जो भी है वह राम कहानी है 
सरल नहीं मेरी राम कहानी 
व्यथा मेरी कितनों ने जानी?
छोड़ो, क्या फर्क पड़ता इससे 
मैंने हार नहीं अब भी मानी।

हाँ, पागल पथिक मैं पंडित हूँ 
निज हाथों से ही दंडित हूँ॥

डॉ जयप्रकाश तिवारी 

पागल पथिक मैं पंडित हूँ

पागल पथिक मैं पंडित हूँ
निज हाथों से ही दंडित हूँ
दुनिया को समझ नहीं पाता
इतना जर्जर और खंडित हूँ,
फिर भी है पौरुष शेष बहुत
हो जाऊँ कैसे शून्य हृदय?

रस नेह भरा है पोर - पोर
जाता छ्लक मेरा यह हृदय
माथे से लगा लूँ चरण धूलि
सुपात्र अगर कोई मिल जाये
उसे त्याग दूँ सूखे पत्ते जैसा
कुपात्र अगर कोई हो जाये,

कोमल हृदय इतना है मेरा
हर आँसू देख पिघल जाता
है कठोर बतलाऊँ कितना
रिश्तों की परवाह न करता
यदि बात समझ मे आ जाये
तो तप्त चट्टान, मैं पर्वत हूँ
यदि बात समझ मे आ जाये
सुरभित सा शीतल शर्बत हूँ।

यह नयी नहीं है व्यथा कोई 
सदियों से यही करता आया 
संवेदना की सुंदर कुटी मेरी 
वेदना के संग - संग रहता हूँ,
यह बीड़ा तब से उठा रखी है 
जीवन को जब से समझा है. 
जन्म- मृत्यु  छोर हैं उसके
जीवन को किसने समझा है?

सदियों से यही तो होता आया 
जहर मिला, कभी तीर मिला
आग मिली, कभी पीर मिला 
घात-प्रतिघात औ नीर मिला,
कभी भी, हार नहीं मानी मैंने 
चल रहा है अबतक सिलसिला।
ब्रूनों, सुकरात, कौटिल्य कहो  
तुलसी, कबीर या बुद्ध कहो 
कहो महावीर या पग की घास 
मैं 'जय' हूँ, इनका ही 'प्रकाश' ।

अरे तेरी भी औकात है क्या 
जो सजा मुझे कभी दे सके
मैं नहीं किसी से डरता हूँ 
डरता हूँ केवक एक प्रभु से ,
मेरी कृष्ण कहानी कोई नहीं 
जो भी है वह राम कहानी है 
सरल नहीं मेरी राम कहानी 
व्यथा मेरी कितनों ने जानी?
छोड़ो, क्या फर्क पड़ता इससे 
मैंने हार नहीं अब भी मानी।

हाँ, पागल पथिक मैं पंडित हूँ 
निज हाथों से ही दंडित हूँ॥

डॉ जयप्रकाश तिवारी 

Wednesday, July 12, 2017

तुमसे श्रेष्ठतर कौन सी कविता?

लिखे शब्द कुछ, जब भी मैंने 
शब्दों मे तेरी ही छ्वि पायी 
ढले अर्थ मे, शब्द वे जब भी 
मूरत तेरी ही, सामने  आयी,
शब्द, अर्थ चाहे जीतने सुंदर 
उन सबको ही  आभूषण पाया
शास्त्रीय शब्द हैं शील तुम्हारे
देशज मे भाव - भंगिमा पाया।

उमड़ी जब भाव शब्द की बदली 
लगा, यह केश तुमने लहराया
कौंधी जब उसमे, दमक दामिनी 
यह लगा मुझे, तूने पास बुलाया,
तुम छंद बद्ध, तुम छंद मुक्त हो
नित नित नूतन औ उन्मुक्त हो 
सोच रहा, छोड़ दूँ लिखना कविता 
तुमसे श्रेष्ठतर कौन सी कविता?



डॉ जयप्रकाश तिवारी 

Monday, July 3, 2017

आत्म विमर्श की वेला

आत्म विमर्श की वेला मे
पूछा मन ने कौन हो तुम?
उत्तर मिला - ‘सर्वनाम’
कौन है ‘संज्ञा’,
इस सर्वनाम का?
और... ‘तुम’ कौन?
मैं भी ‘सर्वनाम’,
किसका? किस ‘संज्ञा’ का?
अरे ! ‘मैं’ और ‘तुम’!
दोनों ही सर्वनाम तो
बीच मे ‘वह’ किसका नाम?
अरे ! वही..., वह..., उसका
अरे ! उसी ‘संज्ञा’ का,
क्या है – ‘वह’?
अरे! यह भी तो है
सर्वनाम, किसी ‘संज्ञा’ का।

तो ... फिर
यह ‘संज्ञा’ है कौन?
यह जो रूपवान? आकृतिमान?
हस्त–पाद वाली आकृति? शरीर?
नहीं, ... नहीं. यह काया है
फिर वह जो है ‘सर्वनाम’
वह वाचक है ‘किसका’?
क्या वह, जो आचार्य है?
अभियंता है? वैज्ञानिक है?
शिक्षक - नेता - फकीर है?
ऋषि – मुनि – साधु है? 


लेकिन ...
क्या यह उनकी तकदीर है?
अरे नहीं...यह तो है ‘विशेषण’
‘संज्ञा’ की, उस ‘सर्वनाम’ की
तो जो कार्य करते हैं ये लोग?
वह क्या है...? वह तो
एक ‘प्रक्रिया’ है, वह भी सर्वनाम,
फिर … वही प्रश्न ...
तो ‘संज्ञा’ क्या है?
व्याकरण मे बचा अब ‘अव्यय’,
लेकिन अब ‘अव्यय’ कैसा?
जब सबकुछ व्यय हो चुका,
सर्वनाम से ‘क्रिया’ तक
सृजन से प्रक्रिया तक।

लेकिन ...अब भी ...
क्या कुछ पता चल सका
इस ‘संज्ञा’ का?
अबकी बार मुख खोला
स्वयं ही ...इस बुद्धि ने नहीं,
उस ‘प्राज्ञ बोध’ ने
मन ने नहीं, ‘सिद्ध मुनि’ ने -
ढूँढ़ना है ‘संज्ञा’ को यदि
जाओ भूल नियम व्याकरण के
और सिद्धान्त सारे विज्ञान के।
तत्व रूप जग एक है
नाम – रूप अनेक।
एक अनेक से भिन्न नहीं
तत्व – तत्व सब एक॥
डॉ जयप्रकाश तिवारी

Tuesday, June 27, 2017

हे मानव खड़ा क्या सोचा रहा?

बिना अर्थ के शब्द व्यर्थ  
व्यर्थ है अर्थ बिना काम 
काम व्यर्थ है, धर्म बिना 
धर्म है व्यर्थ बिना मुक्ति,
सभी समाहित एक कर्म मे 
सत्कर्म बिना सभी व्यर्थ।

सत से विलग होते ही यहाँ  
कर्म वही, बन जाता कुकर्म
कुकर्मी का कोई धर्म नहीं है 
कुकर्मी की चाहत केवल अर्थ,
अर्थ, निरंकुश भोग के लिए
भोगी जीवन को कहाँ मुकि?

मुक्ति नहीं तो कैसा वह धर्म 
वह धर्म नहीं, वह घोर अधर्म 
मचाया इस अधर्म ने हाहाकार 
हे मानव खड़ा क्या सोचा रहा 
बोलो,करोगे कब इसपर विचार?

डॉ जयप्रकाश तिवारी  

Monday, June 26, 2017

कलम जब कफन को उठाती

कर दिया हमें
जिसने उद्वेलित
वह कहानी
किसने गढ़ी है?
बात इतनी नहीं कि 
द्रुपदसुता सभा मे
बेइज्जत हुयी है,
चलती सड़क पर,
ट्रेन, बस, टेम्पो मे भी
उसकी यही गति है।

बदलते समय मे
अब तक खतरे मे
बेचारी 'कन्या भ्रूण',
खतरा यह रूप एक
घिनौना लेने लगा है,
छोटी बच्चियाँ भी
नहीं है सुरक्षित,
इन मनोरोगियों से
करनी है उन्हे संरक्षित।

क्या- क्या कहानी
तुम्हें हम सुनाएँ
रो दोगे तुम,
क्यों तुमको रुलाएँ?
समस्या जो आई
मिटाएँगे उसको,
आएगी जो बाधा
अब हटाएँगे उसको।

यहाँ बिखरी पड़ी
सिसकती वेदनायेँ
उपेक्षित पड़ी हैं
हजारों ऋचायेँ,
भूगोल बनकर
दफन हो गयी हैं
कफन ओढ़कर
असमय सो गयी हैं।

कवि की कलम
जब कफन को उठाती
तब कविता, कहानी
नई जग मे आती,
समस्याओं का हल भी
वही तो सुझाती।
न रोके कोई
इस कलम की राह
शत बार पढ़ो
क्या कलाम की चाह?
डॉ जयप्रकाश तिवारी

Wednesday, March 8, 2017

बोलो समाज, क्यों हो तुम मौन?


जब हर मन में बसता पुरुष
हर पुरुष में बसती नारी है
तब 'नारी' 'पुरुष' क्यों कहता
क्यों देवी या कुलटा कहता?
क्यों बाँटते दो छोर में नारी को
इसके मध्य बहित कुछ घटता.
नारी को रहने दो केवल नारी
इन अतियों के बिच वह हारी है.
नारी क्या सामान्य मानव नहीं?
क्यों सामान्या की अधिकारी नहीं?
उसे नहीं चाहिए "देव' का पद"
पर कुलटा, कामिनी कहना छोडो.
संवेदना नारी मन की श्रेष्ठतर
संवेदना से ही नाता तुम जोड़ो..
संवेदी नारी सबकुछ कर सकती
बनती 'कुलटा', 'देवी' वह बनती
तो सोचे समाज इस बात को कि
'देवी' छवि उससे क्यों छिनती?
क्यों करता समाज इतना मजबूर
बन जाती संवेदनाये , गरल - क्रूर
जब विकृति उभर कर आती है
विभत्स स्वरूप ही दिखलाती है
लेकिन इन सबका कारण कौन?
बोलो समाज, क्यों हो तुम मौन?
डॉ. जय प्रकाश तिवारी