Wednesday, September 17, 2014

वर्ण से अभिव्यक्ति तक =================


वर्ण हैं लिपि का रेखा चित्र जो 
समाजशास्त्रीय चाक पर चढ़कर
अनुभवों अनुभूतियों की आंच में पककर
धारण करता है-  'शब्द का रूप'. 
शब्दों से काव्य शिल्पी अपने अंतर के 
चिंतन, स्फुरण, गुंजन और नर्तन को 
करता है मूर्तमान भाव सम्प्रेषण द्वारा। 
ये विपुलशब्द सम्प्रेक्ष्ण ही 
कहलाते हैं - 'काव्य और साहित्य'. 
शब्द यदि ज्यामितीय की भांति 
स्पष्ट और निर्भ्रांत है तो 
मूर्ति की भांति रहस्य्मयी और गूढ़तर भी. 
साहित्य की सम्यक समझ के लिए 
करना पड़ता है -'शब्दार्थों का  संधान '. 
व्याख्याओं का विशिष्ट विधान. 
क्योंकि यही शब्द अन्य अर्थों से अलग 
नए परिप्रेक्ष्य में , नवीन अर्थ स्फुरण में भी
होते हैं दक्ष, सर्वदा समर्थ। 
ये कुलांचे भी मारते हैं -
कला से विज्ञान और प्रकृति तक 
विज्ञानं से नीरा लोक संस्कृति तक।  
  
डॉ  जयप्रकाश तिवारी 

Saturday, September 13, 2014

आओ अतिथि

कौन तुम? क्यों खड़े हुए हो

इस तरह से मौन हो कर ?

कौन तुम? क्यों अड़े हुए हो 

इस तरह से त्रिभंग हो कर ?

आ भी जाओ खुला है द्वार 

यहाँ भेद नहीं कुछ मेरे द्वार 

मान है, सम्मान है, अपमान है

धिक्कार है, फटकार है, सम्मान है

ये समाज से मिले हुए उपहार हैं

पर ये है सभी मेरे लिए ही

तेरे लिए केवल यहाँ सत्कार है.

अथिथि हो शुभ सत्कार तेरा

कुछ भी कहो आभार तेरा

यूँ अभी टक क्यों खड़े हो ?

जिद पे अपनी क्यों अड़े हो?

कौन हो तुम - छाया ? प्रतिछाया ?

आत्मा - परमात्मा - प्रेतात्मा ?

सत्य हो तुम ? या हो आभास?

या अंतर्मन की कोई आस ?

हो कोई चाहे भी तुम


गर आये हो तो आ जाओ

मेरी उलझन में हाथ बताओ

हो सके तो राह दिखाओ

मैं तो हूँ उलझन में कब से

सोच में डूबा हूँ तब से

जब से देखा है यहाँ - चीत्कार

व्यभिचार, भ्रष्टाचारों का व्यापार

कमजोर नहीं, न साहस कम है

नहीं कोई मरने का डर है

पर निरर्थक यूँ नहीं चाहता हूँ मरना

सोच रहा हूँ यही निरंतर

क्या मुझे अब प्रारंभ करना?

अब आये हो तो आ जाओ

कुछ उलझन तो सुलझा जाओ

पर तुम क्या मेरी मदद करोगे

तुम तो स्वयं उलझे लगते हो।


डॉ जयप्रकाश तिवारी

कौन हो तुम? सत्य या आभास

कौन हो तुम?  सत्य या आभास 
कौन हो तुम ? ताम या प्रकाश 
कहाँ हो ? सन्निकट या सुदूर 
सर्वशक्तिमान हो या हो मजबूर> 

क्यों है तुम्हारी सृष्टि में अराजकता? 
जबकि तेरी ही शिक्षा है नैतिकता 
दरिंदों में क्यों नहीं जगाते  नैतिकता ?
कैसे दयालु? छोड़ देते अबला को तड़पता 

हे सर्वशक्तिमान ! कृपालु ! दयानिधान !
यह तेरा कैसा है - 'संविधान - विधान' ? 
जगा दो प्रभु सौंदर्य - शिवत्व - नैतिकता 
फिर  देखो यही कितना सुगन्धित महकता 

डॉ जयप्रकाश तिवारी 

Saturday, September 6, 2014

संवेदनशून्यता


जब पौधा था तुम पत्ते नोचता रहे
जब बड़ा हुआ तो डाली तोड़ते रहे
कलियों को भी कहाँ छोड़ा तुमने...
फूलों पर तो एकाधिकार ही था
कोई देख भी लेता तो घूरते रहते
उसकी छाया में बैठकें करते रहे
प्रगतिशील योजनायें बनाते रहे
सुविधाओं का उपभोग करते रहे
उसी के बदन में कील ठोकते रहे
उसकी आंसुओं को लासा कहते रहे
उस 'लासा' का व्यापर करते रहे
वह बार बार रोता रहा हँसता रहा
तुम्हारी सारी हरकतों को सहता रहा
तेरी करतूतों ने उसे असमय बुढा कर दिया
तुमने उस बूढ़े को ठूंठ भी नहीं होने दिया


अरे उसके मौत की प्रतीक्षा तो कर लेते
शर्म नहीं आई तुम्हे आरी चलवा दिया
लेकिन तुझे शर्म आती भी कैसे
उसे तो जाने कब का घोलके पी चुके हो
तुम वही हो न ? सफ़ेद कोठी वाले ?
जिसने माँ-बाप को आश्रम भिजवा दिया है
अरे ओ संवेदनशून्य ! स्वार्थ के आराधक
तुम्हे किसी पेड़ से संवेदना कैसे होगी
जब अपने माँ - बाप से ही संवेदना नहीं
कहा जाता है कि खून असर दिखाता है
लेकिन तूने तो विज्ञान को भी फेल कर दिया
तेरे ऊपर न पेड़ के खून ने असर दिखाया
न बेचारे माँ - बाप के पवित्र खून ने ही ..

डॉ जयप्रकाश तिवारी

Saturday, August 30, 2014

गंगा को निर्मल बहने दो


लक्ष्मीपति का चरणोदक यह तो, ब्रह्म कमंडल वासिनी है 
शम्भू की जटा सुशोभित यह तो, भगीरथ की आराधिनि है 
भागीरथी अलकनंदा सहित जाह्नवी धार उज्जवल रहने दो 
नदी नहीं, सुरसरि है यह तो, इसको तुम निर्मल रहने दो । 

तट पर गाँव औ नगर  बसाकरसुन्दर-सुन्दर घाट बनाकर 
समृद्धिशील बनाने वाली, सभ्यता - संस्कृति सिखानेवाली 
कल्याणी विपुल जलराशि को, कल - कल निनाद करने दो
नदी नहीं, सुरसरि है यह तो, इसको तुम निर्मल रहने दो । 

यह तूने क्या कर दिया मानव? बाँध बनाकर रोक दिया !
नाले, सीवर, कूड़ा, कचरे से, इसको कितना शोक दिया 
कब तक सहेगी अत्याचार? तुम माँ के धैर्य को मत मापों 
नदी नहीं, सुरसरि है यह तो, इसको तुम निर्मल रहने दो ।

होकर अंध-श्रद्धा के वशीभूत, तुम मूर्ति विसर्जित करते हो 
पत्र - पुष्प विसर्जित करते, शव भस्म विसर्जित करते हो  
मल-मूत्र विसर्जित करके, यह कैसा कुकृत्य तुम करते हो?
नदी नहीं, सुरसरि है यह तो, इसको तुम निर्मल रहने दो । 

चाहते नहीं यदि सत्यानाश, चाहते जीवन में यदि उल्लास 
तो अपने हाथों, अपने विनाश का, सूत्रपात क्यों करते हो?
इस तारणहार, पावन धारा को, अविरल तुम बहते रहने दो 
नदी नहीं, सुरसरि है यह तो, इसको तुम निर्मल रहने दो । 

सुरसरि यदि इसे नहीं मानते, एक बड़ी नदी तो मानोगे 
लेकर नाम विज्ञान जगत का, कर ली तूने खूब विकास 
कहकर विकास, स्व विनाश का, कपटी सिद्धांत रचते हो
नदी नहीं, सुरसरि है यह तो, इसको तुम निर्मल रहने दो । 

    - डॉ जयप्रकाश तिवारी 

Thursday, August 21, 2014

संस्मरण: कवि का अपराध

मैंने देखा, जंजीरों मे जकड़े हुये स्वयं को
जहाँ चित्रगुप्त रजिस्टर के पृष्ठ पलट रहे थे
उनके चेहरे के भाव क्षण-प्रतिक्षण बदल रहे थे
यमदूतों ने कड़ककर कहा; नीची करो दृष्टि
जबतक फैसला न आ जाय, दृष्टि उठाना पाप है.
चित्रगुप्त ने सिर उठाया, अपना फैसला सुनाया -
इसे ओखली में डाल दो, मुगदर से पिटाई करो
अच्छी तरह मंड़ाई करो’, फिर आरे से दो फाड़ कर दो
             
मैंने पूछा – हुजूर ! अपराध तो बताइये...
अरे अभी..., अभी तो... ऊपरी अदालत शेष है...
मैं कृतान्त के पास जाऊंगा, सारा वृत्तान्त सुनाऊँगा,
जाऊंगा इससे भी आगे, त्रिदेवों की बेंच मे जाऊंगा
अभी अपने इस फैसले पर ... इतना मत इतराइए,
पहले मुझे मेरा दोष तो बताइये ...।

देखो! देखो! यह अब भी जुबान लड़ाता है
कलम नहीं मिली तो शब्द-बाण चलाता है,
अरे यही है... , यही है तुम्हारा अपराध,
तुम्हारा अपराध यह है कि
वर्षों से सोई पड़ी कलम को जगाया,
इतना तो ठीक था किन्तु तुमने
रोशनाई की जगह आग भरी, बारूद भरा
उसे पूरे समाज मे फैलाया ...।

ओह ! कितनी कठिनाइयों से जूझकर 
मदहोश किया था इस समाज को,
उस शिखंडी होते समाज को तूने
पुरुषत्व और अधिकार का पाठ पढ़ाया
उनके जमीर को कोसा, जंजीर को कोसा
तुम्हारे शब्दों ने कहर बरसाया ... 
स्त्री-पुरुष, बूढ़े-बच्चे सबको जगाया,
हमारे दूतों को वहाँ से भागना पड़ा,
हमे भी कायर, रणछोर ... बनाया
अब पूछते हो मेरा अपराध क्या है?

अरे! तुम्ही ने बुलंद किया उनका हौसला
तुमने बदल दिया हमारा सारा फैसला ...
कवि थे, कवि ही रहते तो ठीक था 
सिंगार-वियोग रचते, हास्य रचते तो ठीक था
तुमने मेरे भरेपूरे साम्राज्य मे आग लगाई
शब्दों के तीर चलाये, तर्कों की तोप चलाई
उन तर्कों मे डेकाड्रान की शक्ति थी
मदहोश, अब होश मे आने लगे,
तीर-तरकश, तोप-तलवार उठाने लगे । 

कवि का कर्म चारण-कर्म होता है
प्रशस्तिगान की रचनाधर्मिता छोड़कर
विद्रोही सैनिक की भूमिका निभाई है,
तुम वर्ण-व्यवस्था भंजन के दोषी हो
तुम कर्म-व्यवस्था उल्लंघन के दोषी हो
इसलिए तुम्हारे शिरोच्छेद की सजा सुनाई है।


इस अपमान पर
कवित्व हुंकार उठा .. फूंफकार ...उठा
दहाड़ उठीं संवेदनाएं पूरे ज़ोर-शोर से, 
इतने ज़ोर से कि... आँख खुल गयी
बीवी, बच्चे चौंककर सशंकित खड़े हो गए...
तो तो... क्या यह एक स्वप्न था?
और यह स्वप्न है या हकीकत?
कहानी यह भूत की है या वर्तमान की?
या संकेत है रचनाकारों के भविष्य की?
स्वप्न यह अब बन गया है संस्मरण
नहीं होता कभी भी इसका विस्मरण ॥ 


-    डॉ जयप्रकाश तिवारी

Tuesday, August 12, 2014

भद्रे ! हो तुम कौन?

तू मेले में मेरे साथ रही
अकेले में मेरे साथ रही  
विद्यालय में मेरे साथ रही 
सचिवालय में मेरे साथ रही,
माना तुम साथी बचपन की
अब उम्र हो गयी पचपन की 
कर चूका विदा मैं बेटियों को 
अब वहू है घर में आने वाली 
फिर भी संग-संग लगी हो मेरे 
क्या चाहत, बोलो मतवाली. 
मेरे प्रत्येक प्रश्न के उत्तर में 
धरे रहती हो सदा तुम मौन 
चिर परिचित ! हे सदा अपरिचित 
मुख खोलो, भद्रे ! हो तुम कौन?

 
क्यों इतना चिढ़ते हो मुझसे 
क्या कभी माँगा कुछ तुझसे 
अपने  से  नहीं  हूँ  आई मैं 
प्रारब्ध मेरा, है बंधा तुमसे 
जब तक रहोगे, जहाँ रहोगे 
छोडूंगी न साथ कभी तुझसे 
पूछते हो तुझसे रिश्ता है क्या 
स्वयं मैं भी इसे नहीं जानती 
मित्र कहो, शत्रु कहो, या मतवाली 
न मैं तेरी साली हूँ, ना हूँ घरवाली 
ना ही किसी की सौतन हूँ मैं 
ना प्रियतमा,ना ही भौजाई 
देखो चेहरा खिला खिला है 
ना ही इसमें कहीं कोई झाईं 
परिचित कहो, या निरा अपरिचित
हे सौम्य ! मैं तो तेरी ही परछाईं 

डॉ जयप्रकाश तिवारी