Saturday, April 14, 2012

रचना शीर्षकों का ध्वन्यार्थ

                  
मै हूँ ऐसा दीप जो सतत स्नेह में जलता रहा.
लेकिन मेरी पहचान इस रूप में नहीं हो सकी.

सोचा चलो दीवाली अबकी कुछ यूँ मनाते हैं.
स्नेह की फुलझड़ी से ही असमंजस जलाते हैं.

क्यों आवश्यक है यह परिचर्चा यहाँ इस मंच पर?
वे अच्छी तरह जानते हैं कि वेदना हिंदी की क्या है?

हिंदी है एक पूरी संस्कृति, इसको स्वीकार तो करते हैं,
लेकिन क्या कहूँ, त्रिभुज का वीभत्स कोण तो यही है,

वह चिल्लाती है- 'हिंद की बेटी हूँ मै'. परन्तु ये मानते कहाँ?
कल तक थी जो अपराजिता, आज वह हिंदी अपनी हार गयी.

खेल यह शब्द और अर्थ का नहीं, खेल है कुत्सित राजनीति का.
यह हार नहीं हिंदी की हार, यह तो है राष्ट्रीय अस्मिता की हार.

                                                                 
                                    - डॉ. जयप्रकाश तिवारी
                                     संपर्क : 9450802240


Friday, April 6, 2012

भाई मेरे ! मरो नहीं !


कहना चाहता  हूँ मै
देश पर मर मिटने का 
वक्तव्य देने वालों से -
भाई मेरे !  मरो नहीं !

जीवन यह अमूल्य है
जीओ, दीर्घजीवी बनो!
लेकिन जीकर दिखाओ
अब पीठ मत दीखाओ.

दीपक हाथ पर रख कर 
दूसरों को राह मत दिखाओ.
हम स्वयं केंगे अनुसरण 
राह सीधी चल के तो दिखाओ.

हथेली पर सरसों मत उगाओ,
खेतों में उगी तिलहन और 
दलहन की फसल बचा लो.
उगने वाला किसान तड़प रहा
उसे कुछ दवा तो दिला दो.

देश पर मर मिटने का कोरा 
वक्तव्य देने से कुछ नहीं होगा.
मरते हुए देश को बचा लो.
घुटते - सिसकते संविधान को 
अपने दायित्व और सदाचरण की
दो घूँट पयस्वनी तो पिला दो.

हथेली पर दही जमकर 
अब तुम यहाँ खड़े क्यों हो?
जनता हूँ रणछोड़ हो तुम!
हाथ में रस्सी लिए खड़े क्यों हो?

अकर्मण्य हो तो बने रहो,
यहाँ शेखी तो मत बघारो.
जज्बातों में नहीं बहनेवाला कोई.
है वादा, साथ निभाएंगे भरपूर
पहले जो कहते हो कर के तो दिखा दो.
आदर्श स्वयम बन कर तो दिखा दो.

            - डॉ. जयप्रकाश तिवारी 

Sunday, April 1, 2012

अँधेरी गुफा को तुम दीपक बना लो


प्रकाश  में  साया  तो  सब देखते हैं,
सफेदी  में  धब्बा तो  सब  देखते हैं.
धब्बे  में  अंकित, धवल बिम्ब देखो,
अँधेरे  में  किरण की एक बिम्ब देखो.
अँधेरी गुफा को, तुम  दीपक बना लो.
उस साए में नन्ही किरण जो समायी,
सम्हालो  उसी  को, उसी को बचा लो.
मिटेगा गम ये सारा, ख़ुशी को बचा लो.
अँधेरी  गुफा  को  तुम  दीपक  बना लो.

स्मृति की हो बाती,समर्पण का घी हो ,
जिजीविषा की अग्नि, दीपक जला लो.
लिपियों की भाषा तो सभी गुनगुनाते,
सन्नाटे के गीत - गजल को तुम गा लो.
अँधेरी गुफा  को,  तुम  दीपक  बना लो.
सुनो बधिरों के कानों से, प्रकृति के गान,
देखो सूरों के नयनों से, संस्कृति महान.
मिटेगा गम ये सारा, ख़ुशी को बचा लो.
अँधेरी गुफा  को,  तुम  दीपक  बना लो.

Friday, March 16, 2012

बसंत क्यों हुआ 'अ-संत'



थी प्रतीक्षा जिस बसंत की
वह बसंत खुश होकर आया.
सौगातों की गठरी को भी
साथ में अपने लेकर आया.
फूली सरसों-अलसी-अरहरी
मटर में छेमी खूब लहराया.

परन्तु,..........
बाँट सका न हाथ की झोली.
छिनी किसी ने हाथ की झोली.
अरे! ...अरे! ....यह कौन..?
जिसने दिन में डाका डाला.
चूसा जिसने माँ का सब खून.
अरे! यह तो धरा का प्यारा बेटा.
अरे! कितना यह है खोता बेटा?
पूत लाडला यह तो प्रकृति का.
कारण यही, प्रकृति में विकृति का.

यह देख बसंत को गुस्सा आया
मन ही मन जल - भून उठा वह.
उन पर, जो लोभी था मानव.
देने का दंड किया निश्चय उसने,
छोड़ा निःश्वांस एक जोर से उसने.
सूख गयी सरसों की सब वे
पुष्प दल-पुँज, जो पीले - पीले.
सूख गयी गेहूं की बाली,सूखी 
असमय, अलसी-मटर-अरहरी.

उधर आम की मंजरियों पर
कीट- पतंग कुछ ऐसे छा गए,
महुआ की उस बाग़ में जैसे
बिन पिए सभी मस्ती में आ गये.
चूने लगे टिकोरे सब असमय
सुबह - दोपहरी या हो शाम.
बाग़ का रखवाला घबराया,
छिना उसका सब चैन, आराम.
अपने छाती को दोनों हाथ दबाया,
मुख से निकला, हाय... राम!!..

आया जो इसबार बसंत,
यह नहीं, 'बसंत'.
बसंत वेश कोई असंत है आया.
बोला बसंत -
मैं ही बसंत, मैं हूँ बसंत,
लेकिन तुम मानवों ने मुझको
बना दिया, सचमुच - 'अ-संत'.




Tuesday, March 6, 2012

होली का मनोवैज्ञानिक दर्शन





होली का पर्व मात्र एक परंपरागत उत्सव नहीं; जीवन का मनोविज्ञान है, इसका एक अपना विशिष्ट सामाजिक दर्शन है. पर्व और त्योहारों की सांस्कृतिक स्वीकृति ही इसलिए है कि समाज का प्रबुद्ध वर्ग इसे समझेगा, समाज को इसे समझाएगा. यदि हम बात होली पर्व की करें तो केवल इसी एक पर्व को भली - भांति समझ लिया जाये तो मानव जीवन की आधी उलझने, समस्याएं, उहापोह की स्थिति का शमन, समाधान और निराकरण स्वयं हो जायेगा; इसमें किंचित भी संदेह नहीं. तो क्या है होली? बात यहीं से प्राम्भ करते हैं.. होली का सर्वश्रेष्ठ अर्थ तो इसके अक्षर विन्यास में ही सन्निहित है - (अर्थात, होली = हो + ली). जो हो गया, जो बीत गया.. अच्छा या बुरा, उचित या अनुचित; उस बात को छोड़ दो, ढोते न रहो. छोड़ने का तात्पर्य मात्र यह है कि उससे उत्पन्न निराशा और अवसाद - विषाद को कंधे पर लादे न रहो, मन - मष्तिस्क पर बोझ न बनाओ. घटना के मूल में स्वयं की सहभागिता ढूंढो. यदि उसमे कोई त्रुटि हो और संशोधन की सम्भावना हो तो बेहिचक करो. अपनी लिखी कॉपी का मूल्यांकन स्वयं कीजिए. अपना निरीक्षक - परीक्षक स्वयं बनिए, आधी समस्या का समाधान तो इस प्राथमिक स्तर पर ही हो जायेगा. पूरा नहीं भी हुआ तो मात्र इतने से ही एक सार्थक और समुचित मार्ग मिल जायेगा, यदि परीक्षक की भूमिका बिना पक्षपात, पूरी ईमानदारी और सत्यनिष्ठा के साथ निभाई गयी है! यह सभी व्यक्ति और व्याधियो की अचूक दवा है. स्वयं से प्रारंभ कर परिवार और समाज में निखार लाया जा सकता है. निजत्व के स्तर पर प्रारंभ हुआ यह परिष्कार, सामाजिक परिष्कार और राष्ट्र की अंतर्शक्ति सुदृढ़ कर उसे अंतर्राष्ट्रीय मॉडल के रूप में एक प्रेरणास्रोत बनाया जा सकता है. व्यक्ति विकास की यह प्रगति, राष्ट्रीय प्रगति में परिणित हो सकती है, जिसकी आज महती आवश्यकता है. 

                                 

होली पर्व मनाने के दो चरण हैं -
(i) होलिका - दहन

(ii) रंग - गुलाल प्रक्षेपण


क्या है यह "होलिका  दहन"?  
होलिका न तो कोई स्त्री प्रतीक है, न पुरुष प्रतीक. वह हमारी स्वयं की अपनी आतंरिक वृत्ति है, बुराई है, उसी को दहन करना है. विकृति और बुराई को अंकुरित होते ही, पनपते ही नष्ट कर डालना दैनिक साधना और आत्म संस्कार का उद्देश्य है. यह आदत, यह भाव मनोमालिन्य को धो डालता है. जो लोग किसी कारणवश इस दैनिक साधना से नहीं जुड़ पाते हैं, उन्हें इस वार्षिक साधना से तो अवश्य ही जुड़ना चाहिए. सामूहिक बुराइयों का दहन सामूहिक रूप से हो और सभी के समक्ष हो, यही तो है - "होलिका - दहन". यही है इस होलिका - दहन का सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पक्ष. इस पक्ष को दूसरे ढंग से भी समझा जा सकता है. अब प्रचलित प्रासंगिक कहानी से जुड़े हम..! अग्नि सुरक्षा कवच धारण करने वाली 'होलिका' अग्नि के प्रकोप से बच नहीं पाई, क्यों? विचारणीय बिंदु है यह. सत्य के विरुद्ध, लोकमंगल के विरूद्ध, पाप वृत्तियाँ, अनाचार - भ्रष्टाचार चाहे कितने भी सुरक्षा प्रबंध करें, भेद खुल ही जायेगा और अंततः दोषी को परास्त होना ही पड़ेगा. 'होलिका - दहन' ध्वंसात्मक और नकारात्मक वृत्तियों की हार और 'प्रह्लाद की सुरक्षा', सत्य तथा सृजनात्मक वृत्ति, लोकमंगल की विजय है, इस होली पर्व का तत्त्व-दर्शन है. इसे ही समझने की आवश्यकता है.


बुराइयों के उन्मूलन के पश्चात, अच्छाइयों की शुरुआत अपने आप होने लगती है. होलिका के प्रतीक लकड़ियों के ढेर में आग लगते ही हर्षोल्लास से आप - हम क्यों चिल्ला उठते हैं? क्यों हमारे अंग - प्रत्यंग थिरकने लगते हैं? क्योंकि अच्छाइयों और सदगुणों की प्रचंड आंधी ने दिल - दिमाग के कपाट खोल दिए हैं. हम प्रत्येक व्यक्ति से, छोटा हो या बड़ा, बच्चा हो या बूढा, गले से लिपट जाते हैं, रंग - गुलाल पोत देते हैं. हाँ, स्नेह और सद्भाव के रंग में भीगकर दूसरे को भी सराबोर कर देना, सद्भाव में डूब जाना ही होली है! यह होली प्रतिदिन दैनिक निजी - साधना में हो, तो बहुत अच्छी बात है. यदि यह कार्य दैनिक नहीं हो पाता, तो भी कोई बात नहीं; वार्षिकोत्सव रूप में मनाएं, लेकिन एकल नहीं सामूहिक साधना के रूप में! इस पर्व में तो परिष्कार ही परिष्कार है, उल्लास ही उल्लास, उमंग ही उमंग है. इस उल्लास - परिष्कार - उमंग को वार्षिक ऊर्जा के रूप में तन - मन - आचरण में संचित कर लेना ही इसकी सफलता है. संक्षेप में यही इस पर्व का निहितार्थ, यही इसका सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पक्ष है. आपसी मनोमालिन्य दूर कर प्रेम - सौहार्द्र को शुभारम्भ कर उसे परिपुष्ट करने के सामूहिक शुभदिवस का नाम है - "होली". मानव को अपने अन्दर की मानवता को विकसित करने के लिए होली से बड़ा कोई पर्व हो ही नहीं सकता...! यह किसी एक समुदाय का पर्व नहीं, मानव - समुदाय का, मानव - जाति का पर्व है. इस पर्व के भौंडेपन से, कुरीतियों से, अमर्यादित भाषा प्रयोग से यथासंभव बचें...! अन्दर की विकृतियाँ निकाल बाहर करें. विकृतियों के बहिर्गमन से रिक्त जगह में सभ्यता और संस्कृति का वास होगा, निवास होगा. विरोधियो और शत्रुओं को स्नेह और सद्भाव के रंग में इतना रंग दो कि वह बाहर से ही नहीं, अन्दर से भी रंगीन हो जाये और विरोध का स्वर भूलकर सहयोग का जाप करने लगे. शत्रु को मित्र बना लेने की कला ही इस पर्व की सार्थकता है, यही इस पर्व की पराकाष्ठा भी है.

होली का एक दूसरा स्याह - धूमिल पक्ष भी है! न जाने कब और कैसे इस पर्व में हुडदंग के साथ - साथ अश्लीलता ने भी अपनी जडें जमा लीं..? दावे से साथ कुछ भी कह पाना कठिन है. लेकिन, आज जब हम होली का निहितार्थ जान गए हैं, फिर इसमें फूहड़ता और अश्लीलता का क्या काम? कपड़े यदि गंदे हो जाते हैं तो क्या उन्हें साफ़ नहीं किया जाता? मकान - दुकान की मरम्मत और रंगाई - पुताई नहीं होती? तन - बदन की मैल को क्या धुला नहीं जाता? तो फिर फूहड़ता को, विकृतियों को निकाल फेंकने में संकोच क्यों? चोर दरवाजे से आ घुसे विकृतियों को निकाल बाहर करने का दायित्व भी तो उन्ही का है, जो इस पथ को जान गए हैं, इसकी उपादेयता और महत्व को पहचान गए हैं. पहला कदम तो वही बढ़ाएंगे.... तो आइये, एक सत्साहस भरा संकल्प लें - 

"हम होली मनाएंगे, खूब मनाएंगे... कलुष - कषाय - कल्मष और बुराइयों की होलिका जलाएंगे तथा 

विकृतियों, फूहड़पन, हुडदंग और अश्लीलता को दूर भगायेंगे...!"

सभी को होली की शुभकामनाएं !

एक नयी होली....शुभ होली..... 

सार्थक होली..... भावनात्मक होली..... 

सृजनात्मक होली...सर्जनात्मक होली
..

            - डॉ. जय प्रकाश तिवारी 

अरे यह क्या गजब हुआ...?



क्यों मुझे 
लगता है ऐसा?
जैसे यह रचना 
मेरी नहीं, तेरी है.
यह संवेदना 
मेरी नहीं, तेरी है.
ये एहसास, 
ये अनुभूतियाँ
ये दर्द, ये उपहास
और यह परिहास
यह रंग- रास, 
साज-आवाज 
ये मेरे नहीं.
सब के सब तेरे हैं.

लेखनी तो 
है मेरी जरूर,
उँगलियों में 
फंसी हुई अब भी.
लेकिन शब्द, 
भाव, उदगार.,
मेरे कदापि नहीं, 
ये तो तेरे हैं.
यह हूक ...
और उल्लास, 
यह उमंग 
और तरंग...
ये मेरे नहीं, 
सब तेरे हैं.


मैं तो केवल; 
निहार रहा था, 
चित्र में तुझे.
मंत्रमुग्ध होकर 
दर्शक सा, दूर से.
अनवरत लगातार, 
न जाने कब से?
उंगलियाँ तो यूँ ही, 
बस हिल रहीं थीं.
थिरक रही थी, 
फिसल रही थी...

और यह लिखावट 
है किसकी?
तेरी है.?  नहीं.. मेरी है..,
मेरी है...? 
नहीं - नहीं.., तेरी ही है.

पहले तो 
ऐसा नहीं था.
तेरे और मेरे 
लिपि में भेद था,
भाषा में भेद था, 
शैली में भेद था.
सोच में भेद था, 
संवेदनाओं में भेद था.
रुचियों और 
अनुभूतियों में भेद था.
इस भेद ने ही तो 
हमें अलग किया था.

भेद यह सारा 
मिटा कैसे?
सब सिमट गए 
आपस में कैसे?
तू मुझमे 
रंग गयी हो?
या मैं..
तुझ में रंग गया?

ऐसा कब हुआ? 
यह क्या गजब हुआ?
हुआ सब कुछ...., 
और हमें बोध तक नहीं.
मुझे कुछ होश तक नहीं.
दरवाजा तो बंद था, 
अब भी यह बंद है
आयी किधर से तुम? 
गयी हो किधर को तुम?

Monday, March 5, 2012

कितना कठिन है उठ पाना....




कितना कठिन है 
बन पाना आज? 
किसी का विश्वासपात्र, 
और विश्वस्त.
कितना कठिन है,
होना - आत्मस्थ?
कितना कठिन है
ऊपर उठ पाना,
अहं और इदं से.
त्वं और वयं से?

पूछते हैं उनसे ही जिसने
देखा है हमारी पीढ़ियों को.
हे गाँव के दादा, परदादा!
हे वन्दनीय, बूढ़े अश्वत्थ! 
कितने मानते तुम्हे विश्वस्त?
तुम देते सबको प्यार - दुलार,
तेरी छाँव बैठ सब पाते प्यार.
तुम तो साक्षी हर पंचायत का.
घर-घर के झगड़े, मनोभावों का.

देखा है मैंने आज 
आरी पर धार रखाते.
कुछ ऊँगली तेरी ओर उठाते.
विहँसा, वह बूढा अश्वत्थ.
तुम भावुक हो और भोले हो.
घर - घर की यही कहानी है.
हर बुजुर्ग की यही कहानी है.
ऊँगली उनपर ही उठता है,
हर पेड़ पुराना कटता है.

रोया नहीं कभी काटने पर,
हाँ, रोया हूँ , 
कोई हरा पेड़ जब कटता है.
नहीं बचा, मानव में साहस-धैर्य.
सच कहने और सुन पाने का.
बन गयी है यह दुनिया की रीति.
अपना दोष, दूजे पर मढ़ जाने का.

गम नहीं मुझे कट जाने का,
मैंने अपना कर्त्तव्य निभाया है.
देखो!  तुम सा प्यारा पौधा,
अपनी जगह उगाया है....
इसे तुम्हे सौपता हूँ मैं आज.
जीवन इसका तुम्हे बचाना होगा,
दिया जो वचन, निभाना होगा.
      - डॉ. जय प्रकाश तिवारी