Monday, February 28, 2011

विखर रहा: 'देश-परिवार




देखा था मैंने तन को नाचते
मन को भी नाचते देखा था;
अब धन को नचाते देख रहा हूँ.
धन में होती शक्ति है कितनी?
यह बैठे - बैठे सोच रहा हूँ.

बड़ो-बड़ों को ताल पर इसके
झूमते थिरकते हिलते डुलते,
कमर लचकते देखा था...
अब कहे कमर की कौन?
यहाँ तो कमरा डोल रहा है.
अब कमरे तक भी रही न बात,
पूरा सांचा-ढाचा ही दरक रहा है....

धन का नशा अब छाने लगा है.
रिश्तों को भी ठुकराने लगा है
छोटा बड़ा यहाँ कोई नहीं है,
सबके पास जो ...पैसा... है..
बाप जहां पर रहा न बाप
बेटा न यहाँ पर बेटा है....
धन की इस ज्वाला ने देखो
पूरा परिवार, पूरा देश लपेटा है.

कैसे बच पायेंगे ये सब ?
कुछ सीख भी क्या ये मानेंगे?
हैं सभी चूर धन के मद में
क्या भ्रम को ये कुछ टालेंगे?
खो गयी कहाँ विवेक शक्ति अब?
यह जड़ता सी क्यों छायी है?
क्यों झुलस रहे सब अंगारों में?
क्या इसी में इनकी भलायी है?
अब रास्ता कौन दिखाएगा?
क्या समझ में इनके आयेगा?
यह धन आया है जहां से,
क्या चला वहीँ फिर जाएगा?
सब हैं धमकाते एक दूजे को.

रिश्तों की अब परवाह कहाँ?
क्या विखर सभी ये जायेंगे?
धरती पर इनके पाँव कहा?
होता है कष्ट देख के हमको,
क्या विखराव रोक हम पायेंगे?
उग्र आज है वही इस सबसे,
मान- सम्मान प्यार - दुलार 
कुछ अधिक ही जो पाया है.

अब होगा वही जो होना है.
कर्मों का फल भी तो ढोना है.
क्या शासक बनना इतना जरूरी?
चल रहा जनता पर दनादन छूरी.
कुछ तो डरो समाज से, इतिहास से,
आखिर एक दिन वह भी आएगा जब 
तू भ्रातृहन्ता, कुलहन्ता  कहलायेगा.

Wednesday, February 23, 2011

'पूर्णता' का विज्ञानं- दर्शन 


भारतीय संस्कृति में वर्णित उपनिषदिक दर्शन को प्रायः 'पूर्णता का दर्शन'  कहा जाता है. क्या है यह पूर्णता का दर्शन और क्यों कहा जाता है इसे पूर्णता का दर्शन? आइये आज इसे समझने का प्रयास करते हैं. इसके लिए श्वेताश्वर उपनिषद् के एक मन्त्र को यदि हम प्रतिनिधि और बीजमंत्र कर रूप में स्वीकार कर सकें तो यह पूर्णता अपने दिव्य रूप में वहाँ प्रकट होता है, समझने और समझाने दोनों ही दृष्टि से यह उत्तम है.यह मन्त्र है -

'एको देवः सर्वर्भूतेषु गूढः  सर्वव्यापी सर्व भूतान्तरात्मा 
कर्माध्यक्षः सर्व भूताधिवासः साक्षी चेता केवलः निर्गुणश्च'  - (६.११)  

अर्थात, सभी प्राणियों में स्थित ईश्वर एक है, वह सर्व व्यापक. समस्त भूतों का अंतरात्मा, कर्मों का अधिष्ठाता, समस्त प्राणियों में बसा हुआ साक्षी, परम चैतन्य, परम शुद्ध और निर्गुण है. यह तो हुआ इस मन्त्र का शब्दार्थ. परन्तु यह मन्त्र है बहुत रहस्यपूर्ण, ....आइये इसे दूसरे दृष्टिकोण से देखें, संख्याओं में विभाजित कर गणितीय रूप में देखें  -
      १ - एको देवः 
      २ - सर्वर्भूतेषु गूढः  
      ३ - सर्वव्यापी 
      ४ - सर्वभूतान्तरात्मा 
      ५ - कर्माध्यक्षः 
      ६ - सर्व भूताधिवासः 
      ७ - साक्षी 
      ८ - चेता 
      ९ - केवलः 
      १० - निर्गुणश्च

इस मन्त्र में हम देख सकते हैं कि पूरे मन्त्र को '१' से '१०' तक की संख्याओ में आसानी से विभाजित किया जा सकता है. '१' ब्रह्म की एकता का प्रतीक है. '२' उसकी गूढता और जटिलता का, '३' सर्व्यापकता का. '४'  स्व 'अणु' की पहचान के द्वारा 'विभु ', 'विराट' और 'भूमा' स्वरुप को पहचानने की ज्ञानात्मक / सध्नानात्मक दृष्टि है. '५' आस्तिकों और नैतिक व्यक्तित्व वाले का संबल है, उसके न्यायी प्रकृति के कारण ही व्यक्ति सत्य के लिए अपने 'स्व', अपने अहं  को बलिदान करने की प्रेरणा पता है.  '६' वह परमात्मा केवल मानव, केवल चेतन, केवल जड़ तक ही सीमित नहीं है. वह कण -कण  में परिव्याप्त है, यह दृष्टि केवल प्रकृति के साथ भावनात्मक और पारिवारिक सम्बन्ध जो दती है, प्राकृतिक वस्तुओं के साथ मधुर रिश्ते स्थापित करती है, विश्ववन्धुत्व की भावना विकसित करने के लिए यहीं से ऊर्जा मिलती है. यह दृष्टि ग्रह -नक्षत्रो, नदी-पहाड़ से लेकर वनस्पतियों तक से रिश्ते की परिकल्पना की है.  नाम और रूप तो अलग-अलग है परन्तु, परन्तु तत्वतः  नहीं . संतों ने इसीलिए तो गाया है - 'आपे रसिया आप रस, आपे रावनहार / आपे होवे चोलादा आपे सेज भतार // ' ७' वह द्रष्टा है, समदर्शी है, इसी गुणों के कारण वह परमन्यायी है. इस लोक में न्याय न मिल पाने पर भी यह विश्वास भक्त को न्याय पथ से नहीं डिगा सकता क्योकि यह विश्वास दृढ है कि यदि यहाँ न्याय नहीं मिला तो क्या हुआ. वहाँ तो मिलेगा. यदि यह विश्वास टूट जाय तो सोचिये क्या होगा? जब इस देश में कोई कानून को कितना मानता है तो क्या नैतिकता, ईमानदारी, जिम्मेदारी और मानवीय मूल्यों का कोई महत्व रह जाएगा ?  '८' वह परम चैतन्य है, चेतन होने के कारण ही अपने भक्तों की आर्द्र पुकार सुन लेता है,यह गरीबो, और निर्बलों का एक मात्र बल है,...शक्ति है... संबल है..... 
इसी साहस के बल पर एक चींटी भी विशालकाय हठी से लड़ने और उसे परस्त करने का हौसला पता है. यह विश्वास औए आस्था का ही बल है जो अग्निसुरक्षा कवचधारी, वरदान प्राप्त होलिका को तो भस्म कर देता है लेकिन प्रह्लाद का विश्वास विजयी होता है. यह वह श्वास-प्रश्वास है जिसमे लौह का दम्भ भी लाल पानी बन जाता है. उसका ठोसपना, उसका दम्भ सब  गल जाता है.

आज का मानव टुकडे-टुकडे देखने का अभ्यस्त हो गया है समग्रता में वह देख ही नहीं पाता. जिस दिन समग्र दृष्टि आ जायेगी वह विवेकानंद, अरविंदो और  आइन्स्टीन की तरह आध्यात्मिक वैज्ञानिक बन जायेगा. Philosopher of science' बन जाएगा. ईश्वर के स्तित्व को नकारते देखा-सुना गया है परन्तु क्या कोई सत्य को नकार सकता है? सत्य की परिभाषा क्या है? 'परम सत्यम, सत्यम परम' अर्थात जो सत्य है वही परम है और जो परम है वही एक मात्र सत्य है. जो कभी बदले नहीं. परिवर्तित न हो वही तो सत्य है. सत्य ईश्वर का समानार्थी नहीं पर्यायवाची है. आखिर सत्य तो माननेवाला भला ब्रह्म के स्तित्व को कैसे नकार सकता है? आज के युग में ऐसी अलौकिक शक्ति आज केवल राजनीतिक व्यक्ति के पास है. उसे यह अधिकार है क़ि इस 'सत्य' में जब चाहे 'अ' जोड़ दे, जब चाहे 'अ' घटा दे......

अब हम संख्याओं पर लौटते हैं. इन संख्याओं में  एक अंक की सबसे बड़ी संख्या '९' है और यह संख्या 'केवल' है. केवल वही है- दूसरा नहीं. और दसवी संख्या निर्गुण है जिसका गुणन नहीं हो सकता, वह 'शून्य' है. शून्य स्वतः निर्गुण है ऊपर वाले '१' पर इस निर्गुण शून्य को रख देने से '१०' संख्या स्वतः बन जाती है. इस '१०' में सम्मिलित '१' ब्रह्म और आत्मा दोनों का प्रतिधित्व करता है. इसमें '१०' नाम-रूपमय सृष्टि का वाचक है. इस '१' के अभाव में समस्त सृष्टि 'o' शून्य है. मृत है, प्रलायावास्था में है, मूल्यहीन है तथा '१' के साथ रहने पर वही मूल्यवान है, सजीव है. '९' अंक केवल है, पूर्ण है, सम्पूर्ण है. अतएव '९' अंक जहां भी रहता है, अपने 'केवली' स्वरुप का परित्याग कभी नहीं करता. अतः केवल है, अतः केवल वही रहेगा जो वस्तुतः है. तत्त्वतः है, जो 'actual' ' और  'factual' दोनों है . इस परम तत्त्व  को पहचानना होगा और जो इसे पहचानेगा वही ज्ञानी और पंडित कहलायेगा, कोई दूसरा नहीं.  - 'निर्गुण सरगुन आपे सोई, तत पछाड़े सो पंडित होई'....

उदाहराणार्थ :     ९ के गुणनफल का योग सदैव ९ ही होगा.
                         ९ x १ = ९
                         ९ x २ = १८,     (१ + ८ = ९ )
                         ९ x 3 = २७,    (२ + ७ = ९ )
                         ९ x ४ = ३६,     (३ + ६ = ९ )
                         ........................................
इतना ही नहीं योग (+) और घटाव (-) की क्रिया में भी यह ९ अपने स्वरुप का परित्याग कभी नहीं करता. आइये देखें कैसे - 
(अ) -  ९ + ८ + ७ + ६ + ५ + ४ + ३ + २ + १ = ४५,  (४ + ५ = ९)

(आ) - ९ ८ ७ ६ ५ ४ ३ २ १           कुल योग = ४५ (४ + ५ = ९)
  (-)  १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९           कुल योग = ४५ (४ + ५ = ९)
      ---------------------------
   =  ८ ६ ४ १ ९ ७ ५ ३ २          कुल योग = ४५ (४ + ५ = ९)
     ................................

अतः कह सकते है:    (९ - ९ = ९) या 
             पूर्ण - पूर्ण = पूर्ण 

इसीलिए उपनिषदों में कहा गया है कि ब्रह्म परमपूर्ण है, वह (अदः) और यह (इदं), 'that' और  'this', 'he' और 'she', दोनों में ही वह इकाई रूप में सामान भाव से है. परमतत्त्व पूर्ण , परिपूर्ण है, सम्पूर्ण है. उस पूर्ण में से पूर्ण को घटाने पर भी सम्पूर्ण ही शेष बचता है. उसमे  रंच  मात्र  भी  न्यूनता  नहीं  आने पाती, इसलिए उपनिषद् कहते हैं - 
.
'ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात पूर्णमुदच्यते 
  पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते'. 

इस दर्शन के अनुसार 'ब्रह्म' आदि में पूर्ण है, मध्य में पूर्ण है और अन्त में पूर्ण है, सभी काल में पूर्ण है. सच तो यह है कि वह काल का भी काल है - 'कालः कालौ' है. काल का भी है, इसीलिए साक्षी है, द्रष्टा है. इस मन्त्र में निर्गुण और सगुण दोनों ही सिद्धांतो का, विचारधाराओं का अद्भुत मेल है. सृष्टि के प्रारम्भ में वह 'ब्रह्म' अकेला था, सृष्टि रचना के बाद भी, सब कुछ अपने अन्दर समेट कर एक '१' रहा भी..., और नहीं भी रहा...., वह अनेक  '१०' बन गया.., जगत बन गया, सृष्टि बन गया. '१ ' विहीन '१०' (जगत) शून्य '०' है. निर्गुण है. एक '१' के साथ सम्मिलित रूप में वही '१०' ...है, सृष्टि है, ...सगुण है. ....परन्तु यह सगुण भी अंततः निर्गुण ही है.... 
       
      (१ + ० = १, अर्थात 'लौकिक जगत सत्य है')    
        
      (१  - ० = १, अर्थात 'पारलौकिक जगत सत्य है') और      
        
     (१ x ० = ०, अर्थात 'जगत असत्य है, आभास है'). 

यही इस 'ब्रह्म' का 'सगुण', 'निर्गुण', और 'सगुण - निर्गुण', उभय रूप का खेल है, वह विलक्षण है, अव्याख्येय और अनिर्वचनीय है, जिसे शब्दों में बाँधने के प्रयास में, गणित के सूत्रों में पिरोने के प्रयत्न में ज्ञानी -ध्यानी, संत-महात्मा और दार्शनिक से लेकर वैज्ञानिक तक सभी अनवरत उलझे हुए हैं..., अपनी-अपनी परिकल्पनाओं... .. व्याख्याओं......और माडलों ......के साथ......'आखड वाले जेतड़े सब आखी रहे लिव लाई ' ........

हमारे विविध पुराण इनमे से केवल दो-चार गुणों को प्रमुख मानकर चलते है ... इसलिए कभी.-.कभी परस्पर विरोधी सा भी जान पड़ते है, परन्तु समग्रता के आलोक में समस्त विरोध स्वतः मिट जाते हैं. अतः समग्रता में जानना चाहिए, यह बोध उपनिषद् कराता है.

Monday, February 21, 2011

पूर्णता का दर्शन

 


भारतीय संस्कृति में वर्णित उपनिषदिक दर्शन को प्रायः 'पूर्णता का दर्शन'  कहा जाता है. क्या है यह पूर्णता का दर्शन और क्यों कहा जाता है इसे पूर्णता का दर्शन? आइये आज इसे समझने का प्रयास करते हैं. इसके लिए श्वेताश्वर उपनिषद् के एक मन्त्र को यदि हम प्रतिनिधि और बीजमंत्र कर रूप में स्वीकार कर सकें तो यह पूर्णता अपने दिव्य रूप में वहाँ प्रकट होता है, समझने और समझाने दोनों ही दृष्टि से यह उत्तम है.यह मन्त्र है -

'एको देवः सर्वर्भूतेषु गूढः  सर्वव्यापी सर्व भूतान्तरात्मा 
कर्माध्यक्षः सर्व भूताधिवासः साक्षी चेता केवलः निर्गुणश्च'  - (६.११)  

अर्थात, सभी प्राणियों में स्थित ईश्वर एक है, वह सर्व व्यापक. समस्त भूतों का अंतरात्मा, कर्मों का अधिष्ठाता, समस्त प्राणियों में बसा हुआ साक्षी, परम चैतन्य, परम शुद्ध और निर्गुण है. यह तो हुआ इस मन्त्र का शब्दार्थ. परन्तु यह मन्त्र है बहुत रहस्यपूर्ण, ....आइये इसे दूसरे दृष्टिकोण से देखें, संख्याओं में विभाजित कर गणितीय रूप में देखें  -
      १ - एको देवः 
      २ - सर्वर्भूतेषु गूढः  
      ३ - सर्वव्यापी 
      ४ - सर्वभूतान्तरात्मा 
      ५ - कर्माध्यक्षः 
      ६ - सर्व भूताधिवासः 
      ७ - साक्षी 
      ८ - चेता 
      ९ - केवलः 
      १० - निर्गुणश्च
इस मन्त्र में हम देख सकते हैं कि पूरे मन्त्र को १ से १० की संख्या में विभाजित किया जा सकता है. संख्या का प्रारंभ १ से है और एक अंक की सबसे बड़ी संख्या ९ है और यह संख्या 'केवल' है. दसवी संख्या निर्गुण है जिसका गुणन नहीं हो सकता, वह शून्य है. शून्य स्वतः निर्गुण है ऊपर वाले १ पर इस निर्गुण शून्य को रख देने से १० संख्या स्वतः बन जाती है. इस १० में सम्मिलित '१' ब्रह्म और आत्मा दोनों का प्रतिधित्व करता है. इसमें '१०' नाम-रूपमय सृष्टि का वाचक है. इस '१' के अभाव में समस्त सृष्टि 'o' शून्य है. मृत है, प्रलायावास्था में है, मूल्यहीन है तथा '१' के साथ रहने पर वही मूल्यवान है, सजीव है. '९' अंक केवल है, पूर्ण है, अतएव '९' अंक जहां भी रहता है, अपने स्वरुप का परित्याग नहीं करता. अतः केवल है, अतः केवल वही रहेगा जो वस्तुतः है..

उदाहराणार्थ :   ९ के गुणनफल का योग सदैव ९ ही होगा.
            ९ x १ = ९
            ९ x २ = १८,     (१ + ८ = ९ )
            ९ x 3 = २७,    (२ + ७ = ९ )
            ९ x ४ = ३६,     (३ + ६ = ९ )
                         ........................................
इतना ही नहीं योग (+) और घटाव (-) की क्रिया में भी यह ९ अपने स्वरुप का परित्याग नहीं करता. आइये देखें कैसे - 
(अ) - ९ + ८ + ७ + ६ + ५ + ४ + ३ + २ + १ = ४५,  
                                            (४ + ५ = ९)

(आ) -  ९ ८ ७ ६ ५ ४ ३ २ १       कुल योग = ४५ (४ + ५ = ९)
   (-)   १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९       कुल योग = ४५ (४ + ५ = ९)
    ---------------------------
     =  ८ ६ ४ १ ९ ७ ५ ३ २       कुल योग = ४५ (४ + ५ = ९)
              .................................
इसीलिए उपनिषदों में कहा गया है कि ब्रह्म परमपूर्ण है, वह (अदः) और यह (इदं) दोनों ही पूर्ण है. उस पूर्ण में से पूर्ण को घटाने पर भी सम्पूर्ण ही शेष बचता है.- 
.'ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात पूर्णमुदच्यते 
  पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते'. 

इस दर्शन के अनुसार 'ब्रह्म' आदि, मध्य और अन्त, सभी काल में पूर्ण है. इस मन्त्र में निर्गुण और सगुण दोनों ही सिद्धांतो का, विचारधाराओं का अद्भुत मेल है. सृष्टि के प्रारम्भ में वह 'ब्रह्म' अकेला था, सृष्टि रचना के बाद भी, सब कुछ अपने अन्दर समेट कर एक '१' रहा भी..., और नहीं भी रहा...., वह अनेक  '१०' बन गया.., जगत बन गया, सृष्टि बन गया. '१ ' विहीन '१०' (जगत) शून्य '०' है. निर्गुण है. एक '१' के साथ सम्मिलित रूप में वही '१०' ...है, सृष्टि है, ...सगुण है. ....परन्तु यह सगुण भी अंततः निर्गुण ही है.... 
-       (१ + ० = १, अर्थात 'लौकिक जगत सत्य है')    
        (१  - ० = १, अर्थात 'पारलौकिक जगत सत्य है') और      
        (१ x ० = ०, अर्थात 'जगत असत्य है, आभास है'). 

यही इस 'ब्रह्म' का 'सगुण', 'निर्गुण', और 'सगुण - निर्गुण', उभय रूप का खेल है, वह विलक्षण है, अव्याख्येय और अनिर्वचनीय है, जिसे शब्दों में बाँधने के प्रयास में, गणित के सूत्रों में पिरोने के प्रयत्न में ज्ञानी -ध्यानी, संत-महात्मा और दार्शनिक से लेकर वैज्ञानिक तक सभी अनवरत उलझे हुए हैं..., अपनी-अपनी परिकल्पनाओं... और व्याख्याओं...और माडल ...के साथ....... 

Saturday, February 19, 2011

सखी मधुमास आयो री


सखी! मधुमास आयो री
झूम रही गेहूं की बाली,
पीली सरसों झूम रही है.
अरहर अलसी चना मटर
सब खोले बाहें लिपट रही है.

धरती ने ओढ़ी धानी चूनर
पवन को सूझी नयी शरारत
कभी तेज कभी मंद-मंद बह
देखो विजन डुलाय रहा है.
यह कौन कर रहा देखो इशारा ?
संकेत पर किसके प्यारा घूंघट 
यह धरती का अब उठा रहा है.

खेतखलिहान में जुटा कृषक भी
गीत - बासंती गुनगुना रहा है
होली गीत का प्यारा सा मुखड़ा 
हे सखी! किसे ये सुना रहा है ?
देख सखी! मै सच कहती हूँ..,
मधुमास का ऋतु आ गया है.

Monday, February 14, 2011

आत्मोत्सर्ग का स्वरुप





समाज में व्याप्त अत्याचार, अनाचार, भ्रष्टाचार शोषण का सामना करते -करते एक दिन वह स्थिति आ जाती है जब अन्दर सोया पुरुषार्थ भी जागृत हो उठता है. नहीं ...अब ...और नहीं...., बहुत दिन सह लिया..बहुत ज्यादा सह लिया..अब और नहीं सहूंगा...मिटा डालूँगा इसे....अन्याय का यह अस्वीकार बोध मानव मन को दो विकल्प उपलब्ध कराता है - प्रथम, हम अन्याय और शोषण की ओर से पूरी तरह विरक्त हो जाय, यह मान लें कि हमारे चरों ओर जो कुछ घटित हो रहा है हम उसके सहभागी नहीं है. हम कुछ नहीं कर सकते. अतएव हमारा कोई दायित्व नहीं. द्वितीय, यह स्थिति अन्याय, शोषण और भ्रष्टाचार से सीधे प्रतिकार और टकराव का है. पहली  स्थिति पलायनवादिता है, विवशता और पराधीनता की स्थिति है. दूसरी स्थिति अन्याय से आमने - सामने जूझने की स्थिति है जहां जीवन का मोह निरर्थक हो जाता है. और मृत्यु का वरण पहली अनिवार्य शर्त बन  जाती है.जहां मृत्यु के अनजाने भय में भी दायित्व का सौन्दर्य और विवेक का प्रकाश दिखाई देने लगता है. मन बोल ही उठता है - 'पहिला मरण कबूल कर जीवन की छड़ आस', यहाँ मृत्यु की कोई चिंता नहीं और जीवन से कोई मोह भी नहीं. बिना तत्त्वज्ञान के यह होता भी नहीं, वह शक्ति -साहस और ऊर्जा तभी मिलती है जब व्यक्ति में ज्ञान और दायित्व का, कर्त्तव्यबोध का उदय होता है. जब ऐसा होता है तो वह अन्याय और भ्रष्टाचार को सहने से इनकार कर देता है. यह स्थिति  पहले भी कई बार आयी है ..और आज भी आ उपस्थित हुई है.... 

परन्तु आज परिस्थितिया बदल गई है, शस्त्र नहीं उठाना है, अपना काम नियम - कानून और संविधान की परिधि में रहकर पूर्णतया अनुशासित ढंग से करना है. इसके लिए एक मात्र ब्रह्मास्त्र है -"वोट का अधिकार'. सोच-समझकर इसका प्रयोग करना है. हमें बलिदान भी देना होगा, शीश भी कटाना होगा: परन्तु वह शीश होगा जातिवाद का, क्षेत्रवाद का, धर्मवाद का, अलगाववाद का. हमें कुनबे की छोटी सोच की कुर्बानी देनी होगी. राष्ट्रीयता को सर्वोपरि और सर्वोच्च मानकर ही अपना अगला कदम उठाना होगा. व्यक्तिगत हितों की, स्वार्थों की, व्यापक हित के लिए होम करना पडेगा. यदि हम राष्ट्र के नाम पर इस दायित्व बोध को समझ सकें तो यही जागृति है, यही आज का आत्मोत्सर्ग है, अह्मोत्सर्ग है. अहंकारोत्सर्ग है, बलिदान है.. आखिर आप इस देश के संवेदनशील नागरिक हैं, जागरूक है, शूर वीर है. ऐसे ही शूर-वीरों के लिए कबीर ने कहा था कभी - 'सूरा सोई सराहिये जो लड़े दीन के हेतु / पुर्जा पूर्जा कटि मरे ताऊ न छड़े खेत //' . यहाँ मरना नहीं है, मन को मारना है, वह भी स्व के लिए, सर्व के लिए जूझना है मैदान छोड़कर भागना नहीं है..

हम चार दीवारी के अन्दर भले ही हिन्दू रहे या मुसल्मान , चार दीवारी  के बाहर हम भारतीय हैं और केवल भारतीय हैं.. आज का राष्ट्रधर्म और व्यक्ति धर्म दोनों ही यही है. यहाँ केवल सृजन है...., निर्माण है..., नवीन भारत का पुनर्जागरण है. यह किसी राजनीतिक की भाषा या प्रचार प्रसार नहीं, अपने अंतर्मन की आवाज है जो सिर्फ मित्रों और दोस्तों को हो सुनायी जा सकती है, दूसरों को नहीं. आज यही कार्य एक दायित्व मानकर राष्ट्रीयहित में एक आह्वान और एक निवेदन दोनों है. हमें अवांछनीय कार्यो को दृढ़ता से रोकना होगा. शार्टकट के सारे रास्ते और सुविधाशुल्क के प्रचलन पर दृढ़ता से रोक लगाना होगा. कम से कम हम स्वयं तो यह कार्य न करें. न अपनों को करने दे. संख्या हमारी अवश्य बढ़ेगी. आखिर हम भ्रष्टाचार, अनाचार, अत्याचार को कब तक सहें........?

Sunday, February 13, 2011

जिन्होंने 'मृत्यु-सौन्दर्य' को पहचाना.




बलिया की मिट्टी में जन्मे,
'मंगल' ने जब ललकारा था...
'अंग्रेजों तुम भारत छोड़ो..,
यह हिन्दुस्तान हमारा है..'.
उतर पड़े तब पहन के चोला
केसरिया सब बलिदानी रे..., 
वो भी टीम क्या टीम थी भैया, 
जिसमे सम्मिलित थे जो साथी,
उन्हें राजा-रानी-प्रजा मत कहो!.
वतन के वे स्वाभिमानी थे.. .
मृत्यु की इस सौन्दर्य पे भाई I
लाखों जीवन कुर्बान है भाई !.
'जीवन' जो नहीं कर सकता..
'मृत्यु' उसे पूरी करती है..
लेकिन यह भी सच है भैया !
मरना नहीं  आता है सबको
जो जीना भी सीख नहीं पाए,
भला मरना वे क्या जानेंगे ?
क्या मृत्यु सौंदर्य पहचानेंगे ?
क्या मृत्यु के सत्य को जानेंगे ?
कुछ तो मरते है - एकबार,
कुछ एक ही दिन में कईबार..
दुःख को जग से पुनः मिटाने
बुद्ध को 'मैत्रेय' रूप में आना है.
आना तो है हरि को भी अब,
'कल्कि' रूप में आना है ...
वादा अपना जो निभाना है.
फिर बात वही दुहराता हूँ ..
मृत्यु समापन नहीं, सृजन है..,
यह मृत्यु का ही 'महागर्जन' है.

. 

Tuesday, February 8, 2011

पूजा सरस्वती की: महिमा धन का




बच्चों की परीक्षा की तैयारी
जगह-जगह अब दीख रही है.
कोचिंग जाकर सुबह सबेरे 
न जाने क्या सीख रही है?
कुछ करने को 'सरस्वती पूजा',
सड़कों पर उतावले दीख रहें है.
सरस्वती हैं 'स्वर की देवी',
विद्या - वाणी - ज्ञान आधार.
कभी विद्या की पूजा होती थी,
धन की पूजा होती है आज.
सरस्वती के मंडप में भी
देखी धन की महिमा आज.
धनिक वर्ग है कला विहीन क्यों?
सुविधाभोगी संवेदनाहीन क्यों?
कैसी दुविधा क्या माया है?
आज समझ में आया है कुछ,
क्यों कहीं धूप कहीं छाया है?
छोड़ 'हंस' की विवेकी प्रकृति,
'उल्लू आदर्श' जो अपनाया है.