Tuesday, July 13, 2010

वह कविता भी क्या कविता है?

जिस कविता में कोई होश नही,
जिस कविता में कोई जोश नही,
जिस कविता में कोई प्यास नही,
जिस कविता में कोई आस नही,
जिस कविता में कोई हास्य नही,
वह कविता भी क्या कविता है?


जिस कविता में अनुराग नही,
जिस कविता में है आग नही,
जिस कविता से हो विराग नहीं,
जिस कविता में कोई चिराग नही,
जिस कविता में कोई स्वाद नही,
वह कविता भी क्या कविता है?


जिस कविता में हो शक्ति नही,
जिस कविता में हो भक्ति नही,
जिस कविता में अनुरक्ति नही,
जिस कविता में अभिव्यक्ति नही,
जिस कविता से हो विरक्ति नही,
वह कविता भी क्या कविता है?


जिस कविता में कोई आह नही,
जिस कविता में कोई वाह नही,
जिस कविता में कुछ स्याह नही,
जिस कविता में कोई सुझाव नही,
जिस कविता में कोई सलाह नही,
वह कविता भी क्या कविता है?


जिस कविता में कोई रंग नही,
जिस कविता से उठे तरंग नही,
जिस कविता में जीने का नही,
जिस कविता में कोई उमंग नही,
जिसे पढकर हो कोई दंग नहीं,
वह कविता भी क्या कविता है?


जिस कविता में कोई जागृति नही,
जिस कविता की कोई आकृति नही,
जिस कविता की कोई स्वीकृति नही,
जिस कविता में हो प्रकृति नही,
जिस कविता झलके संस्कृति नही,
वह कविता भी क्या कविता है?


जिस कविता में व्याकुलता नही,
जिस कविता में आकुलता नही,
जिस कविता में अनुकूलता नही,
जिस कविता में चंचलता नही,
जिस कविता में समरसता नही,
वह कविता भी क्या कविता है?


जिस कविता में इतिहास नही,
जिस कविता में परिहास नही,
जिस कविता में उपहास नही,
जिस कविता में आकाश नही,
जिस कविता से हो प्रकाश नही,
वह कविता भी क्या कविता है?

माँ ने कराया सन्मार्ग का बोध

यूँ तो माँ को गुज़रे हुए
हो गए हैं, कई वर्ष .
किन्तु लगता है......,
वह है बहुत निकट.....,
यहीं कहीं, आस पास ही.


मनाता हूँ अब भी श्रद्धा से,
उसकी पुण्य तिथि प्रत्येक वर्ष.
जैसे कभी वह मनाती थी
मेरा जन्मदिन हर वर्ष.
हाथ जोड़कर, विनीत भाव में
मांगता हूँ,उससे सन्मार्ग,
आशीर्वाद और उत्कर्ष.


आज फिर उसकी पुण्य तिथि है,
उसके चित्र को झाड - पोंछकर,
फूलमाला से सजाकर रखा है,
उसी परंपरागत केक वाली चौकी पर.
समर्पित किया है - पुष्पं , पत्रं
और मधुरं उसे, श्रद्धा भाव से.
जलाया है दीप, चढ़ाया है चन्दन,
दिखाया है - अगरबत्ती औए धूप.


देखता हूँ; धूप के सुगन्धित धूम्र में,
माँ, आ खडी हुई है, लिपटी श्वेतवस्त्रों में.
अब दीख रही है माँ.., मेरी प्यारी माँ...
..अब साडी, उड़ रही है, हवा में धीरे ..धीरे...
माँ, हिला रही है ....हाथ; ...हौले....हौले.....
और अब विलीन हो गयी, हवा में...व्योम में....

हवा अब बदल गयी है, ..... मेघ....में,
मेघ संगठित होकर नभ में छा गया है,
हल्की, रिमझिम बूंदें बरसा गया है.
मेघ से तो बरसा था ......पानी;
पानी तरल था, .....बूंद रूप था,
पानी ठोस था, ...ओला स्वरुप था,
ध्यान आया सघन - संगठित
ओला ही तो है, हिमवान - हिमालय.

लगा सोचने, ..माँ तो ....गंधरूपी थी,
धूम्र बनी.., वायुरुपी थी.., जलरूप बनी .
तो क्या हिमनद रूप माँ का ही है ?
क्या ये नदियाँ..., दरिया.., ये झरने,
सब .....माँ का ही प्रवाह हैं.?

हां, तभी तो करते हैं,
पालन पोषण, माँ के समान.
और ये फलदार वृक्ष ?
ये ठूंठ ...सूखे ..से पेड़ ?
क्या इसने नहीं पाला है,
हमे माँ के समान ?
क्या इससे बने पलंग, कुर्सियां, ..
अनुभूति नहीं कराते, माँ की गोद का ?
दरवाज़े बनकर क्या नहीं करते सुरक्षा ?
छत बनकर क्या नहीं करते, हमारी रक्षा?

परन्तु, आश्चर्य है, यह बात पहली बार,
आज क्यों समझ में आ रही है?
क्योंकि, आज तुने सन्मार्ग पूछा है- माँ से.
प्रगति और उत्कर्ष का मार्ग पूछा है- माँ से.
माँ, अब सन्मार्ग दिखा रही है,
प्रगति का मार्ग बता रही है.
सबमें अपने अस्तित्व का बोध
करा रही है, मानो कह रही हो,
बेटे चित्र को छोड़ो , तस्वीर भूलो.
सृष्टि में मेरा ही रूप देखो, वही हूँ मैं,
वाही है मेरा रूप, मेरा स्वरुप....

सचमुच, देखता हूँ...........
यह जल अब पानी नहीं, 'माँ' है,
यह वायु अब हवा नहीं, 'माँ' है.
यह वृक्ष अब लकड़ी नहीं, 'माँ' है
यह अरण्य और आरण्यक,
ये सब कुछ और नहीं, 'माँ' है.
ये प्रस्थर...ये शैल..माँ है, माँ है.


अरे हाँ, तभी तो कहा गया है माँ को
"शैलपुत्री", 'शैलजा' और 'गिरिजा',
धर्म ग्रंथों में. यह हिमनद
"ब्रह्मचारिणी" के तप से है द्रवित,
स्नेह से है गतिमान,
माँ है - 'हिमाचल पुत्री', गिरिराज किशोरी.

अज्ञानता की जब तक है,
घनी धुँध छायी; वह 'क़ाली' है.
ज्ञानरूप जब चक्षु खुला,
देखा, अरे वह 'गोरी' है, 'गौरी' है.
चेतना हुई है अब जागृत,
माँ ने इसे कर दिया है- झंकृत.
सचमुच आज सन्मार्ग दिखाया है,
मुझे सत्य का बोध कराया है.

लेते हैं संकल्प अभी से,
संग तुम भी ले लो मेरे भाई.
अब न स्वयं करेंगे, न करने देंगे -
"वायु प्रदूषित".
अब न स्वयं करेंगे, न करने देंगे -
"जल को दूषित".
अब न स्वयं करेंगे, न करने देंगे -
"ध्वनि प्रदूषित".
अब पेड़-पौध लगायेंगे,
इसकी संख्या बहुत बढ़ाएंगे.
माँ का क़र्ज़ चुकायेंगे,
अब माँ का क़र्ज़ चुकायेंगे.
हे माँ ! तुझे नमन,
तुझे वंदन, बहुत बहुत अभिनन्दन.





Friday, July 2, 2010

ईमान आज डिगता है क्यों?

ईमान आज डिगता है क्यों? इन्सान आज बिकता है क्यों? साहस आज डरता है क्यों? मित्र आज छलता है क्यों? ये कुछ प्रश्न हैं जो छकाने लगे है, जागते ही नहीं सोते में भी सताने लगे है. जब से इंसान, ईमान की कीमत जानने लगा है, साहस की शक्ति और मित्र की भक्ति को भली - भांति पहचानने लगा है. तभी से, शायद तभी से उसे मिल गया है, अपनी कुत्सित वासनाओं को फलीभूत करने का एक सफल माध्यम, एक अवसर.

विज्ञानं की अति भौतिकता ने, उसकी कुशाग्रता, व्यावहारिकता ने मानवीय संवेदना को मार दिया है. लिप्सा की वेगवती प्रबल धारा ने, भावनाओं को धो डाला है. वह अच्छी तरह जनता है, जो अभी तक नहीं हुए शुष्क, अवसरवादी, भोगवादी और निरा भौतिकवादी, उन्हें कैसे ठगा जाना है? कब, कहाँ और किस तरह शिकार बनाना है? वह जनता है, जो नहीं है भौतिकवादी, वह है नर्मदिल इंसान, संवेदी और कमजोर प्राणी. उसकी कोमल भावनाओं को, उसके प्यार और सत्कार को, कभी चुराकर, कभी बंधक बना कर, और कभी कुचक्रों में फसाकर, किया जाता है मजबूर और मजबूर.

मजबूर ही बिकता है, मजबूर ही डरता है. मजबूर मित्र ही डंसता है, पतित होता है. कुछ तो हैं मजबूर तन से, कुछ मन से, और कुछ धन से. बुद्धि को भी मजबूर करनेवाला एक और शैतान जो पैदा तो बहुत पहले हुआ था, अब बहुत बड़ा हो चुका है. भक्ष्य - अभक्ष्य का कर आहार, अब हो गया है बहुत बलवान. यह बड़ो - बड़ों को मजबूर करता है. भाई को भाई के हाथों, पडोसी को पडोसी के हाथों और मित्र को मित्र के हाथों क़त्ल कराता है, कभी परंपरा के नाम पर, कभी पंथ के नाम पर, कभी जाति के नाम पर और कभी उस धर्म के नाम पर; जिसे जनता तक नहीं. जिसने अपने धर्म ग्रंथों का परायण तक नहीं किया कभी. कभी कुछ शब्दों, कुछ प्रसंगों को सुन भले लिया हो, मनन नहीं किया है, मंथन नहीं किया है कभी. उसे इसकी आवश्यकता ही क्या है ? जिसे इसकी घोर आवश्यकता है जब वही हैं उदासीन, बुद्धि - विवेक से पराधीन.

अब उन्हें क्या कहें, जो शब्दजाल फैलाते हैं, अर्थ - निहितार्थ को तोड़ कर विकृत करते हैं. रचते हैं कुछ ऐसा कुचक्र; जो पैदा करे अनर्थ. नई प्रतिभाओं को इसी में फंसाना चाहते हैं. वे जानते हैं, यदि नई पीढ़ी जान गयी सच्चाई फिर हाथ नहीं आएगी. अच्छा है कच्ची उम्र में ही कापी कलम के बदले पकड़ा दो उसे - ' A K- ४७', 'A K - ५६' और बना दो उन्हें नक्सली, आतंकवादी और उग्रवादी.

फिर क्या करे हम? इस कमजोरी को दूर भगायेंगे. और हम तो उनसे यही कहेंगे. हम तो सबसे यही कहेंगे - अरे भटके हुए महानुभावों! अब और न हमको भटकाओ. स्वर्गलोक की 'परी' और जन्नत की 'हूर' का लोभ - लालच मत दिखलाओ. हो सके ... हो सके तो स्वर्ग इसी धारा पर लाओ, हमें अब और न भटकाओ, हमें और न भटकाओ..

Thursday, July 1, 2010

काश! ऐसा हुआ होता.

सजल नयनों की भाषा,
यदि पढ़ लिया होता,
मूक आमन्त्रण को,
यदि समझ लिया होता.

मौन की आवाज को,
यदि शब्द दे दिया होता,
आत्मपीड़क न बन,
चाहत को बयां किया होता,

दिल की बात यदि,
होठों पर ला दिया होता.
तुम्हारे अंतर का भी ज्वार,
यदि समय से पवां चढ़ा होता,

यह सही है, मै ही चुप था,
तुम्ही ने कुछ कहा होता.
तो ..तो..जो शायद जो कुछ
भी हुआ, नहीं हुआ होता.
काश! कुछ ऐसा हुआ होता.

(करीब २८-३० वर्ष पूर्व विद्यार्थी जीवन की रचना)

Monday, June 28, 2010

स्त्री-पुरुष विमर्श

"पुरुष है कुतूहल और प्रश्न, और स्त्री विश्लेषण, उत्तर और सब बातों का समाधान. पुरुष के प्रत्येक बातों का उत्तर देने के लिये वह प्रस्तुत है. उसके कुतुहल, उसके अभाओं को परिपूर्ण करने का उष्ण प्रयत्न और शीतल उपचार. अभागा मनुष्य संतुष्ट है बच्चों के समान. पुरुष ने कहा, 'क' स्त्री ने अर्थ लगा लिया - कौवा, बस वह रहने लगा."
- जयशंकर प्रसाद

"प्रत्येक पुरुष के लिए स्त्री एक कविता है. कविता उसके सूने दिलों में संगीत भरती है. स्त्री भी उसके ऊबे हुए मन को बहलाती है. पुरुष जब जीवन की सूखी चट्टानों पर चढ़ता - चढ़ता थक जाता है, तब सोचता है - चलो, थोडा मन बहलाव कर लें. स्त्री पर अपना सारा प्यार, अपने सारे अरमान निछावर कर देता है, मानो दुनिया में और कुछ हो ही न और उस के बाद जब चांदनी बीत जाती है, जब कविता नीरव हो जाती है, तब पुरुषों को चट्टाने फिर बुलाती हैं और वह ऐसे भागता है मानो पिंजरे से छूटा हुआ पंछी और स्त्री? स्त्री के लिया वही अँधेरा, फिर वही सूनापन."
- जगदीश चन्द्र माथुर


"पुरुष पानी है और स्त्री गूंगी माटी. पानी में इच्छा जगती है मूर्ति रचने के लिए. यही रचना इच्छा ही उस गूंगी माटी को वाणी और गति दे देती है. शायद इसे ही हमारे यहाँ पुरुष और प्रकृति का नाम दिया गया है - ब्रह्म और माया. पर ये हैं दोनों एक. पानी और मिटटी एक मूर्ति से अलग कैसे हो सकते हैं? एक प्रेरणा है, एक रचना है और दोनों एकाकार हैं - एक हैं. दुर्भाग्य उस दिन शुरु हुआ जब पुरुष ने कहा, 'स्त्री! तू श्रद्धा है, देवी है मैं हूँ - 'ब्रह्मा, मनु और कर्मकार, रचनाकार'. अर्थात स्त्री महज जन्म और पालन के अलावा जगत के सारे कर्मों, व्यापारों, रचनाओं से बिलकुल दूर कर दी गयी. पुरुष जो कुछ भी करे, स्त्री उसे श्रद्धा से स्वीकारे, इससे ज्यादा अपमान पुरुष और क्या कर सकता था? और इससे ज्यादा नुकसान मानवता का और क्या हो सकता था?"
- लक्ष्मी नारायण लाल.


"स्त्रियों का मुख्य कर्तव्य है कि वे अपने सौन्दर्य द्वारा पुरुषो में जीवन का संचार करे, क्योकि पुरुष तभी सद्गुण प्राप्त कर सकते है, जब वे रमणी के अनंत सौन्दर्य पर निछावर होकर उसके व्यक्तित्व में अपनेआपको पूर्णतया अन्तर्हित कर देते हैं."
- स्वेट मार्डेन

"स्त्री ने एक एक करके अपने बहुत से अधिकार इसलिए खो दिए कि वह पुरुष पर आधिपत्य चाहती रही है. इसमें वह उतनी ही स्वार्थी है जितना कि पुरुष जो नारी पर पूर्ण अधिकार चाहता है, परस्पर स्नेह नहीं. जैसे एक द्वंद्व है, जैसे एक मज़बूरी है कि दोनों एक दूसरे के बिना नहीं रह सकते".
- डॉ. रांगेय राघव

"द्विविधा में बंधी हुई स्त्री कभी किसी भी पुरुष को बल नहीं दे सकती. वह कभी एक भाव में रहेगी और कभी दूसरे. एकनिष्ठ सती ही अपने पुरुष को बल प्रदान कर सकती है."
- अमृतलाल नागर

"वास्तव में स्त्रियाँ जल के सामान हैं जो शांत रहने पर शीतल होती हैं पर जब जल में तूफ़ान आता है , तब वह ऐसा भयंकर हो जाता है कि बड़े बड़े जहाज भी टुकड़े- टुकड़े हो जाते हैं."
- आचार्य चतुरसेन

"स्त्री का ह्रदय एक एक विचित्र वस्तु है. वह आज प्यार करती है, कल दुत्कार देती है. प्यार के लिए स्त्री सबकुछ करने को तैयार हो जाती है, परन्तु प्रतिकार के लिए उससे भी अधिक भयानक कर्म कर बैठती है."
- सुदर्शन


Sunday, June 27, 2010

मेरी दिव्य ग्रंथावली


मुझे तलाश है जिसकी वर्षों से, दशकों से,
इसलिए ढूंढ़ रहा हूँ उसे अनवरत लगातार,
इतनी बड़ी दुनिया में, कहीं तो दिखेगी,
कभी तो मिलेगी, वह मेरी 'स्वप्न सुन्दरी'.


वह जो बन जाएगी, 'विचार-संगिनी',
मेरी 'जीवन-संगिनी', 'चिर-संगिनी'.
वह हो कुछ ऐसी, जिसमे बचपन का
अबोध, तुतलाता उन्मुक्त हास्य हो,


अल्हड़ता के साथ छलांग लगाती हुई
कुलांचे मारती हुई एक किशोरपना हो,
कुछ चंचलता हो, चुलबुलापन हो,
अन्तरिक्ष में दूर, उड़ने की ललक हो,
एक उत्कट कुछ करने की अभीप्सा हो,
एक अपरिमित जिजीविषा, उमंग हो.


जिसकी भाषा में भले ही पिक की कूक न हो,
जिसकी शैली में भले ही मयूर का नृत्य ना हो,
काक वाणी से भी परहेज नहीं है मुझे,
परन्तु, अन्तः में चातक सी हूक... तो हो.


चौकिये नहीं,
अपेक्षा न गौरा की है, न गोदावरी की,
न दुर्गा, लक्ष्मी, शारदा की और न ही 'काली' की,
न ही किसी घरवाली की, अथवा किसी साली की.
अपेक्षा तो है, .....एक 'दिव्य काव्य ग्रंथावली की'.


जिसमे भरा हुआ
ईशावास्य का ज्ञान हो,
'ब्लैक होल' सा विज्ञानं हो, गीता सा प्रज्ञान हो,
जो वेदांत सा महान हो, कुछ शाप हो, वरदान हो,
हल्दीघाटी का स्वाभिमान हो, कुछ तीर हो, कमान हो,


जिसमे गार्गी की तर्कशीलता हो,

सावित्री सी तेजस्विता हो, दूरदर्शिता हो,
गौतम बुद्ध की प्रज्ञा हो, महावीर की अहिंसा हो,
नचिकेता सा बालहठ हो, नानक सा सुहृदय हो,
न हो जहाँ एकलव्य को फटकार, कर्ण का तिरस्कार,
जहाँ भीष्म भी अपनी प्रतिज्ञा की समीक्षा कर सके,
जहाँ कोई हुमायूँ राखी की मर्यादा, गर्व से निभा सके.


सीता सी नहीं मिलती
कोई बात नहीं,
किन्तु जो उर्मिला सा प्रतीक्षार्थी हो,
विद्यावती, कलावती, लीलावती, और
पद्मावती भले न हो, परन्तु मुख में,
कबीर की साखी हो. बिहारी की सतसई हो


हजारी सा गाम्भीर्य हो,
शुक्ल सी करुना हो,
परशुराम चतुर्वेदी की, जहाँ बही 'संत परंपरा' हो,
दिनकर की उर्वशी और प्रसाद की कामायनी हो,
मीरा का अल्हड नृत्य हो,महादेवी की हूक हो,
जहाँ नीरज के गीत और बच्चन की हाला हो,
अभिज्ञान शाकुंतलम सी थोड़ी चूक हो ,
मेघ सा कोई दूत हो, ऐसी कोई समन्वित
'काव्य ग्रंथावली ' चाहिए मुझे.


तलाश रहा हूँ,. आज भी
लगातार,
ग्रंथालयों में,.........सम्मेलनों में.
सभाओं में, ..नेट पर, ब्लॉग पर...
ढूंढता हूँ उसे, निकटस्थ मित्रों में,.
दूरस्थ मित्रों में, और उनमे भी,
जिन्हें, आखिर शत्रु कहूँ तो कैसे?
क्या उन्हें मुझसे अनुराग नहीं..?
आखिर दिन-रात
हमारा ही चिंतन करते हैं.
फाँसने का कोई न कोई उपक्रम करते रहते हैं.
जनसे ज्यादा तो, वह नहीं सोचता जो
निकट रहता है, अपने को सगा कहता है.


क्या पूरी हो पाएगी मेरी तलाश ?
क्या मिल पायेगी मुझे मेरी 'श्री राधा' ?
हाँ...., शायद ........हाँ, ... परन्तु......,
बनना पडेगा मुझे, '......श्री कृष्ण सा'.
बदलना होगा स्वयं को, सर्वदा के लिए.


अरे! ऐसा तो कभी सोचा ही न था,
देखा ही न था, इधर दृष्टि गयी ही न थी.
सोचमे मात्र से ही दिखने लगी है......,
मेरी 'श्री राधा', ..मेरी 'दिव्य ग्रंथावली'.
क्या मेरे हाथ, उतने लम्बे हो पायेंगे?
क्या आगे बढकर, उन्हें छू पाएंगे?
स्वयं को सिद्ध करना है अब.


हे 'ग्रंथावली !', हे 'श्री राधा !', अब क्या है बाधा?
अब तुम्ही शक्ति दो, निज की अनुरक्ति दो.
तुम्ही कोई युक्ति दो, अमित - अक्षय भक्ति दो.
समर्पित करता हूँ,
जो भी हूँ, जैसा भी हूँ,
स्व को....,.....तुम्हारे 'श्री चरणों.....' में............



लेकिन अब पाने की अभीप्सा रही कहाँ?
अब छूने की ललक - अभिलाषा बची कहाँ?
तृप्त हो गया मन, नेत्र पान कर.
संतृप्त हो गया हूँ मैं, पृष्ठ पानकर.
सच है, पूर्णता समर्पण में है, तलाश में नहीं.
संतृप्ति में है, शान्ति में है, किन्तु प्यास में नही.
अब तुम में ही डूब चुका हूँ, गहरायी तक ,
डूबना ....और ...मिट जाना ही अमरता है.
अमरत्व ही शाश्वत सत्य है, परम रहस्य है .
यही प्रत्येक गति का चरम लक्ष्य है.


हे 'ग्रंथावली' ! तुझे नमन, तेरा अभिनन्दन!!
मुझ अकिंचन को, क्या से क्या बना दिया.
हे 'सावित्री' ! तुझे नमन, तेरा अभिनन्दन !!
तू ने तो मुझे 'सत्यवान' बना दिया.
हे 'श्री राधे' !
तुझे नमन, तेरा अभिनन्दन !!
तू ने तो मुझे 'श्याम सा' बना दिया.









Tuesday, June 22, 2010

शिक्षा क्या है?

शिक्षा क्या है?
शिक्षा का उद्देश्य है - प्रस्फुटन, अंकुरण,
आतंरिक सृजनात्मक शक्तियों का.
शिक्षा का उद्देश्य है - प्रकटन,
मानव की सम्पूर्ण संभावनाओं का.


शिक्षा है - एक पुनीत अवसर,
सन्मार्गी के स्वरुप में रूपांतरण का.
शिक्षा है - संस्कार के माध्यम से,
संस्कृति की पहचान / अभिवृद्धि का.


शिक्षा है - व्यवहार के माध्यम से,
सभ्यता,
संस्कृति के प्रदर्शन का.
शिक्षा है - आचरण के माध्यम से,
मानवीय मूल्यों में अभिवर्द्धन का.


शिक्षा है -
सर्वोच्च सामाजिक गठन हेतु,
उपयुक्त मनोभूमि की ......
आंतरिक संरचना का.
अनुकूलता, वैयक्तिकता
और ....सार्थकता का.


शिक्षा का सर्वोच्च उद्देश्य है -
मानव का देवत्व रूप में उन्नयन.
मानव
का दानव के रूप में पतन,
शिक्षा की असफलता मात्र नहीं,
उसपर न मिटने वाला धब्बा,
और घोर - घनघोर ..कलंक है.


शिक्षा की सफलता में ही,
अंतर्भूत है - व्यक्ति निर्माण,
चरित्र निर्माण, समाज निर्माण
और श्रेष्ठ राष्ट्र का निर्माण.
शिक्षा की उपयोगिता में ही
सन्निहित है - वैश्विक शांति,
वैश्विक समृद्धि, वैश्विक सौहार्द्र.


आज शिक्षा के नाम पर,
दृष्टिगत हैं अनेकश: प्रमाण पत्र,
और बड़ी उपाधियाँ, कुछ महँगी,
और कुछ अति महँगी उपाधियाँ.


फिर भी क्यों लगते हैं
ये उपाधि धारक, चंचल मानव,
एक प्रशिक्षित बन्दर ?
क्यों है उनमे गांभीर्य का अभाव?
और क्यों है, सहनशीलता, साहस,
धैर्य, और समुचित आदर का अभाव?


उनकी दृष्टि सतत कार्य और
दायित्व के बजाय, फल और
अर्थ पर ही केन्द्रित क्यों है?
और आज का शिक्षक समाज
मौन और मूक दर्शक क्यों है?