Monday, August 8, 2011

दो पक्ष: मौन के

दो पक्ष: मौन के
निःशब्दता और मौन के,
दीखते है - दो पक्ष.
प्रथम मौन, शिशु की 'अज्ञता'.
द्वितीय, ज्ञान की - 'दिव्यता'.


बीच, इन्हीं दो पाटों के,
बिखरी और सिमटी पड़ी हैं-
हमारी अनुभूतियाँ, संवेदनाएं.
शब्द - प्रतीक और रचनाएं.


शब्दों से, अ-शब्द हो जाना,
निः शब्दता, मौन धारण करना.
प्रगति है; साधना की, आराधना की.
चेतना-दिव्यता की, ज्ञान- प्रज्ञान की.


जिसमे गति है, ऊर्जा है.
अनेकत्व तक से, एकत्व तक की.
अंततः, अलिंगी एकत्व का भी लोप.
निःशब्दता में, दिव्यता में शून्यता में.


यह तो रूपांतरण है,
गतिज ऊर्जा की, स्थितिज ऊर्जा में.
इस शून्यता में है, पतझड़ - बसंत.
जहां एक नहीं, सहस्रों अनंत.

16 comments:

  1. जिसमे गति है, ऊर्जा है.
    अनेकत्व तक से, एकत्व तक की.
    अंततः, अलिंगी एकत्व का भी लोप.
    निःशब्दता में, दिव्यता में शून्यता में.
    समाधि की उच्च अवस्था का वर्णन जहां कोई भी नहीं है न शब्द न निशब्द... बहुत गहन भाव ! आभार!

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  2. bahut badiyaa bhav liye shaandaar rachanaa,badhaai aapko. "ब्लोगर्स मीट वीकली {३}" के मंच पर सभी ब्लोगर्स को जोड़ने के लिए एक प्रयास किया गया है /आप वहां आइये और अपने विचारों से हमें अवगत कराइये/हमारी कामना है कि आप हिंदी की सेवा यूं ही करते रहें। सोमवार ०८/०८/११ को
    ब्लॉगर्स मीट वीकली में आप सादर आमंत्रित हैं।

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  3. आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल मंगलवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    यदि किसी रचनाधर्मी की पोस्ट या उसके लिंक की चर्चा कहीं पर की जा रही होती है, तो उस पत्रिका के व्यवस्थापक का यह कर्तव्य होता है कि वो उसको इस बारे में सूचित कर दे। आपको यह सूचना केवल इसी उद्देश्य से दी जा रही है! अधिक से अधिक लोग आपके ब्लॉग पर पहुँचेंगे तो
    चर्चा मंच का भी प्रयास सफल होगा।

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  4. बहुत गहन अभिव्यक्ति ..मौन के दोनों पक्षों को समझाने का उत्तम प्रयास

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  5. itni gehanta se kabhi socha nahi.sochne par vivash karti bahut acchhi abhivyakti.

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  6. शब्दों से, अ-शब्द हो जाना,
    निः शब्दता, मौन धारण करना.
    प्रगति है; साधना की, आराधना की.
    चेतना-दिव्यता की, ज्ञान- प्रज्ञान की.
    आपके द्वारा प्रकट किए गए गहन भाव को बार-बार पढ़कर समझने की कोशिश करता हूं। कभी-कभार थोड़ी बहुत व्याख्या भी कर दिया करें।

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  7. आप सभी अध्येताओं, समीक्षकों, समालोचकों को इस प्यार भरे समर्थन और प्रोत्साहन के लिए बहुत-बहुत आभार. आप ही लोगों के प्यार ने अपने भावों-विचारों को प्रस्तुतुय कर पता हूँ. जब ब्लॉग जीवन में प्रवेश नहीं था तो मेरे पास कहने सुनने- लिखने को कहीं कुछ नहीं था, यदि कहीं अंकुर था भी उसी प्रकार का जिस प्रकार का प्रत्येक व्यक्ति बाथरूम सिंगर होता है. लेकिन आप ही लोग हैं जिन्होंने कलम ऐसी पडा दि की की अब साथ छोट्टा है नहीं. अ६० से अधिक पस्त ब्लॉग पर आ चुकीं हों और ३०० ड्राफ्ट में पड़ी हैं. यह है स्नेह और समर्थन का परिणाम....

    आभार आप सभी का ,,,पुनः -पुनः आभार.

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  8. मनोज जी,
    आप तो विज्ञान क्षेत्र से है इस लिए उसी तरह से अपनी बात स्पष्ट करने का प्रयास करूंगा. आप एक तारा (स्टार) के जीवन चक्र को स्मृति पटल पर लायें. आप देखेंगे की एक स्टार, के जन्म.. ब्लैक होल के महाविस्फोट (बिग बैंग) की घटा से हुई प्रोटो-स्टार, स्टार, सुपर नोवा और एक दिन फिर ब्लैक होल में रूपांतरण. कुल मिलाकर सृष्टि से प्रलय तथा प्रलय से सृष्टि की प्रक्रिया. जिसका समापन नहिब है. कभी नहीं. प्रत्येक चिन्तक, धर्म ग्रन्थ अपनी-अपनी तरह से थोड़े बहुत हेर-फेर के साथ इसी बात को कहते हैं.

    यही ब्लैक होल की अवस्था में पड़े रहना प्रलय है और तारों, सितारों, मंदाकिनियों, अपने-अपने सौर परिवारों के साथ उनकी उपस्थिति सृष्टि है. इस रचना में मौन में अनेकों पतझर और बसंत कह कर इसी बात को ध्वानित किया गया है. गणित की दृष्टि से शुन्य में अनंत का विलीनीकरण शायद अटपटा लगे. लेकिन सहारों अनन्त ? अनंत की तो सीमा ही नहीं होती. वह तो अगणनीय है ,एक ही अनानंत पर्याप्त है फिर सहस्रों अनन्त की बात पर गणितज्ञ..रुक जाएगा अनेक दोष निकालेगा.......लेकिन बात ऐसी है नहीं सहस्रों अनन्त का तात्पर्य, यहाँ सृष्टि और प्रलय की सहद्रों बार की आव्रिरी, कित्शः चक्रोंसे है.....बार -बार ..अन्नंत बार से है. क्योकि जब तक ओर्र्जा रहेगी, उसका रूपांतरण गतिज से स्थितिज, और स्थितिज से गतिज में होता रहेगा.

    चिंतन के क्षेत्र में मौन उच्चतम ज्ञान की वह स्थिति है जहां भूत्व से एकत्व के संदरी और सत्य का बोध होता है. कुछ लोग इस आकर्षण में उलझ कर वहीँ रुक जाता , अपलक निहारता रहता है. लेकिन सजग इसके भी पार जाता है जहन केवल अस्ति पर नहीं, नास्ति, अनस्तित्व के संसार की नही बात होती है. वही अस्तित्वहीनता, मौन है, अब काया कहे ? किससे कहे ? किस भाषा किस लिपि में कहे क्योकि सभी की अपनी-अपनी सीमायें हैं.... याद कीजिए हिंदी साहत्य के सबसे बडबोले कवि, सामाजिक चिन्तक समाज को सुधारते-सुधारते स्वयं सुधार गए . कहना पड़ा उन्हें -
    " एक कहूँ तो है नहीं, दूई कौन तो गारी.
    है जैसा वैसा रहे कहे कबीर विचारी."

    वह सर्वोच्च तत्व जैसा है एकदम निराला है. कुछ भी नहीं का जा सकता. सके आलोचल कबीर सबके मित्र बन बन गए. हाँ भाई लाइन में हो तो जान ही जाओगे मै कब तक और कितना बता पाऊंगा सीमित सामर्थ्य वाले शब्दों से. लेकी शब्द, प्रतीक हमर बुद्धि को सन्मार्ग पर प्रेरित करते हैं. एक धरातल, सोचने-समझने का प्रदान करते हैं इसलिए वे महत्वपूर्ण है. जगाने और पर्थ पर चलने को प्रेरित करने भर के लिए आगे यात्रा तो स्वयं करनी है क्षेत्र लौकिक हो या पारलौकिक.

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  9. जे.पी. तिवारी जी,
    नमस्कार,
    आपके ब्लॉग को "सिटी जलालाबाद डाट ब्लॉगपोस्ट डाट काम"के "हिंदी ब्लॉग लिस्ट पेज" पर लिंक किया जा रहा है|

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  10. thanks. and thanks again for visit and comments.

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  11. kavita gambhir aur byakhayaa sarahaniy lagi !

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  12. शब्दों से, अ-शब्द हो जाना,
    निः शब्दता, मौन धारण करना.
    प्रगति है; साधना की, आराधना की.
    चेतना-दिव्यता की, ज्ञान- प्रज्ञान की.
    ..bahut badiya sandesh..

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  13. समझ रहे हैं हम भी मौन के दोनों पहलूओं को ...
    आभार !

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  14. सुन्दर रचना, बहुत सार्थक प्रस्तुति
    , स्वाधीनता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं

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