Saturday, May 21, 2011

प्रेम पाथेय


बात यहाँ प्रेम की है मित्र !  -  भटक जाओगे.
अक्षरों को मत पकड़ना     -  बहक जाओगे.
शब्दों को मत पकड़ना      - ठिठक जाओगे.
भाषा को मत पकड़ना       - डूब जाओगे.
लिपि को मत पकड़ना     -  पिघल जाओगे.
इसके अर्थ को पकड़ना     -  संभल जाओगे.
निहितार्थ को पकड़ना      -  दौड़ जाओगे.
इसके भाव में डूबना        -   तर जाओगे.
 
 
तैरने की कोशिश न करना   -  गच्चा खाओगे.
डूबने की कोशिश न करना   -  उछल जाओगे.
कभी संदेह मत करना       -   मिट जाओगे.
विश्वास को मत तोड़ना     -    पा जाओगे.
त्याग को मत छोड़ना       -   छा जाओगे.
समर्पण को मत छोड़ना     -   बदल जाओगे.
नाम - ग्राम - रंग - रूप    -  सब भूल जाओगे.
प्रेम का पाथेय लेकर       -  प्रेमरूप बन जाओगे.
बात प्रेम की है मित्र !   -   खुद प्रेम बन जाओगे.

15 comments:

  1. बहुत सुंदर, प्रेम जैसे अकथनीय विषय को आपने सहज शब्दों से कह दिया है, प्रेम का पाथेय हमें मार्ग पर बनाये रखे, आभार!

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  2. अति सुन्दर विचार..अनुकरण करने योग्य बातें..

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  3. प्रेम मार्ग को प्रशस्त करता प्रेम पाथेय.. सुन्दर रचना

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  4. प्रेम का मूक प्रदर्शन अकथ्य रह जाएगा। भाषा उसे आर्थी आयाम देती है। अतः भाषा के साथ भाव को पकड़ कर तर जाना ही श्रेयस्कर है। बहुत अच्छी रचना।

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  5. अनुकरणीय विचार।

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  6. सभी विद्वान समीक्षकों का हार्दिक स्वागत और रचनात्मक टिप्पणी तथा सुझाव के लिए आभार.

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  7. आपको पढ़कर मैं भी ..प्रेम बन गयी

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  8. चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 24 - 05 - 2011
    को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

    साप्ताहिक काव्य मंच --- चर्चामंच

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  9. kya baat hai sir sarthak kathya -ban sandhan kiye gaye .
    shukriya ji

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  10. अर्थ , निहितार्थ , भाव को पकड़ने वाले ही तर पायेंगे ...प्रेम की बात है !
    सुन्दर !

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  11. बहुत ही गहन एवं सार्थक चिंतन ।

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  12. अनुकरणीय है प्रेम पाथेय

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  13. बात प्रेम की है मित्र ! - खुद प्रेम बन जाओगे.
    adbhud....

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  14. सभी विद्वान समीक्षकों का हार्दिक स्वागत और रचनात्मक टिप्पणी तथा सुझाव के लिए आभार.

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  15. मित्रों चर्चा मंच के, देखो पन्ने खोल |
    आओ धक्का मार के, महंगा है पेट्रोल ||
    --
    बुधवारीय चर्चा मंच

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