Thursday, April 4, 2013

'नारी-विमर्श के अर्थ’ का निहितार्थ



                                    
                       (भाग १)

संचारक्रांति ने अंतर्जाल के माध्यम से जहाँ वैश्विक ज्ञान-विज्ञान को अद्यतन रूप में समृद्ध और सर्वसुलभ कराया है, वहीँ मानवमन की अन्तःचेतना को भी गहराई तक झकझोरा है. उदासीन रहनेवाला संवेदनशील चिन्तक भी अब अपना मौन और झिझक छोड़कर अंतर्जाल पर मुखर हो चुका है. अब वह स्वयं जहाँ दूसरे की विचारों की समीक्षा करता है, वहीँ उसके अपने विचार की भी सम्यक समीक्षा होती रहती है. कहना न होगा इस पूरी प्रक्रिया में महिलाओं की उपस्थिति अपेक्षाकृत अधिक है. इस आपसी विचार-विनिमय में, वैचारिक प्रस्तुति में समस्याओं पर स्पष्टता और प्रौढ़ता के साथ जहाँ गहन अनुभूति है तो तीव्र आक्रोश भी. इस क्रम में जब नारी मुक्तिआन्दोलन, महिला सशक्तिकरण और स्त्री विमर्श जैसे विषय जब राजनितिक और सामाजिक क्षेत्र में चर्चा-परिचर्चा का प्रमुख विन्दु बना हुआ है तो भला साहित्य क्षेत्र ही अछूता कैसे रहे? उपन्यासों और कविताओं के माध्यम से इस विन्दुओं को कई बार और कई तरह से उठाया गया है. प्रारंभ हो चुकी इस चिंतनधारा को आगे बढ़ाते हुए अंतर्जाल की संवेदी कवयित्री और विदुषी चिन्तक रश्मि प्रभा जी ने इस नारी-विमर्श के अर्थ को जानने और इसके निहितार्थ को जनमानस के समक्ष प्रस्तुत करने का समसामयिक निर्णय लिया, सहयोगियों के आलेख-निबंधों को संपादित किया और निष्कर्ष रूप में अब यह नारी-तत्व और नारी-अस्मिता पर केन्द्रित एक बहुआयामी साहित्यिक परिचर्चा नारी-विमर्श के अर्थ शीर्षक से ही हिन्दयुग्म प्रकाशन द्वारा प्रकाशित होकर जनमानस के समक्ष प्रकाश में आया है. नारी-विमर्श के क्षेत्र में मंथन तो चल रहा है ... और किसी न किसी बहाने लम्बे समय से चल रहा है. कभी यह जोर पकड़ता है तो कभी नेपथ्य में चला जाता है. आलोच्य पुस्तक की समीक्षा के पूर्व विषयवस्तु की पृष्ठभूमि पर एक संक्षिप्त सिंहावलोकन उचित होगा. इसे हम दो विन्दुओं पर देखेंगे - 
(अ) ऐतिहासिक पृष्ठभूमि 
(ब) दार्शनिक पृष्ठभूमि.

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि:
पाश्चत्य देशों में पिछले ५-७ दशकों में नारी-विमर्श के नाम पर काफी कुछ विष-वमन हो चुका है.. विष-वमन उन्हें इसलिए कहना पड रहा है क्योकि उनमे प्रायः एकांगी आक्रोश है, विद्रोह है और व्यवस्था को धराशायी करने का प्रबल आह्वान है. यूरोप में सिमोन दि बाउवा की पुस्तक दि सेकण्ड सेक्स और अमरीका में बेट्टी फ्रीडन की पुस्तक दि फेमिनिन मिस्टिक ने नारी अस्तित्व को पुरुष के साथ सह-अस्तित्व की अवधारणा से अलग एक स्वतंत्र निकाय के रूप में देखने और प्रचारित करने का प्रयास किया. इस आन्दोलन की प्रथम अन्तर्राष्ट्रीय चेयरपर्सन चुनी गयी अस्तित्ववादी चिन्तक सिमोन दि बाउवा. सिमोन ने दो काम किया- पहला, नारी को पुरुष से अलग कर दिया और नाम दिया अन्या और दूसरा काम यह किया कि विवाह नमक संस्था को अनावश्यक घोषित कर डाला तथा नारी स्वतंत्रता के नाम पर मुक्त-सेक्स की मांग कर डाली. गर्भस्थ शिशु को जन्म देने, न देने का पूर्ण अधिकार उसका अपना होगा और बच्चों के पालन का दायित्व सरकार का होगा. यह चिंतन का एकांगी अतिरेक था और विकृत भी. विकृत इसलिए कि बिना विवाह के गर्भस्थ शिशु जब दुनिया में आएगा तो उसका रिश्ता-नाता किसी स्त्री या पुरुष से क्या होगा? क्या विवाह के अभाव में भावी समाज एक पशु-समाज नहीं बन जाएगा जहाँ न कोई किसी का बाप होता है, न भाई, न बहन, न ही अन्य कोई रिश्तेदार .. और दूसरा विकल्प, कोई गर्भस्थ-शिशु जब पैदा ही नहीं होगा, तो क्या धरती पर मानव प्रजाति का विलोपन नहीं हो जायेगा? फिर कैसी सरकार? और किसका पालन-पोषण? इस प्रकार दोनों ही विन्दुओं पर वह अस्वीकार्य था. प्रख्यात चिन्तक और नोबल पुरस्कार विजेता ज्यां पाल सार्त्र ने बिना विवाह सिमोन के साथ एक छत के नीचे दम्पति की तरह कुछ वर्ष व्यतीत किया, परन्तु मतभेद के कारण अलग हो गए और सिमोन का आन्दोलन भी कमजोर पड़ गया. दूसर और अमरिका में बेट्टी फ्रीडन के चिंतन में भी व्यापक बदलाव आया. अपने बाद के अनुभवों को उन्होंने इस प्रकार लिखा मैं नारी आन्दोलन के अभिमानपूर्ण नित्यप्रति के झगड़ों से तंग आ चुकी हूँ,.. शेषकाल अब मैं अपना जीवन जीना चाहती हूँ.. जिस बराबरी के लिए हम लड़े, वैसा जीवन जीने में कुछ गड़बड़ लगता है, ..कुछ धुंधला प्रतीत हो रहा है, इसमें कुछ गलत हो रहा है... मैं पीड़ा और घबराहट के स्वर सुनने लगी हूँ... ८० के दशक में डायना शा जैसी प्रखर महिलाओं ने नारी मुक्ति-समर्थकों की आलोचना की. उनका कहना था समकालीन नारी आन्दोलन ने हमें उन मूल्यों को तिरस्कृत करना सिखाया है जो परंपरागत रूप से स्त्री जाति के साथ जुड़े हुए हैं. यह नारी मुक्ति आन्दोलन नहीं है, इससे मैं थक गयी हूँ... यह तो नारी मुक्ति का लेबल है.. बाद का विमर्श प्रायः इसी त्रिकोण के बीच दोलायमान रहा है.

दार्शनिक पृष्ठभूमि:
पाश्चात्य देशों में नारी समानता का आन्दोलन तीव्र गति से उठा, क्यों उठा इतने आक्रोशित रूप में? इसका कारण है एक दार्शनिक मिथ. वह मिथ यह है कि आदिम स्त्री (हौवा इव) की उत्पत्ति आदिम पुरुष की एक पसली से हुई थी. सिमोन ने इसे जंघे की पसली कहा है. उस पसली के अलग हो जाने से पुरुष कं नहीं हुआ, परन्तु स्त्री तो एक छुद्र अंग ही बनी रही. वह दीन-हिन् बनी रही और पुरुष दम्भी बना रहा. पुरुष के अंतर्मन में वही श्रेष्ठता और नारी मन में वही हीनता का भाव कायम रहा. 

लेकिन भारतीय चिंतन में असमानता वाला मिथ नहीं है.उपनिषद स्पष्ट कहते है कि सृष्टि के प्रारंभ में पुरुष (ब्रह्म) अकेला था. उसने अपना सामान रूप से द्विधा विभाजन किया, दाल के दो फांक की तरह एकदम बराबर-बराबर. वृह. उप.(१.४.३) में महर्षि याज्ञवल्क्य ने इस प्रकार इसकी व्याख्या की है दिव्य पुरुष ने अपने ही शारीर के दो भाग किया, उससे पति और पत्नी हुए जैसे मटर के दो अर्द्ध भाग. अर्ध नारीश्वर रूप. यह उदहारण बताता है की एक के बिना दूसरा अधूरा है. यह बहुत बड़ा अंतर है पाश्चात्य और भारतीय चिंतन में. इस वैचारिक पृष्ठभूमि, परिवेश और वातावरण के आलोक में एकबार पुनः लौटते हैं आलोच्य पुस्तक नारी-विमर्श के अर्थ पर.



                                 - डॉ. जयप्रकाश तिवारी



नोट भाग-२ में आलोच्य पुस्तक नारी-विमर्श के अर्थ पर समालोचनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया जायेगा. कृपया प्रतीक्षा करे.








Monday, April 1, 2013

काव्यसंग्रह पगडंडियाँ: आधारभूमि और लक्ष्यविन्दु

                                              
मननशील मन जब सत्य और समाज के विभिन्न आयामों से परिचित होता है तब वह परिचय और उसकी प्रतिक्रया ही शब्दों का आवरण ओढकर कथन और कलम द्वारा एक विशिष्ट स्वरुप ग्रहण करती है. लाक्षणिक भाषा में ये विशिष्ट उदगार ही पगडंडियाँ हैं. किसी पगडण्डी का प्रवर्तक तो उसका रचनाकार ही होता है लेकिन जब उसके अनुयायी अनेक हो जातें हैं और धरती पर अपने पगचिह्नों की लकीर छोड़ते हैं, तब वह एकल न होकर पगडंडी बन जाती है. पगडण्डी ही कालांतर में पुष्टपरिपुष्ट होकर, व्यावहारिक रूप से पालित-पोषित होकर एक दिन खडंजा, डामर, कंक्रीटपथ और राजपथ भी बन जाया करती है. इस काव्य-संग्रह में संकलित २८ युवा रचनाकारों में से अनेक रचनाएँ मन और ह्रदय के प्रकोष्ठ से निकलकर चौड़ीसड़क, विस्तृतपथ की आशा जगती हैं. विशेषरूप से वे रचनाएं जो किसी न किसी दार्शनिक आधार, वैज्ञानिक सोच अथवा लोकमंगल की भावना से ओतप्रोत हैं, भले ही उनके शब्द और स्वर, भाव और भंगिमा कुछ कठोर ही क्यों न हो गए हों. ध्यान रहे लोकलुभावानी शब्दों वाली पगडंडियाँ मंरेगा मार्ग की तरह होती हैं जो बाढ़ की कौन कहे बरसात भी नहीं झेल पाती हैं. लेकिन लोकमंगल पथ डामर और कंक्रीट से बने होते हैं तभी आधारपथ बन पाते हैं; जिनसे कई नई पगडंडियाँ निकलती भी हैं और जुडती भी हैं. ये पगडंडियाँ ही सांस्कृतिक चेतना का, आर्थिक समृद्धि का  नैतिकतादायित्व और कर्त्तव्यबोध का पथ प्रसस्त करती हैं जो किसी भी सभ्य समाज के लिए अनिवार्य तत्व माने जाते हैं.

सैद्धांतिक अभिव्यक्ति मष्तिष्क-प्रसूता होने के कारण जहाँ शुष्क और जटिल होते हैं, वहीँ काव्य ह्रदय-प्रसूता होने के कारण सरस और सरस होने के साथ-साथ रोचक भी होता है. यद्यपि दोनों ही प्रकार की अभिव्यक्तियाँ प्रखर चिंतन की देन हैं, लेकिन जो मष्तिष्क का चिंतन है वह दर्शन है, विज्ञान है, गणित है और जो ह्रदय का चिंतन है, वह कविता है. इस तथ्य पर विचार करते हुए मेरी लेखनी ने इसके अंतर को और भी स्पस्ट करते हुए लिखा है –”“....जो चिंतन है वह दर्शन है / अभिव्यक्ति है जो वह कविता है / दर्शन है विधा एक ज्ञान की / इसकी दशा निराली है / कविता है हमें मार्ग दिखाती / भावों में अभिव्यक्ति कराती / होता फिर गूढ़ सत्य अनावृत्त / जो है त्रिभुज वही वर्ग और वृत्त / बिना अभिव्यक्ति हम रुक नहीं पाते / यह मानव की अपनी प्रवृत्ति. इन पगडंडियों में इसी कथन का व्यावहारिक रूप दृष्टिगत होता है. इस मानवीय प्रवृत्ति के कारण ही यह रचनाकार सीधे सृष्टिकर्ता से (प्रकारांतर से शासक वर्ग से) बिना लागलपेट के प्रश्न करता है ओ क्षितिज पर रहनेवाले देख क्या हाल तेरी क्षिति का है आज? वहीँ प्रशासन से पूछता है ऐ भाष्कर सुन रहे हो.... साथ ही साथ समाज से भी दो टूक शब्दों में पूछता है –“शांति सभी को प्यारी है, क्यों दहसत की चिंगारी है?. लेकिन यह पगडंडी ही है जो इसका रहस्योद्घाटन भी करती है, उसकी सटीक नजर और पारखी दृष्टि से कुछ भी छिप नहीं पाता. वह डंके की चोट पर कहती है कि नफ़रत की यह चिंगारी आखी बुझे तो बुझे कैसे? क्योकि थम गया दंगा क़त्ल हुआ आवाम का / आ गए घर जलानेवाले हाथ में मरहम लिए. ऐसे ही अनेकानेक प्रश्न, जिज्ञासा और समाधान, कोरी बाल जिज्ञासा नहीं है. ये सशक्तं मन की अभिव्यक्तियाँ हैं. कहीं हमें बच्चा न मान लिया जाय इसलिए रचनाकार अपनी बैटन पर बल देने के लिए स्पष्ट करता है –“ मैया मैं बड़ा हो गया हूँ इसलिए बता रहा हूँ..... समाज का जो वर्ग अभी भी अर्द्धनिद्रा में है वह जगे, आलस्य दूर करे और अनुसरण करे अपनी मनपसन्द पगडण्डी का. जिंदगी के तमाम उतार-चढ़ाव से जूझने का मन्त्र भी है इसमें और हौसला भी – “ जिंदगी तुझे सहते सहते जीना हमने सीख लिया है / जब तक तुम रुला पाती हँसना हमने सीख लिया है / ... कौन कहता है कि ठुकराए हुए की कद्र नहीं होती है / हमसे पूछो, जिंदगी उसके बाद ही तो शुरू होती है. कहना न होगा कितनी बड़ी आशा, कितना बड़ा साहस, ऊर्जा और सामर्थ्य भरा है इस अभिव्यक्ति में. अशांति दूर होगी और शांति मिलेगी, ऐसा सबल आश्वासन इन पगडंडियों से मिलता है. पथ यदि सरल भी हो, चिकना और चौड़ा भी हो लेकिन पथिक को प्रेरणा और उत्साह न मिले तो वह निरर्थक ही है, महत्वपूर्ण है प्रेरणा शक्ति. अतिरिक्त साहस और संबल जो बच्चों के साथ साथ बूढों के लिए भी समान रूप से उपयोगी हो.

इस प्रकार इन रचनाओं में जीवन के विभिन्न रंग-रूप हैं, रुढिवादिता के प्रति जहाँ प्रखर क्षोभ विद्रोह और प्रतिक्रिया है; वहीँ प्रगतिशीलता को प्रबल समर्थन भी. इस संग्रह में जहाँ विज्ञानं है, तर्क है, वहीँ आध्यात्मिकता नैतिकता और पौराणिकता का पूत भी है. इन पग डंडियों का शिखर विन्दु एक ही है –‘लोकमंगल. भू की परिधि से ये पगडंडियाँ फूटतीं हैं और आड़े-तिरछे रास्ते, अवरोधों को पार करती हुयी केंद्र तक जा पहुचती है. इनमे बाँकपना है, गिले-शिकवे हैं, उतार-चढ़ाव-घुमाव है. इसीलिए तो काव्यरूप में हैं. यदि ये सीधी होतीं तो गणित होती और तब इनकी संज्ञा पगडंडी नहीं, त्रिज्या होती. अध्यात्म, पंथ और पथ: इन पद डंडियों से विस्तार पता है और और विज्ञानं त्रिज्या तथा जीवा से.

वास्तवमें ये पगडंडियाँ  काव्य-ह्रदय का उच्छ्वास हैं, विकासशील हैं और इनमे भी विस्तृतपथ और राजपथ वही बन पाएंगी जिनमे मस्तिष्क की सीमेंट, तर्क की गिट्टी पड़ी हो और जबतक उसपर व्यावहारिकता की रोलर नहीं चलेगी तबतक न तो वह पैदल चलने वालों के लिए सुगम होगी और नहीं मोटर वाहनों के लिए. इतना तो निर्विवाद सत्य है कि ये कविताये हमें झकझोरती हैं, मनन-मंथन और अनुगमन के लिए प्रेरित भी करती हैं. यदि ये कवितायें समाज की प्रतिगामी सोच को बदलने की शुरुआत भी क्र सकें तो यही इनकी सफलता और सार्थकता होगी. कई रचनाओं में यह सामर्थ्य भी है और क्षमता भी. लेकिन गतिशील तो समाज को होना है. रूचि के अनुसार व्यक्ति, परिवार और समाज यदि इसे स्वीकार करे तो वह कल्याणकारी ही होगा, ऐसा विश्वास किया जाना चाहिए. शहरों जैसी चौड़ी सडक न पाने पर भी पग डंडियों का महत्व कम नहीं हो जाता.  बहुसंख्यक आबादी को सड़क से घर तक, घर से खेतखलिहान-नहर नदी तक, प्राथमिक विद्यालय से प्राथमिक चिकित्सालय तक जो पहुचती हैं हमें, आपको, नन्हे-मुन्नों को: वे पगडंडियाँ ही तो हैं.

हिदयुग्म द्वारा प्रकाशित और अंजु रंजु मुकेश की त्रिमूर्ति द्वारा सम्पादित यह साझा काव्यसंग्रह पगडंडियाँ निश्चय ही उपयोगी और संगह्नीय कृति है. वैयक्तिकता और सामाजिकता को आधार बनाकर रची गयी इस काव्यसंग्रह की भाषा और काव्य-शिल्प पर विचार करना बहुत महत्वपूर्ण नहीं रह जाता. हिंदी भाषा से इतर अन्य भाषिक शब्दों को स्थान देने से हिंदी साहित्य समृद्ध ही हो रहा है, ऐसा मेरा मानना है. हाँ, ग्राह्यता के लिए अत्यधिक उतावलापन उचित नहीं, मांग के अनुरूप प्रयोग को ही उचित कहा जा सकता है. हमरी शुभकामनायें, मंगलकामनाएं सभी के साथ हैं....
                                                                                                         

                                                                                           - Dr. Jai Prakash Tiwari   




           

Thursday, March 7, 2013

अध्यात्म के मूल तत्त्व

तत्त्व  रूप जग  एक है, नाम  और रूप अनेक .
एक अनेक से भिन्न नहीं, तत्त्व तत्त्व सब एक.

ग्रन्थ  वही  है अर्थ  नए,  नूतन  सरस  नवीन .
मूल  वही  है  फूल नए,  जानत  सकल  प्रवीण.

एक रंग में  सात रंग है, सात रंग मिल एक.
ब्रह्म  ही  राम-रहीम है, दोनों  ही  है  एक.

ब्रह्म वही सदग्रंथ वही, भाषा और लिपि अनेक.
ऋषि मुनि  साधु फकीर, गावत निजहि विवेक.

कहे अभेद जो भेद बिना, सगुण बिना कहे निर्गुण.
है कोई ज्ञानी विज्ञानी, कोई फकीर या साधु निपुण?

शुभ - अशुभ के द्वन्द में, क्यों घुट रहे हो तुम?
अशुभ में ही शुभ छिपा, शुभ - अशुभ हो तुम.

बंधन और मुक्ति भवर में, क्यों उलझ रहे हो तुम.
जुड़ना मोह से बंधन है, छूटना ही मोह से मुक्ति.

                   
                              डॉ जय प्रकाश तिवारी

Tuesday, March 5, 2013

सम्बन्ध दर्शन और कविता का

क्षण क्षण के बीच जो अंतराल
वह भी तो एक क्षण ही है
कण कण के बीच में जो दरार
उसमे भी तो कोई कण ही है

ढूंढते ढूँढते अंतराल को
मापते मापते इस दरार को
जो चिंतन है वह दर्शन है,
अभिव्यक्ति है जो वह कविता है.

दर्शन है विधा एक ज्ञान की
इसकी तो दशा निराली है
कविता है हमे मार्ग दिखाती
भावों में अभिव्यक्ति कराती

होता फी गूढ़ तत्व अनावृत्त
जो त्रिभुज, वही वर्ग और वृत्त
बिना अभिव्यक्ति रह नहीं पाते
यह मानव की अपनी प्रवृत्ति

समझाते हैं जब मन को अपने
अध्यात्म रूप वह बन जाता
दिखलाना हो जब औरों को
विज्ञानं रूप में सामने आता

तुम बोलो तब क्या अंतर है -
विज्ञान और अध्यात्म जगत में
जो वहिर्मुखी विज्ञान है वह
अंतर्मन में जो प्रज्ञान है व्ह.

दोनों हैं दो पार्श्व ज्ञान के
बुद्धि चेतना सत्ता प्रज्ञान के
संवेग से हैं दोनों चंचल
संवेग रहित हैं शांत अविचल.

जो भेद मान लिया हमने
वह ज्ञान नहीं, अज्ञान है
अभेद जिसने देख लिया
उसी के पास तो ज्ञान है.

Wednesday, February 27, 2013

अशक्त नारी, सशक्त नारी

 
(भाग-१)
नर  से जो द्विगुणित है नारी,
वह नारी क्यों आज है हारी?
शक्तिस्रोत है नाभि में जिसके,
आखिर उसकी क्या लाचारी?

सृजन - पालन जो करती है
वह ध्वंश नाम से क्यों घबराती?
जिस पथ सब सरल चाल चलते,
उस पथपर भी वह बल खा जाती

जो स्नेह लुटाती लाल पर अपने
वह वधू का काल क्यों बन जाती?
कुछ वधुएँ भी होती हैं ऐसी जो
सासू माँ को क्या खूब छकाती .

खाने को वह गम खाती है
और पी जाती सब खारा पानी,
फिर भी जाए छलक कभी तो
स्वयं को वह कठघरे में पाती

सिसक सिसक कर जीवन जीती
और जीवन, चैका - बेलन - रोटी
लांघा जब चौखट उसने आज
उठा लिया है जब बेलन हाथ

यह समाज उसपर चिल्लाता
हो पति या बेटा हाथ उठाता
उस हाथ को नारी रोक न पाती
अब भी जाने क्या है लाचारी?

निकली जब घर से बाहर आज
उसे मिला दुशासन का समाज
दुशासन के लम्बे -लम्बे हाथ
दुर्योधन का उसपर वरद हाथ?

एक दुशासन के कारण ...
कभी हुआ यहाँ था भीषण रण
तब राजतंत्र था, अब लोकतंत्र
कैसी प्रगति, जब वही आचरण?

गृह अन्दर नारी का शासन है
पर घर-घर एक दुशासन है
दुशासन तो घर में ही पलता
माँ आखिर उसको समझ न पाती

कहती  जिसको लाल ! लाल!!
वही करता  नारी को  हलाल,
यह नारी के लाल की करनी है
नारी का शव, ये टुकडे लाल.

(भाग-२)

छोडो नारी तुम ममता को
छोडो मान और प्रभुता को
तेरी असली शक्ति तो समता है
क्यों छोड़ दिया इस समता को?

समता से नाता जोड़ोगी
यह प्र्स्भुता दौड़ी आएगी
हर दृष्टि थर्राएगी तुमसे
नहीं ध्वंश की बारी आएगी

दुशासन नजर न आएगा
घर बैठे शोक मनायेगा
घुट घुट कर वह मर जाएगा
दुर्योधन भी तब घबराएगा .

अब लाल जिसे भी बोलोगी
मुह में मिसरी जब घोलोगी
यह जग होगा तेरा ही लाल
तू है एक माँ, तू रहेगी माँ .

हो प्रकृति स्वरूपा, बनो प्रकृति
सृजन-पालन में रहो प्रवृत्त,
जननी बन जा, तू जगजननी
जय हे जननी, जय जगजननी !


- डॉ जय प्रकाश तिवारी

Thursday, September 20, 2012

स्वर्गलोक में भी हुआ “हिंदी-दिवस’” पर साहित्यिक परिचर्चा: देर से प्राप्त एक रिपोर्ट


‘हिंदी दिवस’ के अवसर पर इस वर्ष स्वर्गलोक में भी साहित्यिक चर्चा-परिचर्चा का आयोजन किया गया. हिंदी साहित्य की गद्य विधा को घिस-घिस कर चमकाने वाले आचार्य महावीर प्रसाद दिवेदी जी ने संयोजकत्व का दायित्व स्वर्गलोक में भी कुशलता से निभाया. मैंने देखा कई स्व-नामधन्य चिन्तक, साहित्यकार और समीक्षक बैठे थे वहाँ, कुछ मंच पर और बहुत से गोष्ठी की अग्रिम पँक्तियो में. राजनीतिक समीक्षक होने पर घोर अफ़सोस मुझे उस समय हुआ जब मैं इस आयोजन स्थल पर देर से पहुँचा. भारतीय नेताओं के सानिध्य और प्रभामंडल में होने के कारण सम्मेलनों में देर से पहुचने की आदत सी अब बन चुकी थी, मुझे सुखद हैरानी हुई कि कार्यक्रम अपने ठीक निर्धारित समय पर प्रारम्भ हो चुका था और इस समय अपने पूरे उत्कर्ष पर था. मैं तो यह भूल ही गया था कि यह ‘साहित्यिक विचारगोष्ठी’ है, कोई राजनितिक सभा नहीं. मुझे साहित्यिक पत्रकार के रूप में ही आमंत्रित भी किया गया था, लेकिन कहते हैं न कि आदत जो एकबार बिगड जाय, तो बदलने में समय लेती है. साहित्यिक रूचि-रुझान के कारण अपने को कोसता हुआ, कुछ अधीर और निराश सा होकर घुटन और घबराहट में ही इन गूढ़-गंभीर साहित्यिक बातों को लिपिबद्ध करने में जुट गया. निराला, प्रसाद, महादेवी, गुप्त जी  और दिनकर जी जैसे बड़े साहित्यकारों / समीक्षकों को न सुन पाने का दर्द मुझे अंतर से कचोट रहा था. इसके बावजूद भी जो कुछ मिला और जितना भी लिपिबद्ध मैं कर पाया, वह बहुत दूर तक हम-आपका पथप्रदर्शन करेगा, मार्गप्रशस्त करेगा. ऐसा मेरा विश्वास है. इसलिए इस अनुभव में सबको साझेदार बनाना चाहता हूँ. जब मैं इस गोष्ठी में पंहुचा तो देखा, वहाँ आचार्य रामचन्द्र शुक्ल जी गोल-गोल ऐनक लगाये अध्यक्षीय आसान पर विराजमान थे. आचार्य महाबीर प्रसाद दिवेदी जी सञ्चालन कार्य कर रहे थे, यह उनकी कड़क-मिजाजी, अनुशासनप्रियता और प्रबंधकीय योग्यता ही थी कि सबकुछ इतना शांतिमय और सुव्यवस्थित ढंग से चल रहा था. आचार्य हजारी प्रसाद दिवेदी मुख्य अतिथि और मैथिलीशरण गुप्त जी विशिष्ट अतिथि के रूप में मंचस्थ थे. साथ में मुंशी प्रेमचंद, नन्द दुलारे वाजपेयी, इलाचंद जोशी, श्यामसुन्दर दास, अज्ञेय, पन्त जी, निराला जी, महदेवी वर्मा जी तथा किनारे डॉ. देवराज मंचस्थ थे.

इस समय डायस पर खड़े होकर अपने विचार रख रहे थे डॉ. विद्यानिवास मिश्र जी. वे इस परिचर्चा गोष्ठी में साहित्य की परिभाषा को लेकर विमर्श कर रहे थे. उन्होंने कहा– “साहित्य की सबसे सटीक परिभाषा यही है कि जितनी बार वह दोहराया जाय, जितनी बार वह पढ़ा जाए उतनी बार जिया जाये, सही अर्थ में जिया जाए, उतनी बार पाठक या श्रोता के द्वारा नया रचा जाये. यह बार-बार उसका रचा जाना उसकी सबसे सटीक पहचान है. जब साहित्यकार सोचता है कि इसमें बार-बार रचे जाने कि क्षमता आये तो निश्चित ही आगे की सोचता है और अपने ज़माने में रहते हुये अपने बाहर जाकर सोचता है ....... कुछ चीजें जीवन ही होती हैं. जीवन के लिए अमृत होती है, जीवन का भविष्य ही होती है. कविता या साहित्य जीवन का भविष्य है. जीवन का मनोरंजन नहीं है. जीवन की उपभोग सामग्री नहीं है, यह जिंदगी का ऐसा हिस्सा है जो आता है तो बहुत सी चीजें नई कर देता है. घाव भी नए करता है लेकिन साहित्य जब घाव करता है तो उसमे भी ऐसी अनुभूति होती है, यह घाव शायद सबको ही करकता होगा न? सबका घाव होने से घाव ऐसा लगता है कि इसके लिए कुछ करना चाहिए. अपना होता है तो केवल खीज होती है. जब सबका होता है तो दूसरे ही प्रकार की प्रतिक्रिया होती है”. डॉ. राम विलास शर्मा ने वहाँ एक नया प्रश्न उठाया, ‘साहित्य मनुष्य के लिए? या ‘मनुष्य साहित्य के लिए?’. अपना दृष्टिकोण रखते हुये उन्होंने तर्कपूर्ण शब्दावली में कहा - “जैसे मनुष्यों के बाहर मनुष्य की सत्ता नहीं है वैसे ही सुन्दर वस्तुओं से बाहर सौंदर्य की सत्ता नहीं है और तमाम सुन्दर वस्तुएं तमाम सुन्दर भाव-विचार मनुष्य के लिए हैं, उसकी सेवा करने के लिए नहीं है. साहित्य भी मनुष्य के लिए है, साहित्य का सौंदर्य मनुष्य के उपयोग के लिए है, मनुष्य साहित्य के लिए नहीं है. लेकिन अवकाश भोगी सज्जन तमाम जनता का अस्तित्व असिलिये सार्थक समझते हैं कि वह उनके लिए उपयोग कि वस्तुएं उत्पन्न करती हैं. इसे वे सनातन ईश्वर-कृत नियम मानते हैं. इसी नियम के अनुसार वह साहित्य को जनता के लिए नहीं मानते, वर्ण जनता को साहित्य के लिए मानते है.”. मुंशी प्रेमचंद ने कहा - “जिसे संसार दुःख कहता है, वह कवि के लिए सुख है. धन और ऐश्वर्य, रूप और बल, विद्या और बुद्धि- ये विभूतियाँ संसार को चाहे कितना ही मोहित कर लें, कवि के लिए यहाँ जरा भी आकर्षण नहीं है. उसके मोह और आकर्षण की वस्तु तो बुझी हुई आशाएं और मिटी स्मृतियाँ और टूटे हुये हृदय के आंसू हैं. जिस दिन उन विभूतियों से उसका प्रेम न रहेगा; उस दिन वह कवि न रहेगा. दर्शन जीवन के इन रहस्यों से केवल विनोद करता है, कवि उनमे लीन हो जाता है.... ज्ञानी कहता है, ओठों पर मुस्कराहट न आये, आँखों से आँसू न आये, मैं कहता हूँ, अगर तुम हँस नहीं सकते, तो तुम मनुष्य नहीं, पत्थर हो. वह ज्ञान जो मानवता को पीस डाले , ज्ञान नहीं है, कोल्हू है”. .. माथे पर पसीने की बूँदें छलक आयीं थी. रुमाल निकल कर पसीने को पोछकर अब वे पुनः माइक के सामने थे – ....“अज्ञान की भांति ज्ञान भी सरल, निष्कपट और सुनहले स्वप्न देखने वाला होता है. वह इसके विरुद्ध व्यवहार को अमानुषीय समझ वह यह भूल जाता है कि भेड़ियों ने भेड़ों कि निरीहता का जवाब सदैव पंजों और दांतों से दिया है. वह अपना एक आदर्श संसार बनाकर उसको आदर्श और मानवता से आबद्ध करता है और उसी में मग्न रहता है. यथार्थता कितनी आगम्य, कितनी दुर्बोध, कितनी अप्राकृतिक है, उसकी ओर विचार करना उसके लिए मुश्किल हो जाता है.”
   
अब अपना विचार प्रकट करने की बारी अज्ञेय जी की थी. अज्ञेय जी ने अपने बेबाक स्वरों और अपनी अनूठी शैली में बोलना शुरू किया. भेड़ियों का सामना करने के लिए एक सामाजिक विद्रोह की आवश्यकता होती है. इस आवश्यकता को रेखांकित कर रचनाकार, सहित्यकार सामाजिक भेडिओं की आँख का किरकिरी बन जाता है. इस लिए सहित्य सृजन को अज्ञेय जी ने मृत्यु का आह्वान माना. उन्होंने इसी विन्दु से बोलना प्रारम्भ किया - “साहित्य का निर्माण, मानो जीवित मृत्यु का आह्वान है. साहित्यकार को निर्माण करके और लाभ भी तो क्या, रचयिता होने का सुख भी नहीं मिलता, क्योकि काम पूरा होते ही वह देखता है, ‘अरे, यह तो वह नहीं है जो मैं बनाना चाहता था’, वह मानो क्रियाशीलता का नारद है, उसे कहीं रुकना नहीं है- उसे सर्वर्त्र भडकाना है, उभारना है, जलना है और कभी शांत नहीं होना है- कहीं रुकना नहीं है .... मूर्ति का निर्माण हो सकता है, मृत्तिका का नहीं. उसी मिटटी से अच्छी प्रतिमा भी स्थापित की जा सकती है, बुरी भी, पर जहाँ मिटटी ही न हो, वहाँ कितने ही प्रचार से, कितनी भी शिक्षा से, कितने भी जाज्वल्यमान  बलिदान से मूर्ति नहीं बन सकती. विद्रोही हृदय को विद्रोही गदन की आवश्यकता है. उसी प्रकार जैसे मृत्तिका को कलाकार के स्पर्श की...  कुछ क्षण रुक कर वे फिर बोले – “शायद मृत्यु का ज्ञान और जीवन की कामना एक ही चीज है. यह बहुतबार सुनने में आता है कि जीना वही जनता जो मारना जनता है, यह नहीं सुना जाता कि जीवन सबसे अधिक प्यारा उसको होता है, जो मारना जनता है, पर है यह भी ध्रुव सत्य. लोग समझते हैं कि जो जीवन को प्यार करते हैं, वे मृत्यु से डरते हैं. बिलकुल गलत. जो मृत्यु से डरते हैं वे जीवन से प्यार कर ही नहीं सकते, क्योकि जीवन में उन्हें क्षण भ्रर भी शांति नहीं मिल सकती.” आचार्य नन्ददुलारे वाजपेयी जी ने कहा – “साहित्य की अतिशयोक्तियाँ इन्द्रधनुष-सी जीवन के स्थूल, अकाल्पनिक रूखे अस्तित्व को मनोरम बना देती हैं. साहित्य में मनुष्य का जीवन ही नहीं, जीवन कि वे कामनाएं, जो अनन्त जीवन में भी पूरी नहीं हो सकतीं, निहित रहतीं हैं. जीवन यदि मनुष्यता कि अभिव्यक्ति है तो साहित्य में उस अभिव्यक्ति की आशा-उत्कंठा भी सम्मिलित है. जीवन यदि सम्पूर्णता से रहित है तो साहित्य उसके सहित है.तभी तो उसका नाम साहित्य है. तभी तो साहित्य जीवन से अधिक सारवान और परिपूर्ण है तथा जीवन का नियामक और मार्गद्रष्टा भी रहता आया है.”. आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी ने कविता के अलौकिक शक्ति को रेखांकित करते हुये कहा – “कवि की कल्पना शक्ति तीव्र होती है. इस कल्पना शक्ति के द्वारा वह कठिन बातों को ऐसे अनोखे ढंग से सबके सामने रखता है कि वे सहज ही समझ में आ जाती है. इसी शक्ति से वह अनजाने पदार्थो के दृश्यों का चित्र इतना मनोहर खिचता है कि पढ़ने या सुनने वाले एकाग्रचित हो जाते हैं और उस बात पर प्रेम पूर्वक विचार करते हैं. फिर कवि अपने अवलोकन और कल्पना से ऐसी शिक्षा देते हैं कि वह न तो आज्ञा का रूप धारण करती है और न अपना स्वाभाविक रूखापन ही प्रकट करती है, किन्तु भीतर ही भीतर मन को उकसा देती है”. द्विवेदी जी ने अपनी बातों पर बल देकर कहा– मैं साहित्य को मनुष्य की दृष्टि से देखने का पक्षपाती हूँ. जो मनुष्य को दुर्गति, हीनता और परमुखापेक्षिता से बचा न सके, जो उसकी आत्मा को तेजोदीप्त न बना सके, जो उसके हृदय को परदुखकातर और संवेदनशील न बना सकेउसे साहित्य कहने में मुझे संकोच होता है.” फिर वे साहित्य में भाषा प्रोयोग की बात पर उतर आये. इसके लिए तप और साधना की अनिवार्यता बताई. इस विन्दु पर अपना दृष्टिकोण रखते हुये उन्होंने स्पष्ट किया कि- “सीधी लकीर खींचना टेढा काम है. सहज भाषा पाने के लिए कठोर तप आवश्यक है. जबतक आदमी सहज नहीं होता तबतक भाषा का सहज होना असंभव है. स्वदेश और विदेश के वर्तमान और अतीत के समस्त वाँग्मय का रस निचोडने से वह सहज भाव प्राप्त होता है. हर आदमी क्या बोलता है या क्या नहीं बोलता, इस बात से सहज भाषा का अर्थ निश्चित नहीं किया जा सकता. क्या कहने या क्या न कहने से मनुष्य उस आदर्श तक पहुच सकेगा, जिसे संक्षेप में ’मनुष्यता’ कहा जाता है यही मुख्य बात है.

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में इस विमर्श को एक नया आयाम देते हुये, काव्य को नए रूप में परिभाषित करते हुये अपना मत प्रस्तुत किया. साहित्य के कार्य-व्यापारों की ओर लक्षित करते हुये उन्होंने एक रेखा चित्र कुछ यूँ खींचा - “यदि खिले हुये फूलों को देखकर वह न खिला, यदि सुन्दर रूप सामने पाकर अपनी भीतरी कुरूपता का उसने विसर्जन न किया, यदि दींन-दुखी का आर्तनाद सुन वह न पसीजा, यदि अनाथों और अबलाओं पर अत्याचार होते देख क्रोध से न तिलमिलाया, यदि बेढब और विनोदपूर्ण दृश्य या उक्ति परन हंसा, तो उसके जीवन में रह क्या गया? ..... जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञानदशा कहलाती है, उसी प्रकार हृदय की यह मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है. हृदय की इसी मुक्ति की साधना के लिए मनुष्य की वाणी जो शब्द-विधान करती आयी है, उसे कविता कहते हैं. इस साधना को हम भावयोग कहते हैं और कर्मयोग और ज्ञानयोग का समकक्ष मानते हैं..... जो केवल विलास या शारीर सुख की सामग्री ही प्रकृति में ढूँढा करते है उनमे उस रागात्मक ‘सत्त्व’ की कमी है जो व्यक्त सत्ता मात्र के साथ एकता की अनुभूति में लीन करके हृदय के व्यापकत्व का आभास देता है. सम्पूर्ण सत्ताएँ एक ही परम सत्ता और सम्पूर्ण भाव, एक ही परम भाव के अंतर्भूत हैं. अतः बुद्धि की क्रिया से हमारा ज्ञान जिस अद्वैत भूमि पर पहुचता है उसी भूमि तक हमारा भावात्मक हृदय भी इस सत्व रस के प्रभाव से पहुँचता है. इस प्रकार अंत में जाकर दोनों पक्षों की वृत्तियों का समन्वय हो जाता है. इस समन्वय के बिना मनुष्यत्व की साधना पूरी नहीं हो सकती”. अंत में पन्त जी ने सभी साहित्यकारों और पाठकों का धन्यवाद ज्ञापित किया, और इस प्रकार परिचर्चा का समापन हुआ.

वापस घर लौटते समय सोच रहा हूँ, साहित्य यदि मनुष्य के लिए ही हो तो क्या होगा? क्या  साहित्याकर एक चाटुकार नहीं बन जायेगा? क्या एक चारण, एक भाट और रागदरबारी बनकर ही नहीं रह जायेगा? साहित्य, केवल साहित्य के लिए भी नहीं होना चाहिए.... कोई ईश्वर को माने या न माने, यह उसकी अपनी मर्जी. लेकिन वह सत्य को तो मानेगा. साहित्य का श्रेय और प्रेय यही सत्य होना चाहिए. इस सत्य को सुन्दरम बनाने का दायित्व साहित्य का ही है. चिन्तक, वैज्ञानिक और दार्शनिक भी अपनी अभिव्यक्ति साहित्य के ही माध्यम से कर पाता है. इसलिय साहित्य ही वह विधा है जो सत्य को भी, दार्शनिक अभिव्यक्ति को भी रगडता है, घिसता है पूरे कौशल और तन्मयता के साथ, उसकी रुक्षता को घिसकर हीरे जैसी निखार लाकर मानव के लिए उपयोगी भी बनाता है और संग्रहणीय भी. यह हीरा लोहे की तिजोरी में नहीं मानव के मन-मस्तिष्क में रहता है. सत्य रूखा होता है, सूखा होता है, कटु होता है. इस सत्य में माधुर्य और सरसता यह साहित्य ही लाता है. वही सत्य को ‘कटु सत्य’ से ‘सुन्दर सत्य’, ‘सत्यम सुन्दरम’ बनाता है. यही ‘सत्यम सुंदरम्’ कल्याणकारी समाज की संरचना करेगा और ‘शिवम’ बनकर उसमे कल्याण की अन्तःशक्ति प्रवाहित करेगा. तब समाज में केवल दो हाथ-पैर वाले मनुष्य मात्र नहीं रहेंगे, रहेगी उसकी आभा ‘मनुष्यता’ और ‘मानवता’ भी. इस मानवता के अभाव में क्या मानव समाज भी केवल एक पशु-समाज बनकर ही नहीं रह जायेगा? इसलिए यह ‘मानवता’ ही साहित्य का एकमात्र लक्ष्य होना चाहए. लेकिन यहाँ भी हमें मुंशी प्रेमचंद की चेतावनी को याद भी रखना होगा -....“अज्ञान की भांति ज्ञान भी सरल, निष्कपट और सुनहले स्वप्न देखने वाला होता है. वह इसके विरुद्ध व्यवहार को अमानुषीय समझ वह यह भूल जाता है कि भेड़ियों ने भेड़ों कि निरीहता का जवाब सदैव पंजों और दांतों से दिया है. वह अपना एक आदर्श संसार बनाकर उसको आदर्श और मानवता से आबद्ध करता है और उसी में मग्न रहता है. हमें इस आत्ममुग्धता को दूर करना होगा. साहित्य को प्रभुता और मानवता में से यदि एक का वरण करना हो तो निश्चित रूप से मानवता को ही वरण करना चाहिए. इसके लिए ज्ञान दृष्टि और समत्व भाव की भी आवश्यक है. लौह और स्वर्ण में समत्व भाव दृष्टि रखनी होगी. शायद इसी का संकेत करते हुये विद्वान समीक्षकों ने अपने संबोधन में ‘तप’, ‘साधना’, ‘कर्मयोग’, ‘ज्ञानयोग’, ‘भावयोग’ जैसी शब्दावली का प्रयोग किया है. विना साधना के मानवता विकसित नहीं हो सकती. इस मानवता में ही दिव्यता है. यह दिव्यता ही ईश्वरत्व है, यह दिव्यता ही प्रकाश है, यह दिव्यता ही अमृतत्व है. साहित्य का उद्देश्य इसी लक्ष्य की प्राप्ति होनी चाहिए और यही है भी. तभी तो साहित्य विनती करता है स्वर-संगीत की देवी से –
      हे माँ!
      मुझे असत्य से सत्य की ओर ले चलो.
      मुझे अंधकार से प्रकाश की ओर ले चलो.
      मुझे मृत्यु से अमरत्व की ओर ले चलो.

                                     
                                 प्रस्तुति: अनाम दास ‘स्वर्गवासी’
                                  ग्राम पोस्ट - भरसर
                                  जिला- बलिया निवासी