भटक गए है आज लक्ष्य से, निज संस्कृति से हम दूर हो रहे.
अध्यात्म शक्ति को भूल गए, भौतिकता में ही मशगूल रहे.
पूर्वजों की उपलब्धियों में, छिद्रान्वेषण ही नित करते रहे.
परिभाषाएं स्वार्थ परक, परम्पराएँ सुविधानुकुल गढ़ते रहे
मोक्ष-मुक्ति, निर्वाण-कैवल्य, फना -बका में ही उलझे
श्रेष्ठतर की प्रत्याशा में, वर्चस्व की कोरी आशा में;
अंहकार - इर्ष्या में जलकर, अरे ! देखो क्या से क्या हो गए?
बनना था हमें 'दिव्य मानव', और बन गए देखो 'मानव बम'.
इससे तो फिर भी अच्छा था, हम 'वन - मानुष' ही रहते.
शीत - ताप से, भूख -प्यास से, इतना नहीं तड़पते.
अरे! भटके हुए धर्माचार्यों, हमें नहीं स्वर्ग की राह दिखाओ.
कामिनी- कंचन, सानिध्य हूर का, भ्रम जाल यहाँ मत फैलाओ.
दिव्यता की बात भी छोडो, हो सके तो; मानव को मानव से जोडो.
अब रहे न कोई 'वन मानुष', अब बने न कोई ' मानव बम'.
कुछ ऐसी अलख जगाओ, दिव्यता स्वर्ग की; यहीं जमीं पर लाओ.
अब हमको मत बहलाओ, दिव्यता स्वर्ग की; इसी जमीं पर लाओ.
Monday, May 24, 2010
Sunday, May 23, 2010
श्रेष्ठतर क्या है?
छिड़ जाती है,
अक्सर यह बहस,
कही भी, यूँ ही,
किसी भी बहाने
कि श्रेष्ठतर क्या है?
जंगलराज, राजतन्त्र
या लोकतंत्र ?
सभ्यता के नाम पर
हमने जंगलराज ठुकराया,
जनता के नाम पर
राजतन्त्र को ठुकराया.
समाजवाद और मानवता के
नाम पर लोकतंत्र अपनाया.
सही है -
कि लोकतंत्र आया,
स्वतंत्रता के नाम पर
विदेशियों को भगाया.
परन्तु ....
वह मानव कहाँ है?
मानवता कहाँ है?
वह इन्सान कहाँ है?
इंसानियत कहाँ है?
इस जंगे आजादी में,
पुत्र और दामाद दोनों को,
खोनेवाला किसान कहाँ है?
संविधान का प्राविधान कहाँ है?
मजबूरों का अधिकार कहाँ है?
सुनहले ख्वाबों की
तश्वीर कहाँ है?
हमारे आदर्श और
ईमान कहाँ है?
देश की बढती आजादी में
मानव कहाँ है?
लोग तो बहुत दीखते हैं,
मगर इन्सान कहाँ हैं?
स्ट्रीट लाइट के नीचे,
भौकते कुत्तों की
कर्कश आवाजों के बीच,
नि:शब्दता; नीरवता के साथ
पुस्तकों में, समाधि
लगाने वाले बच्चों की,
तक़दीर आज कहाँ है?
अक्सर यह बहस,
कही भी, यूँ ही,
किसी भी बहाने
कि श्रेष्ठतर क्या है?
जंगलराज, राजतन्त्र
या लोकतंत्र ?
सभ्यता के नाम पर
हमने जंगलराज ठुकराया,
जनता के नाम पर
राजतन्त्र को ठुकराया.
समाजवाद और मानवता के
नाम पर लोकतंत्र अपनाया.
सही है -
कि लोकतंत्र आया,
स्वतंत्रता के नाम पर
विदेशियों को भगाया.
परन्तु ....
वह मानव कहाँ है?
मानवता कहाँ है?
वह इन्सान कहाँ है?
इंसानियत कहाँ है?
इस जंगे आजादी में,
पुत्र और दामाद दोनों को,
खोनेवाला किसान कहाँ है?
संविधान का प्राविधान कहाँ है?
मजबूरों का अधिकार कहाँ है?
सुनहले ख्वाबों की
तश्वीर कहाँ है?
हमारे आदर्श और
ईमान कहाँ है?
देश की बढती आजादी में
मानव कहाँ है?
लोग तो बहुत दीखते हैं,
मगर इन्सान कहाँ हैं?
स्ट्रीट लाइट के नीचे,
भौकते कुत्तों की
कर्कश आवाजों के बीच,
नि:शब्दता; नीरवता के साथ
पुस्तकों में, समाधि
लगाने वाले बच्चों की,
तक़दीर आज कहाँ है?
.....वे बैकफूट पर क्यों हैं?
ऐसे भी क्षण
आये हैं जीवन में....,
जब ......वर्दी की लाज ......
किसी अपराधी ने बचाया है.
अपराधी तो उस इन्सान को
'इनकी' ....और .....'उनकी'
गठजोड़ ने बनाया है.
अपराधी की इंसानियत,
उसके अन्दर की मानवता
तो फिर भी.....
जाग उठती है कभी न कभी,
परन्तु मित्रों!
खादी की नीयति,
अभियंता की तकनीक,
डॉक्टर की सिरिंज,
शिक्षक की शिक्षा और
खाकी के सेवा भाव में
खोट क्यों है?
ऐसा नहीं है कि खादी वालों में,
संवेदनशील नेता नहीं हैं .
खाकी वालों में कानून के रखवाले,
देश के सच्चे सपूत नहीं है.
कुशल अभियंता, समर्पित चिकित्सक
और योग्य अध्यापक नहीं हैं,
परन्तु अफ़सोस .......
आज वे आज हासिये पर
क्यों ...हैं..?
लाख योग्यताओं के बावजूद.
वे फ्रोन्टफूट के बजाय
बैकफूट पर क्यों हैं?
आये हैं जीवन में....,
जब ......वर्दी की लाज ......
किसी अपराधी ने बचाया है.
अपराधी तो उस इन्सान को
'इनकी' ....और .....'उनकी'
गठजोड़ ने बनाया है.
अपराधी की इंसानियत,
उसके अन्दर की मानवता
तो फिर भी.....
जाग उठती है कभी न कभी,
परन्तु मित्रों!
खादी की नीयति,
अभियंता की तकनीक,
डॉक्टर की सिरिंज,
शिक्षक की शिक्षा और
खाकी के सेवा भाव में
खोट क्यों है?
ऐसा नहीं है कि खादी वालों में,
संवेदनशील नेता नहीं हैं .
खाकी वालों में कानून के रखवाले,
देश के सच्चे सपूत नहीं है.
कुशल अभियंता, समर्पित चिकित्सक
और योग्य अध्यापक नहीं हैं,
परन्तु अफ़सोस .......
आज वे आज हासिये पर
क्यों ...हैं..?
लाख योग्यताओं के बावजूद.
वे फ्रोन्टफूट के बजाय
बैकफूट पर क्यों हैं?
प्रगति का सर्वोपयोगी फार्मूला
हमने देखी है आपके अन्दर
मानवता की एक झलक,
इसलिए आमंत्रित किया है,
कुछ कहने का दुस्साहस किया है.
क्या कहा आपने भाई साहब?
आपको अध्यात्म से लगाव है.
कोई बात नही, केवल इतना सोचिये:
केवल एकांगी विकास क्या करेगा?
ज्यादा से ज्यादा आपको ताड़ का
एक लम्बवत पेड़ बना देगा.
और आपने क्या कहा भाई साहब?
भौतिकवादी है, आपको धन से लगाव है?
कोई बात नही, केवल इतना सोचिये:
यह भी एकांगी बना देगा.
अमरबेल की तरह, क्षैतिज प्रगति;
तो होगी, परन्तु.रीढ़ की हड्डी नहीं होगी.
उंचाई का एकदम अभाव होगा,
यह दीन - हीन - पंगु बना देगा.
अनियमित प्रगति, आपके जीवन की
गति को 'जिग-जैग' बना देगी.
'जिग-जैग', एक ऐसी गति है;
जहाँ श्रम - परिश्रम तो है लेकिन,
सब कुछ, दिशाहीन - निरर्थक...
इसकी परिणति मात्र थकन है;
जिसका न आध्यात्मिक मूल्य है,
और न ही कोई भौतिक मूल्य.
क्या यह उचित नहीं होगा?
कि प्रगति और उत्थान संतुलित
और सुनियोजित किया जाय? .
संतुलन और समग्रता की इस स्थिति में,
हर प्रगति बन जाएगी, हमारे लिए -
एक 'त्रिज्या'; और हम - 'एक वृत्त',
'एक शून्य'... और ....'एक अनंत'.
'वृत्त' के सुविचाररूपी त्रिज्या को,
सद्भावना से अभिसिंचित कर,
श्रमशीलता के उर्वरक से,
'मनोवांछित व्यास की वृत्त'
संरचना में, कोई संदेह नहीं.
और 'वृत्त' क्या है?
सम्पूर्णता का बोधक,
परम सत्ता का सूचक,
जिसे मान्यता प्रदान की है,
अध्यात्म और विज्ञानं,
दोनों ने ही एक साथ.
दुर्गुणों से रहित हम 'शून्य' हैं,
'समाधि' हैं, 'कैवल्य' हैं, 'निर्वाण' हैं,
'बका', 'फना' और 'जीवन मुक्त' हैं.
सद्गुणों से पूरित, हम 'विराट' हैं.
'अनंत' हैं, 'परिपूर्ण' हैं, 'सम्पूर्ण' हैं.
यही 'पूर्णता' है, 'पूर्णता का दर्शन' है.
जो गुम्फित है, इस उपनिषद् सूत्र में -
"पूर्णं अदः पूर्णं इदं पूर्णात पूर्णं उदच्यते,
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णं इव अवशिष्यते".
मानवता की एक झलक,
इसलिए आमंत्रित किया है,
कुछ कहने का दुस्साहस किया है.
क्या कहा आपने भाई साहब?
आपको अध्यात्म से लगाव है.
कोई बात नही, केवल इतना सोचिये:
केवल एकांगी विकास क्या करेगा?
ज्यादा से ज्यादा आपको ताड़ का
एक लम्बवत पेड़ बना देगा.
और आपने क्या कहा भाई साहब?
भौतिकवादी है, आपको धन से लगाव है?
कोई बात नही, केवल इतना सोचिये:
यह भी एकांगी बना देगा.
अमरबेल की तरह, क्षैतिज प्रगति;
तो होगी, परन्तु.रीढ़ की हड्डी नहीं होगी.
उंचाई का एकदम अभाव होगा,
यह दीन - हीन - पंगु बना देगा.
अनियमित प्रगति, आपके जीवन की
गति को 'जिग-जैग' बना देगी.
'जिग-जैग', एक ऐसी गति है;
जहाँ श्रम - परिश्रम तो है लेकिन,
सब कुछ, दिशाहीन - निरर्थक...
इसकी परिणति मात्र थकन है;
जिसका न आध्यात्मिक मूल्य है,
और न ही कोई भौतिक मूल्य.
क्या यह उचित नहीं होगा?
कि प्रगति और उत्थान संतुलित
और सुनियोजित किया जाय? .
संतुलन और समग्रता की इस स्थिति में,
हर प्रगति बन जाएगी, हमारे लिए -
एक 'त्रिज्या'; और हम - 'एक वृत्त',
'एक शून्य'... और ....'एक अनंत'.
'वृत्त' के सुविचाररूपी त्रिज्या को,
सद्भावना से अभिसिंचित कर,
श्रमशीलता के उर्वरक से,
'मनोवांछित व्यास की वृत्त'
संरचना में, कोई संदेह नहीं.
और 'वृत्त' क्या है?
सम्पूर्णता का बोधक,
परम सत्ता का सूचक,
जिसे मान्यता प्रदान की है,
अध्यात्म और विज्ञानं,
दोनों ने ही एक साथ.
दुर्गुणों से रहित हम 'शून्य' हैं,
'समाधि' हैं, 'कैवल्य' हैं, 'निर्वाण' हैं,
'बका', 'फना' और 'जीवन मुक्त' हैं.
सद्गुणों से पूरित, हम 'विराट' हैं.
'अनंत' हैं, 'परिपूर्ण' हैं, 'सम्पूर्ण' हैं.
यही 'पूर्णता' है, 'पूर्णता का दर्शन' है.
जो गुम्फित है, इस उपनिषद् सूत्र में -
"पूर्णं अदः पूर्णं इदं पूर्णात पूर्णं उदच्यते,
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णं इव अवशिष्यते".
Saturday, May 22, 2010
छोटे प्रश्न का बड़ा उत्तर
हमलोगों ने प्रायः देखा है,
प्रहरीरूप में एक पुलिस वाले को;
कुछ चुस्त - दुरुस्त, सतर्क,
और कुछ अलमस्त.
हाथ में कभी बन्दूक, कभी
पिस्टल और कभी एक डंडा.
इनमे कोई है ..मुच्छड़,....
तो कोई ...निरा मुछमुंडा .
समाज में इनकी क्रिया कलापों के,
आलोचक तो बहुत हैं, समालोचक थोड़े,
परन्तु प्रेरक और प्रशंसक?
उनकी तो बात ही ना करो,
शायद समाधिस्थ है यह वर्ग आजकल?
फिर वही प्रश्न, आखिर
एक पुलिस वाला क्या है?
एक रोबोट या हाड़-माँस का लोथड़ा?
या कोई ऐसा व्यक्तित्व जो देकर
अपनी भावनाओं को तिलांजलि,
बना रहता है. खादीवाले के सन्देश और
हैटवाले के निर्देशों का मात्र अनुपालक?
जो खड़ा रहता है.. निरंतर, ...लगातार .....
तपती दुपहरी में, जाड़े की ठिठुरन भरी
सर्द रातों में, भींगते बरसातों में,
गरजते - कौंधते मेघों के नीचे.
अथवा कंट्रोलरूम में सामंजस्य बैठाते,
अधिकारियों - कर्मचारियों के बीच;
कण्ट्रोल टेबुल पर बैठा हुआ,
घिसता रहता है अपने.
तन... - बदन.... - मन... को.......
लगा रहता है त्रुटि रहित प्रसारण में,
समन्वय - समाधान बनाने में,
नीति - निर्देश, आदेश - सन्देश को
पढने और पढ़ाने में. लिखने और लिखाने में.
पुलिस लाइन से चौराहे, चौकी से थाने..
फल मंडी से, घासमंडी तक,
चिकित्सालय, विद्यालय से न्यायालय,
मदिरालय और वेश्यालय... तक.
चाय मंदिर से देव मंदिर.... तक.....
विस्तृत है जिका कार्य क्षेत्र.....
,
सडक पर पटकते डंडे से,
संभ्रांत नागरिक तो समझ जाते हैं,
इसके अर्थ को, इसके निहितार्थ को,
अपेक्षानुरूप करते हैं सहयोग भी .
परन्तु वही डंडा, .छिटक जाता है,
उस अनियंत्रित वाहन के टक्कर से,
जिसमे सवार हैं, समाज के नवोदित सेवक.
जिनके लिए सडक .और समाज के क़ानून..
को तोडना, शर्म की नहीं .......;
गर्व .....और ....गौरव... की बात है.
किस - किस जगह, कानून के रखवालों को,
कब, कहाँ, कैसे नचाया, कितना बेवकूफ बनाया,
और 'बड़ों' से शिकायत कर, कैसी उलटी फटकार
लगवाया, इसका गुणगान अपने आकाओं से करते हैं.
उदंडताओं की बढती संख्या, उन्हें इस क्षेत्र में,
डिप्लोमा और डिग्री धारक बनती है.
परन्तु एक पुलिसवाले को, ये घटनाएं ,
उसको अपनी हैसियत बतलाती है,
जब अपना पक्ष प्रस्तुतीकरण पर
फटकार ही प्रायः उनके हिस्से आती है.
क्या एक पुलिस वाले की
उसकी कर्त्तव्यपरायणता का,
कोई मान नहीं.........?
संवेदनाओं का भावनाओं का कोई मूल्य नहीं?
आखिर वह कब तक..... 'पी' से 'पोलाईट',
'ओ' से 'ओबीदिएंट बना रहेगा?
लायल्टी, ओबिदिएन्सी, चातुर्य, दक्षता,
साहस - शौर्य ....की, कोई कमी नहीं......
परन्तु, पुचकार, संश्पर्श, अपनत्व और
संरक्षण के अभाव में वह कब तक टिकेगा?
क्या यह विचारणीय बिंदु नहीं है?
'अर्ध सत्य' की कहानी
जब से दुहराया जाने लगा है,
उसका परिणाम निश्ठावानो पर
नजर आने लगा है.
कर्त्तव्यपरायणता, निष्ठां के बदले
मिली कुंठा, अब बाहर आने लगा है,
अपना विकृत रूप दिखाने लगा है.
कहीं का आक्रोश, ...कहीं...,
नजर आने लगा है.
कहर बनकर छाने लगा है.
'सौत का गुस्सा कठौत पर'
उतरने ....लगा ...है.......
सबल का गुस्सा निर्बल पर ............
परिणाम - कहीं थाने पर पिटाई,
कहीं मौत की घटनाएं......
आये दिन कहीं न कहीं
सभीको नजर आने लगा हैं.
केवल थाने पर ही नहीं, उनका गुस्सा
अब अपने बीबी - बच्चों पर भी
छाने लगी है. अब तो हद हो गयी.....,
उसकी अपनी गोली उसी की
कनपटी में सामने लगी है.
कोई यूँ ही तो जान नहीं देता ..
एक पुलिस वाले के लिए यह शर्म की बात है,
कानून के रखवाले को कानून हाथ में लेना,
बद्तोव्याघात है. स्वयं पर क्रूर आघात है.
परन्तु सबको सोचना होगा.......,
आखिर यह किसकी करामात है?
इसके पीछे किसका हाथ है ?
अपराधी को निलंबित, बर्खास्त करना,
समस्या का, समाधान नहीं.
मिटाकर अपराधी को,
अपराध मिटाया नहीं जा सकता.
न्याय देकर ही, है न्याय को पाया जा सकता.
घटना के पीछे कार्यरत
मनोविज्ञान को समझना होगा.
न्याय का देकर आश्वासन,
स्वयं भी खरा उतना होगा.
करना होगा विचार हमे,
फिर उन्ही तीन प्रश्नों पर -
दागदार खादी का रंग,
सफ़ेद क्यों है?
दिन रात सेवा में जुटे
खाकी का रंग मटमैला क्यों है?
और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी
सीमा पर डटे रहने वाले,
सैनिकों की वर्दी धब्बेदार क्यों है?
.
.
प्रहरीरूप में एक पुलिस वाले को;
कुछ चुस्त - दुरुस्त, सतर्क,
और कुछ अलमस्त.
हाथ में कभी बन्दूक, कभी
पिस्टल और कभी एक डंडा.
इनमे कोई है ..मुच्छड़,....
तो कोई ...निरा मुछमुंडा .
समाज में इनकी क्रिया कलापों के,
आलोचक तो बहुत हैं, समालोचक थोड़े,
परन्तु प्रेरक और प्रशंसक?
उनकी तो बात ही ना करो,
शायद समाधिस्थ है यह वर्ग आजकल?
फिर वही प्रश्न, आखिर
एक पुलिस वाला क्या है?
एक रोबोट या हाड़-माँस का लोथड़ा?
या कोई ऐसा व्यक्तित्व जो देकर
अपनी भावनाओं को तिलांजलि,
बना रहता है. खादीवाले के सन्देश और
हैटवाले के निर्देशों का मात्र अनुपालक?
जो खड़ा रहता है.. निरंतर, ...लगातार .....
तपती दुपहरी में, जाड़े की ठिठुरन भरी
सर्द रातों में, भींगते बरसातों में,
गरजते - कौंधते मेघों के नीचे.
अथवा कंट्रोलरूम में सामंजस्य बैठाते,
अधिकारियों - कर्मचारियों के बीच;
कण्ट्रोल टेबुल पर बैठा हुआ,
घिसता रहता है अपने.
तन... - बदन.... - मन... को.......
लगा रहता है त्रुटि रहित प्रसारण में,
समन्वय - समाधान बनाने में,
नीति - निर्देश, आदेश - सन्देश को
पढने और पढ़ाने में. लिखने और लिखाने में.
पुलिस लाइन से चौराहे, चौकी से थाने..
फल मंडी से, घासमंडी तक,
चिकित्सालय, विद्यालय से न्यायालय,
मदिरालय और वेश्यालय... तक.
चाय मंदिर से देव मंदिर.... तक.....
विस्तृत है जिका कार्य क्षेत्र.....
,
सडक पर पटकते डंडे से,
संभ्रांत नागरिक तो समझ जाते हैं,
इसके अर्थ को, इसके निहितार्थ को,
अपेक्षानुरूप करते हैं सहयोग भी .
परन्तु वही डंडा, .छिटक जाता है,
उस अनियंत्रित वाहन के टक्कर से,
जिसमे सवार हैं, समाज के नवोदित सेवक.
जिनके लिए सडक .और समाज के क़ानून..
को तोडना, शर्म की नहीं .......;
गर्व .....और ....गौरव... की बात है.
किस - किस जगह, कानून के रखवालों को,
कब, कहाँ, कैसे नचाया, कितना बेवकूफ बनाया,
और 'बड़ों' से शिकायत कर, कैसी उलटी फटकार
लगवाया, इसका गुणगान अपने आकाओं से करते हैं.
उदंडताओं की बढती संख्या, उन्हें इस क्षेत्र में,
डिप्लोमा और डिग्री धारक बनती है.
परन्तु एक पुलिसवाले को, ये घटनाएं ,
उसको अपनी हैसियत बतलाती है,
जब अपना पक्ष प्रस्तुतीकरण पर
फटकार ही प्रायः उनके हिस्से आती है.
क्या एक पुलिस वाले की
उसकी कर्त्तव्यपरायणता का,
कोई मान नहीं.........?
संवेदनाओं का भावनाओं का कोई मूल्य नहीं?
आखिर वह कब तक..... 'पी' से 'पोलाईट',
'ओ' से 'ओबीदिएंट बना रहेगा?
लायल्टी, ओबिदिएन्सी, चातुर्य, दक्षता,
साहस - शौर्य ....की, कोई कमी नहीं......
परन्तु, पुचकार, संश्पर्श, अपनत्व और
संरक्षण के अभाव में वह कब तक टिकेगा?
क्या यह विचारणीय बिंदु नहीं है?
'अर्ध सत्य' की कहानी
जब से दुहराया जाने लगा है,
उसका परिणाम निश्ठावानो पर
नजर आने लगा है.
कर्त्तव्यपरायणता, निष्ठां के बदले
मिली कुंठा, अब बाहर आने लगा है,
अपना विकृत रूप दिखाने लगा है.
कहीं का आक्रोश, ...कहीं...,
नजर आने लगा है.
कहर बनकर छाने लगा है.
'सौत का गुस्सा कठौत पर'
उतरने ....लगा ...है.......
सबल का गुस्सा निर्बल पर ............
परिणाम - कहीं थाने पर पिटाई,
कहीं मौत की घटनाएं......
आये दिन कहीं न कहीं
सभीको नजर आने लगा हैं.
केवल थाने पर ही नहीं, उनका गुस्सा
अब अपने बीबी - बच्चों पर भी
छाने लगी है. अब तो हद हो गयी.....,
उसकी अपनी गोली उसी की
कनपटी में सामने लगी है.
कोई यूँ ही तो जान नहीं देता ..
एक पुलिस वाले के लिए यह शर्म की बात है,
कानून के रखवाले को कानून हाथ में लेना,
बद्तोव्याघात है. स्वयं पर क्रूर आघात है.
परन्तु सबको सोचना होगा.......,
आखिर यह किसकी करामात है?
इसके पीछे किसका हाथ है ?
अपराधी को निलंबित, बर्खास्त करना,
समस्या का, समाधान नहीं.
मिटाकर अपराधी को,
अपराध मिटाया नहीं जा सकता.
न्याय देकर ही, है न्याय को पाया जा सकता.
घटना के पीछे कार्यरत
मनोविज्ञान को समझना होगा.
न्याय का देकर आश्वासन,
स्वयं भी खरा उतना होगा.
करना होगा विचार हमे,
फिर उन्ही तीन प्रश्नों पर -
दागदार खादी का रंग,
सफ़ेद क्यों है?
दिन रात सेवा में जुटे
खाकी का रंग मटमैला क्यों है?
और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी
सीमा पर डटे रहने वाले,
सैनिकों की वर्दी धब्बेदार क्यों है?
.
.
Friday, May 21, 2010
एक बहुत छोटा सा प्रश्न
दागदार खादी का रंग,
सफ़ेद क्यों है?
दिन रात सेवा में जुटे
वर्दी का रंग मटमैला क्यों है?
प्रतिकूल परिस्थितियों में भी
सीमा पर डटे रहने वाले,
सैनिकों की वर्दी धब्बेदार क्यों है?
सफ़ेद क्यों है?
दिन रात सेवा में जुटे
वर्दी का रंग मटमैला क्यों है?
प्रतिकूल परिस्थितियों में भी
सीमा पर डटे रहने वाले,
सैनिकों की वर्दी धब्बेदार क्यों है?
डायरी का एक डरावना पृष्ठ
धुधली - धुधली सी रजनी थी,
पीपल भी नहीं था डोल रहा,
कुछ ठनी हुई थी पवन के संग,
रजनीश भी मेघ के अन्दर था.
व्योम के नीचे अम्बर है,
अम्बर के नीचे एक टिम्बर है,
उस टिम्बर में कोई हलचल है,
मैंने सोचा कोई बन्दर है.
पंहुचा पास जब मै उसके,
था बहुत सतर्क; फिर भी उसने,
था एक झपट्टा मार दिया,
उछल - कूद के वार किया.
मै भी था कुछ कम तो नहीं,
बाजू में उसे फिर जकड लिया,
जब कड़े - कड़े दो हाथ पड़े,
चिल्लाया फिर वह 'बाप - बाप'.
गौर से देखा जब उसको....,
वह बंदर के वेश लफंदर था.
था पढ़ा - लिखा कुछ ख़ास नहीं,
दो कलम जेब के अन्दर था.
पड़ी जेब में डायरी थी,
जिसमे ढेर सा नम्बर था.
कुछ बड़े - बड़े थे नाम पते,
उसमे एक गुप्त कलेंडर था.
जिसे देख उड़ जाए होश,
ऐसी चीज भी उसके अंदर था.
था बिलकुल वह 'रावण' जैसा,
वेश बदल कर आया था.
था किसी और के चक्कर में,
भ्रम से पड़ा मेरे पल्ले था.
मै भी बन गया था 'बाली' तब,
सब कुछ उससे बकवा डाला.
रह गया 'सन्न' एकदम से मै,
आ दुश्मन ने डेरा डाला था.
थी दूर कि कोई बात नहीं,
मेरे ऑफिस का ही सौदा था.
बन बगुला भगत वह बोल रहा,
"है स्टाफ आपका डोल रहा,
पहले संभालिय अपनों को,
क्यों 'डालर' पर वह लोट रहा" ?
थे सहयोगीगण जांबाज सभी,
देश पर मर - मिटने वाले,
उनमे था बिका हुआ फिर कौन?
प्रश्नों ने मुझको मथ डाले.
मै लीन इन्ही सब बातो में,
शिर उठा मेरा, जब शोर हुआ.
मै जिसे पकडकर लाया था,
था गिरकर, वह अब ढेर पड़ा.
खा लिया था; उसने वह 'कैप्सूल' जिसे,
साथमें लाया था, जाने कहाँ छिपाया था?
वह तो सीधे परलोक गया ..........,
पर जटिल प्रश्न .....था .....छोड़ गया.
अब राज यह कैसे खुल पायेगा?
कलंक यह कैसे धुल पायेगा?
हुआ अबतक तो कोई हानि नहीं,
फिर आगे अब क्या होगा?
शक करे तो कैसे साथी पर?
ना करें तो क्या आघात होगा?
काश! कहीं कुछ ऐसा हो जाए,
आरोप लफंदर का मिथ्या हो जाए.
पीपल भी नहीं था डोल रहा,
कुछ ठनी हुई थी पवन के संग,
रजनीश भी मेघ के अन्दर था.
व्योम के नीचे अम्बर है,
अम्बर के नीचे एक टिम्बर है,
उस टिम्बर में कोई हलचल है,
मैंने सोचा कोई बन्दर है.
पंहुचा पास जब मै उसके,
था बहुत सतर्क; फिर भी उसने,
था एक झपट्टा मार दिया,
उछल - कूद के वार किया.
मै भी था कुछ कम तो नहीं,
बाजू में उसे फिर जकड लिया,
जब कड़े - कड़े दो हाथ पड़े,
चिल्लाया फिर वह 'बाप - बाप'.
गौर से देखा जब उसको....,
वह बंदर के वेश लफंदर था.
था पढ़ा - लिखा कुछ ख़ास नहीं,
दो कलम जेब के अन्दर था.
पड़ी जेब में डायरी थी,
जिसमे ढेर सा नम्बर था.
कुछ बड़े - बड़े थे नाम पते,
उसमे एक गुप्त कलेंडर था.
जिसे देख उड़ जाए होश,
ऐसी चीज भी उसके अंदर था.
था बिलकुल वह 'रावण' जैसा,
वेश बदल कर आया था.
था किसी और के चक्कर में,
भ्रम से पड़ा मेरे पल्ले था.
मै भी बन गया था 'बाली' तब,
सब कुछ उससे बकवा डाला.
रह गया 'सन्न' एकदम से मै,
आ दुश्मन ने डेरा डाला था.
थी दूर कि कोई बात नहीं,
मेरे ऑफिस का ही सौदा था.
बन बगुला भगत वह बोल रहा,
"है स्टाफ आपका डोल रहा,
पहले संभालिय अपनों को,
क्यों 'डालर' पर वह लोट रहा" ?
थे सहयोगीगण जांबाज सभी,
देश पर मर - मिटने वाले,
उनमे था बिका हुआ फिर कौन?
प्रश्नों ने मुझको मथ डाले.
मै लीन इन्ही सब बातो में,
शिर उठा मेरा, जब शोर हुआ.
मै जिसे पकडकर लाया था,
था गिरकर, वह अब ढेर पड़ा.
खा लिया था; उसने वह 'कैप्सूल' जिसे,
साथमें लाया था, जाने कहाँ छिपाया था?
वह तो सीधे परलोक गया ..........,
पर जटिल प्रश्न .....था .....छोड़ गया.
अब राज यह कैसे खुल पायेगा?
कलंक यह कैसे धुल पायेगा?
हुआ अबतक तो कोई हानि नहीं,
फिर आगे अब क्या होगा?
शक करे तो कैसे साथी पर?
ना करें तो क्या आघात होगा?
काश! कहीं कुछ ऐसा हो जाए,
आरोप लफंदर का मिथ्या हो जाए.
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