Monday, May 7, 2012

ओ मेरी अपराजिता !

ओ मेरी अपराजिता... !
तू है अगर अपराजिता,
तो रहेगी तू अपराजिता.
मैंने कब चाहा,
तुझे करना पराजित?

हार की यह हार 
है तुझे सादर समर्पित,
हार पहनोगी तुम,
है मेरी भी यही जिद.
देखा होगा तुमने
बहत से जिद्दियों को.
दीवानगी की
जिद भी देखी कभी?

जिंदगी गिरवी मेरी
यह जिद के नाम.
देखता हूँ कौन देता 
है मेरा अब साथ?
तू अगर आयी तो 
दूंगा तुझे फिर से जिता.
ओ मेरी अपराजिता.... ! 
ओ मेरी अपराजिता.... ! 

थी कल भी तू अपराजिता
हो आज भी अपराजिता.
रहोगी कल भी तू अपराजिता.
ओ मेरी अपराजिता.... ! 
ओ मेरी अपराजिता..... ! 

7 comments:

  1. बढ़िया आवाहन ||
    बधाई स्वीकारें ||

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  2. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति।

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  3. जिंदगी गिरवी मेरी
    यह जिद के नाम.
    देखता हूँ कौन देता
    है मेरा अब साथ?
    तू अगर आयी तो
    दूंगा तुझे फिर से जिता.
    ओ मेरी अपराजिता.... !

    वाह...बहुत अच्छी प्रस्तुति,....

    RECENT POST....काव्यान्जलि ...: कभी कभी.....

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  4. अपराजिता रहेगी अपराजिता ...

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  5. अति सुन्दर रचना के लिए बधाई.. भाव अपराजित ठहरा ही देता है..वाह...बहुत अच्छी प्रस्तुति,....

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  6. वाह क्या बात है!! आपने बहुत उम्दा लिखा है...बधाई

    इसे भी देखने की जेहमत उठाएं शायद पसन्द आये-
    फिर सर तलाशते हैं वो

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  7. Thanks fir kind visit and creative comments.

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