Wednesday, September 29, 2010

न्याय है - प्रेम का ढाई अक्षर

प्रेम का पवित्र ढाई आखर
न सीख पाने वाले भद्रजन,
जाने कैसे इतनी जल्दी
सीख लेते हैं - चार अक्षरों
वाला यह शब्द - "नफरत".

सत्य का अनुपम सौन्दर्य
देख नहीं पाने वाले उन
नेत्रयुक्त अंधों को यह दुनिया
कैसे दिखती है इतनी हसीन?

सत्य में, प्रेम में, शिव में, राम में
ढाई अक्षर को नहीं ढ़ो पाने वाले :
असत्य की, नफरत की, हिंसा की
भारी - बोझिल गठरी कैसे ढ़ो लेते हैं?

शिवम के सत्य को नकारने वाले
किस सौन्दर्य की तलाश करते हैं?
क्या उन्हें पता नहीं क़ि जो सत्य है
वही शिव है, शिव स्वरुप ही प्रेम है.

प्रेम ही शिवम है, सत्य है और
प्रेम का प्रसार ही सुन्दरम है.
सत्य से निःसृत प्रेम ही न्याय है -
न्याय श्रेष्ठ ही नहीं, श्रेष्ठतर भी है.

इसलिए हमें स्वीकारना चाहिए
अपनाना चाहिए इस न्याय को,
सत्कर्म को, सत्य के इस मर्म को.
मानवता और मानवीय धर्म को.

15 comments:

  1. इसलिए हमें स्वीकारना चाहिए
    अपनाना चाहिए इस न्याय को,
    सत्कर्म को, सत्य के इस मर्म को.
    मानवता और मानवीय धर्म को.

    bahut sundar aur saarthak rachna.

    .

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  2. Zeal ji
    Thanks for visit and moral support

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  3. Zeal ji

    Thanks for visit and moral support

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  4. बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
    काव्य प्रयोजन (भाग-१०), मार्क्सवादी चिंतन, मनोज कुमार की प्रस्तुति, राजभाषा हिन्दी पर, पधारें

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  5. सुन्दर भाव युक्त कविता के लिए बधाई .

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  6. उम्दा रचना...एक संदेश देती.

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  7. सत्य में, प्रेम में, शिव में, राम में
    ढाई अक्षर को नहीं ढ़ो पाने वाले :
    असत्य की, नफरत की, हिंसा की
    भारी - बोझिल गठरी कैसे ढ़ो लेते हैं?
    सुन्दर सार्थक रचना। शुभकामनायें

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  8. Manoj ji, Ashish ji aur Bhai Sameer Lal ji

    Aap sabhi ko padharne aur utaam sujhaw dene ke liye haardik aabhar.

    Sameer bhai aapki upasthiti aaj kal niymit nahi ho rahi hai. Kya aap aswasth the ya kahi aur vyast the. Aap jaiso niymit visiters ke bina blog jagat adhoora lagata hai. Ham log ko kabhi kabhar wale hain. Rajkiy jimmedariyon aur pariwarik dayitwon kw beech UP-DN ki jindagi ka andaaja lagaya ja sakta hai.

    Ek baar punah aap sabhi ka aabhar.

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  9. निर्मला दीदी!
    प्रणाम !!
    आपकी समीक्षाओं ने मुझे सतत एक राह डिकी है. बहुत- बहुत आभार आपका.

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  10. मानव का एकमात्र धर्म प्रेम ही है...सभी को यह अच्छी तरह समझ लेना चाहिए...सुंदर और समयानुकूल रचना के लिए बधाई।

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  11. sundar bhaav liye bahut badhiya kavita....badhai.

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  12. बहुत सुन्दर संदेश देती रचना।

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  13. प्रेम का पवित्र ढाई आखर
    न सीख पाने वाले भद्रजन,
    जाने कैसे इतनी जल्दी
    सीख लेते हैं - चार अक्षरों
    वाला यह शब्द - "नफरत".....
    bahut hi samsamayik aur sundar sandesh...bahut sundar..aabhar...

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  14. आप सभी से निवेदन है की मेरे पुराने ब्लॉग कृपया "भारतीय की कलम से..." में कोई भी टिपण्णी न देवें यह हैक हो चूका है| पर आप सभी से अनवरत जुडाव के लिए मैंने नया ब्लॉग निर्मित कर लेखन प्रारंभ कर दिया है, आप कृपया उस नए ब्लॉग में आकर अपनी प्रतिक्रियाओं से मुझे अवगत कराएँ इस कष्टमय समय में पुनः मेरा उत्साह बढ़ाएं !!
    मेरे ब्लॉग का यु. आर एल. निम्नांकित है :-
    लो मै फिर आ गया.....
    pls visit on my blog :- http://bhartiyagourav2222.blogspot.com/

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  15. आदरणीय महेंद्र जी, अरविन्द जी, शर्मा जी, वंदना जी, भारतीय जी

    आप सभी का हार्दिक आभार, नमन. आपकी टिपण्णी हमारा बल है, प्रेरक है. धन्यवाद.

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