Saturday, May 18, 2019

हाँ बुद्ध अभी भी हैं बद्ध,

हाँ बुद्ध अभी भी हैं बद्ध,
हुए न अब तक मुक्त
नहीं हुआ पूरा संकल्प
इसीलिए हैं अभिशप्त.
दुःख निरोध नहीं आसान,
वैश्विकस्तर से बड़ा है काम
'मैत्रेय' रूप उन्हें आना होगा,
वादा अपना निभाना होगा.
आज की यशोधरा भी कहाँ
कर रही वचनों का निर्वाह?
लौकिक यश के मोह जाल में
फंस नित हो रही है हैरान.
गौतम ने त्यागा राजपाट,
वह संग्रह में राज्य के जुटी हुयी है,
बुद्ध तो चाहते हैं - 'निर्वाण',
वह भोग में आज भी डूबी हुयी है.
जब तक होगा द्वन्द जगत में
और र्विरहेगा विरोधाभास...,
अनुभूति के स्तर पर तब तक
दुःख का ही होगा आभास.
यदि दुःख को जड़ से मिटाना है,
समता आदर्शों में लाना होगा,
आर्यसत्य हैं नहीं असत्य,
उनके तथ्यों को अपनाना होगा.
पहला सत्य, जगत यह दुखमय,
दूजा, दुःख का भी कोई कारण है.
कारण का निदान 'अष्टांग योग',
चौथा सत्य दुःख निरोध संभव है.
और इसी का नाम 'निर्वाण' है.
इसे ही अब अपनाना होगा,
जगत से दुःख भगाना होगा.
निर्वाण ही है सत्य अंतिम.
अंततः सबकी है गति अंतिम.
बुद्ध गौरव हैं भारत भूमि के,
वे ऐतिहासिक पुरुष ही नहीं,
एक विशेष "प्राज्ञ पुरुष" हैं,
स्वयं मे ही एक इतिहास हैं,
यह सृष्टि उनकी ही करुणा
का विकास और विलास है.
नहीं हूँ विरोधी बुद्ध का मै,
उनका 'शील' उनकी 'संयम',
उनकी 'वेदना' उनकी ' प्रज्ञा',
उनका 'बोध' उनकी 'समाधि',
बहुत - बहुत प्रिय है मुझे.
उनके 'चार आर्य सत्य''
उनका 'अष्टांग योग' तत्व,
उपयोगी ही नहीं....
अनिवार्य तत्व हैं मूल सत्व है ..
मानवता की स्थापना के लिए.
सृष्टि मे सद्भावना के लिए ।
गंभीर अध्ययन किया है
उनके 'जीवन यान' का..,
'हीनयान' और 'महायान' का भी.
खूब पढ़ा है - 'बोधि सत्व' को,
और नागार्जुन के 'शून्यवाद' को भी.
फिर भी क्यों...? आखिर क्यों..?
सहमत नहीं हूँ मैं, उनके प्रयाण से ...
उनकी परिकल्पना के 'निर्वाण' से...
जीवन तो एक उल्लास है,
इसमें शांति की सहज प्यास है.
.'निर्वाण' तो एक आभास है,
और 'लौ' तो स्वयं प्रकाश है.
कितने वे लगते हैं अच्छे,
जब कहते - "आप्पो दीपो भव".
जब चर्चा करते "बुझ जाने की"
तब विल्कुल बच्चे लगते हैं.
पूछता हूँ स्वयं से एक प्रश्न,
बार - बार फिर बारम्बार,
प्रत्युत्तर में कहीं दूर अन्तः से,
आती है एक स्पष्ट आवाज:
नहीं चाहिए मुझे 'प्रयाण'
नहीं चाहिए मुझे निर्वाण ,
यदि अर्थ है इसका बुझ जाना.
मैंने केवल 'लौ' को जाना.
आंधी और तूफ़ान में देखो,
'लौ' को खूब लहराए दीपक,
बुझने से पहले भी देखो;
सौ - सौ दीप जलाये दीपक.
मुझको यह दीपक है प्यारा,
प्यारा इसका जलते रहना.
इस जलते दीपक की खातिर,
जन्म - मृत्यु सब कुछ है सहना.
डॉ जयप्रकाश तिवारी

Friday, July 27, 2018

अंतर पतंग और पतंगे मे

एक पतंग और पतंगे मे 
बस अंतरप केवल इतना है 
एक नियम बद्ध उड़ती है 
दूजा हो स्वछंद उड़ता है 
स्व को स्वतंत्र समझता है 
जा कर लौ मे झुलसता है,

इस बात का कोई अर्थ नहीं 
यह त्याग, समर्पण है उसका 
या कोई आक्रोश- प्रतिशोध 
लम्बे समय से चल रहा है 
इन बातों पर अनवरत शोध 
इसीलिए मैं फिर कहता हूँ
 
सुन री ओ मेरी कविता !
मार्ग कभी तू भटक न जाना 
दायित्व कभी तू भूल न जाना 
अपना कर्तव्य निभाना तू,
पथ दिखलाना तेरा काम 
दायित्व सदा निभाना तू 
सुन री मेरी कविता !
सुन री ओ मेरी कविता !!


जयप्रकाश तिवारी 

Thursday, July 26, 2018

कविता का सन्देश

कविता सन्देश
अन्तः का
पहुंचाती है
जन-जन तक
कविता होती है 
विधि सापेक्ष;
विधि निरपेक्ष ,
कुछ उसी तरह
जैसे विधि ही है
सापेक्ष,निरपेक्ष.

काव्य
विधि सम्मत होती
विरोधक भी होती,
यह निरपेक्ष, शाश्वत
शांत - प्रशांत होती,
दैहिक - दैविक-
भौतिक भी होती.
काव्य और
साहित्य प्रायः
आन्दोलन करते
नहीं, कराते है.
ये कभी जनता को
जनार्दन के लिए,
कभी विधि के लिए,
तो कभी जनार्दन को
जगत के लिए भी
प्रेरित किया करते.

काव्य कभी भी
राजनीति करती नहीं,
राजनीतिज्ञों की
कसती नकेल है,
काव्य जगत को
नकारने वाला
यहाँ पास नहीं
नितांत फेल है.
डॉ जयप्रकाश तिवारी

Tuesday, February 6, 2018

कौन, किसने डाला डेरा?

पाकर मुझे नितांत अकेला
यह कौन, किसने डाला डेरा?
छू-छूकर मेरे तन-बदन को
वासंती हवाएँ गुदगुदा रही हैं
उनको क्या मालूम कि मेरे 
दिल का दर्द वे बढ़ा रहीं हैं ।
अरे, मेरी बात न पूछो तुम
हर दर्द यहाँ मेरा सहचर है
बैठा हूँ चुपचाप, मौन धर
इसका यह मतलब तो नहीं
कि अकेला है, घर खाली है
यह प्रतीक्षा रत बनमाली है।
मुंह खोला तो छलक पड़ेंगे
तेरे नयनों से ही खारा- खारा
गमगीन, उतप्त, गरम आँसू
देखो तुम अल्हड़ हो मदमाती
तुम ठंडी पवन का झोंका हो
इस तरह पास क्यों आ रही?
क्या तेरा भी मन भर गया है
ठंडे, मीठे इस सरिता जल से?
क्यों पीने ये अश्रु यहाँ आई ?
नहीं छोड़ा करते घर को यूँ ही
जा, लौट जा वापस घर को तू
हाँ, लौट जा वापस घर को तू ।
यदि देर हुई जग यह टोकेगा
तुझे घर मे घुसने से रोकेगा
चाहे जितना दे लो सफाई
तेरी बात न कोई समझेगा
देनी होगी तुझे अग्नि-परीक्षा
पवित्रता अपनी बताने को
मेरे कहने से भी कुछ ना होगा
मानेगा यहाँ कोई भी नहीं।
निर्जन है, बदन छुया न होगा
रूप गंध किसी ने पिया न होगा
किससे क्या बतलाओगी तुम
जा, लौट जा वापस घर को तुम॥
जयप्रकाश तिवारी

Saturday, February 3, 2018

मैं और मेरा जीवन


जीवन सुख दुख का मिश्रण
खट्टा - मीठा एक घोल सा
सरल- शांत - घट - मोम सा॰
हमी बनाए गरल हैं, इसको
यह जल है, मेघ है, व्योम सा.
खोलना चाहोगे, खुल जाऊंगा
परत - परत भी मैं हो जाऊंगा
चाल चलोगे लेकिन कोई यदि
अभेद्य दुर्ग सा बन जाऊंगा।
सरल नहीं, गरल ही समझो
गूढ रहस्य एक बन जाऊंगा ।
माना तुम सबल, बुद्धिमान हो
फिर भी मैं हाथ नहीं आऊँगा
कभी भी साथ नहीं आउंग,
बन के पवन बहता ही रहूँगा
लेकिन सूनी होगी मुट्ठी तेरी,
न मिश्रण हूँ मैं, न यौगिक हूँ
विशुद्ध तत्व मैं बन जाऊंगा
भारहीन, रूप रंगहीन मैं
विस्तृत व्यापक हूँ ऊर्जा सा,
मेरी ही शक्ति दमकते हो तुम
मैं हूँ 'सांत', मैं ही 'अनंत सा'॥
डॉ जयप्रकाश तिवारी

Sunday, January 28, 2018

तूने जिंदा कवि को मार दिया



हाँ, कविताओं को मैं पढ़ता हूँ
और कविता भी मैं लिखता हूँ
कवि की चाह, पढें सब कविता
डरता हूँ, कविता पढे न कविता,

ठन जाएगी, कविता-कविता में
मैं कहाँ संभाल पाऊँगा कविता
कविता - कविता के इस द्वन्द्व में
पिस जायेगी बेचारी मेरी कविता।
नहीं खोना चाहता कविता को
इसलिए संभालता हूँ कविता
चलो यह एक अच्छी बात हुई
भा गयी, कविता को कविता,

अरे अब पिसने की बारी, मेरी है
बच पायेगी नहीं अन्तः कविता
अरे कविता को कौन बचाएगा
लिखने लगी कविता, कविता।

पाला जिस कविता को मैंने
आँसू अपना पिला - पिलाकर
कविता ने उसे बाजार दे दिया
हँस - हँसकर, खिल खिलाकर,

कविता को कविता लिखने का
किसने यह अधिकार दे दिया?
कविता मेरी, दयाकर मुझपर
तूने जिंदा कवि को मार दिया।

पहुंचा संदेश जब छापाखाना
कुछ अर्थी को लेकर आ गए
कुछ लगे तलासने मेज मेरा
कुछ डायरी लेकर भाग गए ,

अभी मरा नहीं, मैं जिंदा हूँ
कविता-कविता रटता ही रहा
कविता ने मारा, कविता से
कविता-कविता कह रोता रहा

कविता छापने के बदले मे
प्रकाशक ने थोपी थी कविता
ला, अब ला, तू मेरी कविता
ले जा, अपनी प्यारी कविता,

नहीं जाऊंगा, प्रकाशक पास
क्या छोड़ दूँ , लिखना कविता?
नहीं, छोड़ नहीं सकता लिखना
लिखुंगा स्वांतः सुखाय कविता॥
- जयप्रकाश तिवारी

Tuesday, January 9, 2018

मैं और मेरा जीवन

जीवन सुख दुख का मिश्रण
खट्टा - मीठा एक घोल सा
सरल- शांत - घट - मोम सा॰
हमी बनाए गरल हैं, इसको
यह जल है, मेघ है, व्योम सा.
खोलना चाहोगे, खुल जाऊंगा
परत - परत भी मैं हो जाऊंगा
चाल चलोगे लेकिन कोई यदि
अभेद्य दुर्ग सा बन जाऊंगा।
सरल नहीं, गरल ही समझो
गूढ रहस्य एक बन जाऊंगा ।
माना तुम सबल, बुद्धिमान हो
फिर भी मैं हाथ नहीं आऊँगा
कभी भी साथ नहीं आउंग,
बन के पवन बहता ही रहूँगा
लेकिन सूनी होगी मुट्ठी तेरी,
न मिश्रण हूँ मैं, न यौगिक हूँ
विशुद्ध तत्व मैं बन जाऊंगा
भारहीन, रूप रंगहीन मैं
विस्तृत व्यापक हूँ ऊर्जा सा,
मेरी ही शक्ति दमकते हो तुम
मैं हूँ 'सांत', मैं ही 'अनंत सा'॥
डॉ जयप्रकाश तिवारी

Friday, January 5, 2018

माँ की चरणों मे बैठकर

इस जीवन के बीते कई बरस
कहीं धूप खिला कहीं साया है
इस अनुभव के हैं विविध रंग 
मेरे रग रग में यही समाया है
माँ छोड़ गयी, एक महापुराण
ये शब्द नहीं, शब्दों मे प्राण
शब्द ही तो गीता का उपदेश
शब्द ही रामायण का संदेश
शब्द मे वेद उपनिषद निर्देश
शब्द के भाषा- बोली कई देश 

इन शब्दों की कोई माया है?
या है निहितार्थ का माधुर्य?
किसी शिल्पी की कृति है यह
या प्रज्ञा का अपना उत्कर्ष?
किसमे इतनी प्रतिभा है, और
कौन हो गया इतना समर्थ ?
दयानिधान की दया मिले जब
और करुणा, करुणानिधान की
तब जाकर कहीं मिलता आशीष
ऐसे ही नहीं कोई बनता मनीष.

भाई पूजा करनी पड़ती है यहाँ
अरे ! एक नहीं, अनेको बार
पूनम की शीतल चांदनी हो
या अमावस की घोर अंधकार
सबके जीवन मे तृष्णा है
निदान सबकी यह कृष्ण है
कृष्णा होना कोई सरल नहीं
अमृत सुधा है, गरल नहीं
गोदी जिसके खेलती नेहा
माथे पर रोली - चन्दन है
निशा -राकेश, संधि वेला मे
सबका ही यहाँ अभिनंदन है ,

करना पड़ेगा स्वीकार सबको
जन्म-मृत्यु दो छोर जीवन के
जिया जन्म तो मारना ही है
यही, यही तो सच्चा ज्ञान है
ज्ञान - योग यह सरल नहीं
पीयूष है यह, कोई गरल नहीं
नरेंद्र को कितने जानते है
सब स्वामी को पहचानते हैं.
कवीन्द्र रवींद्र की बात अलग
भोले के नाथ तो राम ही हैं
राम के नाथ हैं बोलो कौन?
मेरे प्रश्न पर क्यों सब मौन?

उमा - रमा- अनुसुइया सबकी
अपनी अपनी अलग कहानी है
किसी के लिए 'विनोद, परीक्षा
किसी की संकट में जवानी है,,
खिलता प्रकाश जिसका यहाँ
तिमिर को जो जय करता है
विद्या के अभाव में वही
मंजु - पुष्प को भी डँसता है.
उम्र बीत गयी दम्भ न गया
मन से लोभ प्रीति ना गया
यहाँ बैठे- बैठे यह सोच रहा हूँ
अरे क्या पाया, क्या खो गया?

जिसने लहू पिलाकर पाला था
कोई देवी थी वह, या काजी था
विलीन हो गयी परम सत्य में
नाम जिसका - 'देवराजी' था,
ऐसे ही नहीं यह नाम पड़ा था
देवों को उसने किया था राजी
मरते दम तक उपवास किया
किसमें इतना दम? बोलो जी !
मृत्यु को उसने टाल दिया था
एक नहीं, कई बार किया था
इतनी दृढ इच्छा-शक्ति थी उसमे
उसने अपना स्व-धर्म जिया था.
वह चली गयी, पर छोड़ गयी
क्या छोड़ गयी, यह सोचना है
जिस पल्लव-पुष्प को छोड़ गयी
मिलकर उसको अब सींचना है.
जयप्रकाश तिवारी

Thursday, December 21, 2017

'माँ' जीवन की मेरे
संबल थी, आशा थी
मेरे व्यक्तित्व की 
सम्पूर्ण परिभाषा थी,
उसकी इच्छा ही थी, 
मेरे लिए संविधान
मैं  सुनता रहा, 
जग कहता रहा, 
पागल एक इंसान

डॉ जयप्रकाश तिवारी

Friday, September 29, 2017

आत्मा और आत्मस्थ

प्रवचन सुना, जाना मैंने 
पढ़ा शास्त्र तो जाना मैंने 
आत्मा हूँ मैं, काया नहीं, 
ब्रह्म-रूप कोई माया नहीं।  
आत्मा हूँ पर आत्मस्थ नहीं 
तट हूँ पर अभी तटस्थ नहीं ,
कर रहा हूँ खूब मैं भाग दौड़
एक रोगी हूँ मैं, स्वस्थ नहीं।
कहीं बना हुआ नागफनी मैं
कहीं बना हुआ हूँ अमर बेल
घास - फूस सा जीवन मेरा
बन सका कभी अश्वत्थ नहीं। .
मैं नाच रहा एक लट्टू बनकर
अभी उदय हुआ है, अस्त नहीं
निकलूं बाहर, मैं भी यह देखूं 
एक नदी सा हूँ मै, तटस्थ नहीं.
अब होऊं तटस्थ तो बात बने
अभी चंचल हूँ, ध्यानस्थ नहीं
संवेदना बढे तो कुछ बात बने
वेदना बढे... तो कुछ बात बने,
बढ़ गयी है वेदना इतनी अब
कर्मनिष्ठ हुआ, समाधिष्ठ नहीं
ध्यान-ज्ञान विलीन कर्म में
कर्मनिष्ठ हूँ मैं, समाधिष्ट नहीं .
मिट गया भेद तेरे- मेरे का
अज्ञेय नहीं हूँ, ज्ञेय हूँ अब
योगी हूँ और गृहस्थ भी हूँ
आत्मा हूँ और आत्मस्थ भी हूँ.
डॉ जयप्रकाश तिवारी

Monday, September 4, 2017

शिक्षक दिवस: अपनो से अपनी बात




                                                    
                                                  

५ सितम्बर. आज विश्वप्रसिद्द भारतीय दार्शनिक, महान शिक्षक, गंभीर विचारक और हमारे देश के राष्ट्रपति पद को सुशोभित कर चुके डॉ. राधाकृष्णन की जयंती है, इस दिवस को 'शिक्षक दिवस' के रूप में मनाया जाता है. हमें डॉ. राधाकृष्णन ने शिक्षा और चिंतन का एक आधार, एक दृष्टिकोण प्रदान किया है. आज आवश्यकता है उसे समझने की, वे लिखते हैं - "मनुष्य का विकास खुद-ब-खुद नहीं होता. ऐसी कोई चीज नहीं जोवंशानुक्रम और प्राकृतिक चुनाव के नियमों के अनुसार स्वतः घटित होती हो. मनुष्य का विकास तभी होता है जब वह इसके लिए चौकस होकर कोशिश  करता है. जैसाकि वह है, मनुष्य एक अपूर्ण प्राणी है. उसे अपना पुनः-पुनः संस्कार करना है और पुनः-पुनः विकसित होना है; उसे सार्वभौम जीवन की चेतना-धारा को अपने भीतर से प्रवाहित होने देना है. जिन लोगों ने अपना विकास कर लिया है, जिन्होंने अपने भीतर छिपी संभावनाओं को पहचान लिया है और जिनकी चेतना का पुनर्जन्म हो चुका है, ऐसे ही लोग दूसरों के लिए आदर्श तथा पथ-प्रदर्शक बनते हैं. " इस उद्देश्य की प्राप्ति, यह विकास शिक्षा द्वारा ही संभव है. आज उनकी जयंती पर सबसे अच्छी पुष्पांजलि यह होगी क़ि हम न केवल उनके दिखाए मार्ग का अनुसरण करें अपितु वर्तमान में शिक्षा और शिक्षण की समस्याओं को समझें, उसके निराकरण का प्रयास करें और इस शिक्षक दिवस को सार्थक बनाये. तो आइये प्रारंभ करते है एक विमर्श, अपनों के बीच, शिक्षकों और शिक्षार्थियों के बीच, जन - मानस के बीच..

मित्रों! हमने प्रायः हमेशा ही सुना है - 
शिक्षक, शिक्षा, विद्यार्थी और विद्या को 
शब्दरूप में; परन्तु क्या गुना है - 
इनके अर्थ को, भावार्थ को.., 
शब्दार्थ को, इसके निहितार्थ को ? 
शिक्षक क्या है, हाड - मांस का एक पुतला ? 
या ऐसा कोई व्यक्तित्व जो कक्षा में खड़े-खड़े, 
खींचता रहता है - कोई चित्र, कोई सूत्र, 
काले -चिकने बोर्ड पर; रंग -विरंगे चाक से? 

क्या शिक्षक 
योग्यता रूपी प्रमाण-पत्रों के आधार पर, 
स्वयं अपनी, अपने परिवार का पेट पालने की 
सामाजिक स्वीकृति मात्र है? 
जी नहीं, शिक्षक एक पद है, एक वृत्ति है ; 
संपूर्ण सामाजिक दायित्व का बोध करनी वाला कृति है. 
शिक्षक सांस्कृतिक बोधि और प्राकृतिक चेतना की सम्बोधि है. 
शिक्षक एक माली है, कुम्भकार है, शिल्पकार और कथाकार है 
जो गढ़ता है देश के भविष्य को, सभ्यता और संस्कृति को. 
अरे! वह तो निर्माता है, सर्जक है, नियंता है, 
प्रणेता है - सन्मार्ग का. 
ऐसे शिक्षकवर्ग को, उनकी वृत्ति को, 
उनकी कृति को, उनकी संस्कृति को नमन.
शिक्षा क्या है? 
आजीविका प्राप्त करने का माध्यम? 
या समुन्नत राष्ट्र निर्माण में भागीदारी? 
रचनात्मक भूमिका, सृजनात्मक जिम्मेदारी? 
परन्तु आज शिक्षक रूपी माली, कुम्भकार, 
शिल्पकार और कथाकार, सभी हैरान है, परेशान है. 
वे कहते हैं अपनी पीड़ा - 

'सोचा था यह डाली लाएगी - 
'फूल' और 'फल', फैलाएगी - 'हरियाली'. 
परन्तु हाय! इस डाली से, 
क्यों टपकी यह खून की लाली? 
ये महानुभाव बड़े - बड़े उपाधि धारक हैं, 
परन्तु क्या कहूँ इनकी गति? 
कैसी हो गयी है इनकी मति? 
कभी-कभी तो ये ऐसे कार्य करने में भी नहीं शरमाते 
जिसे कहने में हमें शर्म आती है. 
देखो यह कैसा अनर्थ है? क्या हमारी शिक्षा ही व्यर्थ है? 

मेरे श्रम-परिश्रम में कोई खोट तो नहीं थी मेरे मित्र! 
फिर इस आकर्षक घट में, मृदुल जल की बजाय छिद्र क्यों है? 
और इस नवीन, प्रगतिशील कहे जाने वाले कला-कृतियों में; 
संगीत के स्वरों में, ओज और माधुर्य के स्थान पर, 
नग्नता और विकृति क्यों है? 

कारण है सबका ही एक;  
नहीं किया तूने 'शिक्षा' और 'विद्या' में भेद. 
इसी विद्या के अभाव में, शिक्षा का उत्पाद 
दम्भी अभियंता विकास के नाम पर देश का धन चूसता है, 
डॉक्टर चिकित्सा के नाम पर अभिवावकों का खून चूसता है, 
कुछ लोग संविधान की मर्यादा चूसते है. 

ऐसे में हैरानी क्यों है? 
समझो टहनी में लाली क्यों है? 
तो मेरे भाई! 'विद्या' क्या है ? 
करो विचार, अच्छी लगे तो करो स्वीकार. 

विद्या है - 
मानव को महामानव में रूपान्तारण की तकनीक; 
मानव के अंतर की टिमटिमाती दीप को, 
प्रदीप्त और प्रखर करने की अचूक रीति. 
क्या आज इस बात की आवश्यकता नहीं कि शिक्षा के साथ 
विद्या को भी अनिवार्य रूप में जोड़ दिया जाय? 
शिक्षा ढेर सारी आय का, धनोपार्जन का साधन तो हो सकती है, 
परन्तु; उसके उपयोग - सदुपयोग की कला तो 'विद्या' के ही पास है.

शिक्षा श्रब्यज्ञान है- 
यह पुस्तकीय है, व्याख्यान है, अख्यान है, 
सत्याभास है. यह स्व-प्रधान, काम-प्रधान, 
रागी-विषयी, भोग-प्रधान है. 

विद्या संपूर्ण ज्ञान
स्वानुभूति और आत्मोपलब्धि है; 
तत्व साक्षात्कार है; यह सर्वगत, 
समष्टिगत,समदर्शी, 
तत्वदर्शी, वीतरागी, योग-प्रधान है. 
विद्या लभ्यज्ञान है - स्वानुभूति है, भूमा है, 
नित्य है, सत्य है. इसलिए शिक्षा के उत्पाद को, 
सुख-शांति की सर्वदा तलाश है, 
जबकि 'सुख - शांति - संतोष' तो 
विद्या का स्वाभाविक दास है. 
मेरे मित्र! अब तो ग्रहण करो 'विद्या' को, 
इस तरह खड़ा तू क्यों उदास है? 
यह सतत ध्यान रहे  - 
"यो वै भूमा तत्सुखं नाल्पे सुखमस्ति", 
(सर्व में ही, पूर्ण में ही सुख है, अल्प में नहीं.) 
अतएव शरणागत हो सदगुरु के जो तेरे ही पास है.

अन्त में एक और प्रश्न, एक समस्या जो शिक्षार्थी और शिक्षक दोनों ही वर्ग उठाते हैं और उनका निहितार्थ भी प्रायः एक ही है - 'असंतुष्टि'.  शिक्षक की शिक्षार्थी से और शिक्षार्थी की शिक्षकों से है - 'असंतुष्टि'. ऐसा ही प्रश्न प्रसिद्द विचारक एवं शिक्षाशास्त्री जे. कृष्णमूर्ति जी से भी पूछा गाया था, उन्होंने जो उत्तर दिया था वह न केवल विचारणीय है बल्कि सामयिक भी. वे कहते हैं - 

"इसका स्पष्ट कारण यह है कि आपके शिक्षक अच्छी तरह पढाना नहीं जानते. इसका कोई गहरा कारण नहीं है, बस यही एक सीधा सा कारण है. आप यह जानते हैं कि जब कोई शिक्षक गणित, इतिहास अथवा अन्य कोई विषय, जिसे वह सचमुच प्रेम करता है, पढ़ाता है तब आप भी उस विषय से प्रेम करने लग जाते हैं; क्योकि प्रेम स्वयं अपनी बात कहता है. क्या आप यह नहीं जानते हैं? जब कोई गायक प्रेम से गाता है तो वह उस संगीत में अपनी समग्रता उड़ेल देता है, तब क्या आप में वही भावना नहीं पैदा होती है? तब क्या आप स्वयं ही संगीत सीखने को नहीं सोचते? परन्तु अधिकाँश शिक्षकअपने विषयों को प्यार ही नहीं करते. विषय उनके लिए बोझ बन जाते हैं; पढ़ना उनकी आदत बन जाती है, जिसके माध्यम से वह अपनी आजीविका कमाते हैं. यदि आपके शिक्षक प्यार से अपना विषय पढाते तो क्या आप जानते हैं कि क्या होता ? तब आप बड़े अद्भुत मानव बनते! तब आप न केवल अपने खेलों और पढ़ाई को ही प्रेम करते अपितु फूलों, सरिताओं, पक्षियों और वसुधा को भी प्रेम करते! तब आप के ह्रदय में सिर्फ प्रेम कि तरंगे होती और इससे सभी चीजें शीघ्रता से सीख पाते! तब आपका मन उदासीनता का माध्यम न होकर एकदम आनंदित होता." आज यह 'प्रश्न' और यह 'उत्तर' दोनों ही अपेक्षाकृत और भी चिंतन - मनन का विषय वस्तु बन गाया है. तो क्या आप तैयार है इसपर विचार-विमर्श के लिए? प्रतीक्षा करूंगा, आपके सुझाव और आलोचना का, समालोचना का.
- Dr. J. P. Tiwari

कविता का जन्म

वेदना के वीर्य से
संवेदना गर्भ मे
पलकर भाव शब्द के
रूप मे सुकोमल
हृदय प्रदेश मे
जन्मती है ‘कविता’

डॉ जयप्रकाश तिवारी

कविता - एक पतंग

वेवेदना 
कविता -
एक पतंग है
भाव गगन मे
हो उन्मुक्त
लहराती है,
मस्ती मे करती है
अठखेलियाँ बलखाती है
अनंतता का करके
संस्पर्श धुन मधुर
गुनगुनाती है,
जीवन राग सुनाती है
प्रगति पथ दिखलाती है।
डॉ जयप्रकाश तिवारीके वीर्य से 
संवेदना गर्भ मे पलकर 
भाव शब्द के रूप मे 
सुकोमल हृदय प्रदेश मे 
जन्मती है – ‘कविता’। -दना के वीर्य से 
संवेदना गर्भ मे पलकर 
भाव शब्द के रूप मे 
सुकोमल हृदय प्रदेश मे 
जन्मती है – ‘कविता’। -

Thursday, August 24, 2017

पत्र पिया के नाम

तुम्ही कहते थे तोता - मैना
सहजा सखाया द्वय सुपर्णा
जब से मुँह थोड़ा मोड़ा तुमने
हो गयी मैं पतझड़, अपर्णा,
मेरे मन के हर एक कोने मे
तुम ही तुम हो अब भी छाये
मन से मेरे जो उठे सब भाव
खुशबू तेरी ही उससे आये,
सारा उल्लास तुम्ही हो मेरी
तुम्ही हो मेरे मन की प्यास।
तुम्ही मेरे मन की हर पीड़ा,
 तुम्ही हो मेरे मन की आस,
बुझ न पाये प्यास ये मन की
रह लूँ मैं चाहे जितनी पास।
तुम नहीं जानते हालत मेरी
तू चाँद मेरा, मैं तेरी चकोरी
क्या तेरी भी दशा यही है?
क्यों आते नहीं हमारे पास?
कब तक रहूँ भाव जगत मे
कब पूरी होगी मेरी आस?
दुनिया हँसती दशा पर मेरे
पूछती वह, तुम क्या गाती?
तू ही हो मेरी गीत और छंद
बचपन से थे, तुम ही पसंद
सब डरा रहे, ऐसा ही होता
प्रेम विवाह सफल कहाँ होता?
हरतालिका निर्जला व्रत हूँ मैं
तन-मन तुम्हें समर्पित आज
रख लो प्रिय मान आज तू मेरी
ना कर फिर आज, मुझे उदास।
डॉ जयप्रकाश तिवारी

Wednesday, August 23, 2017

स्याही नहीं, आँखों वाला पानी चाहिए

अभी दिल्ली का निर्भया काण्ड, लखनऊ काण्ड भूल भी नहीं पाये थे कि हो गया हरियाणा का ‘वर्णिता काण्ड, बलिया का ‘रागिनी-काण्ड’ और अब लखीमपुर खीरी मे 13 वर्षीय बच्ची के हाथ काटने का वीभत्स और भयानक समाचार।
ओह ! ऐसी दरन्दगी ! यह हैवानियत? इंसानियत का इतना अधः पतन ! इंसान की क्रूरतम करतूत, ये वहसी वासना के ‘क्रूर दूत’ कहाँ से आ टपके हैं आजकल? जब देखो, जहाँ भी देखो, शहर मे, गाँव मे, कभी यहाँ, कभी वहाँ, कभी इस शहर, कभी उस नगर...। न जाने कहाँ से प्रतीक्षित होकर घुस आए हैं ये नर-पिशाच अपने सभ्य, सुसंस्कृत समाज मे? आखिर कौन है इसका जिम्मेदार?
क्या केवल उनकी आलोचना करके, कोसकर, गालियां देकर, मुट्ठियाँ भींचकर, बैनर निकालकर, मोम बत्तियाँ जलाकर या मौन जुलूस निकालकर मुक्त हो सकते हैं हम सब अपने स्वतः स्फूर्त नागरिक होने के अपने सामूहिक दायित्व से? बढ़ती इस निकृष्टतम विकृति, प्रवृत्ति से?
नहीं, कभी नहीं, कहीं से भी नहीं। वासना के ये भूखे भेड़िये पलटे हैं हमारेही घरों मे छुप- छुप के। पाते हैं पनाह हमारे ही आगोश मे। पढ़ते हैं हमारे ही विद्यालय मे, करते हैं कारी हमारे ही कार्यालय मे। कहीं न कहीं पाते हैं सहारा, अवलंबन और मौन प्रोत्साहन भी, हमी, आप से, जाने – अनजाने में। बिना हमारे अवलंबन के कैसे हो सकते हैं ये इतने दु:साहसी? इतने सबल? किसी न किसी रूप मे हमी सब हैं इनका परोक्ष बल।
वासना में आकंठ डूबे पतित इंसान की अंतरात्मा तो कब की मर चुकी होती है, क्या हमारी अन्तरात्मा जीवित है? सभी को एकबार इसपर सोचना होगा। जिसे जहां से भी हो सके, जैसे हो सके ऐसे घिनौनेकृत्य को अब रोकना होगा। यह दुष्प्रवृत्ति रुकनी चाहिए, अभी से, इसी क्षण से। लेकिन यह दुष्प्रवृत्ति रुकेगी कैसे.....? पार्श्व से नीरज ने दिया सुझाव –
“आदमी को आदमी बनाने के लिए /
जिंदगी मे प्यार की कहानी चाहिए /
और कहने के लिए कहानी प्यार की /
स्याही नहीं, आँखों वाला पानी चाहिए” ।
सचमुच सूख सा गया है हमारे नयनों का पानी, सड़कों पर ललचाई सी घूरती रहती है आज कि जवानी। आज की तरुणाई को जगाना होगा, मदहोश है वो, उसे होश मे लाना होगा। इन्हे प्रेम के सात्विक स्वरूप का बोध करना होगा। यह ज़िम्मेदारी, यह दायित्व साझा है, सबका है, यह बीड़ा उथनी होगी, इससे पीठ मोड़ना उचित नहीं।
डॉ जयप्रकाश तिवारी

Sunday, August 6, 2017

यह भी कोई बात हुई

ये शब्द
जो तुमको ही
हैं समर्पित, 
ये सब कितने
हैं भ्रान्त,
और तुम हो
इतने शान्त?
यह भी
कोई बात हुई?
कितनी मन मे
हलचल आज
गिरी कितनों पर
ये गाज और
तुम शान्त,
यह भी
कोइ बात हुई?
यहाँ मचा
कोलाहल घोर
और कान फाड़ू
ये शोर,
गीदड़ भी नाचे
बन के मोर
फिर भी
तुम इतने शान्त,
यह भी
कोई बात हुई?
यहाँ सबके
मन मे अभिमान
सब भरे हुये
हैं गुमान
ताने हैं
तीर कमान
नहीं है तनिक
उन्हे आराम,
मचा कितना
घनघोर कोहराम,
फिर भी
तुम इतने शान्त?
यह भी
कोई बात हुई?
कर दो
सबको निर्भ्रांत
मिटा दो मिथ्या
सब अभिमान
सब के सब
हों अब शान्त,
अरे ओ प्रभु
तब जा के
लगाओ ध्यान।
चहु ओर शांति,
अब नहीं अशांति,
तुम भी शान्त
और हम भी शान्त,
अब जा के
लगाओ ध्यान
रखो तुम
भक्तों का भी घ्यान,
मिले कुछ उनको
भी शांति सौगात,
पूरी अब जा के हुई
यह बात॥
क्षमा चाहता हूँ
प्रभु तुम से,
न चुभे तुम्हें
कोई मेरी बात॥
और ...
बढ़ता ही रहे
क्रम बातों का
कहीं टूट न जाये
अपनी यह बात।
अब जा के हुई
पूरी कोई बात॥
डॉ जयप्रकाश तिवारी

Wednesday, August 2, 2017

सावन और पवन



काले - काले बादलों का 
कर्कश यह शोर - शराबा 
पाप संगीत, गर्जन तर्जन 
सुहाता नहीं सावन को कभी,
इसलिए कर ली है दोस्ती 
इसने पवन के संग।
जब भी घने काले बादल 
आते हैं, घटा बन छाते हैं 
पीछे से पावन ज़ोर लगाता 
उनको दूर तक भगा आता,
पावन जबतक कुछ सुस्ताता 
सावन हल्के बादलों को बुलाता 
रिमझिम फुहारों को बरसाता
कभी रेशम सी पतली सी लड़ी 
कभी शबनमी फुहार बन जाता 
.तब सावन मंद मंद कुसकाता।
उपेक्षित पवन सत्य जान चुका है . 
अब सावन को पहचान चुका है 
यह सावन तो है कुशल व्यापारी 
प्रोफेशनल आर्टिस्ट,फोटोग्राफर 
नए- नए नायक, नायिकाओं के 
अंतरंग चित्र कैमरे मे उतारता 
फोटोशोप मे खूब सजाता और 
बाजार मे ऊंचे मूल्य पर बेंच आता।
अब ठन गयी है सावन - पवन मे 
इसलिए सावन रहता है पूरा सूखा 
या बन जाता है पूरा भादों सरीखा 
सावन पुनः परेशान है क्योकि 
छिनता जा रहा है उससे परंपरागत 
'रोमांटिक माह' का यह विशिष्ट पद,
यह है उसके लिए दुखद, त्रासद 
सावन को पवन की याद सताती है 
लेकिन इस जग ऐसा कहाँ हो पता 
कोई टूटा रिश्ता शीघ्र कहाँ जुड़ पाता? ,
डॉ जयप्रकाश तिवारी

Sunday, July 30, 2017

भाव सुमन



मन की श्रद्धा, भाव बुद्धि की 
आह्लाद हृदय का अर्पित सबको
तन के कर्म, श्रद्धानवत होकर 
शत शत वंदन करते हैं सबको ।

नमन है मेरा, अभिनंदन है 
वंदन उपवन के हर माली का 
और वंदन है इस प्राणवान को 
जिसने सेंचा है इस उपवन को । 

सींचा था जिसने रक्त स्वेद से 
तन- मन पूरा ही निचोड़ डाला 
होगा किन्तु कितना प्रसन्न वह 
कितना सुरभित उपवन रच डाला?

मैं भी आखिर जो कुछ भी हूँ 
खिला बढ़ा, इसी उपवन मे 
अब जो कुछ भी पहचान बनी है 
उसकी नींव पड़ी इसी उपवन मे ।

आज भी, अब भी भूल न पाता 
जो स्नेह मिला शिक्षण प्रांगण मे 
कक्षा शिक्षण की बात न पूछो 
थी विशेष बात, हर शिक्षण मे ।

चिर कृतज्ञ मैं आप सभी का 
करबद्ध प्रणाम स्वीकार करो,
मन की श्रद्धा, भाव बुद्धि की 
आह्लाद हृदय का अर्पित सबको।
यह भाव सुमन अर्पित सबको 
यह भाव सु-मन अर्पित सबको॥

डॉ जय प्रकाश तिवारी 

Monday, July 17, 2017

पागल पथिक मैं पंडित हूँ
निज हाथों से ही दंडित हूँ
दुनिया को समझ नहीं पाता
इतना जर्जर और खंडित हूँ,
फिर भी है पौरुष शेष बहुत
हो जाऊँ कैसे शून्य हृदय?

रस नेह भरा है पोर - पोर
जाता छ्लक मेरा यह हृदय
माथे से लगा लूँ चरण धूलि
सुपात्र अगर कोई मिल जाये
उसे त्याग दूँ सूखे पत्ते जैसा
कुपात्र अगर कोई हो जाये,

कोमल हृदय इतना है मेरा
हर आँसू देख पिघल जाता
है कठोर बतलाऊँ कितना
रिश्तों की परवाह न करता
यदि बात समझ मे आ जाये
तो तप्त चट्टान, मैं पर्वत हूँ
यदि बात समझ मे आ जाये
सुरभित सा शीतल शर्बत हूँ।

यह नयी नहीं है व्यथा कोई 
सदियों से यही करता आया 
संवेदना की सुंदर कुटी मेरी 
वेदना के संग - संग रहता हूँ,
यह बीड़ा तब से उठा रखी है 
जीवन को जब से समझा है. 
जन्म- मृत्यु  छोर हैं उसके
जीवन को किसने समझा है?

सदियों से यही तो होता आया 
जहर मिला, कभी तीर मिला
आग मिली, कभी पीर मिला 
घात-प्रतिघात औ नीर मिला,
कभी भी, हार नहीं मानी मैंने 
चल रहा है अबतक सिलसिला।
ब्रूनों, सुकरात, कौटिल्य कहो  
तुलसी, कबीर या बुद्ध कहो 
कहो महावीर या पग की घास 
मैं 'जय' हूँ, इनका ही 'प्रकाश' ।

अरे तेरी भी औकात है क्या 
जो सजा मुझे कभी दे सके
मैं नहीं किसी से डरता हूँ 
डरता हूँ केवक एक प्रभु से ,
मेरी कृष्ण कहानी कोई नहीं 
जो भी है वह राम कहानी है 
सरल नहीं मेरी राम कहानी 
व्यथा मेरी कितनों ने जानी?
छोड़ो, क्या फर्क पड़ता इससे 
मैंने हार नहीं अब भी मानी।

हाँ, पागल पथिक मैं पंडित हूँ 
निज हाथों से ही दंडित हूँ॥

डॉ जयप्रकाश तिवारी 

Wednesday, July 12, 2017

तुमसे श्रेष्ठतर कौन सी कविता?

लिखे शब्द कुछ, जब भी मैंने 
शब्दों मे तेरी ही छ्वि पायी 
ढले अर्थ मे, शब्द वे जब भी 
मूरत तेरी ही, सामने  आयी,
शब्द, अर्थ चाहे जीतने सुंदर 
उन सबको ही  आभूषण पाया
शास्त्रीय शब्द हैं शील तुम्हारे
देशज मे भाव - भंगिमा पाया।

उमड़ी जब भाव शब्द की बदली 
लगा, यह केश तुमने लहराया
कौंधी जब उसमे, दमक दामिनी 
यह लगा मुझे, तूने पास बुलाया,
तुम छंद बद्ध, तुम छंद मुक्त हो
नित नित नूतन औ उन्मुक्त हो 
सोच रहा, छोड़ दूँ लिखना कविता 
तुमसे श्रेष्ठतर कौन सी कविता?



डॉ जयप्रकाश तिवारी