Friday, September 29, 2017

आत्मा और आत्मस्थ

प्रवचन सुना, जाना मैंने 
पढ़ा शास्त्र तो जाना मैंने 
आत्मा हूँ मैं, काया नहीं, 
ब्रह्म-रूप कोई माया नहीं।  
आत्मा हूँ पर आत्मस्थ नहीं 
तट हूँ पर अभी तटस्थ नहीं ,
कर रहा हूँ खूब मैं भाग दौड़
एक रोगी हूँ मैं, स्वस्थ नहीं।
कहीं बना हुआ नागफनी मैं
कहीं बना हुआ हूँ अमर बेल
घास - फूस सा जीवन मेरा
बन सका कभी अश्वत्थ नहीं। .
मैं नाच रहा एक लट्टू बनकर
अभी उदय हुआ है, अस्त नहीं
निकलूं बाहर, मैं भी यह देखूं 
एक नदी सा हूँ मै, तटस्थ नहीं.
अब होऊं तटस्थ तो बात बने
अभी चंचल हूँ, ध्यानस्थ नहीं
संवेदना बढे तो कुछ बात बने
वेदना बढे... तो कुछ बात बने,
बढ़ गयी है वेदना इतनी अब
कर्मनिष्ठ हुआ, समाधिष्ठ नहीं
ध्यान-ज्ञान विलीन कर्म में
कर्मनिष्ठ हूँ मैं, समाधिष्ट नहीं .
मिट गया भेद तेरे- मेरे का
अज्ञेय नहीं हूँ, ज्ञेय हूँ अब
योगी हूँ और गृहस्थ भी हूँ
आत्मा हूँ और आत्मस्थ भी हूँ.
डॉ जयप्रकाश तिवारी

2 comments:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (30-09-2017) को "विजयादशमी पर्व" (चर्चा अंक 2743) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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