Monday, September 4, 2017

कविता का जन्म

वेदना के वीर्य से
संवेदना गर्भ मे
पलकर भाव शब्द के
रूप मे सुकोमल
हृदय प्रदेश मे
जन्मती है ‘कविता’

डॉ जयप्रकाश तिवारी

कविता - एक पतंग

वेवेदना 
कविता -
एक पतंग है
भाव गगन मे
हो उन्मुक्त
लहराती है,
मस्ती मे करती है
अठखेलियाँ बलखाती है
अनंतता का करके
संस्पर्श धुन मधुर
गुनगुनाती है,
जीवन राग सुनाती है
प्रगति पथ दिखलाती है।
डॉ जयप्रकाश तिवारीके वीर्य से 
संवेदना गर्भ मे पलकर 
भाव शब्द के रूप मे 
सुकोमल हृदय प्रदेश मे 
जन्मती है – ‘कविता’। -दना के वीर्य से 
संवेदना गर्भ मे पलकर 
भाव शब्द के रूप मे 
सुकोमल हृदय प्रदेश मे 
जन्मती है – ‘कविता’। -

Thursday, August 24, 2017

पत्र पिया के नाम

तुम्ही कहते थे तोता - मैना
सहजा सखाया द्वय सुपर्णा
जब से मुँह थोड़ा मोड़ा तुमने
हो गयी मैं पतझड़, अपर्णा,
मेरे मन के हर एक कोने मे
तुम ही तुम हो अब भी छाये
मन से मेरे जो उठे सब भाव
खुशबू तेरी ही उससे आये,
सारा उल्लास तुम्ही हो मेरी
तुम्ही हो मेरे मन की प्यास।
तुम्ही मेरे मन की हर पीड़ा,
 तुम्ही हो मेरे मन की आस,
बुझ न पाये प्यास ये मन की
रह लूँ मैं चाहे जितनी पास।
तुम नहीं जानते हालत मेरी
तू चाँद मेरा, मैं तेरी चकोरी
क्या तेरी भी दशा यही है?
क्यों आते नहीं हमारे पास?
कब तक रहूँ भाव जगत मे
कब पूरी होगी मेरी आस?
दुनिया हँसती दशा पर मेरे
पूछती वह, तुम क्या गाती?
तू ही हो मेरी गीत और छंद
बचपन से थे, तुम ही पसंद
सब डरा रहे, ऐसा ही होता
प्रेम विवाह सफल कहाँ होता?
हरतालिका निर्जला व्रत हूँ मैं
तन-मन तुम्हें समर्पित आज
रख लो प्रिय मान आज तू मेरी
ना कर फिर आज, मुझे उदास।
डॉ जयप्रकाश तिवारी

Wednesday, August 23, 2017

स्याही नहीं, आँखों वाला पानी चाहिए

अभी दिल्ली का निर्भया काण्ड, लखनऊ काण्ड भूल भी नहीं पाये थे कि हो गया हरियाणा का ‘वर्णिता काण्ड, बलिया का ‘रागिनी-काण्ड’ और अब लखीमपुर खीरी मे 13 वर्षीय बच्ची के हाथ काटने का वीभत्स और भयानक समाचार।
ओह ! ऐसी दरन्दगी ! यह हैवानियत? इंसानियत का इतना अधः पतन ! इंसान की क्रूरतम करतूत, ये वहसी वासना के ‘क्रूर दूत’ कहाँ से आ टपके हैं आजकल? जब देखो, जहाँ भी देखो, शहर मे, गाँव मे, कभी यहाँ, कभी वहाँ, कभी इस शहर, कभी उस नगर...। न जाने कहाँ से प्रतीक्षित होकर घुस आए हैं ये नर-पिशाच अपने सभ्य, सुसंस्कृत समाज मे? आखिर कौन है इसका जिम्मेदार?
क्या केवल उनकी आलोचना करके, कोसकर, गालियां देकर, मुट्ठियाँ भींचकर, बैनर निकालकर, मोम बत्तियाँ जलाकर या मौन जुलूस निकालकर मुक्त हो सकते हैं हम सब अपने स्वतः स्फूर्त नागरिक होने के अपने सामूहिक दायित्व से? बढ़ती इस निकृष्टतम विकृति, प्रवृत्ति से?
नहीं, कभी नहीं, कहीं से भी नहीं। वासना के ये भूखे भेड़िये पलटे हैं हमारेही घरों मे छुप- छुप के। पाते हैं पनाह हमारे ही आगोश मे। पढ़ते हैं हमारे ही विद्यालय मे, करते हैं कारी हमारे ही कार्यालय मे। कहीं न कहीं पाते हैं सहारा, अवलंबन और मौन प्रोत्साहन भी, हमी, आप से, जाने – अनजाने में। बिना हमारे अवलंबन के कैसे हो सकते हैं ये इतने दु:साहसी? इतने सबल? किसी न किसी रूप मे हमी सब हैं इनका परोक्ष बल।
वासना में आकंठ डूबे पतित इंसान की अंतरात्मा तो कब की मर चुकी होती है, क्या हमारी अन्तरात्मा जीवित है? सभी को एकबार इसपर सोचना होगा। जिसे जहां से भी हो सके, जैसे हो सके ऐसे घिनौनेकृत्य को अब रोकना होगा। यह दुष्प्रवृत्ति रुकनी चाहिए, अभी से, इसी क्षण से। लेकिन यह दुष्प्रवृत्ति रुकेगी कैसे.....? पार्श्व से नीरज ने दिया सुझाव –
“आदमी को आदमी बनाने के लिए /
जिंदगी मे प्यार की कहानी चाहिए /
और कहने के लिए कहानी प्यार की /
स्याही नहीं, आँखों वाला पानी चाहिए” ।
सचमुच सूख सा गया है हमारे नयनों का पानी, सड़कों पर ललचाई सी घूरती रहती है आज कि जवानी। आज की तरुणाई को जगाना होगा, मदहोश है वो, उसे होश मे लाना होगा। इन्हे प्रेम के सात्विक स्वरूप का बोध करना होगा। यह ज़िम्मेदारी, यह दायित्व साझा है, सबका है, यह बीड़ा उथनी होगी, इससे पीठ मोड़ना उचित नहीं।
डॉ जयप्रकाश तिवारी

Sunday, August 6, 2017

यह भी कोई बात हुई

ये शब्द
जो तुमको ही
हैं समर्पित, 
ये सब कितने
हैं भ्रान्त,
और तुम हो
इतने शान्त?
यह भी
कोई बात हुई?
कितनी मन मे
हलचल आज
गिरी कितनों पर
ये गाज और
तुम शान्त,
यह भी
कोइ बात हुई?
यहाँ मचा
कोलाहल घोर
और कान फाड़ू
ये शोर,
गीदड़ भी नाचे
बन के मोर
फिर भी
तुम इतने शान्त,
यह भी
कोई बात हुई?
यहाँ सबके
मन मे अभिमान
सब भरे हुये
हैं गुमान
ताने हैं
तीर कमान
नहीं है तनिक
उन्हे आराम,
मचा कितना
घनघोर कोहराम,
फिर भी
तुम इतने शान्त?
यह भी
कोई बात हुई?
कर दो
सबको निर्भ्रांत
मिटा दो मिथ्या
सब अभिमान
सब के सब
हों अब शान्त,
अरे ओ प्रभु
तब जा के
लगाओ ध्यान।
चहु ओर शांति,
अब नहीं अशांति,
तुम भी शान्त
और हम भी शान्त,
अब जा के
लगाओ ध्यान
रखो तुम
भक्तों का भी घ्यान,
मिले कुछ उनको
भी शांति सौगात,
पूरी अब जा के हुई
यह बात॥
क्षमा चाहता हूँ
प्रभु तुम से,
न चुभे तुम्हें
कोई मेरी बात॥
और ...
बढ़ता ही रहे
क्रम बातों का
कहीं टूट न जाये
अपनी यह बात।
अब जा के हुई
पूरी कोई बात॥
डॉ जयप्रकाश तिवारी

Wednesday, August 2, 2017

सावन और पवन



काले - काले बादलों का 
कर्कश यह शोर - शराबा 
पाप संगीत, गर्जन तर्जन 
सुहाता नहीं सावन को कभी,
इसलिए कर ली है दोस्ती 
इसने पवन के संग।
जब भी घने काले बादल 
आते हैं, घटा बन छाते हैं 
पीछे से पावन ज़ोर लगाता 
उनको दूर तक भगा आता,
पावन जबतक कुछ सुस्ताता 
सावन हल्के बादलों को बुलाता 
रिमझिम फुहारों को बरसाता
कभी रेशम सी पतली सी लड़ी 
कभी शबनमी फुहार बन जाता 
.तब सावन मंद मंद कुसकाता।
उपेक्षित पवन सत्य जान चुका है . 
अब सावन को पहचान चुका है 
यह सावन तो है कुशल व्यापारी 
प्रोफेशनल आर्टिस्ट,फोटोग्राफर 
नए- नए नायक, नायिकाओं के 
अंतरंग चित्र कैमरे मे उतारता 
फोटोशोप मे खूब सजाता और 
बाजार मे ऊंचे मूल्य पर बेंच आता।
अब ठन गयी है सावन - पवन मे 
इसलिए सावन रहता है पूरा सूखा 
या बन जाता है पूरा भादों सरीखा 
सावन पुनः परेशान है क्योकि 
छिनता जा रहा है उससे परंपरागत 
'रोमांटिक माह' का यह विशिष्ट पद,
यह है उसके लिए दुखद, त्रासद 
सावन को पवन की याद सताती है 
लेकिन इस जग ऐसा कहाँ हो पता 
कोई टूटा रिश्ता शीघ्र कहाँ जुड़ पाता? ,
डॉ जयप्रकाश तिवारी

Sunday, July 30, 2017

भाव सुमन



मन की श्रद्धा, भाव बुद्धि की 
आह्लाद हृदय का अर्पित सबको
तन के कर्म, श्रद्धानवत होकर 
शत शत वंदन करते हैं सबको ।

नमन है मेरा, अभिनंदन है 
वंदन उपवन के हर माली का 
और वंदन है इस प्राणवान को 
जिसने सेंचा है इस उपवन को । 

सींचा था जिसने रक्त स्वेद से 
तन- मन पूरा ही निचोड़ डाला 
होगा किन्तु कितना प्रसन्न वह 
कितना सुरभित उपवन रच डाला?

मैं भी आखिर जो कुछ भी हूँ 
खिला बढ़ा, इसी उपवन मे 
अब जो कुछ भी पहचान बनी है 
उसकी नींव पड़ी इसी उपवन मे ।

आज भी, अब भी भूल न पाता 
जो स्नेह मिला शिक्षण प्रांगण मे 
कक्षा शिक्षण की बात न पूछो 
थी विशेष बात, हर शिक्षण मे ।

चिर कृतज्ञ मैं आप सभी का 
करबद्ध प्रणाम स्वीकार करो,
मन की श्रद्धा, भाव बुद्धि की 
आह्लाद हृदय का अर्पित सबको।
यह भाव सुमन अर्पित सबको 
यह भाव सु-मन अर्पित सबको॥

डॉ जय प्रकाश तिवारी