Friday, January 30, 2015

15 हाइकु: तीस जनवरी



1 - कौन कहता                          
तीस जनवरी है,
मृत्यु की तिथि ?
                        2 - अमरता की
                        उत्सर्ग तिथि बनी
                        तब से यह ।
3 - हाँ, अमर हैं
मरकर भी आज,
महात्मा गाँधी ।
                        4 - मरण ही है
                        यह स्वार्थी जीवन
                        समझो यदि।
5 - मृत्यु सदृश
है कायर जीवन,
पहचानो तो ।
                        6 – अमरता तो
                        निहित उत्सर्ग मे
                        सर्व विदित ।
7 – अमरता ही
है शाश्वत सौंदर्य
किसी मृत्यु का ।
                        8 – बता गए हैं
                        देकर आत्माहुति
                        गूढ़ रहस्य ।
9 – बड़ा है कौन
स्वार्थी या परमार्थी ?
करो विचार ।
                        10 – बापू थे तुम !
                        व्यक्ति या सद्विचार ?
                        कठिन प्रश्न ।
11 – विश्ववंद्य हो
आज तुम ! बल था, 
सत्य अहिंसा ।
                        12 – सत्य अहिंसा
                        होते हुये फैली क्यों,
                        असत, हिंसा?
13 – हे बापू बोलो !
किसने मार डाला,
तेरे विचार ?
                        14 – बापू संत थे
                        या थे राजनीतिज्ञ ?
                        करो विचार ।
15 - कौन है तेरे
सिद्धांतों का हत्यारा?
नहीं बोलोगे   

                 - डॉजयप्रकाश तिवारी

Wednesday, January 28, 2015

मैं शलभ हूँ

एक शलभ हूँ मैं
रंगीन तितलियाँ 
मन बहलाती हैं 
प्यार में जीना 
मरना सिखाती हैं 
श्वेत तितलियाँ 
पवित्रता लती हैं 
कर्तव्य-बोध कराती 
पथ सुदृढ़ बनाती हैं 
तब मुस्काता हूँ मैं 
जब आरोप लगता है 
दीप बुझाने आया है 
हक़ जताने आया है 
उन्हें मैं क्या समझाऊं 
उन्हें मैं क्या बताऊँ 
प्राण तक तो दे दिया 
अब कौन साप्रमाण लाऊँ ?

डॉ जयप्रकाश तिवारी 

Monday, January 26, 2015

कविता तो मन की बेटी है

कविता तो मन की बेटी है
वह आह वाह में पैदा होती
कविता का दर्द से गहरा नाता
यह कविता दर्द से पैदा होती
...
प्रिय विछोह जब भी होता है
विरह काव्य वह रच जाता है
नहीं मिलते यदि शब्द उसे
पलकों से धीमे से बह जाता

उमंग - तरंग की बात अलग
इसमें भी कविता तैरती है
मन तक ही सीमित नहीं रहती
वह दिक् दिगंत तक फैलाती है

डॉ जयप्रकाश तिवारी

Sunday, January 25, 2015

वह एक स्पर्श

वह शाम ए अवध 
का कोई एक पल था 
या सुबह ए काशी का 
ठीक - ठीक याद नहीं 
वह इंडिया गेट था
या हर की पैड़ी
कौन सी थी वो घडी? 
अब यह भी याद नहीं,
उस 'एक स्पर्श' के बाद 
मुझे कुछ याद न रहा 
यदि याद है कुछ तो 
वही, वह एक स्पर्श 
जिससे सब कुछ 
मैंने पा लिया था,
जिसमे सबकुछ 
मैंने खो दिया था 
अब फिर उस स्पर्श का
संस्पर्श भी नहीं चाहता 
वैसा हो भी नहीं सकता 
स्वतः स्फूर्त नैसर्गिक था 
न सोचा समझा था 
न वह बनावटी था। 

डॉ जयप्रकाश तिवारी 

Saturday, January 24, 2015

माँ शारदे से प्रश्न


माँ!
आज तुम्ही
यह बतलाओ,...
मन की उलझन
तुम सुलझाओ.
मन सोच सोच के
हार गया,
'काव्य' यह मेरे
समझ न आया,

क्या है कविता?
एक उपासना.
कविता साध्य है
या साधना?
कविता लक्ष्य है
या आराधना?
कविता यथार्थ है
या भावना?
कविता बोध है
या संभावना?
कविता अश्रुधार है
या अभिव्यक्ति?
कविता उच्छ्वास है
या आभ्यंतरशक्ति?
कविता प्रणय है या
समर्पण और भक्ति?
कविता कोलाहल है
या पूर्ण संतृप्ति?
कविता हलाहल है
या जीवन का वरदान?
कविता अंतर की शांति है
या अतृप्त अरमान?
कविता सन्देश है,
प्रदर्शन है या अभिमान?
कविता निजत्व का
विलोपन है या पहचान?
कविता उत्साह है
या बहकता एक उमंग?
कविता एक धार है
या उठती हुई तरंग?
कविता एक विकार है
या जीवन का रंग?
कविता भौतिकता है
या एक सत्संग?
कविता.
कृति है मानव की,
फिर मानव है
कृति किसकी?
मानव.
सृष्टि की कविता है;
सृष्टि यह.
कविता है किसकी?

-डॉ. जय प्रकाश तिवारी

Thursday, January 22, 2015

क्या दर्द वही जो...

क्या दर्द वही जो छलक पड़ता? 
क्या दर्द वही जो लोचन बहता? 
क्या  वही जिससे मन में गुबार 
यदि दर्द यही, तो क्या है वह ?
अंतर में जो घुटता रहता है 
आता ही नहीं बाहर  को जो 
विदग्ध लहर जो जःता है 
औ पीकर नयनों का खारा जल
उसे शुष्क किये जो रहता है 

डॉ जयप्रकाश तिवारी  

Tuesday, January 20, 2015

मैं हूँ एक राही पथ का अपने

मैं हूँ एक राही पथ का अपने
इसी पथ पर देखे कुछ सपने
करने साकार उसे निकल पड़ा हूँ
देखा नहीं साथ कितने हैं अपने,
मैं वो राही जिसने कभी न जाना ...
होता क्या है,पथ पर रुक जाना
सीखा नहीं, कभी सर को झुकाना
झुकता यह वहीँ जहाँ इसे झुकाना
नहीं चिंता, मंज़िल मिले, न मिले
मैं तो यह जानता, अब रुकना नहीं
चाहूँ भी रुकना यदि कभी तो चेतना
राह में मुझको नहीं रुकने ये देगी
चरमरा के जी रहा, पर चल रहा हूँ
मर-मर के जी रहा , पर चल रहा हूँ
कहेगी क्यादुनिया, नहीं मैं जानता
किन्तु स्व को तो हूँ मैं पहचानता
पहचान ही सम्बल है मेरा एक मात्र
पहचान ही कारण है मेरी गति का
कुछ को लगता है, मैं सो रहा हूँ
और लगता कुछ को, मैं रो रहा हूँ
क्या पता उनको कि इस राह में
हंसकर रोना, रोकर हँसना, पड़ाव है
यात्रा है यह, नहीं कोई ठहराव है।

डॉ जयप्रकाश तिवारी