Saturday, July 23, 2011

हे ब्लोगर! तुम क्यों सुस्त पड़े एक शंख, जोर से फूंको न.

हे ब्लोगर! तुम क्यों सुस्त पड़े?
तुम ब्लोगर हो, एक सर्जक हो.
तुम इस देश के पीड़ा भंजक हो.
यह माना! तुमको अधिकार नहीं,
पर,
दायित्व को क्यों तुम भूलते हो?
अपनी शक्ति को क्यों तुम भूलते हो?
क्या इस देश से तुमको प्यार नहीं?

हे ब्लोगर! तुम क्यों सुस्त पड़े?
तुम्ही चिकित्सक, तुम सर्जन हो,
शिक्षक हो तुम, तुम हो सन्यासी.
तुम नदी - सरोवर तट के वासी.
रहते जो दूर गाँव में, तुम हो.
जो रहते शीत गृहों में, तुम हो.
विज्ञान रूप तू प्रयोगशाला में,
तुम यति रूप हो, यज्ञशाला में.
क्षमता को अपनी तुम पहचानो,
नया दायित्व अपना तुम जानो.

हे ब्लोगर! तुम क्यों सुस्त पड़े?
तुम को ही, अलख जगाना है,
भारत एक नया बनाना है.
ऐसा भारत, जो भ्रष्ट न हो,
ऐसा भारत, जो त्रस्त न हो.
जो मजबूर न हो, किसी कोने से,
जो भरपूर हो,, चांदी - सोने से.

हे ब्लोगर! तुम क्यों सुस्त पड़े?
एक शंख, जोर से फूंको न.
छेड़ो तान, जगें सब विस्तर से,
अब रहे न कोई, निद्रा में.
अब रहे न कोई, तन्द्रा में.
देशभक्ति का पाठ, पढ़े वे फिर से,
जो गए भटक, किसी कारण से.

हे ब्लोगर! तुम क्यों सुस्त पड़े?
छेड़ो ऐसा तुम, दीपक राग,
घर - घर में जलती रहे चिराग.
चाहे हो निर्धन या दुखियारा,
हो दोनों समय चूल्हे में आग.
अपनी रोटी मिल - बाँट के खाएं,
मिल- बैठ के बिगड़ी बात बनायें.

हे ब्लोगर ! तेरे हाथ मशाल,
ऐसा प्रस्ताव कोई लाओ न,
जनता को तुम समझाओ न.
क्यों लूट रहे हो अपना देश?
क्यों फूंक रहे हो, घर - दरवेश?
लूटकर अपनों को, क्या पाओगे?
आएगी समझ, बहुत पछताओगे.

हे ब्लोगर ! छेड़ो ऐसी झंकृत तान,
गर्जन हो जिसमे, हो स्वाभिमान..
हो देश का जिससे, दुनिया में नाम.
हम रहें सतर्क, करें खुद निगरानी,
हों विफल शत्रु, उनके अरमान.
एक खौफ सा, उनमे छा जाए.
फिर दुबारा, आने का लेवें न नाम.,
हे ब्लोगर ! छेड़ो ऐसी झंकृत तान,
एक शंख, जोर से फूंको न.
गर्जन हो जिसमे, हो स्वाभिमान..

Friday, July 22, 2011

बगुला और इंसान

यह श्वेत पंछी - 'बगुला',
जो होता है प्रतीत-'हंस के कुल का'.
उसी प्रतीति के कारण खा जातीं हैं
धोखा और मात अपने जीवन से -
ये जल जीव और 'मछलियाँ'.

जिस प्रकार बगुले के
स्वच्छ - धवल तन में,
छिपा है -'कलुषित-कुटिल मन',
ठीक उसी तरह स्वच्छ खादी में,
लिपटे हैं आज,'कलुषित-कुटिल तन'.

करते हैं दोनों एक जैसे काम,
बगुला करता है हंस को बदनाम.
और इंसान करता है -
उस पवित्र वस्त्र को बदनाम,
जिसके बारे में धारणा थी -
यह मात्र एक वस्त्र नहीं विचार है,
इसमें लिपटा एक मूर्त सदाचार है.

अपने रंग चयन पर ,
आज सदाचार पछता रहा है और
वह इंसान होठों पर कुटिल हास्य विखेरे,
निर्लज्ज सा खडा देखो मुस्करा रहा है.

Tuesday, July 19, 2011

वेदनाओं का 'हार' चढ़ाता हूँ

तोडूंगा तो नहीं मै उसको,
जिसको पूजा था अब तक.
हाँ बहा दिया है संचित सपना,
जिसे सजाया था मै अब तक.

जान गया हूँ तेरी विवशता,
नहीं तुझे मजबूर करूंगा
बोलो चाहती हो क्या मुझसे?
आजीवन तुझसे दूर रहूँगा.

एक थी बस अभिलाषा मेरी,
एक मात्र वह आशा मेरी..,
एक यही अरमान था मेरा,
अग्नि मुझे दे बेटा तेरा...

नहीं तुझे बदनाम करूंगा,
होठों से अब नाम न लूंगा,
दिल की बात नहीं करता मै,
तेरी इच्छा का मै मान रखूंगा,

सच मानो मै 'जाम' न लूँगा..
अश्कों को भी समझाऊंगा
अभिलाषा का 'दान' करूंगा,
नहीं कभी अब आह भरूंगा,
.
इच्छाओं का अब मोल है क्या?
वेदना है ! कोई ढोल है क्या?
वेदनाओं का 'हार' चढ़ाता हूँ !,
करता हूँ अर्पित तुम्हे अश्रु जल !.

प्राणों का धूप जलाता हूँ मै,
तन का दिया दिखाता हूँ मैं.
मै तेरी 'सुख-धाम' की खातिर,
अपना सर्वस्व लुटाता हूँ मै .
खुद को एक बुत बनाता हूँ मै ...

पर तोड़ नहीं पाउँगा उसको..,
जिसको पूजा था मै अब तक.
बहा दिया सब संचित सपना,
जिसे सजाया था मै अब तक.
,

Monday, July 18, 2011

दर्पण: तीन अनुभूतियाँ

(१)
बार - बार क्यों देखते दर्पण?
देखो उसमे, अपना तुम अर्पण,
तन - मन में राग - विराग भरा,
क्या करे बेचारा यह- 'दर्पण'?

दर्पण को दोष क्यों देते हो?
क्यों बारम्बार रगड़ते हो?
दर्पण तो सत्य दिखलाएगा,
क्यों पीले - लाल तुम होते हो?

देखा जब गौर से दर्पण को,
उसमे न मिला कुछ उसका दोष.
सारा दोष तो अपना था,
अपने को समझते थे - 'निर्दोष'.

(२)

दर्पण को मत तुम साफ़ करो,
डालो उसपर मन का - 'रज'.
यहाँ तन के रज की बात नहीं,
डालो उसपर 'गुरु पद' का रज.

समझो न बेतुकी बात इसे,
जानो तुम बहुत ही ख़ास इसे.
तुलसी ने 'रज' से साफ़ किया,
इसी रज ने संत बना दिया.

जब तुलसी जैसा बन जाओगे,
फिर तो यही तुम भी गाओगे-
श्रीगुरु चरण सरोज रज
निज मन मुकुर सुधार,
बरनौं रघुबर विमल यश,
जो दायक फल चार.

(३)

यह रज मिलना आसन नहीं,
यह प्रेम गली में मिलता है,
जहां आग की दरिया बहती है,
और डूब के जाना पड़ता है.

जहां अहं को अपने मारना है,
सर्वस्व समर्पित करना है.
नैवेद्य शीश जब चढ़ता है,
तब जाके कहीं 'रज' मिलता है.

चारो फल जब मिल जाएगा,
जीवन में शान्ति-समता आयेगा.
जाओगे भूल तब यह -'दर्पण',
होगा तब लक्ष्य केवल - 'अर्पण'.

Friday, July 15, 2011

गुरु पूर्णिमा पर्व

जिसने मुझको नाम दिया है,
बहुत बड़ा सम्मान दिया है.
है जो मेरे व्यक्तित्व का सर्जक,
सब कुछ मुझ पर वार दिया है.

उसी का तन मन अर्पित उसको
श्रद्धा सुमन समर्पित है उसको.
ये सब भी, अब कहाँ है मेरा.
सर्वस उसका नहीं कुछ मेरा.

उस सु-नामी का नाम मैं क्यों लूँ?
धो डाला कलुष कषाय जो मैला.
उसे अमूर्त-अनाम-अरूप रहने दो
क्यों करूँ विराट का रूप मैं बौना.

Wednesday, July 13, 2011

आखिर ब्लोगर है क्या: एक चिंतन (भाग-२)

और दो टूक प्रश्न जिसमे -
छिपा है (भाग -१) का पूरा सटीक उत्तर:

आखिर ब्लोगर यह सब क्यों करता है..?
किसके लिए करता है, बिल्कुल मुफ्त में?
समाज से प्रतिदान में उसे मिलता है क्या?
और वह समाज को अंततः देता है क्या..?

कितने अल्पज्ञं हैं वे जो यह कहते है,
ब्लोगर लड़ता है - 'नूर कुश्ती',
सरकार के संग, सत्ता के संग.
करता है दोहन संवेदनाओं का.
समझ में नहीं आता,.क्या उन्हें पता भी है
कि संवेदना होती है क्या? यह आती कहाँ से?
और जाती कहाँ को है?....वह करती क्या है.?.

हाँ, ब्लोगर एक रचनाकार है,
सर्जक है, संवेदनशील विचारक है -
वह करता है विचार, राष्ट्र की समस्याओं पर,
समाज की विकृतियों, उसकी समस्याओं पर,
शासन-प्रशासन की सुव्यवस्था-कुव्यवस्था पर,
प्राकृतिक आपदा, असके कारण - निवारण पर.
वह निःशुल्क है, बाजारू या व्यापारी नहीं .
कनक और कामिनी उसकी कमजोरी नहीं,
इसलिए उसके पास अपनी कोई तिजोरी नहीं..

वह कबीर क़ी
प्रज्ज्वलित मशाल का संवाहक,
और समाज पथ एक कुशल धावक है..
समाज को बनाने, पुनः-पुनः सवारने
और उसे मिटाने देने क़ी दवा है.
वह जहां विज्ञान रूप में - 'सिद्धांत है',
वहीँ प्रज्ञान रूप में - 'समाधान है',
और संत रूप में - 'अचूक दुआ है'..

हाँ, ब्लोगर एक सुकरात है जो
गली - चौराहे पर खडा मिलता है,
वह हर आने - जाने वाले के तन
और सुप्त मन को झकझोरता है.
ब्लोगर एक ब्रूनो है जो सत्य बोलता है,
जलाये जाने, जहर पीने से कब डरता है?

ब्लोगर एक न्यूटन है, वह आइन्स्टीन
और हाकिंग है जो प्रकृति के रहस्य को
परत दर परत खोलता है..जो अणुओं
और परमाणुओं में स्पंदन ढूंढता है..
जमीं और आसमा का गति मापता है.
तो एक ब्लोगर समाज वैज्ञानिक है जो
समाज और जनचेतना को गति देता है.

ब्लोगर, मीरा के पाँव क़ी घूँघरू है,
जो कभी रूठती है, कभी खनकती है.
वह जहाँ राधा क़ी 'चहकती कूक' है वहीँ,
उर्मिला और यशोधरा क़ी 'गहरी हूक' है.
ब्लोगर एक कुशल आचार्य भी है जो
अध्यात्म और प्रज्ञान की गूढता क़ी
कठिन गाँठ को सर्व के लिए खोलता है .

ब्लोगर,
आज बाजारू हो चुके चौथे स्तम्भ का,
एक सार्थक विकल्प और युग की मांग है.
ब्लोगर लोकतंत्र क़ी ज्वलंत आवाज... है,
राष्ट्र क़ी संकृति, संस्कार का तेजस्वी ताज है.

Saturday, July 9, 2011

आखिर ब्लोगर है क्या: एक चिंतन (भाग-1)

आखिर एक ब्लोगर है क्या?
एक चिन्तक, एक रचनाकार?
एक रिपोर्टर या एक लेखक?
एक कवि, अथवा समालोचक?
अथवा सब कुछ एक ही साथ?

खींचता है जो अपनी रचनाओं में
दृश्य - परिदृश्य, अपनी अनुभूति.
उन संवेदनाओं, प्रतिक्रियाओं की,
जो एकल हो या सर्व समाज की;
और देता है उसे एक सार्थक स्वर.
एक आकार, प्रकार, प्रतिकार.

वह जन चेतना की आवाज है या
नितांत अपने मन के पञ्चकोशों तक
सीमित रहनेवाला 'कन्दरानुरागी'.
एकांतवासी और अरण्य निवासी,
जो निकालता है नेट पर अपनी भड़ास.

अथवा जो बांटता है सर्व समाज से
जनता-जनार्दन से, तत्कालीन ही नहीं,
समकालीन, पुरातन, और नवीनतम
हलचलों की वर्तुलों का सार्थक स्वर है?
यह सहमति है, आलोचना है या विरोध?

अथवा है वह
कुछ सक्षम लोगों का एक चारण?
एक दूत? सुविधा भोगी और वेतन भोगी?
सत्यता को छिपा छद्मवेशी एक अग्रदूत?
आखिर ऐसा कौन सा क्षेत्र है, विधा है,
कौन सी सत्ता है, लौकिक या पारलौकिक?
जहाँ ब्लोगर का हस्तक्षेप नहीं............?

मूल्यों की दृष्टि से, विविधता की दृष्टि से,
इतना तो स्वीकार करना ही पडेगा कि
क्या काबुल में गधे नही होते? लेकिन,
इससे घोड़े का मूल्य कम तो नहीं हो जाता.
ऐसा नहीं कि पुरातन में उर्वरता -उपयोगिता नहीं.
वैसे ही सभी आधुनिक भी सदुपयोगी नहीं...
ब्लोगर निकालता है उससे - 'पराग' और नवनीत'.
रचता है वह - गद्य, पद्य, नाटक ...और ..नवगीत.

अंततः फिर वही प्रश्न, एक ब्लोगर है क्या.?
उत्तर में छोटा सा प्रतिप्रश्न पूछना चाहता हूँ -
जब समाज का सभी वर्ग जुटा होता है -
रोजी-रोटी कमाने में, निन्यानबे के फेर में,
ब्लोगर नेट पर आँखे क्यों गडाए रहता है?
ढूंढ - ढूंढ कर नई पोस्ट क्यों पढता है?
अपनी टिप्पणी उस पर क्यों छोड़ताहै?