यह श्वेत पंछी - 'बगुला',
जो होता है प्रतीत-'हंस के कुल का'.
उसी प्रतीति के कारण खा जातीं हैं
धोखा और मात अपने जीवन से -
ये जल जीव और 'मछलियाँ'.
जिस प्रकार बगुले के
स्वच्छ - धवल तन में,
छिपा है -'कलुषित-कुटिल मन',
ठीक उसी तरह स्वच्छ खादी में,
लिपटे हैं आज,'कलुषित-कुटिल तन'.
करते हैं दोनों एक जैसे काम,
बगुला करता है हंस को बदनाम.
और इंसान करता है -
उस पवित्र वस्त्र को बदनाम,
जिसके बारे में धारणा थी -
यह मात्र एक वस्त्र नहीं विचार है,
इसमें लिपटा एक मूर्त सदाचार है.
अपने रंग चयन पर ,
आज सदाचार पछता रहा है और
वह इंसान होठों पर कुटिल हास्य विखेरे,
निर्लज्ज सा खडा देखो मुस्करा रहा है.
Friday, July 22, 2011
Tuesday, July 19, 2011
वेदनाओं का 'हार' चढ़ाता हूँ
तोडूंगा तो नहीं मै उसको,
जिसको पूजा था अब तक.
हाँ बहा दिया है संचित सपना,
जिसे सजाया था मै अब तक.
जान गया हूँ तेरी विवशता,
नहीं तुझे मजबूर करूंगा
बोलो चाहती हो क्या मुझसे?
आजीवन तुझसे दूर रहूँगा.
एक थी बस अभिलाषा मेरी,
एक मात्र वह आशा मेरी..,
एक यही अरमान था मेरा,
अग्नि मुझे दे बेटा तेरा...
नहीं तुझे बदनाम करूंगा,
होठों से अब नाम न लूंगा,
दिल की बात नहीं करता मै,
तेरी इच्छा का मै मान रखूंगा,
सच मानो मै 'जाम' न लूँगा..
अश्कों को भी समझाऊंगा
अभिलाषा का 'दान' करूंगा,
नहीं कभी अब आह भरूंगा,
.
इच्छाओं का अब मोल है क्या?
वेदना है ! कोई ढोल है क्या?
वेदनाओं का 'हार' चढ़ाता हूँ !,
करता हूँ अर्पित तुम्हे अश्रु जल !.
प्राणों का धूप जलाता हूँ मै,
तन का दिया दिखाता हूँ मैं.
मै तेरी 'सुख-धाम' की खातिर,
अपना सर्वस्व लुटाता हूँ मै .
खुद को एक बुत बनाता हूँ मै ...
पर तोड़ नहीं पाउँगा उसको..,
जिसको पूजा था मै अब तक.
बहा दिया सब संचित सपना,
जिसे सजाया था मै अब तक.
,
जिसको पूजा था अब तक.
हाँ बहा दिया है संचित सपना,
जिसे सजाया था मै अब तक.
जान गया हूँ तेरी विवशता,
नहीं तुझे मजबूर करूंगा
बोलो चाहती हो क्या मुझसे?
आजीवन तुझसे दूर रहूँगा.
एक थी बस अभिलाषा मेरी,
एक मात्र वह आशा मेरी..,
एक यही अरमान था मेरा,
अग्नि मुझे दे बेटा तेरा...
नहीं तुझे बदनाम करूंगा,
होठों से अब नाम न लूंगा,
दिल की बात नहीं करता मै,
तेरी इच्छा का मै मान रखूंगा,
सच मानो मै 'जाम' न लूँगा..
अश्कों को भी समझाऊंगा
अभिलाषा का 'दान' करूंगा,
नहीं कभी अब आह भरूंगा,
.
इच्छाओं का अब मोल है क्या?
वेदना है ! कोई ढोल है क्या?
वेदनाओं का 'हार' चढ़ाता हूँ !,
करता हूँ अर्पित तुम्हे अश्रु जल !.
प्राणों का धूप जलाता हूँ मै,
तन का दिया दिखाता हूँ मैं.
मै तेरी 'सुख-धाम' की खातिर,
अपना सर्वस्व लुटाता हूँ मै .
खुद को एक बुत बनाता हूँ मै ...
पर तोड़ नहीं पाउँगा उसको..,
जिसको पूजा था मै अब तक.
बहा दिया सब संचित सपना,
जिसे सजाया था मै अब तक.
,
Monday, July 18, 2011
दर्पण: तीन अनुभूतियाँ
(१)
बार - बार क्यों देखते दर्पण?
देखो उसमे, अपना तुम अर्पण,
तन - मन में राग - विराग भरा,
क्या करे बेचारा यह- 'दर्पण'?
दर्पण को दोष क्यों देते हो?
क्यों बारम्बार रगड़ते हो?
दर्पण तो सत्य दिखलाएगा,
क्यों पीले - लाल तुम होते हो?
देखा जब गौर से दर्पण को,
उसमे न मिला कुछ उसका दोष.
सारा दोष तो अपना था,
अपने को समझते थे - 'निर्दोष'.
(२)
दर्पण को मत तुम साफ़ करो,
डालो उसपर मन का - 'रज'.
यहाँ तन के रज की बात नहीं,
डालो उसपर 'गुरु पद' का रज.
समझो न बेतुकी बात इसे,
जानो तुम बहुत ही ख़ास इसे.
तुलसी ने 'रज' से साफ़ किया,
इसी रज ने संत बना दिया.
जब तुलसी जैसा बन जाओगे,
फिर तो यही तुम भी गाओगे-
श्रीगुरु चरण सरोज रज
निज मन मुकुर सुधार,
बरनौं रघुबर विमल यश,
जो दायक फल चार.
(३)
यह रज मिलना आसन नहीं,
यह प्रेम गली में मिलता है,
जहां आग की दरिया बहती है,
और डूब के जाना पड़ता है.
जहां अहं को अपने मारना है,
सर्वस्व समर्पित करना है.
नैवेद्य शीश जब चढ़ता है,
तब जाके कहीं 'रज' मिलता है.
चारो फल जब मिल जाएगा,
जीवन में शान्ति-समता आयेगा.
जाओगे भूल तब यह -'दर्पण',
होगा तब लक्ष्य केवल - 'अर्पण'.
बार - बार क्यों देखते दर्पण?
देखो उसमे, अपना तुम अर्पण,
तन - मन में राग - विराग भरा,
क्या करे बेचारा यह- 'दर्पण'?
दर्पण को दोष क्यों देते हो?
क्यों बारम्बार रगड़ते हो?
दर्पण तो सत्य दिखलाएगा,
क्यों पीले - लाल तुम होते हो?
देखा जब गौर से दर्पण को,
उसमे न मिला कुछ उसका दोष.
सारा दोष तो अपना था,
अपने को समझते थे - 'निर्दोष'.
(२)
दर्पण को मत तुम साफ़ करो,
डालो उसपर मन का - 'रज'.
यहाँ तन के रज की बात नहीं,
डालो उसपर 'गुरु पद' का रज.
समझो न बेतुकी बात इसे,
जानो तुम बहुत ही ख़ास इसे.
तुलसी ने 'रज' से साफ़ किया,
इसी रज ने संत बना दिया.
जब तुलसी जैसा बन जाओगे,
फिर तो यही तुम भी गाओगे-
श्रीगुरु चरण सरोज रज
निज मन मुकुर सुधार,
बरनौं रघुबर विमल यश,
जो दायक फल चार.
(३)
यह रज मिलना आसन नहीं,
यह प्रेम गली में मिलता है,
जहां आग की दरिया बहती है,
और डूब के जाना पड़ता है.
जहां अहं को अपने मारना है,
सर्वस्व समर्पित करना है.
नैवेद्य शीश जब चढ़ता है,
तब जाके कहीं 'रज' मिलता है.
चारो फल जब मिल जाएगा,
जीवन में शान्ति-समता आयेगा.
जाओगे भूल तब यह -'दर्पण',
होगा तब लक्ष्य केवल - 'अर्पण'.
Friday, July 15, 2011
गुरु पूर्णिमा पर्व
जिसने मुझको नाम दिया है,
बहुत बड़ा सम्मान दिया है.
है जो मेरे व्यक्तित्व का सर्जक,
सब कुछ मुझ पर वार दिया है.
उसी का तन मन अर्पित उसको
श्रद्धा सुमन समर्पित है उसको.
ये सब भी, अब कहाँ है मेरा.
सर्वस उसका नहीं कुछ मेरा.
उस सु-नामी का नाम मैं क्यों लूँ?
धो डाला कलुष कषाय जो मैला.
उसे अमूर्त-अनाम-अरूप रहने दो
क्यों करूँ विराट का रूप मैं बौना.
बहुत बड़ा सम्मान दिया है.
है जो मेरे व्यक्तित्व का सर्जक,
सब कुछ मुझ पर वार दिया है.
उसी का तन मन अर्पित उसको
श्रद्धा सुमन समर्पित है उसको.
ये सब भी, अब कहाँ है मेरा.
सर्वस उसका नहीं कुछ मेरा.
उस सु-नामी का नाम मैं क्यों लूँ?
धो डाला कलुष कषाय जो मैला.
उसे अमूर्त-अनाम-अरूप रहने दो
क्यों करूँ विराट का रूप मैं बौना.
Wednesday, July 13, 2011
आखिर ब्लोगर है क्या: एक चिंतन (भाग-२)
और दो टूक प्रश्न जिसमे -
छिपा है (भाग -१) का पूरा सटीक उत्तर:
आखिर ब्लोगर यह सब क्यों करता है..?
किसके लिए करता है, बिल्कुल मुफ्त में?
समाज से प्रतिदान में उसे मिलता है क्या?
और वह समाज को अंततः देता है क्या..?
कितने अल्पज्ञं हैं वे जो यह कहते है,
ब्लोगर लड़ता है - 'नूर कुश्ती',
सरकार के संग, सत्ता के संग.
करता है दोहन संवेदनाओं का.
समझ में नहीं आता,.क्या उन्हें पता भी है
कि संवेदना होती है क्या? यह आती कहाँ से?
और जाती कहाँ को है?....वह करती क्या है.?.
हाँ, ब्लोगर एक रचनाकार है,
सर्जक है, संवेदनशील विचारक है -
वह करता है विचार, राष्ट्र की समस्याओं पर,
समाज की विकृतियों, उसकी समस्याओं पर,
शासन-प्रशासन की सुव्यवस्था-कुव्यवस्था पर,
प्राकृतिक आपदा, असके कारण - निवारण पर.
वह निःशुल्क है, बाजारू या व्यापारी नहीं .
कनक और कामिनी उसकी कमजोरी नहीं,
इसलिए उसके पास अपनी कोई तिजोरी नहीं..
वह कबीर क़ी
प्रज्ज्वलित मशाल का संवाहक,
और समाज पथ एक कुशल धावक है..
समाज को बनाने, पुनः-पुनः सवारने
और उसे मिटाने देने क़ी दवा है.
वह जहां विज्ञान रूप में - 'सिद्धांत है',
वहीँ प्रज्ञान रूप में - 'समाधान है',
और संत रूप में - 'अचूक दुआ है'..
हाँ, ब्लोगर एक सुकरात है जो
गली - चौराहे पर खडा मिलता है,
वह हर आने - जाने वाले के तन
और सुप्त मन को झकझोरता है.
ब्लोगर एक ब्रूनो है जो सत्य बोलता है,
जलाये जाने, जहर पीने से कब डरता है?
ब्लोगर एक न्यूटन है, वह आइन्स्टीन
और हाकिंग है जो प्रकृति के रहस्य को
परत दर परत खोलता है..जो अणुओं
और परमाणुओं में स्पंदन ढूंढता है..
जमीं और आसमा का गति मापता है.
तो एक ब्लोगर समाज वैज्ञानिक है जो
समाज और जनचेतना को गति देता है.
ब्लोगर, मीरा के पाँव क़ी घूँघरू है,
जो कभी रूठती है, कभी खनकती है.
वह जहाँ राधा क़ी 'चहकती कूक' है वहीँ,
उर्मिला और यशोधरा क़ी 'गहरी हूक' है.
ब्लोगर एक कुशल आचार्य भी है जो
अध्यात्म और प्रज्ञान की गूढता क़ी
कठिन गाँठ को सर्व के लिए खोलता है .
ब्लोगर,
आज बाजारू हो चुके चौथे स्तम्भ का,
एक सार्थक विकल्प और युग की मांग है.
ब्लोगर लोकतंत्र क़ी ज्वलंत आवाज... है,
राष्ट्र क़ी संकृति, संस्कार का तेजस्वी ताज है.
छिपा है (भाग -१) का पूरा सटीक उत्तर:
आखिर ब्लोगर यह सब क्यों करता है..?
किसके लिए करता है, बिल्कुल मुफ्त में?
समाज से प्रतिदान में उसे मिलता है क्या?
और वह समाज को अंततः देता है क्या..?
कितने अल्पज्ञं हैं वे जो यह कहते है,
ब्लोगर लड़ता है - 'नूर कुश्ती',
सरकार के संग, सत्ता के संग.
करता है दोहन संवेदनाओं का.
समझ में नहीं आता,.क्या उन्हें पता भी है
कि संवेदना होती है क्या? यह आती कहाँ से?
और जाती कहाँ को है?....वह करती क्या है.?.
हाँ, ब्लोगर एक रचनाकार है,
सर्जक है, संवेदनशील विचारक है -
वह करता है विचार, राष्ट्र की समस्याओं पर,
समाज की विकृतियों, उसकी समस्याओं पर,
शासन-प्रशासन की सुव्यवस्था-कुव्यवस्था पर,
प्राकृतिक आपदा, असके कारण - निवारण पर.
वह निःशुल्क है, बाजारू या व्यापारी नहीं .
कनक और कामिनी उसकी कमजोरी नहीं,
इसलिए उसके पास अपनी कोई तिजोरी नहीं..
वह कबीर क़ी
प्रज्ज्वलित मशाल का संवाहक,
और समाज पथ एक कुशल धावक है..
समाज को बनाने, पुनः-पुनः सवारने
और उसे मिटाने देने क़ी दवा है.
वह जहां विज्ञान रूप में - 'सिद्धांत है',
वहीँ प्रज्ञान रूप में - 'समाधान है',
और संत रूप में - 'अचूक दुआ है'..
हाँ, ब्लोगर एक सुकरात है जो
गली - चौराहे पर खडा मिलता है,
वह हर आने - जाने वाले के तन
और सुप्त मन को झकझोरता है.
ब्लोगर एक ब्रूनो है जो सत्य बोलता है,
जलाये जाने, जहर पीने से कब डरता है?
ब्लोगर एक न्यूटन है, वह आइन्स्टीन
और हाकिंग है जो प्रकृति के रहस्य को
परत दर परत खोलता है..जो अणुओं
और परमाणुओं में स्पंदन ढूंढता है..
जमीं और आसमा का गति मापता है.
तो एक ब्लोगर समाज वैज्ञानिक है जो
समाज और जनचेतना को गति देता है.
ब्लोगर, मीरा के पाँव क़ी घूँघरू है,
जो कभी रूठती है, कभी खनकती है.
वह जहाँ राधा क़ी 'चहकती कूक' है वहीँ,
उर्मिला और यशोधरा क़ी 'गहरी हूक' है.
ब्लोगर एक कुशल आचार्य भी है जो
अध्यात्म और प्रज्ञान की गूढता क़ी
कठिन गाँठ को सर्व के लिए खोलता है .
ब्लोगर,
आज बाजारू हो चुके चौथे स्तम्भ का,
एक सार्थक विकल्प और युग की मांग है.
ब्लोगर लोकतंत्र क़ी ज्वलंत आवाज... है,
राष्ट्र क़ी संकृति, संस्कार का तेजस्वी ताज है.
Saturday, July 9, 2011
आखिर ब्लोगर है क्या: एक चिंतन (भाग-1)
आखिर एक ब्लोगर है क्या?
एक चिन्तक, एक रचनाकार?
एक रिपोर्टर या एक लेखक?
एक कवि, अथवा समालोचक?
अथवा सब कुछ एक ही साथ?
खींचता है जो अपनी रचनाओं में
दृश्य - परिदृश्य, अपनी अनुभूति.
उन संवेदनाओं, प्रतिक्रियाओं की,
जो एकल हो या सर्व समाज की;
और देता है उसे एक सार्थक स्वर.
एक आकार, प्रकार, प्रतिकार.
वह जन चेतना की आवाज है या
नितांत अपने मन के पञ्चकोशों तक
सीमित रहनेवाला 'कन्दरानुरागी'.
एकांतवासी और अरण्य निवासी,
जो निकालता है नेट पर अपनी भड़ास.
अथवा जो बांटता है सर्व समाज से
जनता-जनार्दन से, तत्कालीन ही नहीं,
समकालीन, पुरातन, और नवीनतम
हलचलों की वर्तुलों का सार्थक स्वर है?
यह सहमति है, आलोचना है या विरोध?
अथवा है वह
कुछ सक्षम लोगों का एक चारण?
एक दूत? सुविधा भोगी और वेतन भोगी?
सत्यता को छिपा छद्मवेशी एक अग्रदूत?
आखिर ऐसा कौन सा क्षेत्र है, विधा है,
कौन सी सत्ता है, लौकिक या पारलौकिक?
जहाँ ब्लोगर का हस्तक्षेप नहीं............?
मूल्यों की दृष्टि से, विविधता की दृष्टि से,
इतना तो स्वीकार करना ही पडेगा कि
क्या काबुल में गधे नही होते? लेकिन,
इससे घोड़े का मूल्य कम तो नहीं हो जाता.
ऐसा नहीं कि पुरातन में उर्वरता -उपयोगिता नहीं.
वैसे ही सभी आधुनिक भी सदुपयोगी नहीं...
ब्लोगर निकालता है उससे - 'पराग' और नवनीत'.
रचता है वह - गद्य, पद्य, नाटक ...और ..नवगीत.
अंततः फिर वही प्रश्न, एक ब्लोगर है क्या.?
उत्तर में छोटा सा प्रतिप्रश्न पूछना चाहता हूँ -
जब समाज का सभी वर्ग जुटा होता है -
रोजी-रोटी कमाने में, निन्यानबे के फेर में,
ब्लोगर नेट पर आँखे क्यों गडाए रहता है?
ढूंढ - ढूंढ कर नई पोस्ट क्यों पढता है?
अपनी टिप्पणी उस पर क्यों छोड़ताहै?
एक चिन्तक, एक रचनाकार?
एक रिपोर्टर या एक लेखक?
एक कवि, अथवा समालोचक?
अथवा सब कुछ एक ही साथ?
खींचता है जो अपनी रचनाओं में
दृश्य - परिदृश्य, अपनी अनुभूति.
उन संवेदनाओं, प्रतिक्रियाओं की,
जो एकल हो या सर्व समाज की;
और देता है उसे एक सार्थक स्वर.
एक आकार, प्रकार, प्रतिकार.
वह जन चेतना की आवाज है या
नितांत अपने मन के पञ्चकोशों तक
सीमित रहनेवाला 'कन्दरानुरागी'.
एकांतवासी और अरण्य निवासी,
जो निकालता है नेट पर अपनी भड़ास.
अथवा जो बांटता है सर्व समाज से
जनता-जनार्दन से, तत्कालीन ही नहीं,
समकालीन, पुरातन, और नवीनतम
हलचलों की वर्तुलों का सार्थक स्वर है?
यह सहमति है, आलोचना है या विरोध?
अथवा है वह
कुछ सक्षम लोगों का एक चारण?
एक दूत? सुविधा भोगी और वेतन भोगी?
सत्यता को छिपा छद्मवेशी एक अग्रदूत?
आखिर ऐसा कौन सा क्षेत्र है, विधा है,
कौन सी सत्ता है, लौकिक या पारलौकिक?
जहाँ ब्लोगर का हस्तक्षेप नहीं............?
मूल्यों की दृष्टि से, विविधता की दृष्टि से,
इतना तो स्वीकार करना ही पडेगा कि
क्या काबुल में गधे नही होते? लेकिन,
इससे घोड़े का मूल्य कम तो नहीं हो जाता.
ऐसा नहीं कि पुरातन में उर्वरता -उपयोगिता नहीं.
वैसे ही सभी आधुनिक भी सदुपयोगी नहीं...
ब्लोगर निकालता है उससे - 'पराग' और नवनीत'.
रचता है वह - गद्य, पद्य, नाटक ...और ..नवगीत.
अंततः फिर वही प्रश्न, एक ब्लोगर है क्या.?
उत्तर में छोटा सा प्रतिप्रश्न पूछना चाहता हूँ -
जब समाज का सभी वर्ग जुटा होता है -
रोजी-रोटी कमाने में, निन्यानबे के फेर में,
ब्लोगर नेट पर आँखे क्यों गडाए रहता है?
ढूंढ - ढूंढ कर नई पोस्ट क्यों पढता है?
अपनी टिप्पणी उस पर क्यों छोड़ताहै?
Wednesday, July 6, 2011
विचार प्रवाह: एक चर्चा
विचार आते हैं, विचार जाते हैं,
विचार तैरते हैं, विचार डूबते हैं,
विचार ठिठकते हैं, विचार मटकते हैं,
अगर हटा ध्यान, विचार भटकते हैं,
लेकिन करना विचार कहाँ सबको है आता?
परम्परा विचार की, अब कौन है निभाता?
अब करना विचार तो, एक शिष्टाचार है,
कहूँ क्या? यहाँ भी घुस गया भ्रष्टाचार है.
जो आता मन में विचार, वह तो निस्पृह 'मति' है,
औचित्य का विचार, बनाता, सुमति - कुमति है.
विचार ही है प्रेरक, और ईंधन उस 'मति' का,
विचार ही है कारक, और कारण उसमे गति का.
विचार को संवार लो, फिर-फिर से विचार लो.
विचार को विचार की तराजू पर विचार लो.
है विचार तत्त्व यह बहुत ही उपयोगी....
आज त्याग रहे विचार, यहाँ बड़े -बड़े योगी.
विचार से ही बनते हैं, सुविचार और कुविचार,
लेकिन इस बात पर अब कौन करता विचार.
मेरे इस विचार पर कुछ तो करिये विचार...
बताइये श्रीमान अब, आपके क्या हैं विचार?
विचार तैरते हैं, विचार डूबते हैं,
विचार ठिठकते हैं, विचार मटकते हैं,
अगर हटा ध्यान, विचार भटकते हैं,
लेकिन करना विचार कहाँ सबको है आता?
परम्परा विचार की, अब कौन है निभाता?
अब करना विचार तो, एक शिष्टाचार है,
कहूँ क्या? यहाँ भी घुस गया भ्रष्टाचार है.
जो आता मन में विचार, वह तो निस्पृह 'मति' है,
औचित्य का विचार, बनाता, सुमति - कुमति है.
विचार ही है प्रेरक, और ईंधन उस 'मति' का,
विचार ही है कारक, और कारण उसमे गति का.
विचार को संवार लो, फिर-फिर से विचार लो.
विचार को विचार की तराजू पर विचार लो.
है विचार तत्त्व यह बहुत ही उपयोगी....
आज त्याग रहे विचार, यहाँ बड़े -बड़े योगी.
विचार से ही बनते हैं, सुविचार और कुविचार,
लेकिन इस बात पर अब कौन करता विचार.
मेरे इस विचार पर कुछ तो करिये विचार...
बताइये श्रीमान अब, आपके क्या हैं विचार?
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