जिसने मुझको नाम दिया है,
बहुत बड़ा सम्मान दिया है.
है जो मेरे व्यक्तित्व का सर्जक,
सब कुछ मुझ पर वार दिया है.
उसी का तन मन अर्पित उसको
श्रद्धा सुमन समर्पित है उसको.
ये सब भी, अब कहाँ है मेरा.
सर्वस उसका नहीं कुछ मेरा.
उस सु-नामी का नाम मैं क्यों लूँ?
धो डाला कलुष कषाय जो मैला.
उसे अमूर्त-अनाम-अरूप रहने दो
क्यों करूँ विराट का रूप मैं बौना.
Friday, July 15, 2011
Wednesday, July 13, 2011
आखिर ब्लोगर है क्या: एक चिंतन (भाग-२)
और दो टूक प्रश्न जिसमे -
छिपा है (भाग -१) का पूरा सटीक उत्तर:
आखिर ब्लोगर यह सब क्यों करता है..?
किसके लिए करता है, बिल्कुल मुफ्त में?
समाज से प्रतिदान में उसे मिलता है क्या?
और वह समाज को अंततः देता है क्या..?
कितने अल्पज्ञं हैं वे जो यह कहते है,
ब्लोगर लड़ता है - 'नूर कुश्ती',
सरकार के संग, सत्ता के संग.
करता है दोहन संवेदनाओं का.
समझ में नहीं आता,.क्या उन्हें पता भी है
कि संवेदना होती है क्या? यह आती कहाँ से?
और जाती कहाँ को है?....वह करती क्या है.?.
हाँ, ब्लोगर एक रचनाकार है,
सर्जक है, संवेदनशील विचारक है -
वह करता है विचार, राष्ट्र की समस्याओं पर,
समाज की विकृतियों, उसकी समस्याओं पर,
शासन-प्रशासन की सुव्यवस्था-कुव्यवस्था पर,
प्राकृतिक आपदा, असके कारण - निवारण पर.
वह निःशुल्क है, बाजारू या व्यापारी नहीं .
कनक और कामिनी उसकी कमजोरी नहीं,
इसलिए उसके पास अपनी कोई तिजोरी नहीं..
वह कबीर क़ी
प्रज्ज्वलित मशाल का संवाहक,
और समाज पथ एक कुशल धावक है..
समाज को बनाने, पुनः-पुनः सवारने
और उसे मिटाने देने क़ी दवा है.
वह जहां विज्ञान रूप में - 'सिद्धांत है',
वहीँ प्रज्ञान रूप में - 'समाधान है',
और संत रूप में - 'अचूक दुआ है'..
हाँ, ब्लोगर एक सुकरात है जो
गली - चौराहे पर खडा मिलता है,
वह हर आने - जाने वाले के तन
और सुप्त मन को झकझोरता है.
ब्लोगर एक ब्रूनो है जो सत्य बोलता है,
जलाये जाने, जहर पीने से कब डरता है?
ब्लोगर एक न्यूटन है, वह आइन्स्टीन
और हाकिंग है जो प्रकृति के रहस्य को
परत दर परत खोलता है..जो अणुओं
और परमाणुओं में स्पंदन ढूंढता है..
जमीं और आसमा का गति मापता है.
तो एक ब्लोगर समाज वैज्ञानिक है जो
समाज और जनचेतना को गति देता है.
ब्लोगर, मीरा के पाँव क़ी घूँघरू है,
जो कभी रूठती है, कभी खनकती है.
वह जहाँ राधा क़ी 'चहकती कूक' है वहीँ,
उर्मिला और यशोधरा क़ी 'गहरी हूक' है.
ब्लोगर एक कुशल आचार्य भी है जो
अध्यात्म और प्रज्ञान की गूढता क़ी
कठिन गाँठ को सर्व के लिए खोलता है .
ब्लोगर,
आज बाजारू हो चुके चौथे स्तम्भ का,
एक सार्थक विकल्प और युग की मांग है.
ब्लोगर लोकतंत्र क़ी ज्वलंत आवाज... है,
राष्ट्र क़ी संकृति, संस्कार का तेजस्वी ताज है.
छिपा है (भाग -१) का पूरा सटीक उत्तर:
आखिर ब्लोगर यह सब क्यों करता है..?
किसके लिए करता है, बिल्कुल मुफ्त में?
समाज से प्रतिदान में उसे मिलता है क्या?
और वह समाज को अंततः देता है क्या..?
कितने अल्पज्ञं हैं वे जो यह कहते है,
ब्लोगर लड़ता है - 'नूर कुश्ती',
सरकार के संग, सत्ता के संग.
करता है दोहन संवेदनाओं का.
समझ में नहीं आता,.क्या उन्हें पता भी है
कि संवेदना होती है क्या? यह आती कहाँ से?
और जाती कहाँ को है?....वह करती क्या है.?.
हाँ, ब्लोगर एक रचनाकार है,
सर्जक है, संवेदनशील विचारक है -
वह करता है विचार, राष्ट्र की समस्याओं पर,
समाज की विकृतियों, उसकी समस्याओं पर,
शासन-प्रशासन की सुव्यवस्था-कुव्यवस्था पर,
प्राकृतिक आपदा, असके कारण - निवारण पर.
वह निःशुल्क है, बाजारू या व्यापारी नहीं .
कनक और कामिनी उसकी कमजोरी नहीं,
इसलिए उसके पास अपनी कोई तिजोरी नहीं..
वह कबीर क़ी
प्रज्ज्वलित मशाल का संवाहक,
और समाज पथ एक कुशल धावक है..
समाज को बनाने, पुनः-पुनः सवारने
और उसे मिटाने देने क़ी दवा है.
वह जहां विज्ञान रूप में - 'सिद्धांत है',
वहीँ प्रज्ञान रूप में - 'समाधान है',
और संत रूप में - 'अचूक दुआ है'..
हाँ, ब्लोगर एक सुकरात है जो
गली - चौराहे पर खडा मिलता है,
वह हर आने - जाने वाले के तन
और सुप्त मन को झकझोरता है.
ब्लोगर एक ब्रूनो है जो सत्य बोलता है,
जलाये जाने, जहर पीने से कब डरता है?
ब्लोगर एक न्यूटन है, वह आइन्स्टीन
और हाकिंग है जो प्रकृति के रहस्य को
परत दर परत खोलता है..जो अणुओं
और परमाणुओं में स्पंदन ढूंढता है..
जमीं और आसमा का गति मापता है.
तो एक ब्लोगर समाज वैज्ञानिक है जो
समाज और जनचेतना को गति देता है.
ब्लोगर, मीरा के पाँव क़ी घूँघरू है,
जो कभी रूठती है, कभी खनकती है.
वह जहाँ राधा क़ी 'चहकती कूक' है वहीँ,
उर्मिला और यशोधरा क़ी 'गहरी हूक' है.
ब्लोगर एक कुशल आचार्य भी है जो
अध्यात्म और प्रज्ञान की गूढता क़ी
कठिन गाँठ को सर्व के लिए खोलता है .
ब्लोगर,
आज बाजारू हो चुके चौथे स्तम्भ का,
एक सार्थक विकल्प और युग की मांग है.
ब्लोगर लोकतंत्र क़ी ज्वलंत आवाज... है,
राष्ट्र क़ी संकृति, संस्कार का तेजस्वी ताज है.
Saturday, July 9, 2011
आखिर ब्लोगर है क्या: एक चिंतन (भाग-1)
आखिर एक ब्लोगर है क्या?
एक चिन्तक, एक रचनाकार?
एक रिपोर्टर या एक लेखक?
एक कवि, अथवा समालोचक?
अथवा सब कुछ एक ही साथ?
खींचता है जो अपनी रचनाओं में
दृश्य - परिदृश्य, अपनी अनुभूति.
उन संवेदनाओं, प्रतिक्रियाओं की,
जो एकल हो या सर्व समाज की;
और देता है उसे एक सार्थक स्वर.
एक आकार, प्रकार, प्रतिकार.
वह जन चेतना की आवाज है या
नितांत अपने मन के पञ्चकोशों तक
सीमित रहनेवाला 'कन्दरानुरागी'.
एकांतवासी और अरण्य निवासी,
जो निकालता है नेट पर अपनी भड़ास.
अथवा जो बांटता है सर्व समाज से
जनता-जनार्दन से, तत्कालीन ही नहीं,
समकालीन, पुरातन, और नवीनतम
हलचलों की वर्तुलों का सार्थक स्वर है?
यह सहमति है, आलोचना है या विरोध?
अथवा है वह
कुछ सक्षम लोगों का एक चारण?
एक दूत? सुविधा भोगी और वेतन भोगी?
सत्यता को छिपा छद्मवेशी एक अग्रदूत?
आखिर ऐसा कौन सा क्षेत्र है, विधा है,
कौन सी सत्ता है, लौकिक या पारलौकिक?
जहाँ ब्लोगर का हस्तक्षेप नहीं............?
मूल्यों की दृष्टि से, विविधता की दृष्टि से,
इतना तो स्वीकार करना ही पडेगा कि
क्या काबुल में गधे नही होते? लेकिन,
इससे घोड़े का मूल्य कम तो नहीं हो जाता.
ऐसा नहीं कि पुरातन में उर्वरता -उपयोगिता नहीं.
वैसे ही सभी आधुनिक भी सदुपयोगी नहीं...
ब्लोगर निकालता है उससे - 'पराग' और नवनीत'.
रचता है वह - गद्य, पद्य, नाटक ...और ..नवगीत.
अंततः फिर वही प्रश्न, एक ब्लोगर है क्या.?
उत्तर में छोटा सा प्रतिप्रश्न पूछना चाहता हूँ -
जब समाज का सभी वर्ग जुटा होता है -
रोजी-रोटी कमाने में, निन्यानबे के फेर में,
ब्लोगर नेट पर आँखे क्यों गडाए रहता है?
ढूंढ - ढूंढ कर नई पोस्ट क्यों पढता है?
अपनी टिप्पणी उस पर क्यों छोड़ताहै?
एक चिन्तक, एक रचनाकार?
एक रिपोर्टर या एक लेखक?
एक कवि, अथवा समालोचक?
अथवा सब कुछ एक ही साथ?
खींचता है जो अपनी रचनाओं में
दृश्य - परिदृश्य, अपनी अनुभूति.
उन संवेदनाओं, प्रतिक्रियाओं की,
जो एकल हो या सर्व समाज की;
और देता है उसे एक सार्थक स्वर.
एक आकार, प्रकार, प्रतिकार.
वह जन चेतना की आवाज है या
नितांत अपने मन के पञ्चकोशों तक
सीमित रहनेवाला 'कन्दरानुरागी'.
एकांतवासी और अरण्य निवासी,
जो निकालता है नेट पर अपनी भड़ास.
अथवा जो बांटता है सर्व समाज से
जनता-जनार्दन से, तत्कालीन ही नहीं,
समकालीन, पुरातन, और नवीनतम
हलचलों की वर्तुलों का सार्थक स्वर है?
यह सहमति है, आलोचना है या विरोध?
अथवा है वह
कुछ सक्षम लोगों का एक चारण?
एक दूत? सुविधा भोगी और वेतन भोगी?
सत्यता को छिपा छद्मवेशी एक अग्रदूत?
आखिर ऐसा कौन सा क्षेत्र है, विधा है,
कौन सी सत्ता है, लौकिक या पारलौकिक?
जहाँ ब्लोगर का हस्तक्षेप नहीं............?
मूल्यों की दृष्टि से, विविधता की दृष्टि से,
इतना तो स्वीकार करना ही पडेगा कि
क्या काबुल में गधे नही होते? लेकिन,
इससे घोड़े का मूल्य कम तो नहीं हो जाता.
ऐसा नहीं कि पुरातन में उर्वरता -उपयोगिता नहीं.
वैसे ही सभी आधुनिक भी सदुपयोगी नहीं...
ब्लोगर निकालता है उससे - 'पराग' और नवनीत'.
रचता है वह - गद्य, पद्य, नाटक ...और ..नवगीत.
अंततः फिर वही प्रश्न, एक ब्लोगर है क्या.?
उत्तर में छोटा सा प्रतिप्रश्न पूछना चाहता हूँ -
जब समाज का सभी वर्ग जुटा होता है -
रोजी-रोटी कमाने में, निन्यानबे के फेर में,
ब्लोगर नेट पर आँखे क्यों गडाए रहता है?
ढूंढ - ढूंढ कर नई पोस्ट क्यों पढता है?
अपनी टिप्पणी उस पर क्यों छोड़ताहै?
Wednesday, July 6, 2011
विचार प्रवाह: एक चर्चा
विचार आते हैं, विचार जाते हैं,
विचार तैरते हैं, विचार डूबते हैं,
विचार ठिठकते हैं, विचार मटकते हैं,
अगर हटा ध्यान, विचार भटकते हैं,
लेकिन करना विचार कहाँ सबको है आता?
परम्परा विचार की, अब कौन है निभाता?
अब करना विचार तो, एक शिष्टाचार है,
कहूँ क्या? यहाँ भी घुस गया भ्रष्टाचार है.
जो आता मन में विचार, वह तो निस्पृह 'मति' है,
औचित्य का विचार, बनाता, सुमति - कुमति है.
विचार ही है प्रेरक, और ईंधन उस 'मति' का,
विचार ही है कारक, और कारण उसमे गति का.
विचार को संवार लो, फिर-फिर से विचार लो.
विचार को विचार की तराजू पर विचार लो.
है विचार तत्त्व यह बहुत ही उपयोगी....
आज त्याग रहे विचार, यहाँ बड़े -बड़े योगी.
विचार से ही बनते हैं, सुविचार और कुविचार,
लेकिन इस बात पर अब कौन करता विचार.
मेरे इस विचार पर कुछ तो करिये विचार...
बताइये श्रीमान अब, आपके क्या हैं विचार?
विचार तैरते हैं, विचार डूबते हैं,
विचार ठिठकते हैं, विचार मटकते हैं,
अगर हटा ध्यान, विचार भटकते हैं,
लेकिन करना विचार कहाँ सबको है आता?
परम्परा विचार की, अब कौन है निभाता?
अब करना विचार तो, एक शिष्टाचार है,
कहूँ क्या? यहाँ भी घुस गया भ्रष्टाचार है.
जो आता मन में विचार, वह तो निस्पृह 'मति' है,
औचित्य का विचार, बनाता, सुमति - कुमति है.
विचार ही है प्रेरक, और ईंधन उस 'मति' का,
विचार ही है कारक, और कारण उसमे गति का.
विचार को संवार लो, फिर-फिर से विचार लो.
विचार को विचार की तराजू पर विचार लो.
है विचार तत्त्व यह बहुत ही उपयोगी....
आज त्याग रहे विचार, यहाँ बड़े -बड़े योगी.
विचार से ही बनते हैं, सुविचार और कुविचार,
लेकिन इस बात पर अब कौन करता विचार.
मेरे इस विचार पर कुछ तो करिये विचार...
बताइये श्रीमान अब, आपके क्या हैं विचार?
Tuesday, July 5, 2011
मन में उठा एक प्रश्न
सायंकाल की रक्तिम लालिमा
धरती की छिट-फुट हरीतिमा
के मध्य नीले आकाश में,
लय में पंक्तिबद्ध उड़ते हुए पंछी
जब मचाते हैं कोलाहल और
करते हैं - सामूहिक कलरव,
तो यह मात्र कलोल नहीं होता.
होती है उसमे सम्मिलित वह ख़ुशी
जो अपना पेट जाने भरने के बाद
लाते हैं चोंच में भरकर बच्चों के लिए.
अपना पवित्र दायित्व समझकर,
ममता के पवित्र बंधन में बंधकर.
कहीं रुकते नहीं, किसी दूसरे गाव में,
अजनवी बाग़ में, अजनवी घोसले में.
परन्तु,
इंसान का जब भी भरा होता है
पेट और भरी होती है - दोनों जेब;
वह जा घुसता है नामी होटलों में.
किसी अजनवी आशियाने में....
अजनवी लोगों के बीच पाने को ख़ुशी.
आखी वह ख़ुशी क्यों नहीं मिल पाती
उसे अपने ही भरे - पूरे परिवार में...?
क्यों बहक जाते हैं उसके कदम?
क्या है यह आधुनिकता या मजबूरी?
क्यों है वहाँ प्यार और स्नेह का अभाव?
क्यों है कडवाहट दाम्पत्य जीवन में?
क्यों है वह असंतुष्ट अपनी ही संतानों से?
कब रुकेंगे उसके पाँव बहकने से...?
कब बांटेगा वह अपनी प्रसन्नता,
अपना सुख - दुःख अपनों के बीच?
कब पंछियों जैसे हुए..गीत गाते ..
गुनगुनाते वह लौटेगा अपने नीद में?
आखिर कब..? आखिर..आखिर कब...?
धरती की छिट-फुट हरीतिमा
के मध्य नीले आकाश में,
लय में पंक्तिबद्ध उड़ते हुए पंछी
जब मचाते हैं कोलाहल और
करते हैं - सामूहिक कलरव,
तो यह मात्र कलोल नहीं होता.
होती है उसमे सम्मिलित वह ख़ुशी
जो अपना पेट जाने भरने के बाद
लाते हैं चोंच में भरकर बच्चों के लिए.
अपना पवित्र दायित्व समझकर,
ममता के पवित्र बंधन में बंधकर.
कहीं रुकते नहीं, किसी दूसरे गाव में,
अजनवी बाग़ में, अजनवी घोसले में.
परन्तु,
इंसान का जब भी भरा होता है
पेट और भरी होती है - दोनों जेब;
वह जा घुसता है नामी होटलों में.
किसी अजनवी आशियाने में....
अजनवी लोगों के बीच पाने को ख़ुशी.
आखी वह ख़ुशी क्यों नहीं मिल पाती
उसे अपने ही भरे - पूरे परिवार में...?
क्यों बहक जाते हैं उसके कदम?
क्या है यह आधुनिकता या मजबूरी?
क्यों है वहाँ प्यार और स्नेह का अभाव?
क्यों है कडवाहट दाम्पत्य जीवन में?
क्यों है वह असंतुष्ट अपनी ही संतानों से?
कब रुकेंगे उसके पाँव बहकने से...?
कब बांटेगा वह अपनी प्रसन्नता,
अपना सुख - दुःख अपनों के बीच?
कब पंछियों जैसे हुए..गीत गाते ..
गुनगुनाते वह लौटेगा अपने नीद में?
आखिर कब..? आखिर..आखिर कब...?
Monday, June 27, 2011
आखिर यह पतन है किसका - शिक्षा का? शिक्षक का...समाज का या संस्कार का?.
अजी सुनते हो..... ?
विजयी मुद्रा में पत्नी ने आवाज लगायी.
तुम नाहक डरते थे, बोर्डिंग स्कूल पर भड़कते थे,
कोसते रहते थे, बच्चा बिगड़ जाएगा.
अर्थ का अनर्थ सीख कर घर आयेगा.
अब मैं जब भी करती हूँ पूजा - आरती,
पीछे खडा रहता है, प्रेम से भजनों को सुनता है.
मन ही मन कुछ गुनता है....दुहराता है ..
बाप ने प्रसन्न होकर बेटे को बुलाया, दुलराया,
बेटा! तुम तो बहुत समझदार हो गए हो,
संस्कारी भी बन गए हो पढायी के साथ-साथ,
पूजा - पाठ में भी मन लगाने लगे हो.
अपने विचार मुझे भी बताओ, माँ को समझाओ.
हां डैड ! वहाँ स्कूल की रीति बदल गयी है,
वहाँ टीचर अब भजन के साथ उसका
अर्थ भी बताते हैं, विस्तार से समझाते हैं-
जैसे - 'ॐ जय जगदीश हरे',
"हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे"
"हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे' का अर्थ.
इसका अर्थ हुआ कि भगवान् न गोरे हैं न सांवले,
वे तो हरे -हरे हैं, गाँधी जी वाले, एकदम कडकडिया.
डैड! नाराज क्यों होते हो ?
हनुमान चालीसा में भी तो लिखा है-
'होत न आज्ञा बिनु पैसा रे'.इसके बिना कुछ नहीं होता.
भगवान् ही जब लंका गए थे खाली हाथ क्या हुआ?
सीता जी से उधार लेना पड़ा था , भजनों में ही लिखा है-
"मार रावण को वहां उधार सीता का किया'.
इसी उधारी को चुकाने के लिए सोने की सीता बनानी पड़ी थी.
माँ - बाप ने बेटा के दिव्य ज्ञान पर सर पीट लिया .
जब प्रिंसिपल से की शिकायत,
क्या यहाँ यही पढ़ाया जाता है?
अर्थ और अर्थ में भेद नहीं बताया जाता?
उद्धार और उधार में अंतर नहीं बताया जाता?
प्रिंसिपल मुस्कुराते हुए बेशर्मी से बोला -
हम आज की आवश्यका, नीड़ और दरकार पढाते हैं.
तभी तो हमारे बच्चे मनेजमेंट कोर्स में धड़ल्ले से आते हैं.
संस्कार सिखाना हो घर पर सिखाइए,
बोर्डिंग में क्यों भेजते हो? हिंदी स्कूल में पढ़ाइये.
माँ-बाप ने नाम कटवा दिया और
छोटे बच्चे का नाम मोहल्ले के
एक हिंदी स्कूल में लिखवा दिया.
कुछ दिनों बाद 'नेचर' को 'नाचूरे'
याद करते सुन बाप का माथा ठनका.
विद्यालय जाकर शिकायत की.
प्रिंसिपल ने टीचर को बुलाया,
डांट की एक घुट्टी पिलाया -
तुम्हारी शिकायत आयी है..,
ठीक -ठीक पढ़ाया करो नहीं तो
तुम्हारा फचूरे (future) बिगाड़ दूंगा.
परमामेंती (permanent) के लाले पड़ जायेगे.
उधर बाप का बहुत बुरा हाल था अब वह कहाँ जाए?
आखिर यह पतन है किसका - शिक्षा का? शिक्षक का?
विद्यार्थी का? अभिभावक का? समाज का या संस्कार का?
विजयी मुद्रा में पत्नी ने आवाज लगायी.
तुम नाहक डरते थे, बोर्डिंग स्कूल पर भड़कते थे,
कोसते रहते थे, बच्चा बिगड़ जाएगा.
अर्थ का अनर्थ सीख कर घर आयेगा.
अब मैं जब भी करती हूँ पूजा - आरती,
पीछे खडा रहता है, प्रेम से भजनों को सुनता है.
मन ही मन कुछ गुनता है....दुहराता है ..
बाप ने प्रसन्न होकर बेटे को बुलाया, दुलराया,
बेटा! तुम तो बहुत समझदार हो गए हो,
संस्कारी भी बन गए हो पढायी के साथ-साथ,
पूजा - पाठ में भी मन लगाने लगे हो.
अपने विचार मुझे भी बताओ, माँ को समझाओ.
हां डैड ! वहाँ स्कूल की रीति बदल गयी है,
वहाँ टीचर अब भजन के साथ उसका
अर्थ भी बताते हैं, विस्तार से समझाते हैं-
जैसे - 'ॐ जय जगदीश हरे',
"हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे"
"हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे' का अर्थ.
इसका अर्थ हुआ कि भगवान् न गोरे हैं न सांवले,
वे तो हरे -हरे हैं, गाँधी जी वाले, एकदम कडकडिया.
डैड! नाराज क्यों होते हो ?
हनुमान चालीसा में भी तो लिखा है-
'होत न आज्ञा बिनु पैसा रे'.इसके बिना कुछ नहीं होता.
भगवान् ही जब लंका गए थे खाली हाथ क्या हुआ?
सीता जी से उधार लेना पड़ा था , भजनों में ही लिखा है-
"मार रावण को वहां उधार सीता का किया'.
इसी उधारी को चुकाने के लिए सोने की सीता बनानी पड़ी थी.
माँ - बाप ने बेटा के दिव्य ज्ञान पर सर पीट लिया .
जब प्रिंसिपल से की शिकायत,
क्या यहाँ यही पढ़ाया जाता है?
अर्थ और अर्थ में भेद नहीं बताया जाता?
उद्धार और उधार में अंतर नहीं बताया जाता?
प्रिंसिपल मुस्कुराते हुए बेशर्मी से बोला -
हम आज की आवश्यका, नीड़ और दरकार पढाते हैं.
तभी तो हमारे बच्चे मनेजमेंट कोर्स में धड़ल्ले से आते हैं.
संस्कार सिखाना हो घर पर सिखाइए,
बोर्डिंग में क्यों भेजते हो? हिंदी स्कूल में पढ़ाइये.
माँ-बाप ने नाम कटवा दिया और
छोटे बच्चे का नाम मोहल्ले के
एक हिंदी स्कूल में लिखवा दिया.
कुछ दिनों बाद 'नेचर' को 'नाचूरे'
याद करते सुन बाप का माथा ठनका.
विद्यालय जाकर शिकायत की.
प्रिंसिपल ने टीचर को बुलाया,
डांट की एक घुट्टी पिलाया -
तुम्हारी शिकायत आयी है..,
ठीक -ठीक पढ़ाया करो नहीं तो
तुम्हारा फचूरे (future) बिगाड़ दूंगा.
परमामेंती (permanent) के लाले पड़ जायेगे.
उधर बाप का बहुत बुरा हाल था अब वह कहाँ जाए?
आखिर यह पतन है किसका - शिक्षा का? शिक्षक का?
विद्यार्थी का? अभिभावक का? समाज का या संस्कार का?
Sunday, June 26, 2011
ख़ुशी
यह ख़ुशी भी
क्या चीज है भाई!
जिसे देखता हूँ
वही ढूंढता है...
नहीं मिलता तो
उसे छीनता है.
वह मुरख बेचारा
इतना भी न जाने
जिसे ढूंढता है,
जिसे छीनता है,
नहीं है ख़ुशी
वह जिसे छीनता है.
यह ख़ुशी
ढूँढने और छिनने
की वस्तु नहीं है,
यह अपने ही मन
की एक स्थिति है.
यह मिलती करम से
धरम से मिलती है.
यह खजाना तेरे
आचरण में निहित है.
अगर चाहते हो
ख़ुशी मेरे भाई!
तुम बाटो ख़ुशी को,
इसी में भलाई .
गर बांटोगे गम तो
मिलेगा वही गम,
बांटोगे ख़ुशी तो
मिलेगी ख़ुशी ही.
ये ख़ुशी छोटी -छोटी
जो तुम बाँटते हो,
ये वापस मिलेगी
कई गुना बन के.
खजाना कोई रहे न रहे,
यह खजाना ख़ुशी का
रहेगा हमेशा तेरे दिल में.
क्या चीज है भाई!
जिसे देखता हूँ
वही ढूंढता है...
नहीं मिलता तो
उसे छीनता है.
वह मुरख बेचारा
इतना भी न जाने
जिसे ढूंढता है,
जिसे छीनता है,
नहीं है ख़ुशी
वह जिसे छीनता है.
यह ख़ुशी
ढूँढने और छिनने
की वस्तु नहीं है,
यह अपने ही मन
की एक स्थिति है.
यह मिलती करम से
धरम से मिलती है.
यह खजाना तेरे
आचरण में निहित है.
अगर चाहते हो
ख़ुशी मेरे भाई!
तुम बाटो ख़ुशी को,
इसी में भलाई .
गर बांटोगे गम तो
मिलेगा वही गम,
बांटोगे ख़ुशी तो
मिलेगी ख़ुशी ही.
ये ख़ुशी छोटी -छोटी
जो तुम बाँटते हो,
ये वापस मिलेगी
कई गुना बन के.
खजाना कोई रहे न रहे,
यह खजाना ख़ुशी का
रहेगा हमेशा तेरे दिल में.
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