Thursday, May 13, 2010

मानव सृष्टि की कविता है

क्या है कविता - एक उपासना;
कविता साध्य है या साधना?
कविता लक्ष्य है या आराधना?
कविता यथार्थ है या भावना?
कविता बोध है या संभावना?

कविता अश्रुधार है या अभिव्यक्ति?
कविता उच्छ्वास है या आभ्यंतरशक्ति?
कविता प्रणय है या समर्पण और भक्ति?
कविता कोलाहल है या पूर्ण संतृप्ति?

कविता हलाहल है या जीवन का वरदान?
कविता अंतर की शांति है या अतृप्त अरमान?
कविता सन्देश है, प्रदर्शन है या अभिमान?
कविता निजत्व का विलोपन है या पहचान?

कविता उत्साह है या बहकता एक उमंग?
कविता एक धार है या उठती हुई तरंग?
कविता एक विकार है या जीवन का रंग?
कविता भौतिकता है या एक सत्संग?

कविता कृति है मानव की,
फिर मानव है कृति किसकी?
मानव सृष्टि की कविता है;
सृष्टि यह कविता है किसकी?

Sunday, May 2, 2010

नैराश्यभाव से तार न जोड़ो

हो न निराश तुम्हे मिला नहीं,
यदि बेला, चंपा और गुलाब.
नैराश्यभाव से तार न जोड़ो,
आशा की कोई राग तो छेड़ो.

देखते हो केवल रंग-रूप तुम,
उससे रिसता लहू भी देखो...
भ्रमित हुए हैं जीवन में कितने.
कुछ अंतस में भी घुस कर देखो.

पुष्प केवल बेला और गुलाब नहीं,
....अब गेंदा कनेर से नाता जोड़ो.
इस गुलाब ने, बेला ने लुटे हैं,
घरौदें, एक नहीं....बहुतेरे....
बहुतों के गम दूर किये हैं -
गेंदा ....और ....कनेरे.........

अधिकारों की माँग बहुत है,
गुलदस्तों में ये गरजते हैं.
कर्त्तव्यों का है बोध उसे,
अंगारे पर जो चलते हैं.

यह बेला- गुलाब बिछ पथ में
उनके पैरों में फिर चुभता है.
यह तो है गेंदा कनेर जो
पग के घाव को भरता है.

राग जुड़ेगा सत्व से जब,
सब रंग - रूप भूल जाएगा.
मोहकता ही नहीं है सबकुछ,
परख कभी जब हो जाएगा.

आखिर हिंदी अपनी हार गयी,

आखिर हिंदी अपनी हार गयी,
हिंद के गले की 'हार' गयी.
होता है कष्ट कहें कैसे ?
यह हिंदी हिंद में हार गयी.

यह 'आह' - 'वाह' की बात नहीं,
दिल पर भी नया आघात नहीं.
दिल भरा - भरा है घावों से,
है कष्ट दिलों से भाषा की प्यार गयी.

हर देश की अपनी भाषा है,
क्यों भारत में ही निराशा है?
एक जुबाँ के लिए तरसते हैं,
बाहर तो खूब गरजते हैं.

जब सदन में चर्चा उठती है,
हिंदी की लुटिया डूबती है.
हाउस में वो शर्माते हैं,
जो हिंदी की ही खाते हैं.

चुप बैठे वे क्यों रहते हैं?
जो बाहर खूब गरजते हैं.
क्या भय है अन्दर उनके,
जो घुट-घुट कर वे सहते हैं?

अब आंग्ल भाषा आयी है,
दिलों पर सबके छाई है.
यह नटखट छैल-छबीली है,
यह कटी पूँछ की बिल्ली है.

हिंदी के घर की खाती है,
पर 'हाई', 'हेल्लो" करती है.
हिंदी को समझती चुहिया सा,
पंजों से वार ये करती है.....

जब से संगति हुयी इससे,
वे बन गए तब से 'रंगे सियार',
पहले बदले वस्त्र - विचार,
फिर बदल गए सारे व्यवहार.

जाब सूट - बूट में आते हैं,
अंग्रेजी में गुर्राते हैं.....
जब बाँध के पगड़ी आते हैं,
बैठे - बैठे शर्माते हैं......

अब आचरण एक पहेली है,
रहस्यमयी एक हवेली है.
है बुढ़िया यह जादूगरनी सी,
वे समझे यह नई - नवेली है.

यह पर्दा कौन हटाएगा ?
वह वीर कहाँ से आयेगा ?
अब भी तुम जगे नहीं भाई!,
निश्चय ही 'क्लीव' कहलायेगा.

उदगार नहीं यह प्रश्नपत्र है

उदगार नहीं यह प्रश्नपत्र है
पढ़िए जरा संभलकर

प्रतिदिन की तरह समाचारपत्र आया,
प्रमुख खबरों पर नजर दौड़ाया;
परन्तु पढ़ते ही सिर चकराया.
अरे! यह क्या हुआ? क्यों हुआ?
ऐसा हादसा सावित्री के साथ.

हाँ भाई! उसी सत्यवान की सावित्री के साथ
जिसे समाज भारतीय संस्कृति का उपमान
और अपनी उन्नत सभ्यता का,प्रतीक मानता है.
उसी ममता की मूर्ति, पतिव्रता सावित्री को;

जिसे कल सायं ही तो देखा था मैंने भी,
हाथ म पूजा की सजी थाली संग में,
अर्चना और वंदना के देवालय जाते हुए.
और आज यह खबर कि ...
शिवालय से लौटते समय इस लोक के
यमदूत उठा ले गए उसे.......

चर्चा है न्यायालय में सत्यवान द्वारा
सत्य संभाषण की सजा वे सावित्री को;
दे गए, जाते - जाते सत्यवान को भी
देख लेने की धमकी दे गए.
निर्भीक सत्यवान अब इतना डर गया
कि पुलिस -कचहरी कि बजाय
सीधे किसी भाई के घर गया.

विद्यालय से लौटती दुर्गा को
ऑटो में शुम्भ - निशुम्भ ने
अपहृत कर लिया.बदले में
लक्ष्मी को देकर भी दुर्गा को
बचाया नहीं जा सका.
इधर पड़ोस कि राधा ने
प्रेम प्रसंग में बाधक अपने
मोहन का सफाया करा दिया..

और सभी शव मिले एक ही जगह पर;
उस बूढ़े बरगद और ठूंठ अश्वत्थ वृक्ष के नीचे,
जहाँ त्रिपुरारी शिव, हाथ में त्रिशूल लिए
और बजरंगी गदा लिए खड़े हैं.

स्थिति यही है, क्या कम दुखदायी ?
जो सीमा पार से खबर जासूसी की आई.
क्या होगा इस देश में आगे ?
रक्षक ही भक्षक जब बन जाएगा?
है भार सुरक्षा का जिन पर
वह सरेआम बिक जाएगा.
भय है, नहीं है माधुरी यहाँ एक,
छिपे हुए हैं भेड़ की खाल में भेड़िये अनेक.

पश्न है -
सत्यवान की निर्भीकता कहाँ खो गयी ?
यमराज को भी मात देनेवाली सावित्री
यमदूतों से हार कैसे गयी?
महिषासुर मर्दिनी शुम्भ-निशुम्भ से
पराजित कैसे हो गयी?

आज की राधा ने
अपने मोहन से घात क्यों किया?
और मोहन अपनी राधा को
पहचान क्यों नहीं पाया?
त्रिपुरारी की त्रिशूल और
बजरंगी की गदा आज
जडवत निष्प्राण क्यों है?

भीष्म की मजबूरी तो
फिर भी समझ में आती है
परन्तु अर्जुन के गांडीव में चूक क्यों है?
संस्कृति और सभ्यता के नाम पर
कभी सूर्पनखा का कर्ण - नासिका
विदीर्ण करनेवाला लक्ष्मण
आज उसी सूर्पनखा के
तलवे क्यों चाट रहा है?

और आज का समाज
कुम्भकर्णी निद्रा में क्यों सो रहा है?
हमारे अंदर वह जज्बा क्यों नही है
जो इनको इनके किये की सजा दिला दे
इन रंगे सियारों को भींगी बिल्ली बना दे.
मुझको उत्तर कुछ समझ न आया
इसलिए प्रश्न है आज उठाया.

अरे! सृष्टि बदल गयी है या
मेरी ही दृष्टि बदल गयी है?
अरे! कब चिंतन बदल गया?,
मान्यताएं बदल गयीं हैं?
ये समाज बदल गया है या
मेरा ही विचार बदल गया है.
चित्कार रही मानवता
और समाज सो रहा है.
कोई तो ये बताये,
ये क्यों हो रहा है?
ये क्या हो रहा है?

Wednesday, April 14, 2010

स्वतंत्रता और स्वच्छंदता

सत्तर पार कर चुके एक वृद्ध को,
मायूस सड़क पर पड़े देख.
सुनकर के करुण कहानी,
जब पहुंचा घर उनके.....

पहले तो कुत्ते ने अच्छी खबर ली,
फिर पप्पू दहाड़ा - कौन कहता है -
हमने बड़े - बूढों को प्रताड़ित किया है?
हमने तो 'आराम हराम है' के झाडू से,
अपने घर को साफ़ किया है.

श्रवण कुमार की बात मत करो!
वह मूर्ख अनाड़ी निठल्ला था.
तब राजतन्त्र था, अब लोकतंत्र है.
आज विल्कुल हम स्वतंत्र है.
२१वी सदी कम्पूटर युगीन
प्रगतिशील मोडर्न हम हैं.

एक तो चेटिंग से फुर्सत नहीं,
सेंसेक्स भी देखो लुढका है.
इन बुद्धों को इससे लेना क्या?
इनका अपना ही लटका - झटका है.

हमने भेजा था इन्हें घुडशाल,
अब भाग गए तो हम क्या करें?
कुछ काम धाम करते नहीं,
इस बाउंस चेक का हम क्या करें?

यहाँ घर में बिना मतलब चिल्लाते है,
बच्चों का डिविजन ख़राब कराते हैं.
इन्हें खुद कोई पोएम तो याद नहीं,
हमें नीचा दिखाने लिए, हमारे ही बच्चों को,
आप ही की तरह श्रवण कुमार की
धिसी - पिटी कहानी सुनाते हैं.

सुनकर प्रगतिशील बेटे का जवाब,
मेरा सिर चकराया.......
मैंने आँख मूंदकर इतिहास के पृष्ठों को दुहराया,
तो अपनी सभ्यता और संस्कृति में
कंस जैसा चेहरा नजर आया,
उसने हमें बहुत अन्दर तक डराया....

स्वतन्त्रता की यह विषाक्त परिभाषा,
किसने इन्हें पढ़ाया है ?
जो अब तक स्वतंत्रता और स्वच्छंदता
में अंतर इनकी समझ में नहीं आया है.
अब तो साठोत्तरी हुयी अपनी आजादी भी,
यह सोच के मन बहुत ही घबराया है.

मेरी व्यथा को निर्जीव कहे जाने वाले,
बक्से ने समझा है शायद तभी तो,
सुनाया है, साथ - साथ गाया है -
"हम लायें हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के,
इस देश को रखना मेरे बच्चों! संभाल के".

प्रकृति संवेदी को नमन

जीवन तो एक यज्ञ है भाई ! आहुति डालो,
कुछ आहुति डालो... ......यह एक निवेदन हम करते हैं.
स्वागत करने को बेचैन ये तरु की डालियाँ झुकी हुई हैं.
सिर पर मंजरी- कलश लिए ये, धानी चुनरी पहन खड़ी हैं.

सब जिज्ञासु निहार रहीं हैं, मधुरं सुरभित आमन्त्रण दे;
पाने को प्रतिदान, देखो ! पत्तों का विजन डुलाय रहीं हैं.
मानव होता है संवेदी, जान इसे आशा से हमें निहार रहीं हैं,
क्या तुम भी हो पाषण ह्रदय ? यहाँ मानवता अब हार रही है.

धन ने बहुत नचाया हमको, मन ने बहुत सताया है;
इन्द्रियों के इस भोग ने देखो, कैसा दुर्दिन दिखलाया है?
जंगल काटा, बगिया काटा, आँगन का बिरवा काट रहे हो;
कितने वृक्ष लगाए अब तक, क्या इसको भी तुम आँक रहे हो?

ताप बढ़ गया, सूख गया जल, इस संकट को तुम देख रहे हो;
निद्रा तोड़ो, ..तंद्रा छोडो, .....अब पड़े - पड़े यूँ क्या देख रहे हो?
पड़े हुए अज्ञान भवर में......., जीवन स्रोत ना पहचाना;
देता हमें जो प्राण वायु है, उसकी महिमा तो अब जाना.

जपते है नित - "प्राणाय नमो अस्य इदं सर्वं वशे"
कहकर और "प्राण ते आयते नमः अस्तु",
"परयाते नमः अस्तु", "तष्ठाते नमः अस्तु"
कहकर करते पूजन, करते ग्रहण जिस प्राण वायु को.

कुछ और नहीं, पादप जगत का ही उत्सर्जन है.
होगा नहीं यह उत्सर्जन तो समझो इस धरा से
जीवन का ही विसर्जन है........
यज्ञमयी यह सृष्टि सार है, भोगमयी यह है निःसार .

भाग रहे हो भोग के पीछे, कुछ तो करो विचार.
समझ गए जो इस महत्व को, देखो! वे दौड़े आतें हैं.
एक नहीं फिर दर्जन भर, ऊर्जस्वी पौध लगाते हैं.
ऐसे जागृत मानव को हम शत-शत शीश झुकाते हैं.

अब भी तुम बैठे मेरे भैया!
सुनो प्रकृति की करुण पुकार, अब तो करो विचार.
मैं नहीं चाहता कहे कोई कृतघ्न तुझे, याद दिलाना चाहतें है,
कर स्वीकार अनुदान, प्रकृति का मान बढ़ाना चाहते हैं.

जाने-अनजाने जंगल को बंजर भले किया हो,
अब वृक्ष - बाग़ - वन खूब लगना चाहतें है,
वृक्षारोपण के इस अभियान में सभी को हाथ बंटाना है;
करो संकल्प एक नहीं,अब सौ - सौ पौध लगाना है.

Sunday, March 28, 2010

चिन्तक के जीवन - मृत्यु का आधार

पूछते हो - चिन्तक को समाज से
प्रतिदान में मिलता है क्या? परन्तु ,
चिन्तक को कभी मान - सम्मान,
मकान-दूकान की लिप्सा रही है क्या?
पूछते हो - चिन्तक भौतिक रूप में
समाज को देता है क्या?

अरे! चिन्तक समाज को बनाने,
सवांरने और मिटाने की दवा है.
यही विज्ञान रूप में सिद्धांत
और संतरूप में दुआ है.
चिन्तक समाज को बिन मोल
वह दे देता है जिसे धन
कभी खरीद सकता है क्या?

उसकी पूँजी तो हैं - उसकी संवेदनाएं;
समाज का दर्द, प्रकृति की चित्कार,
औचित्य का प्रश्न. जो ग्रहण करता है वह
अपने ही आस - पास से, परन्तु लड़ता है;
लोक मंगल के लिए, जन कल्याण के लिए.

वह ऋणी है - समाज का, सभ्यता का, .....
संस्कृति का; प्रकृति का, प्रज्ञान का और विज्ञान का....
वह संतुष्ट है - संवेदनाओं को पाकर, आहत होकर.
वह आह्लादित है - नीलकंठ होने के पथ पर चलकर.
ऐश्वर्यशाली है - औचित्य के प्रश्न का समाधान ढूंढकर.

कर्मयोगी है वह, निठल्ला नहीं,
टुकड़ों पर पलनेवाला पिल्ला नहीं.
कनक और कामिनी उसकी कमजोरी नहीं,
इसलिए उसके पास कोई तिजोरी नहीं.
आखिर वह भूखों तो मरता नहीं,
कभी खाली पेट सो जाय, अलग बात है.

सुनकर सभ्यता - संस्कृति के क्रन्दन को.
प्रकृति के करुण चित्कार - पुकार को;
चिन्तक की लेखनी रुक कहाँ पाएगी?
चैन छिन जाएगा, नींद उड़ जायेगी.
छलक पड़ेंगे उदगार, गर्जन करेंगे उद्घोष -

सुनो ! सुनो !! और सुनो !!!
अरे ओ सभ्य मानव! प्रगतिशीलता के ध्वजवाहक;
तू प्रगतिशीलता के नाम पर मूर्खता क्यों कर रहा?
स्वतंत्रता और स्वच्छंदता में अंतर क्यों नहीं कर रहा?
धरती माँ की हरि चादर क्यों हटा रहा? प्यारी प्रकृति को,
उसकी मधुमय वृत्ति को, जहरीली क्यों बना रहा?

विज्ञान को वरदान ही रहने दो, मेरे दोस्त!
इसे मानव जीवन के लिए अभिशाप क्यों बना रहा?
क्या तू इतना मदान्ध हो गया कि यह भी नहीं पता;
कि जिस डाल पर बैठा है, तू उसी को काट रहा.
अब भी समय है - स्वयं चेत और दूसरों को चेता.स्वयं को
पूर्वार्द्ध का नहीं, उत्तरार्द्ध का कालिदास और आइन्स्टीन बना.

अरे भाई! चिन्तक के इन तीरों को समाज सह लेता है,
पूरा ना सही, कुछ ना कुछ तो कर लेता है.
चिन्तक के परितोष के लिए, यही क्या कम है?
अरे! यही तो असली मान-सम्मान और प्रतिदान है.

चिन्तक न सुविधाभोगी है, न वेतनभोगी;
वह तो जगत का यार है, जग से ही उसे प्यार है.
प्रतिदान और अवदान की बात तो निरा व्यापार है.
और चिन्तक को व्यापार से नहीं,
अपने दायित्व और कर्त्तव्य से प्यार है.
और एक चिन्तक के जीवन और मृत्यु का,
यही मात्र एक आधार है.