Sunday, May 2, 2010

आखिर हिंदी अपनी हार गयी,

आखिर हिंदी अपनी हार गयी,
हिंद के गले की 'हार' गयी.
होता है कष्ट कहें कैसे ?
यह हिंदी हिंद में हार गयी.

यह 'आह' - 'वाह' की बात नहीं,
दिल पर भी नया आघात नहीं.
दिल भरा - भरा है घावों से,
है कष्ट दिलों से भाषा की प्यार गयी.

हर देश की अपनी भाषा है,
क्यों भारत में ही निराशा है?
एक जुबाँ के लिए तरसते हैं,
बाहर तो खूब गरजते हैं.

जब सदन में चर्चा उठती है,
हिंदी की लुटिया डूबती है.
हाउस में वो शर्माते हैं,
जो हिंदी की ही खाते हैं.

चुप बैठे वे क्यों रहते हैं?
जो बाहर खूब गरजते हैं.
क्या भय है अन्दर उनके,
जो घुट-घुट कर वे सहते हैं?

अब आंग्ल भाषा आयी है,
दिलों पर सबके छाई है.
यह नटखट छैल-छबीली है,
यह कटी पूँछ की बिल्ली है.

हिंदी के घर की खाती है,
पर 'हाई', 'हेल्लो" करती है.
हिंदी को समझती चुहिया सा,
पंजों से वार ये करती है.....

जब से संगति हुयी इससे,
वे बन गए तब से 'रंगे सियार',
पहले बदले वस्त्र - विचार,
फिर बदल गए सारे व्यवहार.

जाब सूट - बूट में आते हैं,
अंग्रेजी में गुर्राते हैं.....
जब बाँध के पगड़ी आते हैं,
बैठे - बैठे शर्माते हैं......

अब आचरण एक पहेली है,
रहस्यमयी एक हवेली है.
है बुढ़िया यह जादूगरनी सी,
वे समझे यह नई - नवेली है.

यह पर्दा कौन हटाएगा ?
वह वीर कहाँ से आयेगा ?
अब भी तुम जगे नहीं भाई!,
निश्चय ही 'क्लीव' कहलायेगा.

उदगार नहीं यह प्रश्नपत्र है

उदगार नहीं यह प्रश्नपत्र है
पढ़िए जरा संभलकर

प्रतिदिन की तरह समाचारपत्र आया,
प्रमुख खबरों पर नजर दौड़ाया;
परन्तु पढ़ते ही सिर चकराया.
अरे! यह क्या हुआ? क्यों हुआ?
ऐसा हादसा सावित्री के साथ.

हाँ भाई! उसी सत्यवान की सावित्री के साथ
जिसे समाज भारतीय संस्कृति का उपमान
और अपनी उन्नत सभ्यता का,प्रतीक मानता है.
उसी ममता की मूर्ति, पतिव्रता सावित्री को;

जिसे कल सायं ही तो देखा था मैंने भी,
हाथ म पूजा की सजी थाली संग में,
अर्चना और वंदना के देवालय जाते हुए.
और आज यह खबर कि ...
शिवालय से लौटते समय इस लोक के
यमदूत उठा ले गए उसे.......

चर्चा है न्यायालय में सत्यवान द्वारा
सत्य संभाषण की सजा वे सावित्री को;
दे गए, जाते - जाते सत्यवान को भी
देख लेने की धमकी दे गए.
निर्भीक सत्यवान अब इतना डर गया
कि पुलिस -कचहरी कि बजाय
सीधे किसी भाई के घर गया.

विद्यालय से लौटती दुर्गा को
ऑटो में शुम्भ - निशुम्भ ने
अपहृत कर लिया.बदले में
लक्ष्मी को देकर भी दुर्गा को
बचाया नहीं जा सका.
इधर पड़ोस कि राधा ने
प्रेम प्रसंग में बाधक अपने
मोहन का सफाया करा दिया..

और सभी शव मिले एक ही जगह पर;
उस बूढ़े बरगद और ठूंठ अश्वत्थ वृक्ष के नीचे,
जहाँ त्रिपुरारी शिव, हाथ में त्रिशूल लिए
और बजरंगी गदा लिए खड़े हैं.

स्थिति यही है, क्या कम दुखदायी ?
जो सीमा पार से खबर जासूसी की आई.
क्या होगा इस देश में आगे ?
रक्षक ही भक्षक जब बन जाएगा?
है भार सुरक्षा का जिन पर
वह सरेआम बिक जाएगा.
भय है, नहीं है माधुरी यहाँ एक,
छिपे हुए हैं भेड़ की खाल में भेड़िये अनेक.

पश्न है -
सत्यवान की निर्भीकता कहाँ खो गयी ?
यमराज को भी मात देनेवाली सावित्री
यमदूतों से हार कैसे गयी?
महिषासुर मर्दिनी शुम्भ-निशुम्भ से
पराजित कैसे हो गयी?

आज की राधा ने
अपने मोहन से घात क्यों किया?
और मोहन अपनी राधा को
पहचान क्यों नहीं पाया?
त्रिपुरारी की त्रिशूल और
बजरंगी की गदा आज
जडवत निष्प्राण क्यों है?

भीष्म की मजबूरी तो
फिर भी समझ में आती है
परन्तु अर्जुन के गांडीव में चूक क्यों है?
संस्कृति और सभ्यता के नाम पर
कभी सूर्पनखा का कर्ण - नासिका
विदीर्ण करनेवाला लक्ष्मण
आज उसी सूर्पनखा के
तलवे क्यों चाट रहा है?

और आज का समाज
कुम्भकर्णी निद्रा में क्यों सो रहा है?
हमारे अंदर वह जज्बा क्यों नही है
जो इनको इनके किये की सजा दिला दे
इन रंगे सियारों को भींगी बिल्ली बना दे.
मुझको उत्तर कुछ समझ न आया
इसलिए प्रश्न है आज उठाया.

अरे! सृष्टि बदल गयी है या
मेरी ही दृष्टि बदल गयी है?
अरे! कब चिंतन बदल गया?,
मान्यताएं बदल गयीं हैं?
ये समाज बदल गया है या
मेरा ही विचार बदल गया है.
चित्कार रही मानवता
और समाज सो रहा है.
कोई तो ये बताये,
ये क्यों हो रहा है?
ये क्या हो रहा है?

Wednesday, April 14, 2010

स्वतंत्रता और स्वच्छंदता

सत्तर पार कर चुके एक वृद्ध को,
मायूस सड़क पर पड़े देख.
सुनकर के करुण कहानी,
जब पहुंचा घर उनके.....

पहले तो कुत्ते ने अच्छी खबर ली,
फिर पप्पू दहाड़ा - कौन कहता है -
हमने बड़े - बूढों को प्रताड़ित किया है?
हमने तो 'आराम हराम है' के झाडू से,
अपने घर को साफ़ किया है.

श्रवण कुमार की बात मत करो!
वह मूर्ख अनाड़ी निठल्ला था.
तब राजतन्त्र था, अब लोकतंत्र है.
आज विल्कुल हम स्वतंत्र है.
२१वी सदी कम्पूटर युगीन
प्रगतिशील मोडर्न हम हैं.

एक तो चेटिंग से फुर्सत नहीं,
सेंसेक्स भी देखो लुढका है.
इन बुद्धों को इससे लेना क्या?
इनका अपना ही लटका - झटका है.

हमने भेजा था इन्हें घुडशाल,
अब भाग गए तो हम क्या करें?
कुछ काम धाम करते नहीं,
इस बाउंस चेक का हम क्या करें?

यहाँ घर में बिना मतलब चिल्लाते है,
बच्चों का डिविजन ख़राब कराते हैं.
इन्हें खुद कोई पोएम तो याद नहीं,
हमें नीचा दिखाने लिए, हमारे ही बच्चों को,
आप ही की तरह श्रवण कुमार की
धिसी - पिटी कहानी सुनाते हैं.

सुनकर प्रगतिशील बेटे का जवाब,
मेरा सिर चकराया.......
मैंने आँख मूंदकर इतिहास के पृष्ठों को दुहराया,
तो अपनी सभ्यता और संस्कृति में
कंस जैसा चेहरा नजर आया,
उसने हमें बहुत अन्दर तक डराया....

स्वतन्त्रता की यह विषाक्त परिभाषा,
किसने इन्हें पढ़ाया है ?
जो अब तक स्वतंत्रता और स्वच्छंदता
में अंतर इनकी समझ में नहीं आया है.
अब तो साठोत्तरी हुयी अपनी आजादी भी,
यह सोच के मन बहुत ही घबराया है.

मेरी व्यथा को निर्जीव कहे जाने वाले,
बक्से ने समझा है शायद तभी तो,
सुनाया है, साथ - साथ गाया है -
"हम लायें हैं तूफ़ान से कश्ती निकाल के,
इस देश को रखना मेरे बच्चों! संभाल के".

प्रकृति संवेदी को नमन

जीवन तो एक यज्ञ है भाई ! आहुति डालो,
कुछ आहुति डालो... ......यह एक निवेदन हम करते हैं.
स्वागत करने को बेचैन ये तरु की डालियाँ झुकी हुई हैं.
सिर पर मंजरी- कलश लिए ये, धानी चुनरी पहन खड़ी हैं.

सब जिज्ञासु निहार रहीं हैं, मधुरं सुरभित आमन्त्रण दे;
पाने को प्रतिदान, देखो ! पत्तों का विजन डुलाय रहीं हैं.
मानव होता है संवेदी, जान इसे आशा से हमें निहार रहीं हैं,
क्या तुम भी हो पाषण ह्रदय ? यहाँ मानवता अब हार रही है.

धन ने बहुत नचाया हमको, मन ने बहुत सताया है;
इन्द्रियों के इस भोग ने देखो, कैसा दुर्दिन दिखलाया है?
जंगल काटा, बगिया काटा, आँगन का बिरवा काट रहे हो;
कितने वृक्ष लगाए अब तक, क्या इसको भी तुम आँक रहे हो?

ताप बढ़ गया, सूख गया जल, इस संकट को तुम देख रहे हो;
निद्रा तोड़ो, ..तंद्रा छोडो, .....अब पड़े - पड़े यूँ क्या देख रहे हो?
पड़े हुए अज्ञान भवर में......., जीवन स्रोत ना पहचाना;
देता हमें जो प्राण वायु है, उसकी महिमा तो अब जाना.

जपते है नित - "प्राणाय नमो अस्य इदं सर्वं वशे"
कहकर और "प्राण ते आयते नमः अस्तु",
"परयाते नमः अस्तु", "तष्ठाते नमः अस्तु"
कहकर करते पूजन, करते ग्रहण जिस प्राण वायु को.

कुछ और नहीं, पादप जगत का ही उत्सर्जन है.
होगा नहीं यह उत्सर्जन तो समझो इस धरा से
जीवन का ही विसर्जन है........
यज्ञमयी यह सृष्टि सार है, भोगमयी यह है निःसार .

भाग रहे हो भोग के पीछे, कुछ तो करो विचार.
समझ गए जो इस महत्व को, देखो! वे दौड़े आतें हैं.
एक नहीं फिर दर्जन भर, ऊर्जस्वी पौध लगाते हैं.
ऐसे जागृत मानव को हम शत-शत शीश झुकाते हैं.

अब भी तुम बैठे मेरे भैया!
सुनो प्रकृति की करुण पुकार, अब तो करो विचार.
मैं नहीं चाहता कहे कोई कृतघ्न तुझे, याद दिलाना चाहतें है,
कर स्वीकार अनुदान, प्रकृति का मान बढ़ाना चाहते हैं.

जाने-अनजाने जंगल को बंजर भले किया हो,
अब वृक्ष - बाग़ - वन खूब लगना चाहतें है,
वृक्षारोपण के इस अभियान में सभी को हाथ बंटाना है;
करो संकल्प एक नहीं,अब सौ - सौ पौध लगाना है.

Sunday, March 28, 2010

चिन्तक के जीवन - मृत्यु का आधार

पूछते हो - चिन्तक को समाज से
प्रतिदान में मिलता है क्या? परन्तु ,
चिन्तक को कभी मान - सम्मान,
मकान-दूकान की लिप्सा रही है क्या?
पूछते हो - चिन्तक भौतिक रूप में
समाज को देता है क्या?

अरे! चिन्तक समाज को बनाने,
सवांरने और मिटाने की दवा है.
यही विज्ञान रूप में सिद्धांत
और संतरूप में दुआ है.
चिन्तक समाज को बिन मोल
वह दे देता है जिसे धन
कभी खरीद सकता है क्या?

उसकी पूँजी तो हैं - उसकी संवेदनाएं;
समाज का दर्द, प्रकृति की चित्कार,
औचित्य का प्रश्न. जो ग्रहण करता है वह
अपने ही आस - पास से, परन्तु लड़ता है;
लोक मंगल के लिए, जन कल्याण के लिए.

वह ऋणी है - समाज का, सभ्यता का, .....
संस्कृति का; प्रकृति का, प्रज्ञान का और विज्ञान का....
वह संतुष्ट है - संवेदनाओं को पाकर, आहत होकर.
वह आह्लादित है - नीलकंठ होने के पथ पर चलकर.
ऐश्वर्यशाली है - औचित्य के प्रश्न का समाधान ढूंढकर.

कर्मयोगी है वह, निठल्ला नहीं,
टुकड़ों पर पलनेवाला पिल्ला नहीं.
कनक और कामिनी उसकी कमजोरी नहीं,
इसलिए उसके पास कोई तिजोरी नहीं.
आखिर वह भूखों तो मरता नहीं,
कभी खाली पेट सो जाय, अलग बात है.

सुनकर सभ्यता - संस्कृति के क्रन्दन को.
प्रकृति के करुण चित्कार - पुकार को;
चिन्तक की लेखनी रुक कहाँ पाएगी?
चैन छिन जाएगा, नींद उड़ जायेगी.
छलक पड़ेंगे उदगार, गर्जन करेंगे उद्घोष -

सुनो ! सुनो !! और सुनो !!!
अरे ओ सभ्य मानव! प्रगतिशीलता के ध्वजवाहक;
तू प्रगतिशीलता के नाम पर मूर्खता क्यों कर रहा?
स्वतंत्रता और स्वच्छंदता में अंतर क्यों नहीं कर रहा?
धरती माँ की हरि चादर क्यों हटा रहा? प्यारी प्रकृति को,
उसकी मधुमय वृत्ति को, जहरीली क्यों बना रहा?

विज्ञान को वरदान ही रहने दो, मेरे दोस्त!
इसे मानव जीवन के लिए अभिशाप क्यों बना रहा?
क्या तू इतना मदान्ध हो गया कि यह भी नहीं पता;
कि जिस डाल पर बैठा है, तू उसी को काट रहा.
अब भी समय है - स्वयं चेत और दूसरों को चेता.स्वयं को
पूर्वार्द्ध का नहीं, उत्तरार्द्ध का कालिदास और आइन्स्टीन बना.

अरे भाई! चिन्तक के इन तीरों को समाज सह लेता है,
पूरा ना सही, कुछ ना कुछ तो कर लेता है.
चिन्तक के परितोष के लिए, यही क्या कम है?
अरे! यही तो असली मान-सम्मान और प्रतिदान है.

चिन्तक न सुविधाभोगी है, न वेतनभोगी;
वह तो जगत का यार है, जग से ही उसे प्यार है.
प्रतिदान और अवदान की बात तो निरा व्यापार है.
और चिन्तक को व्यापार से नहीं,
अपने दायित्व और कर्त्तव्य से प्यार है.
और एक चिन्तक के जीवन और मृत्यु का,
यही मात्र एक आधार है.

Thursday, March 25, 2010

महिला सशक्तिकरण : कुछ सांस्कृतिक प्रश्न

एक गुनगुनाता हुआ शर्मिला सा सुकोमल नारीमन, यदि चुप हो जाय तो उसका मनुहार होना चाहिए. स्तुत्य है, इस व्यथा निवारण का यह पुरुष प्रयास. सम्प्रेषण, प्रेक्षण की यह कोपविद्या, नारी के लिए है, सुगम, सरल; साथ ही लाता है मनुहार का अवसर. परन्तु ....एक चुप हो चुके पुरुष मन को, मानाने और गुदगुदाने का, समझने और समझाने का नारी प्रयास क्या अर्थहीन है? औचित्यहीन है? और क्यों? सामंजस्य और भावसंतुलन के स्थान पर उसे पाषाण पुरुषकी संज्ञा; आखिर है क्या? क्रूरता या कायरता? कौन करेगा निर्णय? किसने देखा है - पाषाण पुरुष की बेजान चुप्पी में, उसके गहन गाम्भीर्य शान्ति में वल्लियों उठ रहे कलोल और कोलाहल को? शान्ति सागर में हिलोरें मार रहे ज्वार- भाटा को? क्या यह अवमूल्यन नहीं,चेतना का, बौद्धिकता का? चिंतन की वेदना का? संवेदना की स्वतन्त्रता का?

नारीमुक्ति विमर्श की धारा, उसके सशक्तिकरण की विचारधारा, समय और प्रस्थितिनुसार संवेग और स्वरुप धारण करे, यह तो समझ में आता है, किंचित भी मतभेद नहीं उससे; यथोचित उत्साहभरा समर्थन है उसे, वे तो दूसरे हैं जो इसका विरोघ अपनी क्षुद्र लिप्सा के लिए करते रहें है, आज भी कर रहे हैं, छोडिये उनकी बात... प्रश्न यह है कि स्वतन्त्रता के नाम पर अपने तन-बदन को,बाजारू चीज बना देना, आखिर है क्या? स्वतन्त्रता या स्वच्छंदता? साथ ही नारी स्वातंत्र्य के नाम पर, नारीत्व और स्त्रीत्व से मुक्ति की बात, कहीं से भी नहीं आती समझ में यह मानवजाति का विलोपन है या पशुता का उन्नयन? नारी को प्रकृति प्रदत्त अधिकार, सृजन है; विनाश नहीं. मानवजाति का विनाश तो नारीजगत का घोर-अपमान है प्रकृति और प्रवृत्ति से विद्रोह है, यदि नारी प्रकृति प्रदत्त और संस्कृति प्रदत्त अधिकारों की सुरक्षा नहीं कर पायी, तो संवैधानिक अधिकारों की सुरक्षा क्या रक्षा कर पाएगी?

नारीत्व और स्त्रीत्व से मुक्ति का प्रश्न, आज सर्वाधिक विचारणीय प्रश्न है, इससे मुख मोड़ना आत्मघाती होगा. आचार विचार में यह परिवर्तन, सैद्धांतिक शब्द विन्यास के कारण है अथवा अर्थदुर्बोध के कारण? बिना इस मर्म भेदन के,स्वतंत्रता का लक्ष्य, इसके उद्देश्य की पूर्ति संभव है क्या? अथवा आज आवश्यकता उन मूलभूत सिद्धांतो के पुनर्विश्लेषण - पुनर्व्याख्या की है. भ्रम और विभ्रम की,यह दुरावस्था सशक्तिकरण और नारी मुक्तिआन्दोलन के नाम पर, कहीं बन न जाये सामजिक कलह का कारण? टूटते दांपत्य, बढ़ते तलाक, विखरते संयुक्त-परिवार पर, क्या यह आन्दोलन ध्यान देगा? हस्तिनापुर के द्युतक्रीडा से उठा यह प्रश्न, अनेक मोड़ पार करता हुआ,आज इस अवस्था में भटक गया है. धन की चकाचौध में आज स्वतंत्रता का एक विकृत रूप;'नारी देह स्वतन्त्रता' के रूप में दीख रहा है. यह 'देह प्रदर्शन' और 'देह उपभोग' अब किसी दबाव या प्रभाव में आकर नहीं, यह पैसे के लोभ में नारी का स्वयं का निर्णय है. जो कार्य स्त्रियाँ, कभी दबाव या मजबूरी में करती थी, आज शौक में कर रहीं है. धन की महिमा ने 'नारी की महिमा' की क्या गति की है? कैसी क्षति की है? क्या यह आन्दोलन इसका मूल्यांकन करेग?

न जाने क्यों मन सशंकित है, कहीं बन न जाये भावी पीढ़ी ...बलि का बकरा? अथवा खड़ा न हो जाये ,प्रतिक्रियावाद का खतरा? क्योकि जिस अस्तित्ववादी विचारधारा के पीछे यह आन्दोलन है, भाग रहा, वह हमारी संस्कृति, हमारी सभ्यता, हमारे विवाह संस्कार को नकार रहा. नहीं होंगे विवाह, भावी पीढ़ी कहाँ से आएगी? बिन विवाह, सामाजिक रिश्ते क्या टिक पायेंगे? और बिन रिश्ते हम कहाँ जायेंगे? हम या तो मानव से च्युत होकर पशु कहलायेंगे...... पशुवत जीवन बिताएंगे....अथवा इस धरा को मानवविहीन बनायेंगे. इस प्रश्न का जवाब नहीं है इस आन्दोलन के पुरोधा और प्रथम अंतर्राष्ट्रीय चेयर परसन 'सिमोन दी बाउवा के भी पास. कौन सा उपचार श्रेयष्कर होगा? श्रीमान! क्या आप भी कुछ सुझायेंगे? और यदि आज चुप रहे, तो निश्चित जानिये,इस समस्या को और जटिल ही बनायेंगे..


नारी स्वाधीनता की परिकल्पना कोई पश्चिम की बपौती नहीं. अनादि काल से बही है यहाँ - यह नारीस्वाधीनता की एक धारा. जो प्रतीक - प्रतिमानों में गुम्फित है यह, उधार की कठौती नहीं. सती का हठ, उनका यज्ञाग्नि प्रवेश नारी स्वातंत्र्य और अधिकार का प्रथम उदाहरण है. सावित्री का सत्यावान-वरण, सीता का बन गमन, मीरा, राधा का अनुरक्त अनुराग. नारी स्वाधीनता का ही है परिचायक. परन्तु इसमें कहीं भी दांपत्य से दूरी नहीं. दुराव टकराव तलाक नहीं मनुष्यता, मानवता, सामाजिकता का ह्रास नहीं. मानव समाज मानव सृष्टि को कोई खतरा नहीं, सृष्टि संरचना को पुष्ट ही करता है यह अधिकार. आज उसी अधिकार हेतु आन्दोलन क्यों? चाहिए यदि वास्तविक अधिकार, आंशिक नहीं सर्वांश तो वापस लौटना होगा. पाश्चात्य शैली नहीं, अपनी संस्कृति को अपनाना होगा, उलटना होगा इस धारा को. और धारा के उलटते ही होगा चमत्कार, न कोई शोर - शराबा !, न चीत्कार !!. धारा अब बन जाएगी - "राधा" . और "राधा" में रूपांतरण होते ही, कान्हा हो गया वश में, ....अब गोकुल..... तुम्हारी, ...मथुरा ......तुम्हारी......., द्वारिका तुम्हारी......अब सब कुछ.... तुम्हारा......., कान्हा तो है प्रेम से हारा. सर्वस्व छोड़ अब ;कुछ' के पीछे,भागना क्या? मणि को छोड़ अब तुच्छ के पीछे नाचना क्या?

संतोषप्रद और गर्व की बात यह है कि,महिला राष्ट्रपति और महिला स्पीकर, दोनों भारतीय संस्कृति की संवाहिका है, पोषिका हैं, लेकिन मूल रूप में इस प्रश्न पर नारी जगत को ही सोचना होगा. हित उनका किसमे है? कहाँ है? उन्हें चाहिए क्या? मिल क्या रहा? और नारी मुक्ति आन्दोलन धारा, सशक्तिकरण के नाम पर किधर जा रहा? हमें और भी गर्व होगा, यदि इन्हीं की भांति भारतीय संस्कृति की सम्वाहिकाएं ही संसद में बैठे; ३३% नहीं भाई, ५०% की संख्या में बैठे. परन्तु अपनी सांस्कृतिक धरोहर को सुरक्षित और संरक्षित रखें. "अर्ध-नारीश्वर" की सत्ता में विश्वास रखने वाली भारतीय संस्कृति में, पुरुष और नारी का भेद कहाँ - "नारी पुरुष पुरुष सब नारी, सब एको पुरुष मुरारी".

Sunday, March 21, 2010

राम कथा का 'दर्शन ', 'अध्यात्म ' और 'विज्ञानं '

विज्ञानं और दर्शन का उद्देश्य :
"सिद्धांतों की खोज" करना,
"अथातो ब्रह्म (सिद्धांत) जिज्ञासा" - वेदांत सूत्र (१.१)

राम कथा का केन्द्रीय विन्दु :
अयोध्या - (यही अयोध्या रामकथा का प्रारम्भ और समापन स्थल है)

अयोध्या का अर्थ और निहितार्थ :
अयोध्या (अ + युद्ध), जहाँ युद्ध और द्वन्द न हो, अर्थात शांति हो. अयोध्या का दूसरा नाम अवध है. (अ + वध) अर्थात जहाँ अपराध न हों, पाप न हों, जहाँ कठोर सजा की, वध जैसी सजा की आवश्यकता ही न हो. ऎसी उच्च कोटि की शांति - व्यवस्था कायम हो जहाँ, वह है - अवध. दार्शनिक दृष्टि से जहाँ चित्त की वृत्तियों का पूर्णतः निरोध हो जाय, वह है - अयोध्या और वह है - अवध. यह एक साधक की अपनी मनः स्थिति है. साधना का उच्च सोपान है यह. यही योग की परिभाषा भी है - "योग: चिति वृत्ति निरोधः" - (योग सूत्र-१.१)

अयोध्या का रजा कौन? :
दशरथ.

दशरथ का अर्थ और निहितार्थ:
जो शारीर रूपी रथ में जुटे हुए दसों इन्द्रिय रूपी घोड़ों (५ कर्मेन्द्रिय + ५ ज्ञानेन्द्रिय) को अपने वश में रखे.ध्यातव्य है कि कठोपनिषद में "आत्मानं रथिं विद्धि शरीरं रथमेव तु / बुद्धिं सारथि विद्धि मनः प्रग्रह मेवच //...." (कठ -३.३-५) से इसी आशय को स्पष्ट किया गया है. और गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को इन्ही इन्द्रियों को वश में करके 'दशरथ; बनने का उपदेश देते हैं - (गीता ३.४१)

दशरथ - योग मार्ग का पथिक :
योगी के लिए निर्देश है -"योग: कर्मः कौशलम". इसके लिए अनिवार्य शर्त है "समत्वं योग उच्यते", समत्व दृष्टि की, समत्व के आचार-विचार की समदर्शी और समत्व की स्थिति में ही शान्ति-व्यवस्था कायम है. आतंरिक और वाह्य सुख की, प्रसन्नता की अवस्था है यह.

दशरथ की ३ रानियाँ कौन? :
त्रिगुण (सत + रज + तम) यही सत कौशल्या, रज सुमित्रा, और तम कैकेयी हैं.

योगी दशरथ को पुरुषार्थ की प्राप्ति :
एक योगी ही अपने जीवन में चरों पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) की प्राप्ति का सकता है. दशरथ रूपी साधक ने भी इन चारों पुरुषार्थों को प्राप्त किया था; ( धर्म - राम, अर्थ - लक्ष्मण, काम - भरत , मोक्ष - शत्रुघ्न)..

राम हैं - धर्म:
राम धर्म का प्रतीक हैं. धर्म को परिभाषित किया गया है - "धारयति असौ सह धर्मः". अर्थात हमारे अस्तित्व को धारण करे वह धर्म है. जिससे हमारा अस्तित्व है और जिसके अभाव में हम अपनी पहचान खो देते हैं, वह नियामक तत्व धर्म है. इस परिभाषा के अनुसार हम मानव हैं, इंसान हैं, अतः हमारा धर्म है - 'मानवता', 'इंसानियत'. यह मानवधर्म हमारी सोच, विचार, मन और आचरण से निःसृत होता है; इसलिए इसका नाम है - 'राम'. "रम्यते इति राम:" अर्थात जो हमारे शारीर में, अंग-प्रत्यंग में रम रहा है, वही है - 'राम'; और वही है - 'धर्म'. इस राम के कई रूप हैं, सबकी अपनी अपनी अनुभूतियाँ हैं - "एक राम दशरथ का बेटा, एक राम है घट - घट लेटा / एक राम का जगत पसारा, एक राम है सबसे न्यारा."

लक्ष्मण हैं - अर्थ :
जिसका लक्ष्य हो 'राम', जिसका एक मात्र ध्येय हो 'राम', वही है - 'लक्ष्मण' . अर्थ का धर्म के साथ अनिवार्य रूप से जुड़ जाना ही अर्थ की सार्थकता, उसकी उपयोगिता और उसका गौरव है. अर्थ और धर्म का युग्म ही कल्याणकारी, लोकमंगलकारी है. अर्थ का साथ होने पर ही धर्म अपने उद्देश्य में सफल हो सकता है. लेकिन यह अर्थ उपयोगी तब है जब वह भोग, लिप्सा और विलासिता से दूरी बनाये रहे. भोग तो रहेगा, लेकिन त्यागमय भोग, 'तेन त्यक्तेन भुन्जीथा' के रूप में. राम रूपी लक्ष्य को छोडकर जो अन्यत्र न भटके; वह है - 'लक्ष्मण'.

भरत है - काम :
भरत का अर्थ है - भा + रत (भा = ज्ञान, रत = लीन), अर्थात जो सतत ज्ञान में लीन हो; वह है भरत. जिसकी सोच, जिसके विचार, जिसके कार्य, जिसकी जीवनशैली 'काम' को भी महनीय, नमनीय और वन्दनीय बना दे; वह है - भरत'.कम को हेय दृष्टि से देखने वालों की जो धारणा बदल दे वह है -'भरत'. काम की सर्वोच्चता का जो दर्शन-दिग़दर्शन करा दे, वह है- 'भरत'.

शत्रुघ्न हैं - मोक्ष :
कामना तो सर्वव्यापी है. कामना की पूर्ति न हो तो अशांति और क्रोध की उत्पत्ति होती है. परन्तु जिसकी कोई कामना ही नहीं; वह है - शत्रुघ्न. लक्ष्मण की कामना हैं -;राम', भरत की कामना हैं -;राम'. परन्तु जिसे राम की भी कामना नहीं है, जो वीतरागी है, जिसका अपना नहीं, कोई पराया नहीं, कोई कोई शत्रु नहीं; वही तो है -'शत्रुघ्न'. जिसने अपनी समस्त मनोवृत्तियों पर विजय प्राप्त कर लिया है, वही तो है -'शत्रुघ्न'. यही मोक्ष की स्थति है, जीवन मुक्त की स्थिति है, कैवल्य और निर्वाण की परिकल्पना इसी भाव से ओत-प्रोत है. यही गीता की शब्दावली में 'स्थितिप्रज्ञं है. बका और फना में इसी प्रकार के वीतरागी जीवन की परिकल्पना है. जीवनमुक्त जगत का कार्य तो करता है, क्योकि कार्य से मुक्ति किसी की नहीं हो सकती. लेकिन अब उसका कर्म निष्काम कर्म है, उसका कार्य कर्मयोग है. यह योग की पूर्णता है. यह कर्म - अकर्म - विकर्म......, इन सभी कोटियों से बहुत ऊपर की अवस्था है.

पुरुषार्थी की वृत्ति, दानवृत्ति:
पुरुषार्थी वृत्ति की परिणति दानवृत्ति में है. लोककल्याणार्थ धर्म और अर्थ (राम और लक्ष्मण) को सुपात्र, 'जगत के मित्र' विश्वामित्र के हाथों सौप देना ही पुरुषार्थ की उपादेयता और उपयोगिता है. पर्त्येक पुरुषार्थी का यह सामाजिक दायित्व बनता है कि राष्ट्र की प्रगतिशीलता, विकास और उत्थान में बाधक आसुरी - प्रतिगामी प्रवृत्तियों (ताड़का, सुबाहु, मारीच) से सृजनशील शोध संस्थानों, यज्ञशालाओं, प्रयोगशालाओं की रक्षा करे. आज भी समर्थवानों से, संवेदनशीलों से यही अपेक्षा है.

'धनुष यज्ञं' का अर्थ और निहितार्थ:
शिव महायोगी है. साधना के क्षेत्र में, प्रत्येक साधक को इस धनुष को तोडना पड़ता है. लेकिन एक योगी ही 'महायोगी शिव' के धनुष को तोड़ सकता है, कोई वंचक या ढोंगी नहीं. शिव के इस धनुष का नाम पिनाक है और निरुक्त में पिनाक का अर्थ बताया गया है -"रम्भ: पिनाकमिति दण्डस्य" अर्थात रम्भ और पिनाक दंड के नाम हैं. योग और अध्यात्म के क्षेत्र में यह पिनाक नाम ;मेरुदंड' का है. प्रतीक रूप में यही धनुष है. इसी धनुष की प्रत्यंचा को मूलाधार से खींच-तान कर सहस्रार तक ले जाकर चढाना पड़ता है. जो योगी होगा, जिसे षटचक्र भेदन का भलीभांति ज्ञान होगा, वही प्रत्यंचा चढ़ाकर धनुष को तोड़ सकता है. इस धनुष के निचले शिरे मूलाधार से आज्ञां चक्र की यात्रा के बाद ही साधक रुपी 'शिव' का मिलन 'शक्ति' से होता है. राम एक योगी हैं, कुण्डलनी विद्या द्वारा तडका - सुबाहु- मारीच रूपी काम-क्रोध-लोभ-मोह आदि कषाय-कल्मषों को विजित कर सहस्रार तक की यात्रा पूरी की थी. सहस्रार में सहस्रदल कमल खिलने की बात योगशास्त्र में बताई गयी है. इसी सहस्रार रूपी 'पुष्प वाटिका' में शिव (राम) का अपनी शक्ति (सीता) से प्रथम साक्षात्कार होता है. यही 'शिव-शक्ति' का मिलन भी है. धनुष यज्ञं के माध्यम से 'राम-सीता विवाह' की कहानी, 'शिव-शक्ति' के मिलन की कहानी है. जो योगी नहीं होगा, वह धनुष को हिला भी नहीं पायेगा. योगबल के अभाव में, कुण्डलिनी विद्या के अभाव में शारीरिकबल, धनबल, संख्याबल का कोई महत्त्व नहीं. इसी को संकेतित करते हुए गोस्वामीजी ने लिखा - "भूप सहसदस एकहिं बारा लगे उठावाहीं टरयी न टारा"

राजा दशरथ. एक अस्थिर-योगी:
योग का पथ कठिन साधना-पथ है. थोड़ी सी असावधानी भी साधक को उसके स्थान से, उसके प्राप्य और प्राप्ति से, भटका सकता है. उसके जीवन में उथल-पुथल मचा सकता है. त्रिगुणरुपी रानियों कौशल्या, सुमित्रा, कैकेयी के प्रति भाव असंतुलन रजा दशरथ को 'शासक दशरथ' के स्थान से च्युतकर 'शासित दशरथ' बना देता है. फलतः अब वृत्तियों द्वारा 'शासित दशरथ' की अभिलाषाएं, आकांक्षाये अधूरी रहतीं है, परिस्थितियाँ विपरीत हो जातीं हैं; शोक - पश्चाताप - दु:ख - अतिशय दु:ख, और अन्त में कष्टदायी मृत्यु. योगपथ में शिथिलता और सहस्रार तक की यात्रा पूरी न कर पाने के कारण 'तत्त्व साक्षात्कार' से भी वंचित.

राम रुपीयोगी (धर्म साधक) के कार्य:
योगी का कार्य है - साधना, स्वयं को, समाज को और राष्ट्र को ....इस साधना के मुख्यतः चार सोपान हैं -बुद्धि, चित्त, मन और अहंकार. धर्म का कार्य आचार-व्यवस्था, विधि-व्यवस्था, मानवता की स्थापना है. जंगल वह स्थान है जहाँ, मानवता का क्षरण हो रहा है. राम वनगमन का यही निहितार्थ है. सत (कौशल्या) को विश्वास है - 'जो पितु मातु कहेउ बन जाना तो कानन षत अवध समाना', जहाँ धर्म है; वहीं- अयोध्या है, वहीँ अवध है और वहीँ सुशासन है.

(i) प्रथम सोपान - बुद्धि जगत:
जहाँ बुद्धि है वहां द्वंद्व है, अनेकता है, तर्क-वितर्क है. जहां द्वंद्व, द्वंद्वों से अतीत हो जाय, तर्क शांत हो जाय, मानसिक सामाजिक कलह न हो, वह है - अयोध्या. अतः अयोध्या नगरी में या अयोध्याकाण्ड में घटित समस्त 'राम लीलाएं' बुद्धि की लीला है.

(ii) द्वितीय सोपान - चित्त जगत:
चित्त स्मृतियों और यादों का भंदारागार है. रामकथा में यही 'चित्रकूट' है. चित्रकूट में घटित समस्त 'राम लीलाएं' चित्त की लीला है, हलचल है. भाव तरंगों का बनना, मिटना, फिर बनना और फिर उठना ....यहाँ इसी की प्रधानता है. चित्त की पांच अवस्थाएं हैं - "क्षिप्तं मूढं विक्षिप्तं एकाग्रं निरुद्धमिती चित्त भूमयः" (योग १.१)

(iii) तृतीय सोपान - मानसिक जगत:
मन अत्यंत चंचल है. यहाँ कामनाएं हिलोरें मारती रहती हैं. उचित-अनुचित भी समझ में नहीं आता. बौद्धिक जगत के समाधान अस्थाई लगाने लगते हैं. कुछ समझ में नहीं आता. जो होता है, वह दीखता नहीं. जो दिखाई देता है, उसमे सच्चाई नहीं.पूरी तरह मृग मरीचिका की स्थिति है यहाँ. असंभव 'कंचनमृग भी' वास्तविक लगने लगता है. बुद्धि मोहित हो जाती है. पंचवटी ही मन है.पंचवटी में घटित समस्त 'राम लीलाएं' मानसिक जगत की लीला है. इसी मानसिक जगत में सचेत और संमित रहना है. मन को यदि नियंत्रित न किया गया तो विश्वामित्र की तरह अर्जित तपस्या गयी, सूर्पनखा की तरह नाक (मर्यादा) गयी, स्वयं राम की भी शक्ति (सीता) गयी.

(iV) चतुर्थ सोपान - अहंकार जगत:
अतिशय सम्पन्नता की प्राप्ति पर अहंकार आता है. इस अहंकार के विविध रूप हैं - शक्ति का अहंकार, धन का अहंकार, विद्या का अहंकार, बल का अहंकार, सत्ता का अहंकार,.....यहीं साधक के अपने अन्दर के रावण की पहचान कर उसे विजित करना है.

रावण कौन? :
जिसका अपनी इन्द्रियों पर अधिकार न हो. जिसकी दासों इन्द्रियां, उन्मुक्त हों; वह है - 'रावण'. अपनी खोई हुई शक्ति और रावण पर विजय प्राप्ति का मात्र एक उपाय है -'ईश्वराधन और पूजा.

रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग-स्थापना, पूजन का अर्थ और निहितार्थ:
धर्मकार्य में पूजन का अर्थ है - 'तत्त्व साक्षात्कार'. सिद्धांतों की खोज करना, अशिक्षितों को, नए साधकों को सिद्धांतो से परिचित करना. उन्हें सबल, अभय और कर्तव्यपरायण बनाना. वेदांत कहता है -"जन्माद्यस्य यतः". अर्थात जिससे इस जगत की उत्पत्ति, जिसमे इसकी स्थिति और जिसमे प्रलय होता है; वह सिद्धांत जान्ने योग्य है? क्या यह प्रश्न मात्र दर्शन और अध्यात्म का ही है? क्या यह विज्ञानं का प्रश्न नहीं है? अब यहाँ इस विन्दु पर यह कार्य अध्यात्म और विज्ञानं दोनों के लिए सामान रूप से महत्वपूर्ण हो जाता है.

ज्योतिर्लिंग-पूजा का विज्ञान:
राम ने गुरु वशिष्ठ और विश्वामित्र के साथ- साथ अन्य ऋषियों से वेद-वेदांग की शिक्षा ग्रहण की थी. वे जानते हैं कि इस ब्रह्माण्ड का मूल स्रोत (नाभिक) क्या है? वेद जहाँ "वेदाहमस्य भुवनस्य नाभिम" (यजु. २६.६०) कहकर इसे खांकित किया है. वहीँ गीता ने "सर्वभूतानाम बीजं" तथा "प्रभवः प्रलयः स्थान निधानं बीजं अव्ययम" कहकर बताया है. वहीँ विज्ञानं ने इसे 'बिग बैंग' थियरी द्वारा विश्लेषित किया है. राम भी यही कार्य एक योग्य शिक्षक कि तरह निरक्षरों को, वानर-भालू को, वन नारों को विज्ञानं-दर्शन पढ़ा रहे हैं.

राम ने वहां उपस्थित सभी सहयोगियों को समझाया - सृजन और प्रलय प्रकृति का शाश्वत नियम है. दृष्टिगत यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड अत्यंत घनीभूत होकर एक विन्दु रूप में विलीन हो जाती है. इसलिए अहंकारी रावण को परास्त करने के लिए इस ज्ञान सिद्धांत की, इस ब्रह्म सत्ता की आराधना-पूजा करना सर्वथा उचित है, श्रेयष्कर है.- "लयं गच्छति भूतानि संहारे भूतानि निखिलं यतः / सृष्टि काले पुनः सृष्टि: तस्माद लिंगामुदाह्रितम //" (लिंग पुराण- ९९.८). विन्दु की आराधना, विन्दु की पूजा, विन्दु में सिन्धु समाहित हो जाने का दर्शन वानरों की समझ में नहीं आया. तब राम ने मुट्ठी भर रेत हाथ में लेकर गोलाकार पिंड बनाया, मंत्रोच्चार सहित स्थापित किया. राम समझाते रहे, यही पिंड, शिवलिंग,है, शालीग्राम है...ब्रह्मा का प्रतीक है. -"मूले ब्रह्मा तथा मध्ये विष्णु त्रिभुवानेश्वार: रुद्रोपरी महादेव: प्राणवाख्य: सदाशिवः //" वानरों की समझ में अब भी कुछ नहीं आया. तब राम ने पिंड को अंडाकार बनाया, उसके नीचे अर्घा (जलहरी) बनाया, और अपनी व्याख्या को और सरल किया. यह अंडाकार पिंड 'ब्रह्माण्ड पुरुष सिद्धांत' है, तथा यह अर्घा (जलहरी) 'ब्रह्माण्ड नारी सिद्धांत' है. युग्म रूप में यही 'शिवशक्ति', सिद्धांत है,यही 'अर्द्ध-नारीश्वर' है, यही सृजनहार है. यह परम तत्त्व है, इसे न केवल अध्यात्म तक सिमित किया जा सकता है न केवल विज्ञानं तक. यह असीम है, कल्याणकारी 'शिवम्' है. इसलिए यह न पुलिंग है, न स्त्रीलिंग और न ही नपुंसक लिंग. यह मात्र 'ब्रह्माण्ड लिंग' है. यही राम को सर्व प्रिय है -"लिंग थापि विधिवत करि पूजा शिव समान प्रिय मोहि न दूजा" . विधिवत पूजा का अर्थ है, उसके सिद्धांत को जानना, उसके अनुप्रयोग को जानना. केवल गोल पिंड ;न्यूट्रान' रूप है, अर्घा सहित पिंड 'अर्ध-नारीश्वर' रूप है, हाइड्रोजन रूप है. इस तत्त्व दर्शन ने वानरों के अंतर के भय को समाप्त कर दिया, ज्ञानचक्षु खुल जाने से अहंकार रूपी लंका पर विजी संभव हो पाया. यही रामकथा का संक्षिप्त विज्ञानं-दर्शन है. लंका विजय के पश्चात राम, अयोध्या नरेश हैं, दशरथ रूप हैं क्योकि "रामराज्य बैठे त्रैलोका हर्षित भये गए सब शोका...........". इसी में योग की, अध्यात्म की, विज्ञान की पूर्णता भी है.