Saturday, March 28, 2015

यज्ञकुण्ड की धूम्र लहरियाँ हैं - ‘रामचरितमानस’

बात माह नवंबर 2014 की 20वीं तारीख की है, हम दो मित्र रेलगाड़ी मे दिल्ली से वाराणसी तक की यात्रा करते हुये समसामयिक प्रसंग के रूप मे समाचार-पत्रों मे छपे हरियाणा की घटना (संत रामपाल प्रकरण) पर आपस मे कुछ चर्चायेँ कर रहे थे, तभी सामने की सीट पर बैठे एक सज्जन को शायद हमारी बातें पसंद नहीं आई। उन्होने कुछ रोषपूर्ण शब्दों मे मुझसे पूछा- क्या मानस पढ़ी है?

मैंने कहा- किसकी?

उन्होने कहा– मज़ाक मत करो। इसे हास-परिहास का विषय मत बनाओ। किसी व्यक्ति के मानस पटल की बात नहीं कर रहा, मैं ग्रंथ की बात कर रहा हूँ। बात कर रहा हूँ तुलसीदासजी की, उनके विश्वप्रसिद्ध कृति रामचरितमानस की।

मैंने कहा- हाँ, हाँमहोदय पढ़ी है, गुनी भी है और क्षमतानुरूप अपने विवेकानुसार कुछ न कुछ समझा भी है; अब जैसा भी समझ पाया उसे .... । 

वे मुस्कुराकर बोले- तो क्या समझा है अभी तक? कुछ विचित्र ही समझा होगा, उसमे दर्शनशास्त्र और मनोविज्ञान भी अवश्य ही घुसा होगा, फिर भी बताओ तो क्या – क्या समझा है?

मैंने कहा- यही कि रामचरितमानस तो तुलसीदास से कहीं अधिक रत्नावली है, हवनकुण्ड है… सार्वभौमिक योनिकुण्ड है ...। औररामचरितमानस’ है इस यज्ञ कुण्ड से उठती हुई धूम्र की लहराती-बलखाती धूम्र-लहरियाँ। सचमुच यह मानस तो यज्ञपुरी’ ही है, एक ऐसी यज्ञपुरी जिसमे काया-नगरी, माया-नगरी, भाव-नगरी, भोग-नगरी, योग-नगरी की अनेक छोटी-बड़ी वेदियाँ हैं, उपकुण्ड और लघुकुण्ड के रूप मे। इन हवनकुण्डों से उठता हुआ सघनतम-विरलतम धुआँधूम्रलहरियाँ, धुआँ की कुछ सरल-सी, कुछ टेढ़ी--सी कुछ लकीरें, कुण्डों को समर्पित आहुतियाँ... विभिन्न प्रकार की समिधाएँ... समवेत स्वर-लहरियों, मंत्र-तंत्र-यंत्रों की अनुगूँज... निरंतर... अनवरत... लगातार दिखती हैं, कभी-कभी क्षणिक विराम और अवकाश के साथ-साथ पुनः-पुनः गतिमान रूप मे। और उसी रूप मे जन मानस को प्रभावित भी करता है यह ग्रंथयही दिखता है मुझे इस रामचरितमानस मेयत्र-तत्र-सर्वत्र। विभिन्न प्रकार की भौतिक-आध्यात्मिक भावोंसंवेदनाओं की सरससरल सी अनुभूति अपनी अभिव्यक्ति के साथ-साथप्रथम अध्याय से लेकर अंतिम अध्याय तक।

प्रथम अध्याय बालकाण्ड’ के प्रारम्भ मे ही दक्ष-यज्ञ है। अहंकार-यज्ञ है यह; वैभव प्रदर्शनविभिन्न प्रकार की आहुतियाँ, एक से बढ़कर एक, सौन्दर्यपरक, भावपरक, दुर्भावपरक, अभिमानपरक, स्वाभिमानपरक और माया की आहुति... सती-काया की आहुति... और अंततः यज्ञ ध्वंश-विध्वंश। भीषण कलह, भयानक कोलाहल ... भयंकर नाश-विनाश ... देखते ही देखते। यज्ञ अधूरा...। लेकिन यज्ञ हो या मिशन, नहीं रहता देर तक अधूरा...। होता ही है यह जैसे-तैसे किसी न किसी रूप मे पूरा। दक्ष मुख्य यजमान था... कैसे हो सकता था उसका नाश, सर्वनाश, सत्यानाश...आचार्यगण साथ मे थे अस्तु उसे जीवित करना पड़ा, आचार्यों ने ही मार्ग ढूंढादक्ष को पुनर्जीवित होना पड़ामान-अभिमान त्यागकर उस निरा-अहंकारी भौतिकता के प्रतीक को विनयी-विनीत होना ही पड़ा। अध्यात्म का शरणागत अंततः होना ही पड़ा उसे। सार्वभौमिक योनिकुण्ड मे जब सनातन ज्योतिर्लिंग की आहुति पड़ीतब दक्ष-यज्ञ पूर्ण हुआ... । मैं... मै... करने वाला मेमना, वह अज (दक्ष) दिव्य मंत्रोच्चार करने लगा ... पशुता ने मानवता को धारण किया,इस मानवता ने प्रगति कीदेवत्व की प्राप्ति की।

दूसरा यज्ञ अवध नरेश दशरथ का पुत्रेष्टि-यज्ञ है, मानवीय अभिलाषा, मानवीय पुरुषार्थ के रूप मे। परिणाम स्वरूप चत्वारि पुरुषार्थों (धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष) की उन्हे प्राप्ति हुयी। राजा की कामना-मनोकामना पूर्ण हुयी। तीसरा यज्ञ महर्षि विश्वामित्र का निष्काम-यज्ञ है। यह समष्टि के कल्याण के लिए है,सर्वसमाज के उत्कर्ष के लिए है। विश्व के उत्कर्ष के लिए विश्व के सच्चे मित्र ही ऐसी याज्ञिक-क्रियाए संचालित करते रहते हैं, लेकिन बाधाएँ उत्पन्न होती हैं इसमे। बाधाओंका नाश धर्म और अर्थ’, ‘अध्यात्म और भौतिकता के संयुक्त शक्ति, सम्मिलित प्रयास द्वारा ही हो सकता है ... और ऐसा ही होता भी है। लेकिन सत्कर्म के लिए धर्म और अर्थ को भी शोधित करना पड़ता है, दोनों को ही आध्यात्मिक-ज्ञान और दार्शनिक-विवेक से प्रशिक्षित होना पड़ता है।

चौथ यज्ञ धनुष-यज्ञ है, यह विदेह-नगरी (ज्ञानियों की नगरी) मे सम्पन्न होता है। ज्ञानी के पास ही भक्ति हो सकती हैकहीं अन्यत्र नहीं। सीता भक्ति है, भक्ति को पाने के लिए अहंकार की अकड़ रूपी धनुष को तोड़ना पड़ता है। कोई भी अहंकारी अहंकार को भला कैसे तोड़ सकता था? इसीलिए अहंकारी राजा इसे तोड़ क्या पाते, हिला-डुला भी नहीं पाये। अकड़-अहंकार तोड़ने के लिए अनिवार्यता है ज्ञान की, गुरु कृपा की। अहंकार गलाने का, तोड़ने का अधिकार धर्म का है। धर्म संत के दिशा-निर्देशों का पालन करता है, संत निर्देशन के अभाव मे यही धर्म शब्दानुगामी बनकर, शब्दजाल मे फँसकर संप्रदाय-पंथ-कुपंथ भी बन जाया करता है, यह ऐतिहासिक सत्य है। संत का निर्देश हुआ - उठहु राम  भंजहु भाव चापा और धनुष की अकड़ता भंग हुयी...। ज्ञान और भक्ति का मिलन हुआ... महा-मिलन ... अद्भुत मिलन ... ।

एक और यज्ञ है सुंदरकाण्ड मे– उपहास-यज्ञ, जो लंका विध्वंश के पूर्व लंका-दहन के रूप मे सामने आता है। इसके लिए कोई हवनकुण्ड नहीं है, बाल ब्रह्मचारी के लिए कैसा हवनकुण्ड? और कैसा योनिकुण्ड? उपहास और विकृत परिहास भी कैसा विनाश लता है, इसका आभास उपहास कर्ताओं को नहीं होता। यदि उन्हे इसका थोड़ा सा भी आभास होता तो क्यों लाते अपने ही विनाश सामग्री के रूप मे समिधाएँ- अपने वस्त्र, तेल, घी ... इस महाविनाश के लिए? क्यों पढ़ते मंत्रों की जगह व्यानवाणी और कर्कश वचनों के छंद? इस सुंदरकाण्ड को ब्रह्मचारी दूत की बात मानकर सुंदर बनाया जा सकता था। दूसरी बात यज्ञाग्नि तो अरणि-घर्षण से उत्पन्न होती है, लगाई नहीं जाती। जिस यज्ञ मे वाहरी अग्नि से कुण्ड प्रज्वालित किया जाता है, वह अपना ही घर, अपनी ही नगरी जलाती है; होतागणों का सत्यानाश कर देती है। यज्ञ वही उत्तम होता है जिसमे जनकल्यणार्थ आहुतियाँ पड़ें। विनाशक यज्ञ प्रायः सफल होते भी नहीं, ये प्रतिकूल प्रभाव दिखलाते हैं लेकिन रामायण परिचर्चा करने वाले कुछ तथाकथित तत्वज्ञानी भी ये सब कहाँ सीख पाते है, आये दिन आरोप उनपर लगते रहते हैं। श्वेत वस्त्रों मे दाग वैसे भी गाढ़ा और दूर से दिखाई देता है। कथावाचकों को अत्यंत सजग-सतर्क रहने की आवश्यकता है।

लंकाकाण्ड मे दो यज्ञ हुये हैं क्रमशः मेघनाद और रावण के द्वारा। ये दोनों ही आचार्य विहीन यज्ञ थे, इनमे मुख्य यजमान स्वयं ही यज्ञाचार्य भी था। भटकाव... ध्वंश... मे पुनर्स्थापित-पुनर्जीवी नहीं हो पाया। फलतः यज्ञ अधूरा-अपूर्ण रहा… यजमानों का ही विनाश हुआ। और अंतिम अध्याय उत्तरकाण्ड मेज्ञान-यज्ञ के अनेक दृश्य हैं, अनेक आचार्य हैं, प्रवचन अनवरत चल रहा है, शंकाओं का शमन हो रहा है ... मानव को मानवता और मानवत्व से देवत्व प्राप्ति का मार्ग समझाया जा रहा है। ज्ञान-यज्ञ मे हवन कुण्ड की अनिवार्यता नहीं होती, ये तपाग्नि से प्रज्ज्वलित होते हैं, इसमे धूम्र नहीं निकलता, ज्ञान-प्रकाश की प्रखर ज्योति-वर्षा होती है। मन की कालिमा और काम की उद्दाम लालिमा भी ज्योतिर्मय हो उठती है।

सचमुचमानव के पास प्रकृति का सर्वश्रेष्ठ उपहार है बुद्धि, बुद्धि ज्ञान चाहती हैप्रमा-पिपासु है लेकिन यह बुद्धि प्रमाण चाहती है। बुद्धि को विश्वास तभी होता है जब वह परख लेती हैसम्यक परीक्षण कर लेती है। परीक्षित पर ही उसे विश्वास है। यही परीक्षण कार्य आज भी हो रहा है, विज्ञान के क्षेत्र मे भी और अध्यात्म क्षेत्र मे भी। हवनकुण्डों का प्रचलन सदा से ही रहा है। हिरण्यगर्भ मे यह हवनकुण्ड ही मानसों रेतः है। मन ही हवनकुण्ड है, कामनाओं की आहुति है और उसी से सृष्टि का विकास हुआ है। हवनकुंडों का प्रचलन सदा से ही रहा है, कभी प्रधानता यज्ञशाला की रही है, कभी प्रयोगशाला की। आज समाज मे हवन कुण्ड (योनि-कुण्ड) की मर्यादा नहीं रही, अब पूजा नहीं, उसका घोर अपमान हो रहा है ...। इतिहास साक्षी हैजब-जब इनहावन कुंडों का दुरुपयोग हुआ है, सदी-गली विकृत भावनाओं की आहुतियाँ पड़ी हैं, मांस के लोथड़ों की समिधाएँ डाली गयी हैं, तब-तब नाश हुआ है, सत्यानाश हुआ है...। आज महती आवश्यकता है पवित्रता की, विवेक की; क्षेत्र चाहे यज्ञशाला की हो, प्रयोगशाला की हो या परिवारिक, समाजिक संस्कारशाला की। मैंने तो बस यही समझा है श्रीमानअब आपने चाहे जो समझा हो। उन्होने कनिष्ठा उंगली उठाई, अभी आते हैं कहकर जो गए वाराणसी स्टेशन पर ही लौटे। तबतक परितोषिक यह मिला कि हम सो भी न पायेउनके सामान की रखवाली करते रहे।
  
डॉ जयप्रकाश तिवारी

Wednesday, March 11, 2015

हमे ‘कन्या-भ्रूण’ बचाना है

शिशु के लिए सुरक्षित सर्वाधिक,
ममता का आँचल, माँ की गोद ।
ले चाकू - कैंची हाथ मे आज तू, 
चाहता विकृत करना माँ की कोख
यह ‘कली’ क्यों बन गयी कील ?
क्यों चाहता इसे तू जाना लील ?
है तेरे ही खून का अंकुरण यह तो,
तेरे हवन-कुण्ड का सुरभित फूल ॥
क्या भूल गया तू, इसी के लिए
खाई हैं ठोकरें, दर दर है भटका ।
क्या बचा है कोई डॉक्टर मंदिर
दरगाह, जहां तूने सर नहीं फटका ॥
बेटा – बेटी मे इतनी भेद ? अरे!
यह तुम कह रहे जो सभ्य कहलाते ।
खुल गयी सारी है अब पोल-पट्टी,
अच्छा होता असभ्य कहलाते ॥
टुकुर - टुकुर क्यों देख रहा मुझे ?
इंसान नहीं, आज शैतान बना तू ।
किसने किया तेरी विकृत सोच ?
चल आज यही बात बतला दे तू ॥
न घूर के देख इस तरह मुझे,
अब मैं कारगार तुझे पहचाऊंगा ।
तूने किया अपराध है बहुत बड़ा,
इसकी सजा तुझे दिलावाऊँगा ॥
जा! जाकर क्षमा मांगो उससे,
तेरी कली कों जिसने आश्रय दिया है ।
केवल भार्या नहीं, माँ है अब,
अब माँ का पावन पद धारण किया है ॥
जमाना नहीं समझता, न समझे,
कल तो समझना ही है उसे ।
मानवता ही नहीं, ‘अस्तित्व’ संकट मे,
आज यह बात समझना है तूझे ॥
समस्या यह समाज मे उठकर,
बिगड़ते लिंग-अनुपात के रूप मे आया है ।
अभी भी समय है, हो सकता है
सम्यक निदान, बस ‘कन्या-भ्रूण’ बचाना है ॥
बस ‘कन्या-भ्रूण’ बचाना है, बस ‘कन्या-भ्रूण’ ... ॥
डॉ॰ जयप्रकाश तिवारी

Sunday, March 1, 2015

मौसम को क्या हुआ आज =================

उमड़ रहे हैं घुमड़ रहे हैं
कहीं छलक रहे है खूब
कहीं छलका रहे हैं खूब 
कहीं घन गरज रहा हैं खूब
कहीं यह तरसा रहा हैं खूब
मौसम को क्या हुआ आज
यह बसंत क्यों हुआ नाराज?
बसंत तो चित्त को भाता था
एक अनुराग हृदय मे लाता था
आज ये हमसे रुष्ट है क्यों ?
भय एक मन मे लाया क्यों ?
आज भयभीत शासन - किसान
फसल न बन जाये एक श्मशान
यदि ऐसा कुछ होता है तो फिर
लूट जाएगा बेचारा बूढ़ा किसान ॥
डॉ जयप्रकाश तिवारी

Tuesday, February 24, 2015

‘गर्भस्थ कली’ मुस्काई (कहानी)


अभी कुछ माह पूर्व ही मैंने देखा था पीयूष और सुजाता को चमकते–दमकते, खुशियाँ बांटते, मिठाइयाँ खिलाते। मुझे स्मरण हो आए वे पुराने दिन जब वे दोनों रहते थे कितने उदास और हताश, निराशा मे उनकी जिंदगी जैसे एक बोझ सी बन गयी थी। बड़े-बड़े शहरों मे नामी-गिरामी चिकित्सकों से इलाज करने के बाद मंदिरों-मजारों की भी खूब खाक छानी थी उन्होंने। अभी विकासशील इस नयी-नवेली कालोनी मे अपना गृह निर्माण कराते समय निर्माण सामाग्री के लेन-देन मे जान-पहचान हुयी थी और व्यापारियों वाली चालाकी न होने कारण पीयूष मुझे व्यापारी कम, विचारक अधिक लगा था। धीर-गंभीर आकर्षक व्यक्तित्व का धनी लगने के कारण यह परिचय शीघ्र ही मित्रता मे परिणत हो गया था। उनकी समस्या सुनकर मैं ही साथ ले गया था उन्हे, अपने पारिवारिक चिकित्सक के पास जो बहुत नामी तो नहीं थे परंतु दवा के साथ-साथ प्राकृत-चिकित्सा पर बहुत बल देते थे और उनसे लाभान्वित हुये थे कई निराश परिवार, जिनके सूने आँगन मे उतर आए थे गगन के चहकते-दमकते चाँद-तारिकाएँ। और, इस दंपति की भी आशा बंधने पर अपने सार्थक परामर्श पर एकबार पुनः तब कितना गर्वित था मैं भी।
परंतु, परंतु क्या हो गया है आज...? इतना तनावपूर्ण ... इतना बोझिल वातावरण ..., मन कांप उठा था किसी अनिष्ट की आशंका से...। लेकिन पूछूँ भी तो कैसे?
प्रश्नवाचक दृष्टि से मैंने पीयूष की ओर देखा, उसने दृष्टि झुका ली। ‘क्यों, सब ठीक तो है?’ इस छोटे से वाक्य मे भी मुझे जैसे कुछ अतिरिक्त बल लगाना पड़ा था। कलतक पुंसत्व प्रामाणिकता और संतति के लिए चिंतित–परेशान और हताश इस पतिदेव के भाव आज कितने बदल चुके थे। मेरी उत्सुक तीक्ष्ण-दृष्टि और संवेदनात्मक शब्दों को वह देर तक झेल नहीं पाया। एक लंबी-सी सांस लेकर धीमे से बोला – “सर जी, जांच रिपोर्ट आई है... ‘बेटी है’,... ‘बेटी’ ..”।
मेरी आँखों मे अचानक वितृष्णा, क्रोध और नफरत के संयुक्त भाव उमड़ आए.... कलतक चूहे-बिल्ली जैसे तक को जन्म नहीं दे पाने वाली पत्नी को कायरों-सा ताना देने और कोसने वाला यह व्यक्ति आज रंग बदलने मे देखो कैसे गिरगिट को भी मात कर रहा था आज। मेरे मस्तिष्क मे कभी, गैरकानूनी कार्य करने वाले डाक्टर के पवित्र श्वेत एप्रिन पर कभी गहरा काला-धब्बा उभरता, तो कभी पीयूष का यह विकृत चेहरा...।
क्रोध और नफरत के शब्दों मे मैंने कहा था – “क्यों मिस्टर! ‘प्रकृति’ को भूल गए? प्रकृति कभी किसी को माफ नहीं करती। प्रकृति का ‘अग्नि-तत्व’ ही उर्वरा मिट्टी मे घुल कर तुम्हारे आँगन की ‘कली’ बना है और वही कली तुझे आज चुभ रही है? मुझे तो बड़ी शर्म आ रही है तुझे मित्र कहते हुये। धिक्कार है तुझे! और रही बात कानून की, वह तो सगे बाप को भी नहीं छोडता। सोच लो, न तू बचेगा न वो डाक्टर ही ...”।
अच्छा यह बताओ! क्या वह तुम्ही थे जो नवरात्रि मे ‘कन्या-भोज’ आयोजित कराते थे, बड़ी श्रद्धा से उनके पाँव पूजते थे? और आज अपनी कन्या जब आना चाहती है तो उससे इतनी वितृष्णा...? और तेरा नाम पीयूष किसने रख दिया? नाम पीयूष और मन-मस्तिष्क मे इतना गरल...? तू विष का प्याला नहीं, पूरा घड़ा है, घड़ा ...? तेरे पास तो बैठना भी पाप है। परंतु न जाने क्यों उठना चाहकर भी उठ नहीं पाया वहाँ से।
...न जाने क्यों मेरी घूरती आँखों से वह सहम गया था... मेरा एक पुलिस-कर्मी होने से डर गया था या मित्रता छूट जाने के डर से? अथवा उसे अपने ही अतीत का गिड़गिड़ाता हुआ वह चेहरा याद आ गया था..., मैं इसे जान न पाया।
थोड़ी देर बाद वह निःशब्द उठा, अपने अन्तःकक्ष मे गया ... । पति-पत्नी की खुसर-फुसर को दीवारें और पर्दे रोक नहीं पा रहे थे ... । मैं दुबारा उठना चाहते हुये भी वहाँ से उठ नहीं पाया और कहीं खो गया था..., अब मुझे ‘भ्रूण-हत्या’ का दारुण दृश्य दिखाई देने लगा था ... । लगा, गर्भस्थ कन्या चित्कार रही है..., वह मुझे ही कोस रही है...., ‘तुम्ही हो!’, ... ‘तुम्ही हो जिम्मेदार मेरे अतित्व और अनस्तित्व दोनों का...’। मैं अंदर तक दहल गया, लगा मैं एकदम निरुत्तर हूँ ...।
तभी लगा सामने कोई खड़ा है। देखा पतिदेव जी थे, दोनों हाथ जोड़कर कुछ हकला रहे थे... सर जी! क्षमा कर दीजिये! बहुत शर्मिंदा हूँ..., मैं ही भटक गया था...। सर जी! नफरत या द्वेष मुझे बेटी से नहीं है, ‘लड़के वालों को नाक रगड़ने पड़ेंगे’, इससे है। यही सोचकर डर गया था और बहक भी गया था। आपने मेरी आँखें खोल दी। जीवन मे पहले आप मित्र बनकर आए थे ..., आज शिक्षक बनकर आए हैं... ।
उसने पीछे मुड़कर देखा, फिर पत्नी को आवाज लगाई ... प्रत्युत्तर न पाकर वह स्वाइन ही अंदर चला गया ... और सपत्नी हाथ मे हलवा का प्लेट लेकर बड़े आग्रह से अनुरोध किया, सर जी ! आपने ही राह दिखाई है, कसाई से इंसान बनाया है॥ । यदि अनुमति दें तो हलवा अपने हाथ से खिलाऊंगा, बिटिया रानी को गले लगाऊँगा... । तबतक इतनी ही देर मे उसकी पत्नी कब अंदर गयी, कब आ भी गयी? मैं जान न पाया । उसके हाथ मे चाय-नमकीन की प्लेट से सजी तश्तरी थी। पत्नी की सीरत ने इस निर्जीव वस्तु की सूरत बढ़ा दी थी। ... न जाने कितने आभार के साथ बोली- भाई साहब! आज फिर आप मेरे घर देवता बनकर आए हैं। कैसे इन्हें आप मना पाएँ हैं? जिसे अर्द्धांगिनी बनकर मैं समझा नहीं पायी, मित्र बनकर आप ही समझाये हैं। बोलो भैया! कौन सी विधि अपनाएं हैं...?
नहीं सुजाता ! मुझे देवता न कहो, इंसान ही बन कर रह सकूँ, यही बहुत है। इस समाज को देवता से अधिक इंसान की आवश्यकता है आज।
“नहीं भाई साहब, भगवान की जो परिभाषा आपने बताई थी, वह अक्षरशः मुझे याद है। हमे याद है जब हम लोग मंदिरों मे माथा टेकते घूम रहे थे तो आपने ही समझाते हुये कहा था कि आस्था कि बात है तो ठीक है, आस्था मे भी बल होता है लेकिन यह प्रकृतिक कार्य है। प्रकृति के साथ सामंजस्य बैठाना पड़ता है। और, जिसे हम भगवान कहते हैं, देवता कहते हैं, वह भी तो प्रकृति ही है; वह प्रकृति इस भगवान शब्द मे ही अन्तर्भूत है। देखो - ‘भ’ से भूमि, ‘ग’ से गगन, ‘वा’ से वायु, ‘न’ से नीर और इन व्यंजनों मे समाहित स्वर ‘अ’ से अग्नि तत्व। और यही तो प्रकृति है, बोलो भगवान का अर्थ प्रकृति हुआ या नहीं? प्रकृति हमे बहुत कुछ देती है, इसलिए यह देवता है...। तभी से मैंने रट लिया है। आप नेक इंसान हैं, प्रकृतिक-देवता हैं। हमसे अपना ही पारिभाषिक अर्थ तो न छिनें। शास्त्र भी कल्याणकारी मित्र को देवता कहकर उसकी पूजा की अनुमति देता है। दत्तात्रेय जी ने अपनी माँ से मित्र के बारे मे यही कहा था। अब मैं जान गयी हूँ, यह प्रकृति ही देवालय है और मित्र ही देवता। मैं जननी होकर भी और चाहते हुये भी इस अजन्मे को गर्भ सुरक्षा नहीं दे प रही थी, बस शक्ति-भर जूझ रही थी। इस अजन्मे की सुरक्षा तो आपकी कल्याणकारी मित्रता ने दिलाई है। जो देता है वही तो देवता है।“ मैं सुजाता को देखते ही रह गया... वह तो आज दार्शनिक बन गयी थी... सचमुच हर्ष और विषाद ही तो मन मे दार्शनिक भाव जगाता है...। अब भला अपने ही परिभाषा को मैं कैसे नकारूँ, समझ मे नहीं आया। मैं उस समय कहता भी क्या..., हँसकर टाल गया। लेकिन सच कहता हूँ कि जितना स्वादिष्ट मुझे ‘आटे’ का वह हलवा लगा, उतना स्वादिष्ट न कभी रवे का हलवा लगा, न बेसन का, न मूंग का न गाजर का और न ही मेवे का...।
लौटते समय मुझे याद आ रही थी मानस की लाइने – ‘विनय न मानत जलधि जड़...’। लेकिन यह ‘जड़ता’ कहाँ थी? लेकिन थी, क्योकि सृष्टि की सर्वाधिक चेतन कृति का जड़ हो जाना ही तो ‘जड़ता’ है। यदि इसे जड़ता नहीं कहेंगे तो कहेंगे किसे? और ‘भय बिनु होय न प्रीति’, किंचित यह भय था भी, तो था सामाजिक भय, झुकने और दीनता का भय भी...। ओह! कितना भयभीत था वह, दहेज रूपी दानव से... ? क्या इस दानव को समाज से मिटाया नहीं जा सकता? आखिर हमने ही तो कभी प्रारंभ किया होगा उसे उपहार का नाम देकर... क्या इसमे संशोधन का समय अभी भी नहीं आया? आखिर हम कब जगेंगे? एक और प्रश्न गूँज रहा था मन मे, माताएँ इन कलियों को सर्वाधिक सुरक्षित स्थान अपनी कोख मे भी चाहते हुये भी आज सुरक्षा नहीं दे पा रहीं है, वे इतनी मजबूर क्यों हैं? अशिक्षा के कारण, दहेज के कारण या स्वावलंबनविहीनता के कारण ....? क्या सुजाता तब भी इस अन्याय के विरुद्ध सरलता से हथियार डाल देती, यदि स्वावलंबी होती? नहीं न! तो क्यों न एक ?नई परंपरा विकसित की जाय, अब बेटियों को ही स्वावलंबी बनाया जाय। उसे इतनी योग्य बना दिया जाय कि वर-पक्ष स्वयं लड़की का हाथ मांगने लड़की वालों के घर आयें। एक बाप फूल को शूल क्यों समझे ? बेटी के जन्म पर वह क्यों घबराये?... लगा उस नन्ही सी कली ने पुनः आवाज लगाई ... कुछ दिखा तो नहीं, लेकिन एक अंजाना गोल-मटोल सा चेहरा, एक मुसकुराती-सी कली अवश्य नजर आई।

डॉ जयप्रकाश तिवारी

Monday, February 23, 2015

ध्वज संस्कृति का लहराएँगे

जन्म से लेकर मृत्यु तक
जो काल खंड है जीवन है
जन - जीवन होता कैसा
चिंतन होता उसका जैसा
चिंतन देन है संस्कार की 
शिक्षा निखार ले आती है
चिंतन मे यदि आई विकृति
इस सिर को वही झुकाती है
संस्कार देंन है संस्कृति की
औचित्य का प्रश्न उठती है
भटके मन को दीप दिखाकर
सन्मार्ग पथिक बनाती है
मानव है वरदान प्रकृति का
यह संस्कृति उसे निखारती है
इस देश को ऐसे रचा प्रकृति ने
नित जल से पाँव पखारती है
बनाया देश को जगत गुरु
कोई और नहीं वह संस्कृति थी
जो रखती सामंजस्य प्रकृति से
इस देश की ऐसी संस्कृति थी
हो रहा क्षरण इस संस्कृति का
इस संस्कृति को हमे बचाना है
सौहार्दर प्रेम और नैतिकता का
उज्ज्वल मशाल जालना है
पाश्चात्य सभ्यता को अपनाकर
सोचो! क्या खोया, क्या पाया है ?
बन गया शत्रु, भाई का भाई
बहनों ने यहाँ लाज गवाया है
कब देंगे आहुती विकृतियों की?
उन्नत सन्सकार कब अपनाएँगे?
जिसे देख कर, परिवार समाज
सन्मार्ग पाठ कदम बढ़ाएँगे ।
दृष्टि मे सूक्ष्मता वाणी मे संयम
औ मृदुलता व्यवहार मे लाएँगे
कह उठे शेष जग वाह ! वाह !!
ध्वज संस्कृति का लहराएँगे ।
मिलजुल कर यदि करें प्रयास
पुनः हम जगत गुरु बन जाएंगे
पवित्रता दृष्टि मे,वाणी मे संयम
औ मृदुलता व्यवहार मे लाएँगे ॥

डॉ जयप्रकाश तिवारी

Monday, February 16, 2015

ओ काल ! ओ समय !

कल महाशिवरात्रि है, महाकाल के हर्ष का दिन सोचा क्यों न उनसे hi कुछ बात की जाय? बस वार्ता प्रारम्भ हो गयी। कैसी लगी वार्ता अवगत कराइएगा -
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ओ काल ! ओ समय !
अरे ओ निष्ठुर समय !!
ओ परिवर्तनशील समय !!!
तुम सबकुछ बदल देते हो
कभी कुछ छोड़ते नहीं
किसी को भी तो नहीं छोड़ते
'कालोस्मि' के हुंकारी को भी तो
कितना निरा असहाय बना दिया
जिसने ली थी कभी अग्निपरीक्षा
उसे भी जल समाधि दिखा दिया
महायोगी को तो अपने ही कंधे पर
माया को कंधे पर लादे हुए
जंगल-जंगल तक दौड़ा दिया
और इस तत्वज्ञानी को भी
कितना तूने बावला बना दिया,
यह है तुम्हारा प्रभाव, प्रबल प्रताप।
माना परिवर्तन ही है
तुम्हारा नियम फिर भी
करते हैं विनम्र एक निवेदन
यदि सम्भव हो तो मान लो
अपने नियम को थोड़ा खंगाल लो
कुछ चीजें छोड़ दो न अपरिवर्तित
वैसा ही, जैसा था बचपन में
वह भोला - भाला सा प्यार, मनुहार
सभी का स्नेह, अनुराग, आशीर्वाद
इन भावनाओं को बचा लो न !
रहेंगे जन्म-जन्मान्तर तक आभारी
तू कुछ बन जा सरस, सरल, मधुर
तुझ सर्व समर्थको क्या लाचारी?
ओ समय !
ओ निष्ठुर समय !!
ओ परिवर्तनशील समय !!!
डॉ जयप्रकाश तिवारी

Sunday, February 15, 2015

शब्दों मे कवि जान फूंकता

कवि को
कहा जाता है क्यों
ऋषि मनीषी सर्जक
या युग द्रष्टा ?
क्या इसलिए की वह 
संचायक है शब्दों का ?
क्या है वह, कोई चारण?
वेतन भोगी? राजदरबारी?
अरे! सर्जक है, युगद्रष्टा है
तलाशता है वह, शब्दों को
तराशता है वह, शब्दों को
निखरता है वह, शब्दों को
चिंतन मनन अनुभव की
प्रज्वलित भट्ठी मे तपाकर
बनाता है एक भाव भूमि
तेजोमयी - ज्योतिरमयी,
दिव्यर्थों की प्राण फूँक कर।
कोमा मे स्पंदन यदि सरल नहीं
तो धूमिल मटमैले शब्दों मे
प्राण संचार सरल है कैसे?
कवि का तो सत्कर्म यही
कवि का तो सीधा धर्म यही
'सृजन', घिसे-पिटे शब्दों से
अटपटे - चटपटे शब्दों से
नए संदर्भ, नए परिप्रेक्ष्य से
नए बिम्ब और नए प्रतीक से
कवि सौंदर्य, साहित्यिक विमर्श
सत्ता द्रोह या सामाजिक उत्कर्ष।
कवि शब्दों को नंगा नहीं करता
वह शब्दों को गंदा नहीं करता
वह शब्दों का अलंकरण करता
अर्थ मे क्या चमत्कारण करता
च्युत शब्दों की शक्ति परखता
घिसे शब्दों पे मुखौटा रखता
शब्दों मे कवि जान फूंकता
कविता मे कवि प्राण फूंकता ॥
डॉ जयप्रकाश तिवारी