Thursday, January 1, 2015

नव वर्ष में संकल्प


क्षण क्षण में जो रमा हुआ है
अंक्षर अक्षर जो जुड़ा हुआ है
कण कण में जो खुदा हुआ है ...
सुनो प्यारे ! वही तो 'खुदा' है
जो रमा हुआ है रोम - रोम में
वही तो हमारा आराध्य राम है,
क्यों करते हो सीमित उसको
तुम मंदिर और मस्जिद तक।
उसी की तो यह समस्त सृष्टि है
संकुचित वह नहीं, हमारी दृष्टि है
अंतर क्या इससे पड़ता कोई
संज्ञा यदि उसकी बदलता कोई
यह तो अपनी - अपनी पसंद है
जड़ चेतन सब उसकी पसंद है
यदि नहीं पसंद होता यह उसको
रचता क्यों वह सृष्टि में उसको ?
भेद नहीं है उसकी दृष्टि में
भेद है सारा, अपनी ही दृष्टि में।
इस भेद को ही हमें मिटाना है
जगत को सौन्दर्यमयी बनाना है
'शिवत्व' जगत में लाना है
शुभत्व का भाव जगाना है।
अरे इसी निमित्त आये हैं हम सब
नव वर्ष में संकल्प यही उठाना है
हमें अपना दायित्व निभाना है
बनाया गया है मानव हमको
हमें मानव धर्म निभाना है। .


डॉ जयप्रकाश तिवारी

Friday, November 28, 2014

सम्बन्ध कवि-कविता का

 
कविता  कवि  की  आत्मजा  है
उसे  रचता  पोषित  करता है 
कविता  कवि  की  जननी  है
कवि का व्यक्तित्व निखरती है 
दोनों  पूरक  हैं  एक  दूजे  का
एक  दूजे  को खूब  सवारते  हैं 
एक  दूजे  से  हैं अस्तित्वमान
एक दूजे से ही है उनकी पहचान 
विचित्र सम्बन्ध कविता कवि में
अद्भुत सा दोनों का यह रिश्ता है
दीखता नहीं लौकिक जगत में
ऐसा अलौकिक सा यह रिश्ता है 

डॉ जयप्रकाश तिवारी 

Friday, November 21, 2014

'चिंतन' अमर होता है

जो व्यक्त है
जो उत्पन्न है
वह कार्य है,...
जो है कार्य
वह सापेक्षा है,
जो सापेक्ष है
वह वस्तुतः
न ही सत है,
न असत ही,
वह है केवल
प्रतीति मात्र ।


अतएव कार्यभूत
यह दृश्यमान
सापेक्ष जगत
न सत है, न असत
न अस्ति है,
न नास्ति
न शासवत है,
न ही उच्छेद
तो क्यों करते हैं
हम इसमे भेद?

सत तो है -
'अव्यक्त',
हाँ अव्यक्त जो
है अनिर्वचनीय
और अव्याख्येय
हमारे लिए तो
सर्वथा अज्ञेय ।
तो क्या वाणी को
विराम दिया जाय?
क्या चिंतन को
विश्राम दिया जय?
क्या लेखनी को
आराम दिया जाय?
नहीं, विलकुल नहीं
चिंतक रुक नहीं सकता
किसी दबाव मे वह
झुक नहीं सकता,
वाणी भी आखिर
मौन कब तक रहेगी?
लेखनी बेमौत नहीं मारेगी

चिंतक रो सकता है
पर सो नहीं सकता,
चिंतक ऊसर मे भी
फसल लहलहाता है
उर्वर बीज बोता है
समाज का सारा बोझ
अपने सर ढोता है ।
क्षणभंगुर दुनिया मे
यहाँ अमरत्व कहाँ?
चिंतक अमर नहीं होता
'चिंतन' अमर होता है
चिंतक का नाम ढोता है ॥

डॉ जयप्रकाश तिवारी

Saturday, November 15, 2014

एक आहुति हूँ

एक आहुति हूँ
एक समिधा हूँ मैं
जीवन के यज्ञ कुण्ड में
तिल तिल कर जलाता हूँ
जितना ही हूँ जलता हूँ 
उठती उतनी ही तीव्र सुगंध
देख इसे हर्षित होता हूँ
जब होती दूर भीषण दुर्गन्ध
मेरी इस समिधा में मिश्रित
सत्कर्मों की मर्यादा है
कर्तव्यपरायणता की इसमें
सुगन्धि भरी कुछ ज्यादा है
समर्पण मुझमे कूट कूटकर
भरा है मेरी संस्कृति ने
विकसित हुआ इसी में जीवन
फूला फैला इसी संस्कृति में
पूर्वजों के प्रति अत्यंत विनीत
उन्हीं का तो नवनीत हूँ मैं
बीते वन्दगी में सारा यह जीवन
उनकी छंदों का गीत हूँ मैं
बना इसीलिए आहुति समिधा
इसमें रची बसी है सभी विधा
मुझे इसी में आता है मजा
यही तो मेरी मधुमय हल है
मैंने आहुति बनकर देख लिया
जीवन यह यज्ञ की ज्वाला है.
डॉ जयप्रकाश तिवारी

Thursday, November 13, 2014

दृष्टि भेद

दुनिया में सबको
द्वेष तो दीखता है
नेह स्नेह अनुराग
कहाँ देखता है ?
रार दिखती है ...
तकरार दिखती है
फटकार दिखती है
स्वीकार दिखती है
लेकिन जो लड़ाई
मैं लड़ रहा हूँ
आप के लिए
अपने आप से
दूसरों को वह
दिखे या न दिखे
आप को भी
यह कहाँ दीखता है
कब देखा है आपने
रिस्ता हुआ शरीर
बहता हुआ लहू
फूटा हुआ माथा?
औरों की तरह
आपने भी तो
बना दिया है
मुझे एक तमाशा


- डॉ जयप्रकाश तिवारी

Monday, November 10, 2014

गीत मेरे ! ओ गीत मेरे !!

गीत मेरे बोल !
आज  गमगीन क्यों है?
क्यों हुआ इतना उदास ?
आज तू फिर मौन क्यों है?
गीत मेरे बोल !
ये लूटी आबरू किसने ?
क्या कहा - 'उसने'
जिनपर था दयित्व सुरक्षा का
तेरी अस्मिता की रक्षा का
गीत मेरे!
मुखर हो अब चुप न बैठ !
गीत मेरे!
तू केवल कविता नहीं है
मन्त्र है, यन्त्र है, तंत्र है तू
यह दुनिया यदि बहुरंगी है
तो… तू  भी तो बजरंगी है
मूर्च्छित चेतना जगायेगा कौन?
तेरे सिवा दायित्व निभाएगा कौन?
गीत मेरे !
तेरे अंदर तो तेज है वह
तू जाएगा पूरा समाज निगल
तू प्रखर हो अब चुप न बैठ !
अंगारे बरसा, तू आग उगल!
फूटेगा नवांकुर उसी भस्म से
तू उसको संस्कारित करना
तू उसको अलंकारिक करना
बनाना सभ्य-सुशील-तेजस्वी
उर्वरा और अत्यंत ऊर्जस्वी
गीत मेरे ! ओ गीत मेरे !!

डॉ जयप्रकाश तिवारी

Thursday, October 30, 2014

सुन, ओ मेरी जिंदगी

अभी विवश हूँ मैं
इस विवशता में भी 
इस मन की आशा 
दिल के उदगार 
कंठ से फूटकर 
गीत बन दासोंदिक 
जो गूँज रहा है 
तेरे बिना अधूरा है 
तू आ जा., 
अब तो साथ निभा जा 
मिशन अभी अधूरा है 
तू थाप देकर, साज देकर  
गीत को संगीत बना जा 
विश्वास है मुझे
जो नहीं के पाया अकेले 
अपनी संयुक्त वाणी करेगी 
कोलाहल यह छटेगा 
हर्ष की बदली छायेगी 
जब गीत का स्वर 
हाथों में मशाल बन जायेगी 
देश मेरा खुशहाल होगा 
न बेकारी होगी, न खून बहेगा 
तब.…   उधार की नहीं 
वास्तविक जिंदगी जिएंगे 
शिकायतें दूर होगी 
मैं खुल के गाऊंगा 
तू खुल के नाचेगी 
वह दिन आयेग… 
वह दिन जरूर आएगा 
ओ मेरी जिंदगी !
ओ मेरी जिंदगी !!
डॉ जयप्रकाश तिवारी