Thursday, November 13, 2014

दृष्टि भेद

दुनिया में सबको
द्वेष तो दीखता है
नेह स्नेह अनुराग
कहाँ देखता है ?
रार दिखती है ...
तकरार दिखती है
फटकार दिखती है
स्वीकार दिखती है
लेकिन जो लड़ाई
मैं लड़ रहा हूँ
आप के लिए
अपने आप से
दूसरों को वह
दिखे या न दिखे
आप को भी
यह कहाँ दीखता है
कब देखा है आपने
रिस्ता हुआ शरीर
बहता हुआ लहू
फूटा हुआ माथा?
औरों की तरह
आपने भी तो
बना दिया है
मुझे एक तमाशा


- डॉ जयप्रकाश तिवारी

Monday, November 10, 2014

गीत मेरे ! ओ गीत मेरे !!

गीत मेरे बोल !
आज  गमगीन क्यों है?
क्यों हुआ इतना उदास ?
आज तू फिर मौन क्यों है?
गीत मेरे बोल !
ये लूटी आबरू किसने ?
क्या कहा - 'उसने'
जिनपर था दयित्व सुरक्षा का
तेरी अस्मिता की रक्षा का
गीत मेरे!
मुखर हो अब चुप न बैठ !
गीत मेरे!
तू केवल कविता नहीं है
मन्त्र है, यन्त्र है, तंत्र है तू
यह दुनिया यदि बहुरंगी है
तो… तू  भी तो बजरंगी है
मूर्च्छित चेतना जगायेगा कौन?
तेरे सिवा दायित्व निभाएगा कौन?
गीत मेरे !
तेरे अंदर तो तेज है वह
तू जाएगा पूरा समाज निगल
तू प्रखर हो अब चुप न बैठ !
अंगारे बरसा, तू आग उगल!
फूटेगा नवांकुर उसी भस्म से
तू उसको संस्कारित करना
तू उसको अलंकारिक करना
बनाना सभ्य-सुशील-तेजस्वी
उर्वरा और अत्यंत ऊर्जस्वी
गीत मेरे ! ओ गीत मेरे !!

डॉ जयप्रकाश तिवारी

Thursday, October 30, 2014

सुन, ओ मेरी जिंदगी

अभी विवश हूँ मैं
इस विवशता में भी 
इस मन की आशा 
दिल के उदगार 
कंठ से फूटकर 
गीत बन दासोंदिक 
जो गूँज रहा है 
तेरे बिना अधूरा है 
तू आ जा., 
अब तो साथ निभा जा 
मिशन अभी अधूरा है 
तू थाप देकर, साज देकर  
गीत को संगीत बना जा 
विश्वास है मुझे
जो नहीं के पाया अकेले 
अपनी संयुक्त वाणी करेगी 
कोलाहल यह छटेगा 
हर्ष की बदली छायेगी 
जब गीत का स्वर 
हाथों में मशाल बन जायेगी 
देश मेरा खुशहाल होगा 
न बेकारी होगी, न खून बहेगा 
तब.…   उधार की नहीं 
वास्तविक जिंदगी जिएंगे 
शिकायतें दूर होगी 
मैं खुल के गाऊंगा 
तू खुल के नाचेगी 
वह दिन आयेग… 
वह दिन जरूर आएगा 
ओ मेरी जिंदगी !
ओ मेरी जिंदगी !!
डॉ जयप्रकाश तिवारी 

Sunday, October 26, 2014

कल, आज और कल

कल तक - 
सर्वसुलभ था मैं 
अम्बर हवा पानी सा 
ह्रदय अम्बर था 
मन  पवन  था 
जीवन जल था   
कितना सरल था 
संवेदनाएं सघन थीं 
अनुभूतियों में हर्ष था 
अभिव्यक्ति मृदंग था

आज -
जटिल हूँ महंगा भी
ए। सी. की हवा सा
बोतल के पानी सा
भावनाएं मर रहीं हैं 
इंटरनेट एस एम एस  
मोबाइलसंग बह रही है
रिश्तों में गहराई कहाँ 
 मन ऊषणतर हो रहा 
कटुता नित बढ रही है
जीवन हुआ बेमानी सा.

और कल - 
लगता है अब 
दुर्लभ सा हो जाऊँगा  
हवा को विषाक्त और 
जल को गरल बनाऊंगा 
संवेदनाओं को मिटाकर  
पहचान मिटाने पर तुला हूँ
इसे अपने हाथों मिटाऊंगा 
मानव से रोबोट बन जाऊँगा 
और गर्व से छाती ठोककर 
प्रगतशील इंसान कहलाऊंग 
इंसान की परंपरागत परिभाषा 
पूरी तरह बदल जाऊँगा। 

जब 
पीछे मुड़ता हूँ सोचता हूँ
यदि प्रगति है यही तो 
ह्रास क्या है? विनाश क्या है?
यह चिंतन नहीं, चिंता है 
क्या कोई इसमें हाथ बताएगा या 
वह भी मेरी तरह जिन्दा  जाएगा ?

डॉ  जय  प्रकाश तिवारी  

Wednesday, September 24, 2014

कविता को तुम शोर न कहो

कविता को तुम शोर न कहो

कविता यह कोई शोर नहीं है
हाँ इसकी ध्वनि दूर टक पहुचती है
जब जीवन की लय, जूनून की धुन पर
तर्कों के संबल में अंगड़ाई लेती है
तब बच्छों बुड्ढों में भी तरुनाई जगती है
उनके मानस में तीव्र हलचल मचाती है.
फी भी यह न शोर है न उन्मादिनी है
काव्य स्वर है अन्तः का ज्वर है
काव्य स्वर उन्मादिनी नहीं मन्दाकिनी है
यदि इसे शोर या शेर कहा भी जाय
तो यह उठकर अब थमने वाला नहीं
उर्मियों की तरह दम तोडनेवाला नहीं.
कविता हैलोजन की चकाचौंध नहीं
जो जली तो जली बुझी तो बुझी
और शेष रह गया वही घुप्प अँधेरा
काव्य शब्द-ज्योति है जो भाव प्रकाश फैलाती
एक लौ से सहस्र लौ जलती है और
देखते देखते भावों का मशाल बन जाती है
मशालची का यही हलचल
जब शब्दों में ढल जाता है तब
एक नूतन काव्य का सृजन हो जाता है
हाँ यह  है कविता कुछ करती नहीं 
परन्तु सब कुछ कराती तो वही है .

डॉ जयप्रकाश तिवारी

Wednesday, September 17, 2014

वर्ण से अभिव्यक्ति तक =================


वर्ण हैं लिपि का रेखा चित्र जो 
समाजशास्त्रीय चाक पर चढ़कर
अनुभवों अनुभूतियों की आंच में पककर
धारण करता है-  'शब्द का रूप'. 
शब्दों से काव्य शिल्पी अपने अंतर के 
चिंतन, स्फुरण, गुंजन और नर्तन को 
करता है मूर्तमान भाव सम्प्रेषण द्वारा। 
ये विपुलशब्द सम्प्रेक्ष्ण ही 
कहलाते हैं - 'काव्य और साहित्य'. 
शब्द यदि ज्यामितीय की भांति 
स्पष्ट और निर्भ्रांत है तो 
मूर्ति की भांति रहस्य्मयी और गूढ़तर भी. 
साहित्य की सम्यक समझ के लिए 
करना पड़ता है -'शब्दार्थों का  संधान '. 
व्याख्याओं का विशिष्ट विधान. 
क्योंकि यही शब्द अन्य अर्थों से अलग 
नए परिप्रेक्ष्य में , नवीन अर्थ स्फुरण में भी
होते हैं दक्ष, सर्वदा समर्थ। 
ये कुलांचे भी मारते हैं -
कला से विज्ञान और प्रकृति तक 
विज्ञानं से नीरा लोक संस्कृति तक।  
  
डॉ  जयप्रकाश तिवारी 

Saturday, September 13, 2014

आओ अतिथि

कौन तुम? क्यों खड़े हुए हो

इस तरह से मौन हो कर ?

कौन तुम? क्यों अड़े हुए हो 

इस तरह से त्रिभंग हो कर ?

आ भी जाओ खुला है द्वार 

यहाँ भेद नहीं कुछ मेरे द्वार 

मान है, सम्मान है, अपमान है

धिक्कार है, फटकार है, सम्मान है

ये समाज से मिले हुए उपहार हैं

पर ये है सभी मेरे लिए ही

तेरे लिए केवल यहाँ सत्कार है.

अथिथि हो शुभ सत्कार तेरा

कुछ भी कहो आभार तेरा

यूँ अभी टक क्यों खड़े हो ?

जिद पे अपनी क्यों अड़े हो?

कौन हो तुम - छाया ? प्रतिछाया ?

आत्मा - परमात्मा - प्रेतात्मा ?

सत्य हो तुम ? या हो आभास?

या अंतर्मन की कोई आस ?

हो कोई चाहे भी तुम


गर आये हो तो आ जाओ

मेरी उलझन में हाथ बताओ

हो सके तो राह दिखाओ

मैं तो हूँ उलझन में कब से

सोच में डूबा हूँ तब से

जब से देखा है यहाँ - चीत्कार

व्यभिचार, भ्रष्टाचारों का व्यापार

कमजोर नहीं, न साहस कम है

नहीं कोई मरने का डर है

पर निरर्थक यूँ नहीं चाहता हूँ मरना

सोच रहा हूँ यही निरंतर

क्या मुझे अब प्रारंभ करना?

अब आये हो तो आ जाओ

कुछ उलझन तो सुलझा जाओ

पर तुम क्या मेरी मदद करोगे

तुम तो स्वयं उलझे लगते हो।


डॉ जयप्रकाश तिवारी