Thursday, May 29, 2014

मैं हूँ कौन ?

मैं कौन हूँ? घर है कहाँ?
मैं हूँ कहाँ? अब हूँ कहाँ?
मैं बहकती, मैं चहकती
पर हूँ कहाँ? घर है कहाँ?
ढूँढ चुकी ऊपर से नीचे
और ढूँढा डाली - डाली
हुई बावली ऐसी मैं तो
फिरूँ नाचती मतवाली ।

पत्ता पत्ता ढूंढ चुकी पर
मिला नहीं अपना ही पता
फल के अंदर ढूंढ चुकी
कच्चा हो या हो वह पका,
ये लोग मुझे ही ढूंढ रहे
गुस्से मे टहनी तोड़ रहे
हुये ऐसे वे मतवाले हैं
बिन बुद्धि तन को ढो रहे ।

कुछ दंभ प्रदर्शित करते हैं
कुछ दाम प्रदर्शित करते हैं
कुछ हैं इनमे शर्मीले इतने
मन ही मन मे वे तरसते है,
जब कुचला मन को साधिकार
तब निकली मुह से चित्कार
तब जाना सु-मन मे रहती हूँ
और नाम मेरा सुगंध है ॥

-    डॉ॰ जयप्रकाश तिवारी

Saturday, May 24, 2014

समय और वृक्ष

तूफान से उखड़कर जमीं पर पड़े
अपनी अंतिम सांस-प्रश्वांस ले रहे
उस विशालकाय वृक्ष को देखकर
समय ने मुस्करा कर बात छेड़ी –
कहो दरख्त ! अकड़ कैसी रही?
मैंने कहा था न, समय को पहचानो
समय है अवसर, अवसर को जानो,
नमनीयता है दीर्घायु पाने का सूत्र,
परन्तु तूने मेरी बात नहीं मानी,
जो झुक गए, आज भी वहीं खड़े
और तुम कैसे असहाय से पड़े?

इस असह्य दर्दनाक क्षणों मे भी
वृक्ष ने अपनी मर्यादा को नहीं छोड़ा
इस व्यंग्य-वाणी के प्रत्युत्तर मे उसने
संयमित आशावादी स्वर का रस घोला,
गिरा हुआ ठूंठ भी प्रकृति के साहचर्य मे
जब हरा - भरा होकर उठ सकता है तो
मैं तो फल-फूलों से भरपूर लदा हूँ
एक दिन मेरी संतति उग आएगी
तुम एक पेड़ की बात करते हो
वह बाग– उपवन– जंगल बसाएगी।

समय ! तूने मेरा भूत देखा है
आज वर्तमान देख रहे हो तो
कल भविष्यत भी अवश्य देखना,
मुझपर न हँसो, हँसना है तो हँसो
उनपर, जो तूफानों के तलवे चाटते हैं,
उनपर, जिन्हे अकड़ना तो आता है
परंतु उगना और उठना नहीं आता ।

सुनो समय !
जिसे तुम जीवित कहते हो, वे मृत हैं
क्या कोई जीवित रहा है, स्व खोकर?
स्वाभिमानी थू करता है ऐसे जीवन पर,
मृत्यु है ... उससे सहस्र गुना बेहतर ... ।

अवचेतन हूँ तो क्या हुआ
इतना नासमझ भी तो नहीं,
नियम से यदि बंधे हो तुम भी
तो नियति से बंधे हैं हम भी,
जानता हूँ, आता है जीवन मे
कभी-कभी ऐसा कोई क्षण जहाँ
मृत्यु, जीवन से बाजी मार ले जाती है
जहाँ जीवन, मृत्यु की दासी बन जाती है।  

कभी कहा था तुम्ही ने –
जीवित रहते हैं केवल दो ही
स्वाभिमानी और निराभिमानी,
वे ही भोगते राज-सुख या स्वर्ग-सुख
क्योकि स्व को तो, दो ही जानते  
स्वाभिमानी और निराभिमानी ।
स्व ही सत्व है, आत्म-तत्व है
और आत्म-तत्व यह अजर-अमर है ।
रहस्योद्घाटन किया था उस धर्मक्षेत्र मे,
उस कुरुक्षेत्र मे तुम्ही ने– मैं समय हूँ’,

समय ! तू सचमुच मनमोहन है
थोड़ा नटखट है और छलिया भी ...
कालिंदी तट पर मैं ही खड़ा था
जिसपर टांगे थे तुमने  गोपियों के पट
यह कहकर कि आत्म-परमात्म ऐक्य मे
बाधक है तन-मन का कोई भी आवरण,
हो सकता है तुम्हें पसंद न आया हो
ओढ़े रहना मेरा स्व का यह आवरण।

समय! यह प्रलाप मेरा नहीं, तुम्हारा गीत है
स्वाभिमानी जीवन उसी गीत का संगीत है,
याद है तुम्हें, बर्बरीक का सिर काटकर
तूने मेरी ही एक शाखा पर टांगा था,
मैं तब भी था मूर्तमान, अब भी हूँ मूर्तमान ।
समय ! यदि अतीत को मैं नहीं पा सकता
तो तुम भी भूतकाल को नहीं पा सकते,
समय ! मैं पुनः पुनः खड़ा हो सकता हूँ
परंतु तुम? तुम पीछे नहीं लौट सकते ॥ 
       
   डॉ॰ जयप्रकाश तिवारी      


Monday, April 21, 2014

मैं जूझ रहा इन प्रश्नों से

कविता वस्तुतः है क्या?
वर्ण संयोजन, भावाभिव्यक्ति?
शब्दों का आपसी मेल या
इससे संप्रेषित भाव-शक्ति
या इन शब्दशक्तियों की
अपनी विशिष्ट अभिव्यक्ति?
साथ ही कविता सौंदर्य है?...

माधुर्य है? या कोई विचार?
अथवा विचारों का सौंदर्य?
और यह सौंदर्य – माधर्य भी
सर्जक का है या सृजित का?
काव्य का है या कवि का?
अथवा श्रोता और पाठक का?
सौंदर्य, सृजन-कला मे है या
पाठक-श्रोता की भावग्राह्यता मे?

यह काव्यात्मकता और माधुर्य
मन मे है या लेखन-प्रस्तुति मे?
कविता सामाजिक उत्प्रेरक है
या प्रगतिशीलता मे बाधक?
कविता बुद्धि विलास है या
सामाजिक नैतिक विकास?
कविता परिकल्पना है या
तथ्यात्मक कोई समन्वय?
आवश्यकता यह समाज की है
या संवेदी सृजनशील कवि की?
और यह ‘सर्वगत सुखाय’ है
या ‘एकांत स्वांतः सुखाय’?
यदि सर्वगत सुखाय है तो
क्या स्वांतः सुखाय दोष है?
स्वांतःसुखाय सार्वजनिक करके भी
क्या कोई कवि पूर्णतः निर्दोष है?

- डॉ॰ जयप्रकाश तिवरी

फिर जन्मा एक ‘नन्हा कबीर’

     आज फिर एक नन्हा-कबीर पाया गया
लहरतारा तालाब मे कमल-पत्र पर नहीं
कूड़े के ढेर पर प्लास्टिक मे लिपटा हुआ
तहजीब के सम्मानित शहर लखनऊ मे ।
क्या है यह, किसी का प्यार?
अथवा किसी नासमझ युग्म का पाप?
अथवा आधा-प्यार, आधा-पाप?
आज बन गयी है मानसिकता जो
हर बात मे ही फिफ्टी-फिफ्टी की।
पाप तो संभव है आधा-अधूरा भी, किन्तु
क्या प्यार भी संभव है आधा-अधूरा?
नहीं, नहीं हो सकता यह आधा-अधूरा।
यह जब भी होगा, जहाँ भी होगा पूरा होगा
पूर्ण रूप मे होगा, सम्पूर्ण रूप मे होगा॥

प्यार-प्रेम तो वही है जो पूर्ण है
जो कर्तव्य है, जो दायित्व है
जो फर्ज है, त्याग है, उत्सर्ग है
यहाँ इसमे तो जूझना ही जूझना है
पलायन के लिए इसमे स्थान कहाँ?
जो सना है तन मे, सनातन है
जो सना है मन मे, वह द्वंद्व है
जो सना मस्तिष्क मे, छल-छद्म है,
क्यों है वहाँ छल-छद्म और स्वार्थ?
क्योकि वहाँ तो भरी हुई हैं ऐषणाएँ
ना ना प्रकार की कुत्सित लोकेषणाएँ,
वित्तेषणाएँ और पुत्रेषणाएँ भी,
लेकिन यहाँ तो यह भी नसीब नहीं।

ये ऐषणाएँ ही विष हैं प्रेम के लिए,
ये ला पटकती हैं प्रेम को वासनाओं के
कपटपूर्ण छल-छद्म के धरातल पर।
इसी कुत्सित वासना की
परिणति है यह नन्हा कबीर 
कौन है यह, हिन्दू या मुसलमान?
क्या बन पाएगा यह एक अच्छा इंसान?
केवल इंसान, ना हिन्दू, ना मुसलमान
नहीं मिल पाया था दो दिनों तक इसे
कोई पालक, कोई नीरू और नीमा
दो दिनो बाद किसी स्नेहमयी माँ का
आँचल चटपटाया, कोई सूनी गोद
किसी किलकारी के लिए छटपटाई,
किसी ममत्व ने चित्कार-पुकार मचाई
तभी तो यशोदा-रूप मे नीमा सामने आई । 

अब यह यशोदा उसे कोई नाम देगी,
अपनी संस्कृति, अपनी पहचान देगी
परंतु यह कबीर क्या उस कोटर को,
कुरीतियों को निज हाथों जला पाएगा?
क्या यह शिशु दूसरा कबीर बन पाएगा?
चाहता हूँ यह नन्हा कबीर यही रहे
यहीं पले-बढ़े, उस युग्म को चिढ़ाता हुआ,
वह युग्म तब-तब तरसेगा, आहे भरेगा 
जब-जब कबीर हँसेगा, रोएगा, चिल्लायेगा
अपनी कोई साखी – सबद – रमैनी गाएगा ।
वे आएंगे, छिपकर आएंगे, अश्रु भी बहायेंगे
बाहें उनकी फड़फड़ाएंगी, पर होठ सिले होंगे
जिह्वा को कसकर दांतों से दबाएँगे,
यह घटना नित्य प्रति ही होगी
वे तिल-तिल घुटेंगे, घिस-घिस मिटेंगे
खुल के रो भी तो नहीं पाएंगे
जीने की कौन कहे, मर भी नहीं पाएंगे
इस प्रकार अपनी करनी की सजा पाएंगे॥
      डॉ॰ जयप्रकाश तिवारी

Saturday, March 22, 2014

चिंतकों से एक आग्रह


शब्द  शब्द  शब्द
अर्थ   अर्थ   अर्थ,
क्या कोई अंतर्संबंध है
शब्द  और अ र्थ  में?
हाँ, शब्द को जानते हैं
हम इसके निहितार्थ से.
शब्द की पहचान अर्थ से
शब्द की  मर्यादा अर्थ से
शब्द की  गरिमा  अर्थ से
शब्द की अस्मिता अर्थ से
तो क्यों बदलते जा रहे हैं
निहितार्थ  आज शब्द के?
क्यों खोते जा रहे  हैं  शब्द
अपनी भावनामयी मूल अर्थ?
शब्द गंभीर, अर्थ  पोपले
ऐसा क्यों हो  रहा अनर्थ?
जब दौलत की मंडी में
बिक  रहे  हों  दोनों  ही
क्षीणता क्यों हो रही इसमें?
शायद अब यह प्रश्न ही व्यर्थ.
लेकिन  प्रश्न  कोई  भी
नहीं होता कभी भी व्यर्थ
बना दिया  जाता  है  उसे
शक्ति / शासन बल से व्यर्थ
चिन्तक - लेखक को आज
इसी विन्दु  पर  सोचना  है
अर्थ को भटकने से रोकना है
जिससे न हो, कोई प्रश्न व्यर्थ
वह  चाहे  तो  कर  सकता  है
एक ही शब्द के विभिन्न अर्थ 
सार्थक गरिमामयी मूल्यपरक अर्थ.

     - डॉ. जयप्रकाश तिवारी 

Saturday, February 22, 2014

चाहता हूँ बनना मैं भी एक नारी

पुरुष की  तो सार्थकत है नारी
रवि यदि पुरुष, किरण है नारी
शशि यदि पुरुष,चांदनी है नारी
पवन यदि पुरुष, गति है नारी
नारी करुणा है, सुरभि है, पुष्पा है
यह लेबल नारी पर ही तो चस्पा है
 
मैं भी चाहता हूँ किसी नारी से
थोडी सी रश्मि, बनने के लिए प्रकाश
थोडी सी ज्योति, बनने के लिए प्रभात
थोडी सी अभिलाषा, पाने के लिए गति
थोडी सी चिंता , सवारने के लिए मति
थोडी सी वंदना, छोड़ने के लिए अभिमान
थोड़ी सी पूजा, तोड़ने ले लिए यह मान
थोडा सा त्याग, छोड़ने के लिए दंभ
थोडी सी गति, छोड़ने के लिए जड़ता
थोडी सी ख़ुशी, पाने के लिए प्रसन्नता ...
थोड़ा सा उत्सर्गम करने के लिए उत्कर्ष.


अब क्रूर मर्दानगी नहीं, इंसानियत चाहिए
अब नग्न पौरुष नहीं, मानवता चाहिए
केवल पैसा नहीं, अब तो संवेदना चाहिए
और, और ये ... सभी हैं... स्त्री वाचक
अब समझ में आया हमें ......
पुरुष तो केवल एक ही है- "अकाल पुरुष"
शेष सभी है नारियां ही
चाहे उनका रंग रूप लिंग जो भी हो.
अरे ! औरत श्रेष्ठ है हमसे
वह पहले से ही है, जन्मजात है नारी
मैं तो आज ..पहलीबार बना हूँ.नारी

             - डॉ. जयप्रकाश तिवारी

Saturday, February 15, 2014

समस्या मानव के शाश्वत प्रश्न की

सुख और शांति ही तो
शाश्वत मांग रही है मानव की
इसी के लिए रचता रहा है प्रपंच
करता रहा है उपयोग-दुरुपयोग
अपनी तीक्ष्णबुद्धि और चेतना का,
मानव मन झूलता ही तो रहा है
सदा से, सतअसत के बीच,
और दोलित होता रहेगा वह
पता नहीं कब तक  ... ,
इस सत और असत के बीच 
कभी अकेला निर्जन एकांत मे,
कभी संगठित किसी समाज मे
वह होता रहा है लगातार दो-चार
मन मस्तिष्क मे हिलोरें ले रही
जिज्ञासामय उत्कंठित तरंगों से।  

मैं कौन हूँ? मैं क्या हूँ?
क्या विश्व अंतिम सत्य है?
क्या समाजसेवा, लोकसेवा ही
अभ्युदय है? नि:श्रेयस है?
क्या लोकमंगल के लिए
जूझ मरना ही है उत्सर्ग?
और सर्वोच्च अंतिम आहुति?
अथवा
सम्पूर्ण जगत ही है निस्सार?
और वैराग्य है आत्मज्ञान का
प्रथम परिष्कृत सोपान?
क्या चित्त-वृत्ति निरोध ही है
सर्वोच्च साधन नि:श्रेयस का?
और अहं का विलोपन ही है
सच्चा उत्सर्ग? अंतिम आहुति?
जिसके लिए रहना चाहिए
सभी को सदैव तैयार?
और यह मोक्ष – कैवल्य - निर्वाण
संकल्पना है, भ्रमजाल है या सत्य?
इस पर गहन चिंतन मूढ़ता है
या मानव चेतना का विकास?
क्या कोई और स्थिति हो सकती है 
इसका समुचित स्वीकृत विकल्प?

        
         (ii)
इन प्रश्नों मे अंतर्निहित है
धर्म और विज्ञान का द्वंद्व,
प्रचलित हैं विभिन्न धर्मों-मतों के
संगत-असंगत, उचित-अनुचित दावे,
साथ ही कम नहीं है, कहीं से भी
लौकिक-समाज के समाजशास्त्रीय दावे।
विचारणीय विंदु यह है कि
धर्म का अस्तित्व मानव जीवन मे
आरोपित है या संस्कारगत?
यदि आरोपित है तो निश्चय ही
उलझा रहा है मानव अब तक
अंधविश्वासों के इस भ्रमजाल मे,
और आज मुक्त हो जाना ही
सर्वथा उचित है इस भ्रमजाल से।
किन्तु धर्म यदि है-
मानवीय संस्कार की उपज तो
स्वीकारना होगा उसका अस्तित्व,
उसका सार्वकालिक महत्व और
धार्मिक दावों का बना रहेगा
यूँ ही अपना अलग महत्व॥

चिंतन तो नित गतिशील है
कबीलाई जादू-टोने-टोटके से
बहुदेववाद, और बहुदेवाद से
एकेश्वरवाद की इस यात्रा मे है 
प्रगतिशील, गतिशील, उन्नतिशील।
अब प्रश्न है, यह एकेश्वरवाद
विज्ञान का जड़वाद है?
या धर्म का अध्यात्मवाद?
यह विज्ञान का न्यूट्रोन है या
अध्यात्म का अर्द्ध-नारीश्वर?

यदि धर्म मात्र पूजा-आराधना तक ही
सीमित, तो है यह भ्रमजाल और यदि
है इसका परिणाम अभ्युदय-नि:श्रेयस
तो है यह पूरक विज्ञान का,
यह मार्गदर्शक भी है विज्ञान का।
और अब तो धार्मिक शब्दावली का
खुला प्रयोग करने लगे हैं शीर्ष वैज्ञानिक भी।
आइंस्टीन कहते हैं – “गॉड प्लेज डाइस”,
तो स्टीफेन हकिंग कहते हैं –
“गॉड डज नॉट प्ले डाइस”॰
यदि इस बहस को छोड़ भी दें कि
किसका उत्तर है सत्य, किसका असत्य
परंतु प्रमाणित हुआ फिर भी यह तथ्य
ईश्वर है, वह लीला करता है, लीलाधर है
यही तो कहता आया है भरता सदियों से
बारंबार, अनेक रूपों मे, अनेक प्रकार से॥


            (iii)
आज भी कुछ लोग
ग्रसित है अपने ही विचारों से
वे कहते हैं, न करो साझा
किसी और को उसके साथ,
क्योकि पसंद नहीं उसको
किसी भी और का साथ,
तो क्या वह ईर्ष्यालु है?
इसपर वे कहते हैं-
वह परम कृपालु, दयालु है
उसके अंग-प्रत्यंग से
स्नेह का निर्झर झरता है
न्याय-झरना कलकल बहता है,
सोचता हूँ, तब वह
इतना तंगदिल कैसे हो सकता?
क्या उसके आसन पर, बगल मे
किसी के लिए भी स्थान नहीं?
क्या कोई गोद मे नहीं बैठ सकता?
उसके कंधे से झूल नहीं सकता?
उसके सिर को सहला नहीं सकता?
इतना भी धैर्यवान, सहनशील,
और स्नेहमयी यदि नहीं है वह,
तो फिर एक पिता वह कैसे?
और जो पिता नहीं बन सकता
वह जगतपिता हो सकता कैसे?
जगन्माता, जगन्नियंता कैसे?
यदि है वह शक्तिमान तो
शक्ति कैसे हो सकती बाधा?
वे तो बताते भी नहीं कि
वह पुरुष है या नारी?
लिंगी है या अलिंगी?
कुमार है या कुमारी?

वे कहते हैं – तू चुप रह!
तू नास्तिक है, मूर्ख है, वाचाल है
तू काफिर है, फिरंगी है, बहुरंगी है।
पूछता हूँ –
वह है जब एक अकेला,
वही जब सर्जक सारे जग का
तो रचकर जगत, परे इसके
रह सकता बहुत दूर वह कैसे?
अपने ही बच्चों से अलगाव
सहन कर सकता वह कैसे?
वे कहते हैं-
वह है असीम, अनिश्चित,
एक अनिवार्य सृजन सत्ता,
कहते नहीं थकते विलक्षण उसको
कृपाशील, दयावान भी उसको,
उसी का फिर लक्षण बतलाते
उस दयावान का भय दिखलाते।

जब पूछता हूँ-
वह आत्मनिष्ठ है या वस्तुनिष्ठ?
अथवा परे है निरा इन भेदों से?
वह सर्वदेशीय है या एक देशीय?
वह विराज है, सूक्ष्म है या महान
या है अणुरोअणियम महतो महीयान?  
जब वह है अज्ञेय और अव्याख्येय
समझ के परे, तो कैसे जान गए आप
उसके अन्तर्मन की गूढ-गोपनीय बात?
वे नाराज हो जाते, हाथ मे डांडा उठाते॥
  

        (iv)
मैंने अबतक यह समझा
संप्रदाय हैं अनेक, धर्म है एक
संप्रदाय पंथ काया हैं, धर्म के
आत्मा नहीं बन सकते वे धर्म के,
धर्म है अस्तित्व, धर्म ही सत्ता
जिसकी अनुपस्थिति से मिट जाए
अस्तित्व, बदल जाए संज्ञा
वही है धर्म, यही उसकी महत्ता,
शब्द और अज्ञान मिलकर
सृजित करते संप्रदाय की सत्ता,
सत्य है एक, परम तत्व एक
लेकिन व्याख्या वाले शब्द अनेक,
भाषा, शैली, और विधि अनेक
व्यक्ति अनेक, ग्रंथ अनेक, पंथ अनेक।
इसी अनेकत्व ने किया है विकसित संप्रदाय
सभी भटक रहे, समझने का अब क्या उपाय?
जो विलक्षण है, उसका लक्षण कैसा?
फिर भी वे शब्दों का भ्रमजाल फैलाते,
सत्य तो होता भी नहीं अभिव्यक्त
शब्दों द्वारा, फिर भी वे समझते हैं
हमे अपने शब्दों के द्वारा ।  
कहता हूँ- ऊपर उठो!
विचारों से, तर्क से, शब्दों से
तब जान पाओगे निर्विचार को
निर्विकार को, शब्दातीत को,
शब्द तो हैं संकेतक मात्र
हम तो शब्द का अर्थ करते हैं
उसमे भी मनमानी करते हैं।
शब्दों की अपनी सीमित शक्ति,
अभिधा-लक्षणा-व्यंजना तक जाती
आगे उसके रुक यह जाती,
अब संकेत-प्रतीक आगे गति करते हैं
थोड़ी और आगे तक दूरी तय करते हैं।

लेकिन
शब्दों-प्रतीकों के प्रति आग्रह ही
पूरी की पूरी बात ही बदल देता
पूरा संदर्भ अब पीछे छूट जाता
और अब उन शब्दों, प्रतीकों की ही
अपनी-अपनी मीमांसा प्रारम्भ हो जाती।
सत्य छिप जाता पीछे और हम
उलझ जाते है शब्दों मे, प्रतीकों मे,
आधुनिक भाषा विश्लेषणवादी
आज क्या कर रहे हैं?
शब्दों मे ही तो उलझ रहें हैं
परिणामतः शब्दजाल फैल रहा है
कलह, द्वेष, नफरत फैल रहा है।

तो क्या सत्य सर्वथा अज्ञेय है?
नहीं, सत्य अज्ञेय तो नहीं,
लेकिन अव्याख्येय अवश्य है,
ज्ञेय है यह, मात्र सत्यानुभूति से
साक्षात्कार से, स्व के बोध से,
सत्य साक्षात्कार के लिए हमे
पंथ और संप्रदाय छोडना होगा।
शस्त्र वचन त्रुटिपूर्ण नहीं हैं
त्रुटिपूर्ण है हमारा ही अर्थ
हमारा निहितार्थ, हमारी व्याख्या,
क्योकि शस्त्र वचन हमारे द्वारा
न दृश्य हैं, न श्रव्य, वे परंपरागत हैं,
अर्थ और निहितार्थ परंपरागत हैं
सत्य प्राप्ति के लिए करना होगा तप
करो चाहे यज्ञशाला मे या प्रगोगशाला मे,
लेकिन इसके लिए तैयार नहीं हम
हमे चाहिए पकापकाया भोजन
रसोइया बनने को तैयार नहीं हम ॥ 

-    डॉ॰ जयप्रकाश तिवारी