Wednesday, September 12, 2012

काव्य-संग्रह ‘कस्तूरी’: जैसा मैंने समझा (अंतिम भाग - ५)


प्रेम है शाश्वत एक तरंग, निर्मल - स्वच्छ धवल है रंग
सृष्टि पूर्व उपजा यह प्रेम, है सृष्टि का करण यही प्रेम.
प्रकृति प्रेम में ही अनुरक्त, लेकिन प्रकृति प्रेम अवरक्त.
प्रकृति नटी,पुरुष निर्लिप्त, इसके गति में नहीं सश्लिष्ट.

         यह सच है, प्यार जब भी अपने सर्वोच्च शिखर का संश्पर्श करता है, उसकी अभिव्यक्ति लडखडा ही जाती है. शब्दों के बोल छोटे पड जाते है, उपमाएं और उपमान अपना दामन छुड़ाने लगते है, और ऐसी स्थिति में प्राप्त होते हैं- कुछ संकेत, कुछ विम्ब, कुछ प्रतीक. काव्य-संग्रह ‘कस्तूरी’ में प्यार का यह शिखर विन्दु भी है कुछ इस रूप में – ‘तुम जब भी छूते हो, मैं बेहोश हो जाती हूँ / फिर तुम छोकर मुझे होश में लाते हो / पास आ तो जाऊं मैं भी तुम्हारे लेकिन / मैं भी जल जाती हूँ / और तुम भी झुलस जाते हो / कहते हो खुद को मासूम / और राज बन मेरे दिल में उतर जाते हो’. याद है मुझे, ऐसे ही एक प्रश्न कि प्यार क्या है? इसके उत्तर में मनीषी चिन्तक डॉ. राम गोपाल चतुर्वेदी जी का उत्तर था– “प्रेम का पुरस्कार ईश्वर को भक्ति मार्गियों ने दिया था. यह भक्ति मार्ग सूफीवाद के समकक्ष है और सूफीवाद में खुदा और उसके मुरीदों के मध्य आशिक –माशूक का सम्बन्ध माना गया है. इश्क का ही हिंदी पर्याय प्रेम है और इश्क या प्रेम में रति भाव का प्राधान्य रहता है. शास्त्रों में रति को उद्गीथ कि संज्ञा दी गई है. छान्दोग्य उपनिषद में एक वामदेव्य साम का उल्लेख है जिसमे रति सुख को उद्गीथ माना गया है. उद्गीथ और आनंद में कोई तात्विक भेद नहीं है. उद्गीथ प्रक्रिया है और आनंद उसका परिचय”. कस्तूरी के रचनाकार भी इस उद्गीथ की प्रक्रिया से कई-कई बार गुजरते हैं. उनके मन में तरह-तरह के भाव उठते हैं, तरंगें हिलोरें मारती हैं और ये चिन्तक उनका रसास्वादन और वर्णन कर आनंदित होते है. मन में उठने वालों भाव के रूप-स्वरुप अलग-अलग है. देवीदुर्गा की आराधना - वंदना में इन विविध मनोभावों का एक विषद परिचय मिलता है. प्रसंगवश उनका उल्लेख शायद हमारी राह को, परिचर्चा को और आसान बना दे. इससे विषय- -सामग्री और विषय-वस्तु को समझने में भी सरलता ही होगी. ये मनोभाव हैं– बुद्धि, क्षुधा, छाया, शक्ति, तृष्णा, जाति, लज्जा, शांति, श्रद्धा, काँति लक्ष्मी, वृत्ति, स्मृति, दया, तुष्टि, मातृत्व और भांति.

प्रेम भी एक उपासना है इनमे से कई मनोभावों का प्रभावी-चित्रण और प्रभावी अभिव्यक्ति हुआ है. आदर्श की उपासना, चरम और परम की उपासना. प्रेमी की यह उपासन ही जब अभिव्यक्ति का विषय बनती है तो काव्य और साहित्य का सृजन होता है. इस सृजन में भावों को उभारने वाले कारक और साधन, आलंबन या उद्दीपन कहे जाते हैं. यह आलंबन भाव देखकर, सुनकर याँ अनुमान के आधार भी उत्पन्न होते हैं. यह लौकिक भी हो सकती है और पारलौकिक भी. भावनाओं का प्रस्तुतीकरण ही साहित्य है और साहित्य से वैयक्तिक मन और समाज दोनों भाव विभोर हो उठते हैं. कस्तूरी को पढकर ऐसे ही भाव उठ रहे है. भाष-शैली की दृष्टि से कहीं-कहीं परिष्कार की आवश्यकता है लेकिन भाव सम्प्रेषण में बाधक नहीं है. सृजनात्मक भाव श्रेष्ठ समाज की संरचना करता है, आत्म-समीक्षा के लिए प्रेरित करता है. इसलिए कहना चैये साहित्य समाज का दर्पण ही नहीं, प्रेरक भी है. इस प्रकार प्रेरक साहित्यकार की जिम्मेदार और भी बढ़ जाती है. यदि और खुलकर कहा जाय तो सहिय्कार समाज को बनाने, सवारने और मिटने की दावा है. यह विज्ञान रूप में सिद्दांत तथा संतरूप में दुआ है. यह समाज ही है, आज का समाज भौतिकता का समज, विज्ञान का समाज, प्रौद्योगिकी का समाज जिसने छीन लिया है माँ प्रकृति के मुह से मृदुलता की लोरी भी, अपने दंभ में- ‘लोरी छीनकर / तुमने ही उसे काली का रूप दिया है / और इस रूप में वह संहार ही करेगी / सिर्फ संहार’. लेकिन क्यों? क्योकि इस विज्ञान और प्रौद्योगिकी मिलकर माँ प्रकृति का दोहन-शोषण निर्दयता पूर्वक कर रहे हैं.

विज्ञान है परिकल्पनाओं का परीक्षण, उनका गणितीय मान, और तकनीक है विज्ञान का वह लाडल-पुत्र जिसके एक हाथ में है ‘सृजन’ और दूसरे हाथ में है ‘ध्वंश’ की चावी. इस तकनीक के ‘ट्रिगर’ और ‘बटन’ पर शासन और वर्चस्व है, संकल्पना और परिकल्पना रुपी उँगलियों का. इस परिकल्पना के मूल में है यह विचार कि वह भाई को समझता क्या है- एक ‘मित्र’ अथवा ‘शत्रु’? अब विज्ञान स्वयं तो है बूढा-लाचार, उसने थमा दिया है अपनी मशाल बन्दर के हाथ मे. यह बन्दर ही है जिसका अपना कोई निजी घर-द्वार नहीं होता, यह जब भी जलाएगा, होगा वह किसी दूसरे का छप्पर. मेहनत और खून-पसीने से छाई गई एक कुटिया. तकनीक अश्वत्थामा रुपी विज्ञान का वह अस्त्र है जिसे छोड़ा तो जा सकता है, परन्तु उसके द्वारा रोका नहीं जा सकता. तो कौन समझायेगा विज्ञान के इस बिगडैल पुत्र को? वही श्रीकृष्ण जिन्होंने मोड दिया था अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र को. आज भी वही मोड़ेगा, विज्ञान के इस बिगडैल पुत्र के अस्त्र को. इसलिए उन्ही श्रीकृष्ण को एकबार पुनः याद किया गया है इस ‘कस्तूरी’ में – ‘युद्ध भूमि में उतरना था / विस्वास करो या न करो / सारथि श्रीकृष्ण बने / दिया उपदेश / क्या है छल! क्या है भ्रम! / विश्वास भरने को नरक का द्वार भी दिखाया / जिन्हें महारथी माना था / उनका असली रूप दिखया’. जब असली रूप दिख गया तो ये चिन्तक शांत बैठने वाले ही कब थे, जुट गए समाज सृजन के कार्य में अपने-अपने हुनर के साथ. शय्स संवेदी चिन्तक उस तकनीक से ही पूछता है – ‘ऐ तुम! / ‘मैं’ बनकर तुम्हे जो मिला / क्या उसे आज उपलब्धि मानते हो / या अब एक ‘मैं’ ही रह गया तुम्हारे पास? / और हम की तलाश में / तुम खुद में प्रलाप करते हो?”.

इस प्रकार ‘कस्तूरी’ के संवेदी चिंतकों ने काल को, काल की गति को पहचान लिया है. प्रेम करने वाला डरता तो नहीं, लेकिन संवेदी होने के नाते अपनी अनुभूति को अभिव्यक्त तो करता ही है. मीठे अनुभव भले ही विस्मृत हो जांय, खट्टे और तीक्ष्ण अनुभूति कभी भूलती नहीं. वह लेखनी के संस्पर्श को छटपटाती है और जब भी लेखनी का साथ पाती है, वह रंग जाती है पूरे पृष्ठ को, पृष्ठों को, अपनी वेदना से, अपनी पीड़ा से.- ‘कोई मुझसे प्रेम नहीं करता / सब मुझसे बचते फिरते रहते हैं / सुनिए मेरा नाम है बुरा वक्त / ... समय है बड़ा बलवान / कि इस किस्मत के आगे / जीतते – जीतते क्यों हर जाता है इंसान / क्यों भाग्य का खेल / ९९ पर खत्म होकर फिर शून्य(०) से शुरू हो जाता है?’. शून्य एक अज्ञात राशि है, अंजान संख्या है. इस प्रकार जीवन के विभिन्न थपेडों को झेलते हुये युवा अन्वेषी मन एक रहस्य कि चादर ओढ़ लेते है, रहस्यवाद के क्षेत्र में पहुच जाते हैं, अंतर्मुखी हो दार्शनिकता की चादर ओढ़ लेते हैं. और पुष्टि करते हैं कविवर पन्त के इस कथन की –“वियोगी होगा पहला कवी आह से उपजा होगा गान, निकल कर आँखों से चुपचाप बही होगी कविता अंजान”. लेकिन दार्शनिक की कविता अंजन कब तक रहती? वह ढूढ़ ही लेता है इस शून्य का मूल्य. इस शून्य का मान – ‘शून्य, शून्य और सिर्फ शून्य / पता नहीं फिर भी लगता है / कुछ बचता है कहीं शून्य से परे / स्वयं का बोध / या कोई कड़ी / अगली सृष्टि की / ... कुछ ऐसा है जो / बचता है शून्य के बाद भी’. बिलकुल सही बात है वंदना जी! ‘शून्य’ जो शून्य तो है ही, प्रकारांतर से वही पूर्ण भी है. यही पूर्णता  आवर्ती गति करती रहती है- धनात्मक आवर्त सृष्टि है और ऋणात्मक आवर्त प्रलय. दूसरे शब्दों में धनात्मक आवर्त पूर्णता है और ऋणात्मक आवर्त शून्यता. और यह शोध किया जा चुका है कि पूर्ण में से पूर्ण घटने पर भी पूर्ण ही अवशेष बचता है. शास्त्र वचन है - पूर्णस्य पूर्णम आदाय पूर्ण मेव अवशिष्यते’. इस तरह इस टीम ने एक पूरी यात्रा कर ली है, शून्य से अनन्त और अनन्त से शून्य तक की.

यह तो हुई भावनात्मक यात्रा, अध्यात्मिक यात्रा. यह लौकिक यात्रा वहाँ जाकर पूरी होती है जहाँ जब पहले प्रश्न, परम जिज्ञासा का उत्तर मिलता है. प्रश्न था - जिंदगी के सफर में जो खुशियों का नगर है, वह कहाँ है..? वह कहाँ है...? उत्तर मिला– वह यहीं है.., यहीं है.., यहीं है... यहीं... जहाँ.. तुम रहते हो! जहाँ तुम्हारा जन्म हुआ है... जहाँ की मिटटी में खेल कर पाले-बढे हो.., जहाँ का अन्न-जल ग्रहण कर तुम प्रश्न करने लायक बने हो! तुम्हारी प्यारी जन्म-भूमि. तुम्हारा अपना प्यारा देश- ‘भारत वर्ष’. संवेदी मन निष्कर्ष प्राप्त कर बोल ही तो उठता है – ‘नहीं चाहता विश्व भ्रमण / भातर दर्शन की आशा है / मैं गली – गली में रमण करूं / मन जनम –जनम का प्यासा है / .. हर नगर राज्य मैं देख सकूँ / अपना समाज मैं देख सकूं / कल विश्व-गुरु कहलाया क्यों / वो नीव आज मैं देख सकूं’. इस प्रकार इस ‘कस्तूरी’ की खोज में यह युवा रीम निकल पड़ी थी, भटक रही थी, वह कस्तूरी मिली उनके अपने ही घर में, उनकी ही नाभि में. इस प्रकार इस काव्य संग्रह का नाम ‘कस्तूरी’ रखा जाना औचित्य पूर्ण है. यह सर्वांश में अपने नाम को सार्थक करती है.

     डॉ. जय प्रकाश तिवारी
   संपर्क- ९४५०८०२२४०


Kasturi

(Hardcover, Hindi)
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Anju Anu Chaudhary

 (Edited By), 

Mukesh Kumar Sinha

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Monday, September 10, 2012

‘कस्तूरी’: जैसा मैंने समझा (भाग - ४)



संवेदनाये समीक्षक की जब जोर मारती
 मौन के सारे निहितार्थ खोलती.
                    मौन भी मुखर तब हो जाता,
और उस शून्य में अनन्त
                         प्रकट हो ही जाता.
 सहस्रदल कमल
   खिल जाता.

प्रेम तत्व के अनुसन्धान में यह विमर्श और आगे बढ़ता है, गतिशील होता है. अब इस प्रेमानुसंधान में ऐसे भी क्षण आते हैं जब शोधार्थी यह समझ नहीं पता कि इस प्रेम की सत्यता क्या है? यह शरीरी है या अशरीरी? यह प्रत्यक्ष है या परोक्ष? इसकी वास्तविकता क्या है? अंत में संवेदी मन स्वयं से पूछ ही बैठता है कि – ‘तेरा मिलना ख्वाब है या हकीकत / बस बंद पलकों में कैद रहती है तू / जुगनू को सितारा समझ भटकता रहा / कस्तूरी है तू या फिर एक छलावा?’. कौन पहचानेगा इसको? अरे वही जिसने प्रेम किया हो, जिसे प्रेम हुआ हो, जिसने प्रेम को जिया हो. वही पहचानेगा और वही कह भी सकेगा – ‘तू रो मुझमे, और अपने अश्क / पलकों से मेरी बहने दे’. यह है अनुराग की वह भाषा जो हम-उम्र या प्रेमी-प्रेयसी के बीच के संवाद रूप में प्रकट है. इसी प्रकार अनुराग का एक दूसरा परिदृश्य भी है यहाँ, स्नेह और श्रद्धा के रूप में, माँ से स्नेह-संवाद के रूप में – ‘माँ / तुमने सब दिया / जन्म और सुख के सभी आधार / पर पुत्री को क्यों / न दिया सेवा का अधिकार?’ प्रकारांतर से यह प्रश्न माँ के माध्यम से समाज से भी हैऔर सामाजिक व्यवस्था से भी. इस प्रकार यह ‘काव्य-संग्रह’ प्रेम प्रसंग के माध्यम से सामाजिक विमर्श के विभिन्न पहलुओं का सूक्ष्म संस्पर्श करता है, अवसर और अवकाश ढूँढता है. परिमार्जन और शोधन के लिए चिह्नित करता है, ऐसा कोई भी प्रयास रचनात्मकता की श्रेणी में ही रखा जायेगा. अभी हल ही में पुत्री द्वारा मुखाग्नि दिए जाने का कम से कम दो उदहारण समाचार पत्रों की सुर्ख़ियों में था जिसे मने रूचि लेकर पढ़ा भी था..

प्रेम तत्व के इस अन्वेषण की एक विशेषता और भी है. यहाँ प्रेमी युगल के मध्य संबोधन को लेकर एक मनोवैज्ञानिक विश्लेषण भी है जहाँ ‘आप’, ‘तुम’ और ‘तू’ के प्रयोग को लेकर एक औचित्यपूर्ण विवेचन देखने को मिलता है. और यहाँ अंततः छुपा हुआ अपना स्व, अपना अहम, स्वाभिमान जाग्रत हो उठा है – ‘मैं तुम्हे और तुम मुझे / मेरे ही नाम से पुकारेंगे / अपना – अपना वजूद लिए हम / एक दूसरे के / उम्र भर रहेंगे’. और जहाँ मान - स्वाभिमान – अभिमान – गुमान प्रकट हो उठे, वहाँ प्रेम कहाँ? इसलिए सावधानी की आवश्यकता है यहाँ. लेकिन प्रेम में सावधानी हो भी नहीं सकती. जहाँ प्रेम में सुधि-बुद्धि सब खो जाय, वहाँ सावधानी के लिए अवकाश भी कहाँ? इसलिए प्रेम के सन्दर्भ में उसकी व्याख्या में प्रयुक्त शब्दों के अभिधात्मक अर्थों तक ही पाठक या समीक्षक को उलझ कर नहीं रह जाना चाहिए. लक्षणात्मक और व्यंजनात्मक शब्द-शक्तियों की शरण में भी अवश्य ही जाना चाहिए. शब्दों का अपना महत्व तो है लेकिन एक सीमा तक ही, उसके आगे नहीं. जबकि प्रेम की गति संकेत, प्रतीक और मौन तक है. इस युवा पीढ़ी को इसका संज्ञान है, तभी तो वे कह सके हैं – ‘शब्द मुखर हो जाते हैं / किन्तु / मोल उन शब्दों का नहीं / जो प्रभावित करने की आकांक्षा में / निकले थे / शब्दों का जाल तो प्रपंच भी हो सकता है / मोल तो स्वयं निष्ठां / स्वयं की आस्थाओं का है’. यह निष्ठा और आस्था की चरमावस्था ही तो है कि प्रेयसी ने अपने साजन में ही प्रभु का साक्षात्कार कर लिया. यह भाव प्रवणता-सघनता नहीं तो और क्या है?  यहाँ अनुराग का वह भाव प्रकट हुआ है जिसे भक्ति की संज्ञा दी गई है. अब देखिये न नायिका का विह्वल सा उत्तर – ‘तुम बिलकुल / कृष्ण का रूप लगते हो सजना / अब तुम ही कहो / मुझे किसी भगवान की कया जरूरत / मैं तुमको जो देख लेती हूँ / आँख खुलते ही’. लेकिन यह तो आदर्श की चरम स्थिति है और वर्तमान में वह आदर्श कहीं नजर नहीं आता. इसलिए वर्तमान में जीने वाला प्रेमी तुरत ही इसका प्रतिवाद करता है और छोड़ जाता है एक अत्यंत महार्व्पूर्ण प्रश्न – ‘हमें तो आज में जीना है / क्योकि आज जो है वही सत्य है / और सत्य ही शिव है / तो फिर शिव की तरह / सुन्दर क्यों नहीं होता / शिव, जिनका न कोई आदि है / न अंत / विल्कुल प्रेम की तरह / तो फिर सत्य क्यों / प्रेम की तरह कोमल नहीं होता?
                        क्रमशः
                                 डॉ. जय प्रकाश तिवारी
                                  संपर्क – ९४५०८०२२४०


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Friday, September 7, 2012


काव्य-संग्रह ‘कस्तूरी’: जैसा मैंने समझा
(भाग - ३)

संकेत और प्रतीक पहुचते हैं शब्दों की सीमा से आगे
दिखलाते हैं राह वहाँ तक, जहाँ शब्द पहुच नहीं पाते
लेकिन चलकर उसके आगे ये प्रतीक भी हैं लड़खड़ाते
निश्चित एक सीमा से आगे, वे भी तो जा नहीं पाते

प्रेम सर्वथा स्वतंत्र है, यह किसी बंधन को नहीं मानता, यदि मानता भी है तो प्रेम के ही बंधन को. यही प्रेम नैतिकता, ईमानदारी, वफादारी बनकर उत्सर्ग के सर्वोच्चशिखर तक पहुचने का साहस – संबल - प्रेरणा देता है. प्रेम तो प्रेम है, उसमे छोटे-बड़े का भेद कैसा? आभासी भेद यदि कही है भी तो इसके स्वरुप में है, संवेदनाओं की सघनता-विरलता में है, अभिव्यक्ति में है, मूल्यों में है. भौतिकता का अपना एक अलग मूल्य है, आधात्मिकता, मानवता का अलग. लेकिन जिसमे मानवता नहीं, इंसानियत नहीं, नैतिकता नहीं, ईमानदारी नहीं, राष्ट्रीयता नहीं... समझ लेना चाहिए वहाँ प्रेम भी नहीं, प्रेम नाम से कुछ और है .. धोखा है .. फरेब है ... छल है .. यही सब मिलकर कुचक्र रचते हैं, निर्मल-पवित्र प्रेम को दागदार-धब्बेदार बनाते है, कलंकित करते हैं. हाँ! इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि प्रेम स्वयं अपने आप में अद्वितीय होता है चाहे कोई भी करे.., चाहे जिसे भी यह हो जाय... रचनाकार के द्वारा प्रस्तुत इस तर्क में पर्याप्त बल है और इससे कोई इंकार नहीं कर सकता कि- ‘प्रेम के विविध रंग-रूप-स्वरुप होते है / और शायद हर कोई इनमे / कभी न कभी ढला भी होता है / रंगा भी होता है, जिया भी होता है / इसलिए प्रेम की व्याख्या का अधिकार / हम किसी से नहीं छीन सकते’. रचनाकार प्रेम का विभाजन, बटवारा, वर्गीकरण नहीं चाहता. प्रेम या तो ‘है’ अथवा ‘नहीं है’. बीच की कोई भी स्थिति उसे स्वीकार नहीं. कवियित्री का आरोपण है मानव समाज से, उसके सामाजिक मूल्यांकन से, जिसे वह पक्षपात-पूर्ण, भेदभाव-पूर्ण मानती है. उसका सीधा-सीधा निहितार्थ है कि प्रेम में भावना-प्राधान्यता से ही उसका मापन होना चाहए, ज्ञान-विज्ञान से नहीं. वह तर्क करती है - ‘कृष्ण ने गीता सार कह दिया / तो वे पारलौकिक की श्रेणी में आ गए / और जो इससे परे हैं, परन्तु प्रेम में रत हैं / क्या उनका प्रेम अमर नहीं? / प्रेम में हर पुरुष कृष्ण स्वरूप है / और हर नारी स्वयं में राधा’. मुझे लगता है यहाँ कुछ विभ्रम की स्थिति है, कृष्ण की अलौकिकता का कारण केवल गीताज्ञान नहीं है. यदि गीताज्ञान को परिदृश्य से हटा भी दिया जाय तो भी उनके व्यक्तित्व और चरित्र में कोई न्यूनता नहीं आने पाएगी. दूसरी बात, गीताज्ञान अर्जुन को कर्त्तव्य बोध करने के लिए दिया गया था, स्वयं उसके अनुरोध पर. कर्त्तव्यपरायणता और लोकमंगल ही तो प्यार है, प्रेम है. इसका संकेत ऊपर किया भी जा चुका है. हाँ, जहाँ तक राधा-कृष्ण के प्रेम की बात है, वह अलौकिक है. संसारी नही, दैहिक नहीं, भौतिक नहीं. अध्यात्मिक है. और यही प्रेम का अपना मानक भी है. इसी मानक से अभी तक प्रत्येक प्राणी के प्रेम को मापा गया है और आगे भी आदर्श प्रेम का यही मापन बना रहेगा सदियों तक. यदि कोई कृष्ण और राधा सा उदहारण प्रस्तुत कर सके तो निश्चित ही वह समक्ष मन जायेगा. लेकिन यह सरल नहीं... प्रथम स्थिति में तो यह आग की दरिया है जिसमे डूबकर उसपार प्रियतम के पास जाना पड़ता है. प्रेम की प्रौढता में कहीं आने-जाने की आवश्कता भी नही पड़ती. जब भी जी चाहा, दिल का पर्दा उठाया और दीदार कर ली. सर्वोच्च अवस्था वह है जब दोनों एकाकार हो जाते है, तब पहचान कठिन हो जाती है, कौन है राधा? और कौन है कृष्ण? वास्तव में राधा कोई अलग व्यक्तित्व नहीं, वह कृष्ण की चिति-शक्ति है, प्रेरणा है और गति भी. जिस प्रकार ‘शक्ति’ के बिना ‘शिव’ भी शव हैं, उसी प्रकार राधा के बिना कृष्ण का भी मूल्य नहीं. गीता की अभिव्यक्ति में राधातत्व का ही प्रस्फुटन है, गीता-ज्ञान राधा है, अर्जुन का साख्य-भाव राधा है, उसकी जिज्ञासा, प्रेरणा भी राधा-शक्ति ही है. अर्जुन के प्रेरित करने वाली भावना-शक्ति भी राधा-शक्ति ही है. इन सभी शक्तियों का स्त्रीलिंग वाचक होना इसका स्पष्ट संकेत है. कोई समझ पाए, न समझ पाए, यह अलग बात है.

यह तो सत्य है कि प्रेम का कोई स्वरुप नहीं होता. कोई आकार नहीं होता, कोई लिंग नहीं होता. प्रेम तो इतना सरस और तरल है कि जिस पात्र से यह जुड़ता है उसी का रूप-स्वरुप, आकार-प्रकार-लिंग ग्रहण कर लेता है. इस लिए प्यार कि परिभाषा अत्यंत कठिन है. फिर भी यदि परिभाषित करना ही पड़े तो कहा जा सकता है कि प्यार अनुराग और अनुभूति का वह संगठित-संघनित भाव है जो शिशु के साथ ‘वात्सल्य’, बालक के साथ ‘स्नेह’, युवा के साथ ’प्रेम’, बड़ों के साथ ‘अभिवादन’, माता-पिता के साथ ‘श्रद्धा और अपने आराध्य के साथ ‘भक्ति’ के रूप में प्रकट और व्यवहृत होता है. और इसके बदले में जो वापस मिलता है अभिवादन’ और ‘आशीर्वाद’ के रूप में वह भी तो प्यार ही है. इस प्यार के अनेक रूप हैं.. यहाँ तक कि नफ़रत – ईर्ष्या – द्वेष भी नकारात्मक प्यार ही है. यदि प्यार प्रेरक शक्ति है, तो ये सभी प्यार के ही रूप-स्वरुप है. उद्देश्य और लोक मंगल की दृष्टि से एक सृजनात्मक है तो दूसरा विध्वशात्मक. सृष्टि का सृजन ही प्रेम का परिणाम है, इसलिए विध्वंश को प्रेम का रूप नहीं माना जाता. लौकिक दृष्टि से, विधि-व्यवस्था की दृष्टि से तो यह विभाजन उचित है लेकिन तात्विक दृष्टि से, आध्यात्मिक दृष्टि से नहीं.

यह युवा वर्ग प्रेम को परंपरागत रूप से अनुकरण करना नहीं चाहता. वह प्रश्न और प्रतिप्रश्न करता है- बेहिचक, तर्कपूर्ण युक्ति के साथ. इस तर्कपूर्ण विवेचना का ही परिणाम है निष्कर्ष रूप में यह उपलब्धि – ‘निश्चय ही / प्रेम विराट है / और दृढ भी’. इस उपलब्धि के लिए यह युवावर्ग बधाई के पात्र हैं. प्रेम तर्क का विषय नहीं है, यह माप तौल का विषय भी नहीं है. लेकिन विज्ञान और भौतिकता से प्रभावित युवामन की प्रत्येक कसौटी में कहीं न कहीं विज्ञान की, भौतिकता की, आधुनिकता की झलक मिल ही जाती है. एक कविता जिसका शीर्षक है –‘एक पाती पांचाली के नाम’ उसमे वह प्रेम के सन्दर्भ में एक नए विमर्श को जन्म देती है कि ‘प्रेम बलिदान मांगता है’. क्या प्रेम वास्तव में बलिदान की मांग करता है? यह एक विचारणीय प्रश्न है. बलि देने में वाह्य बल कार्य करता है, इसमें बलि चढ़ाये जाने वाले की एक प्रकार से हत्या की जाती है. यदि केवल बलिदान देने से ही प्रेम की प्राप्ति हो जाय तो यह सौदा महंगा नहीं है. भावना के वशीभूत या उन्माद में, उकसावे में, तंत्र-मन्त्र द्वारा लाभान्वित होने के लिए अथवा लोकलाज से लोग ऐसा कभी-कभी आज भी किया भी करते है, परन्तु क्या वास्तव में उन्होंने यह कृत्य प्रेम में किया है? प्रेम के लिए किया है? प्रेम केपी दायत्व पूर्ती के लिए किया है? उत्तर निश्चित रूप से होगा - ‘नहीं’. प्रेम वलिदान की मांग कभी नहीं करता. प्रेम तो श्रद्धा–भक्ति और समर्पण की वस्तु है, मान-सम्मान-अभिमान, तन-मन-धन, सर्वस्व समर्पण ही प्रेम है, प्रेम का उत्सर्ग है.

राष्ट-प्रेम भी बलिदान की नहीं, उत्सर्ग की ही मांग करता है. समाज में, राष्ट्र में व्याप्त  अत्याचार, अनाचार, भ्रष्टाचार शोषण का सामना करते-करते एक दिन वह स्थिति आ जाती है जब अन्दर सोया पुरुषार्थ भी जागृत हो उठता है. नहीं ... अब ... और नहीं...., बहुत दिन सह लिया.. बहुत ज्यादा सह लिया.. अब और नहीं सहूंगा... मिटा डालूँगा इसे.... अन्याय का यह अस्वीकार बोध मानव-मन को दो विकल्प उपलब्ध कराता है- प्रथम, हम अन्याय और शोषण की ओर से पूरी तरह विरक्त हो जाय, यह मान लें कि हमारे चरों ओर जो कुछ घटित हो रहा है हम उसके सहभागी नहीं है. इसमें कुछ नहीं कर सकते. यह नियति, ऐसा होना था इसलिए हो रहा है. अतएव हमारा कोई दायित्व नहीं. द्वितीय; यह स्थिति अन्याय, शोषण और भ्रष्टाचा से सीधे प्रतिकार और टकराव का है. पहली  स्थिति पलायनवादिता की है, विवशता और पराधीनता की स्थिति है. दूसरी स्थिति अन्याय से आमने-सामने जूझने की स्थिति है जहाँ जीवन का मोह निरर्थक हो जाता है. और मृत्युवरण पहली शर्त बन  जाती है. जहां मृत्यु में उद्देश्य, सौन्दर्य और प्रकाश दिखाई देने लगता है. तब मन बोल ही उठता है- 'पहिला मरण कबूल कर जीवन की छड़ आस', यहाँ मृत्यु की कोई चिंता नहीं और जीवन से कोई मोह भी नहीं. बिना तत्त्वज्ञान के यह होता भी नहीं. वह शक्ति-साहस और ऊर्जा तभी मिलती है जब व्यक्ति में ज्ञान, प्रेम और कर्त्तव्यबोध का उदय होता है. जब ऐसा होता है तो वह अन्याय को सहने से इनकार कर देता है.  इन परिस्थितियों में प्राणोत्सर्ग करना पड़ता है. राष्ट्रीयता को सर्वोपरि और सर्वोच्च मानकर ही अपना अगला कदम उठाना होगा. व्यक्तिगत हितों की, स्वार्थों की, व्यापक हित के लिए होम करना पडेगा. यदि हम राष्ट्र के नाम पर इस दायित्व बोध को समझ सकें तो यही जागृति है, यही आज का आत्मोत्सर्ग है, अह्मोत्सर्ग है. अहंकारोत्सर्ग है, जिसे बलिदान भी प्रायः कह दिया जाता है.. 

यह तो हुआ राष्ट्रप्रेम की दृष्टि से. अब  यदि हम मूल्य की दृष्टि से बात करें, तो मूल्य की दृष्टि से प्रेम सर्वोच्च मूल्य है, यह परमशुभ है. परमशुभ में हिंसा नहीं हो सकता, अतएव कहाँ ही पड़ेगा कि प्रेम कभी भी बलिदान की मांग नहीं करता. प्रेम द्विपक्षीय भी होता है और एक पक्षीय भी... हाँ, प्रेम में प्रेमी-मन अपना उत्सर्ग करता है, अपने को होम करता है, अपने सर्वोच्च आदर्श अथवा आराध्य के आदर्श के लिए. बलिदान और उत्सर्ग के इस सूक्ष्म अंतर को समझना होगा हमें.
                        
                        क्रमशः
                                 डॉ. जय प्रकाश तिवारी
                                  संपर्क – ९४५०८०२२४०

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Wednesday, September 5, 2012

काव्य-संग्रह ‘कस्तूरी’: जैसा मैंने समझा (भाग - 2)



वर्णों से हैं शब्द बने, हर शब्द की अपनी है रचना
शब्द बात कहते उतना अर्थ निकलता उससे जितना
कभी – कभी कह लेते उतना, भावार्थ और निहितार्थ
मिल कर समीक्षक तक, भाव अपनी पहुचाते जितना

प्रेम की तीव्रता ही संवेदी मन को जज्बाती बना देता है, जिसे समाज पागल कहने से भी नहीं चूकता. यह समाज जिसे पागलपन और दीवानापन समझता है... वही तो प्रेम की तीव्र अभीप्सा है. यह खोज भी है और प्यास भी, साथ ही उपलब्धि भी. नानक – मीरा - रामकृष्ण परमहंस – चैतन्य – ईशा – सुकरात.. - ब्रूनो -आइंस्टीन... किसको छोड़ा है ज़माने ने, पागल ही तो कहा. पवित्र प्रेम की यही अभीप्सा तलाश करता है अपनी प्रेमी/प्रेमिका को हर संभावित जगह.. घर में, उपवन में, मंदिर में, नदी में, नाव में, जंगल में, कन्दरा में, रेगिस्तान में... और एक शहर से दूर दराज के शहरों को जड़ने वाली ट्रेन में भी. वह भी केवल एकबार नहीं.. कई बार, बार.. आखिर उसकी आस जो बंधी है, विश्वास की डोर टूटती नहीं. हताशा उसे थकाती नहीं, वह रोज, हररोज निकल पड़ता है एक नए विश्वास के सहारे,, विश्वास ही बल और संबल है इस प्रेम का. प्रेम के इस मनोविज्ञान तक युवा की मन की सहज ही पहुच भी है और अभिव्यति भी. तभी आ पाई है प्रकाश में यह रचना ट्रेन का प्रतीक बन कर – ‘रोज रात / आखिरी डिब्बे पर / सर दे मरता है / लडखडाता हुआ / अल्हड पागल’. वह पागल तो है लेकिन उतना नहीं जितना देखने वाला समाज. इस अल्हड को एक दिन समझ आ जाता है, एक रौशनी मिल जाती है जो उसे बोध कराती है लोक और परलोक का, विज्ञानं और प्रज्ञान का. तब वही पागल मन बोल उठता है ‘मैं जनता हूँ जिंदगी के इस रंमंच पर /  न तुम्हारी इच्छा कोई मायने रखती है / और न मेरी / वैसे ही नाटक में पात्रों का निर्धारण / पात्रों की इच्छा पर नहीं / निर्देशक की इच्छा पर होता है”. यह संसार एक रंग मंच ही तो है और हम आप सभी एक पात्र. जिसे जो भूमिका मिली है उसको उसका निर्वहन करना है. महत्वपूर्ण बात यह है कि जो भूमिका मिली है उसका पूरी निष्ठा, ईमानदारी, समर्पण और पूरे मनोयोग से किया जाय. इसमें व्यवधान या परिवर्तन कि आवश्यकता नही, क्योकि नियम, कानून और ‘कसमे / दीवानों को रोक सकती है दीवानापन नहीं / दीवारें जिस्मों को रोक सकती हैं अहसास नहीं /  समय / मौसम बदल सकता है / प्रेम नही”. अब इसे क्या कहा जाय, प्रेम का लक्षण, प्रेम की परिभाषा या उसका स्वरुप?

प्रेम पर प्रतिबन्ध कोई नई बात नहीं है. प्रत्येक काल, प्रत्येक युग में इसका दमनकारी चक्र चला है. कठिन से कठिन परीक्षा ली है इस प्रतिबन्ध ने, इस समाज ने. लेकिन प्रेमी तो ठहरा प्रेमी ही, उसे डर कैसा? और उसे भय क्यों? जिसके लिए प्रेम पूजा की वस्तु बन गई हो तो उसकी प्राप्ति के लिये झिझक और संकोच कैसा? अन्वेषी मन को ज़माने की प्रतिबन्ध का बोध है. वह अच्छी तरह जनता है कि मिलन संभव नहीं, दीदार भी शायद ही हो. लेकिन प्रतिबद्धता में कमी नहीं, शिथिलता नहीं. यदि आना है तो फिर आना है ... भले ही तेरा दीदार हो या न हो – ‘यह जानते हुये भी कि / तुम / नहीं मिलोगी मुझे / फिर भी मैं आऊंगा तो / और साथ लाऊंगा / अपनी बहुत सारी बेवकूफियां / थोड़े से आंसूं और ढेर सारा दीवानापन’. प्रेमी का यह दीवानापन का स्वरुप इतना महनीय, इतना पवित्र, इतना वन्दनीय और नमनीय कि योग और समाधि के उच्चत्तर अवस्था तक परिव्याप्त है, अपनी पूरी तीव्रता और तन्मयता के साथ. और उसकी साक्षी है यह प्रकृति और उसका प्रतिनिधि यह गलियां – ये चौबारे, सूरज – चाँद – सितारे. उन घटनाओं को यह ‘चाँद / टकटकी लगाये / देख रहा था / हमारे मोद को / मिलन को / प्रेम को / हमारी डूबन को / हमारी समाधि को’. और समाधि में ही तो सहस्रदल कमल खिलता है, योगी अपने आराध्य का साक्षात्कार करता है. उससे एकाकार हो जाता है- ‘शिव और शक्ति’ की तरह, ‘राधा और कृष्ण’ की तरह. अब यदि अधर मुह खोले या न खोले,  शब्दों से कुछ बोले या न बोले, अनुभूतियाँ तो मुखर हो उठेंगी. भाव – भंगिमाओं से तो प्रकट हो ही जायेगा, पुलकित रोम-रोम भेद की बात तो बता ही देंगे – ‘दिन हुये अनगिनत / रातें लंबी अनन्त / जिंदगी वीरान / हर पल एक विराम / मैं अकेली थी / तेरे बिना / मेरे कृष्ण / तुम आ आ ही गए / मेरे, सिर्फ मेरे बनकर’.

परन्तु सभी के लिए प्रेम इतना सुलभ कहाँ? समाधि तो दूर, एहसास और अनुभूति तक मे नहीं. कोरे शब्दों में भी नहीं. अन्वेषी मन इस वास्तविकता को, इस सच्चाई को स्वीकार करता है तभी तो कह पाता है‘इतना आसान कहाँ / शब्दों से जीत पाना / कम से कम / मुझ जैसे नौसिखिये के लिए तो / बिलकुल भी नहीं / और उस पर तुम्हारा प्यार / देखो तो इत्ते दिन हुये / हुबह से रात भी हो आई / पर तुम ना आये / शब्दों तक में कहीं’. यह तो विरह की दारुण स्थिति है. भले ही इस विरहिणी मन को प्रतीक्षा हो पिया मिलन की, लेकिन इसी बहने उसने जान लिया है – प्रेम मिलन की स्थिति, परिस्थिति, परिभाषा और अभिलाषा को. तभी तो किसी को सचेत करती है – ‘ऐ लड़की! / सच्ची बता / तुझे कहीं इश्क तो नहीं हो गया? / इत्ते सारे रंग तो बस / इश्क होने पर ही खिला करते हैं / महबूब से मिलने पर ही उडा करते हैं / सुन पगली! कब्बी इश्क ना करना / ना, कब्बी नहीं / वर्ना ये रंग तुझे कहीं का नहीं छोड़ेंगे / पागल तो तू पहले से ही है / अब क्या मरने का इरादा है?’ सचेत करने वाला यह मन शायद इस बात को नहीं जनता कि जो प्रेम में पागल न हुआ उसने प्यार किया कहाँ? और जो पागल हो गया हो वह मरने से कब डरेगा? यह शारीर तो उपादान मात्र है, इसका महत्व ही क्या? और प्रेम यग्य में यदि आहुति न बन सका तो इसकी उपयोगिता भी क्या? महत्वपूर्ण है तत्व से तत्व का संयोग.
                                                   क्रमशः
                             
                         डॉ. जय प्रकाश तिवारी
                           संपर्क – ९४५०८०२२४०








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