Friday, September 7, 2012


काव्य-संग्रह ‘कस्तूरी’: जैसा मैंने समझा
(भाग - ३)

संकेत और प्रतीक पहुचते हैं शब्दों की सीमा से आगे
दिखलाते हैं राह वहाँ तक, जहाँ शब्द पहुच नहीं पाते
लेकिन चलकर उसके आगे ये प्रतीक भी हैं लड़खड़ाते
निश्चित एक सीमा से आगे, वे भी तो जा नहीं पाते

प्रेम सर्वथा स्वतंत्र है, यह किसी बंधन को नहीं मानता, यदि मानता भी है तो प्रेम के ही बंधन को. यही प्रेम नैतिकता, ईमानदारी, वफादारी बनकर उत्सर्ग के सर्वोच्चशिखर तक पहुचने का साहस – संबल - प्रेरणा देता है. प्रेम तो प्रेम है, उसमे छोटे-बड़े का भेद कैसा? आभासी भेद यदि कही है भी तो इसके स्वरुप में है, संवेदनाओं की सघनता-विरलता में है, अभिव्यक्ति में है, मूल्यों में है. भौतिकता का अपना एक अलग मूल्य है, आधात्मिकता, मानवता का अलग. लेकिन जिसमे मानवता नहीं, इंसानियत नहीं, नैतिकता नहीं, ईमानदारी नहीं, राष्ट्रीयता नहीं... समझ लेना चाहिए वहाँ प्रेम भी नहीं, प्रेम नाम से कुछ और है .. धोखा है .. फरेब है ... छल है .. यही सब मिलकर कुचक्र रचते हैं, निर्मल-पवित्र प्रेम को दागदार-धब्बेदार बनाते है, कलंकित करते हैं. हाँ! इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि प्रेम स्वयं अपने आप में अद्वितीय होता है चाहे कोई भी करे.., चाहे जिसे भी यह हो जाय... रचनाकार के द्वारा प्रस्तुत इस तर्क में पर्याप्त बल है और इससे कोई इंकार नहीं कर सकता कि- ‘प्रेम के विविध रंग-रूप-स्वरुप होते है / और शायद हर कोई इनमे / कभी न कभी ढला भी होता है / रंगा भी होता है, जिया भी होता है / इसलिए प्रेम की व्याख्या का अधिकार / हम किसी से नहीं छीन सकते’. रचनाकार प्रेम का विभाजन, बटवारा, वर्गीकरण नहीं चाहता. प्रेम या तो ‘है’ अथवा ‘नहीं है’. बीच की कोई भी स्थिति उसे स्वीकार नहीं. कवियित्री का आरोपण है मानव समाज से, उसके सामाजिक मूल्यांकन से, जिसे वह पक्षपात-पूर्ण, भेदभाव-पूर्ण मानती है. उसका सीधा-सीधा निहितार्थ है कि प्रेम में भावना-प्राधान्यता से ही उसका मापन होना चाहए, ज्ञान-विज्ञान से नहीं. वह तर्क करती है - ‘कृष्ण ने गीता सार कह दिया / तो वे पारलौकिक की श्रेणी में आ गए / और जो इससे परे हैं, परन्तु प्रेम में रत हैं / क्या उनका प्रेम अमर नहीं? / प्रेम में हर पुरुष कृष्ण स्वरूप है / और हर नारी स्वयं में राधा’. मुझे लगता है यहाँ कुछ विभ्रम की स्थिति है, कृष्ण की अलौकिकता का कारण केवल गीताज्ञान नहीं है. यदि गीताज्ञान को परिदृश्य से हटा भी दिया जाय तो भी उनके व्यक्तित्व और चरित्र में कोई न्यूनता नहीं आने पाएगी. दूसरी बात, गीताज्ञान अर्जुन को कर्त्तव्य बोध करने के लिए दिया गया था, स्वयं उसके अनुरोध पर. कर्त्तव्यपरायणता और लोकमंगल ही तो प्यार है, प्रेम है. इसका संकेत ऊपर किया भी जा चुका है. हाँ, जहाँ तक राधा-कृष्ण के प्रेम की बात है, वह अलौकिक है. संसारी नही, दैहिक नहीं, भौतिक नहीं. अध्यात्मिक है. और यही प्रेम का अपना मानक भी है. इसी मानक से अभी तक प्रत्येक प्राणी के प्रेम को मापा गया है और आगे भी आदर्श प्रेम का यही मापन बना रहेगा सदियों तक. यदि कोई कृष्ण और राधा सा उदहारण प्रस्तुत कर सके तो निश्चित ही वह समक्ष मन जायेगा. लेकिन यह सरल नहीं... प्रथम स्थिति में तो यह आग की दरिया है जिसमे डूबकर उसपार प्रियतम के पास जाना पड़ता है. प्रेम की प्रौढता में कहीं आने-जाने की आवश्कता भी नही पड़ती. जब भी जी चाहा, दिल का पर्दा उठाया और दीदार कर ली. सर्वोच्च अवस्था वह है जब दोनों एकाकार हो जाते है, तब पहचान कठिन हो जाती है, कौन है राधा? और कौन है कृष्ण? वास्तव में राधा कोई अलग व्यक्तित्व नहीं, वह कृष्ण की चिति-शक्ति है, प्रेरणा है और गति भी. जिस प्रकार ‘शक्ति’ के बिना ‘शिव’ भी शव हैं, उसी प्रकार राधा के बिना कृष्ण का भी मूल्य नहीं. गीता की अभिव्यक्ति में राधातत्व का ही प्रस्फुटन है, गीता-ज्ञान राधा है, अर्जुन का साख्य-भाव राधा है, उसकी जिज्ञासा, प्रेरणा भी राधा-शक्ति ही है. अर्जुन के प्रेरित करने वाली भावना-शक्ति भी राधा-शक्ति ही है. इन सभी शक्तियों का स्त्रीलिंग वाचक होना इसका स्पष्ट संकेत है. कोई समझ पाए, न समझ पाए, यह अलग बात है.

यह तो सत्य है कि प्रेम का कोई स्वरुप नहीं होता. कोई आकार नहीं होता, कोई लिंग नहीं होता. प्रेम तो इतना सरस और तरल है कि जिस पात्र से यह जुड़ता है उसी का रूप-स्वरुप, आकार-प्रकार-लिंग ग्रहण कर लेता है. इस लिए प्यार कि परिभाषा अत्यंत कठिन है. फिर भी यदि परिभाषित करना ही पड़े तो कहा जा सकता है कि प्यार अनुराग और अनुभूति का वह संगठित-संघनित भाव है जो शिशु के साथ ‘वात्सल्य’, बालक के साथ ‘स्नेह’, युवा के साथ ’प्रेम’, बड़ों के साथ ‘अभिवादन’, माता-पिता के साथ ‘श्रद्धा और अपने आराध्य के साथ ‘भक्ति’ के रूप में प्रकट और व्यवहृत होता है. और इसके बदले में जो वापस मिलता है अभिवादन’ और ‘आशीर्वाद’ के रूप में वह भी तो प्यार ही है. इस प्यार के अनेक रूप हैं.. यहाँ तक कि नफ़रत – ईर्ष्या – द्वेष भी नकारात्मक प्यार ही है. यदि प्यार प्रेरक शक्ति है, तो ये सभी प्यार के ही रूप-स्वरुप है. उद्देश्य और लोक मंगल की दृष्टि से एक सृजनात्मक है तो दूसरा विध्वशात्मक. सृष्टि का सृजन ही प्रेम का परिणाम है, इसलिए विध्वंश को प्रेम का रूप नहीं माना जाता. लौकिक दृष्टि से, विधि-व्यवस्था की दृष्टि से तो यह विभाजन उचित है लेकिन तात्विक दृष्टि से, आध्यात्मिक दृष्टि से नहीं.

यह युवा वर्ग प्रेम को परंपरागत रूप से अनुकरण करना नहीं चाहता. वह प्रश्न और प्रतिप्रश्न करता है- बेहिचक, तर्कपूर्ण युक्ति के साथ. इस तर्कपूर्ण विवेचना का ही परिणाम है निष्कर्ष रूप में यह उपलब्धि – ‘निश्चय ही / प्रेम विराट है / और दृढ भी’. इस उपलब्धि के लिए यह युवावर्ग बधाई के पात्र हैं. प्रेम तर्क का विषय नहीं है, यह माप तौल का विषय भी नहीं है. लेकिन विज्ञान और भौतिकता से प्रभावित युवामन की प्रत्येक कसौटी में कहीं न कहीं विज्ञान की, भौतिकता की, आधुनिकता की झलक मिल ही जाती है. एक कविता जिसका शीर्षक है –‘एक पाती पांचाली के नाम’ उसमे वह प्रेम के सन्दर्भ में एक नए विमर्श को जन्म देती है कि ‘प्रेम बलिदान मांगता है’. क्या प्रेम वास्तव में बलिदान की मांग करता है? यह एक विचारणीय प्रश्न है. बलि देने में वाह्य बल कार्य करता है, इसमें बलि चढ़ाये जाने वाले की एक प्रकार से हत्या की जाती है. यदि केवल बलिदान देने से ही प्रेम की प्राप्ति हो जाय तो यह सौदा महंगा नहीं है. भावना के वशीभूत या उन्माद में, उकसावे में, तंत्र-मन्त्र द्वारा लाभान्वित होने के लिए अथवा लोकलाज से लोग ऐसा कभी-कभी आज भी किया भी करते है, परन्तु क्या वास्तव में उन्होंने यह कृत्य प्रेम में किया है? प्रेम के लिए किया है? प्रेम केपी दायत्व पूर्ती के लिए किया है? उत्तर निश्चित रूप से होगा - ‘नहीं’. प्रेम वलिदान की मांग कभी नहीं करता. प्रेम तो श्रद्धा–भक्ति और समर्पण की वस्तु है, मान-सम्मान-अभिमान, तन-मन-धन, सर्वस्व समर्पण ही प्रेम है, प्रेम का उत्सर्ग है.

राष्ट-प्रेम भी बलिदान की नहीं, उत्सर्ग की ही मांग करता है. समाज में, राष्ट्र में व्याप्त  अत्याचार, अनाचार, भ्रष्टाचार शोषण का सामना करते-करते एक दिन वह स्थिति आ जाती है जब अन्दर सोया पुरुषार्थ भी जागृत हो उठता है. नहीं ... अब ... और नहीं...., बहुत दिन सह लिया.. बहुत ज्यादा सह लिया.. अब और नहीं सहूंगा... मिटा डालूँगा इसे.... अन्याय का यह अस्वीकार बोध मानव-मन को दो विकल्प उपलब्ध कराता है- प्रथम, हम अन्याय और शोषण की ओर से पूरी तरह विरक्त हो जाय, यह मान लें कि हमारे चरों ओर जो कुछ घटित हो रहा है हम उसके सहभागी नहीं है. इसमें कुछ नहीं कर सकते. यह नियति, ऐसा होना था इसलिए हो रहा है. अतएव हमारा कोई दायित्व नहीं. द्वितीय; यह स्थिति अन्याय, शोषण और भ्रष्टाचा से सीधे प्रतिकार और टकराव का है. पहली  स्थिति पलायनवादिता की है, विवशता और पराधीनता की स्थिति है. दूसरी स्थिति अन्याय से आमने-सामने जूझने की स्थिति है जहाँ जीवन का मोह निरर्थक हो जाता है. और मृत्युवरण पहली शर्त बन  जाती है. जहां मृत्यु में उद्देश्य, सौन्दर्य और प्रकाश दिखाई देने लगता है. तब मन बोल ही उठता है- 'पहिला मरण कबूल कर जीवन की छड़ आस', यहाँ मृत्यु की कोई चिंता नहीं और जीवन से कोई मोह भी नहीं. बिना तत्त्वज्ञान के यह होता भी नहीं. वह शक्ति-साहस और ऊर्जा तभी मिलती है जब व्यक्ति में ज्ञान, प्रेम और कर्त्तव्यबोध का उदय होता है. जब ऐसा होता है तो वह अन्याय को सहने से इनकार कर देता है.  इन परिस्थितियों में प्राणोत्सर्ग करना पड़ता है. राष्ट्रीयता को सर्वोपरि और सर्वोच्च मानकर ही अपना अगला कदम उठाना होगा. व्यक्तिगत हितों की, स्वार्थों की, व्यापक हित के लिए होम करना पडेगा. यदि हम राष्ट्र के नाम पर इस दायित्व बोध को समझ सकें तो यही जागृति है, यही आज का आत्मोत्सर्ग है, अह्मोत्सर्ग है. अहंकारोत्सर्ग है, जिसे बलिदान भी प्रायः कह दिया जाता है.. 

यह तो हुआ राष्ट्रप्रेम की दृष्टि से. अब  यदि हम मूल्य की दृष्टि से बात करें, तो मूल्य की दृष्टि से प्रेम सर्वोच्च मूल्य है, यह परमशुभ है. परमशुभ में हिंसा नहीं हो सकता, अतएव कहाँ ही पड़ेगा कि प्रेम कभी भी बलिदान की मांग नहीं करता. प्रेम द्विपक्षीय भी होता है और एक पक्षीय भी... हाँ, प्रेम में प्रेमी-मन अपना उत्सर्ग करता है, अपने को होम करता है, अपने सर्वोच्च आदर्श अथवा आराध्य के आदर्श के लिए. बलिदान और उत्सर्ग के इस सूक्ष्म अंतर को समझना होगा हमें.
                        
                        क्रमशः
                                 डॉ. जय प्रकाश तिवारी
                                  संपर्क – ९४५०८०२२४०

Kasturi
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Anju Anu Chaudhary

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Mukesh Kumar Sinha

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Wednesday, September 5, 2012

काव्य-संग्रह ‘कस्तूरी’: जैसा मैंने समझा (भाग - 2)



वर्णों से हैं शब्द बने, हर शब्द की अपनी है रचना
शब्द बात कहते उतना अर्थ निकलता उससे जितना
कभी – कभी कह लेते उतना, भावार्थ और निहितार्थ
मिल कर समीक्षक तक, भाव अपनी पहुचाते जितना

प्रेम की तीव्रता ही संवेदी मन को जज्बाती बना देता है, जिसे समाज पागल कहने से भी नहीं चूकता. यह समाज जिसे पागलपन और दीवानापन समझता है... वही तो प्रेम की तीव्र अभीप्सा है. यह खोज भी है और प्यास भी, साथ ही उपलब्धि भी. नानक – मीरा - रामकृष्ण परमहंस – चैतन्य – ईशा – सुकरात.. - ब्रूनो -आइंस्टीन... किसको छोड़ा है ज़माने ने, पागल ही तो कहा. पवित्र प्रेम की यही अभीप्सा तलाश करता है अपनी प्रेमी/प्रेमिका को हर संभावित जगह.. घर में, उपवन में, मंदिर में, नदी में, नाव में, जंगल में, कन्दरा में, रेगिस्तान में... और एक शहर से दूर दराज के शहरों को जड़ने वाली ट्रेन में भी. वह भी केवल एकबार नहीं.. कई बार, बार.. आखिर उसकी आस जो बंधी है, विश्वास की डोर टूटती नहीं. हताशा उसे थकाती नहीं, वह रोज, हररोज निकल पड़ता है एक नए विश्वास के सहारे,, विश्वास ही बल और संबल है इस प्रेम का. प्रेम के इस मनोविज्ञान तक युवा की मन की सहज ही पहुच भी है और अभिव्यति भी. तभी आ पाई है प्रकाश में यह रचना ट्रेन का प्रतीक बन कर – ‘रोज रात / आखिरी डिब्बे पर / सर दे मरता है / लडखडाता हुआ / अल्हड पागल’. वह पागल तो है लेकिन उतना नहीं जितना देखने वाला समाज. इस अल्हड को एक दिन समझ आ जाता है, एक रौशनी मिल जाती है जो उसे बोध कराती है लोक और परलोक का, विज्ञानं और प्रज्ञान का. तब वही पागल मन बोल उठता है – ‘मैं जनता हूँ जिंदगी के इस रंमंच पर /  न तुम्हारी इच्छा कोई मायने रखती है / और न मेरी / वैसे ही नाटक में पात्रों का निर्धारण / पात्रों की इच्छा पर नहीं / निर्देशक की इच्छा पर होता है”. यह संसार एक रंग मंच ही तो है और हम आप सभी एक पात्र. जिसे जो भूमिका मिली है उसको उसका निर्वहन करना है. महत्वपूर्ण बात यह है कि जो भूमिका मिली है उसका पूरी निष्ठा, ईमानदारी, समर्पण और पूरे मनोयोग से किया जाय. इसमें व्यवधान या परिवर्तन कि आवश्यकता नही, क्योकि नियम, कानून और ‘कसमे / दीवानों को रोक सकती है दीवानापन नहीं / दीवारें जिस्मों को रोक सकती हैं अहसास नहीं /  समय / मौसम बदल सकता है / प्रेम नही”. अब इसे क्या कहा जाय, प्रेम का लक्षण, प्रेम की परिभाषा या उसका स्वरुप?

प्रेम पर प्रतिबन्ध कोई नई बात नहीं है. प्रत्येक काल, प्रत्येक युग में इसका दमनकारी चक्र चला है. कठिन से कठिन परीक्षा ली है इस प्रतिबन्ध ने, इस समाज ने. लेकिन प्रेमी तो ठहरा प्रेमी ही, उसे डर कैसा? और उसे भय क्यों? जिसके लिए प्रेम पूजा की वस्तु बन गई हो तो उसकी प्राप्ति के लिये झिझक और संकोच कैसा? अन्वेषी मन को ज़माने की प्रतिबन्ध का बोध है. वह अच्छी तरह जनता है कि मिलन संभव नहीं, दीदार भी शायद ही हो. लेकिन प्रतिबद्धता में कमी नहीं, शिथिलता नहीं. यदि आना है तो फिर आना है ... भले ही तेरा दीदार हो या न हो – ‘यह जानते हुये भी कि / तुम / नहीं मिलोगी मुझे / फिर भी मैं आऊंगा तो / और साथ लाऊंगा / अपनी बहुत सारी बेवकूफियां / थोड़े से आंसूं और ढेर सारा दीवानापन’. प्रेमी का यह दीवानापन का स्वरुप इतना महनीय, इतना पवित्र, इतना वन्दनीय और नमनीय कि योग और समाधि के उच्चत्तर अवस्था तक परिव्याप्त है, अपनी पूरी तीव्रता और तन्मयता के साथ. और उसकी साक्षी है यह प्रकृति और उसका प्रतिनिधि यह गलियां – ये चौबारे, सूरज – चाँद – सितारे. उन घटनाओं को यह ‘चाँद / टकटकी लगाये / देख रहा था / हमारे मोद को / मिलन को / प्रेम को / हमारी डूबन को / हमारी समाधि को’. और समाधि में ही तो सहस्रदल कमल खिलता है, योगी अपने आराध्य का साक्षात्कार करता है. उससे एकाकार हो जाता है- ‘शिव और शक्ति’ की तरह, ‘राधा और कृष्ण’ की तरह. अब यदि अधर मुह खोले या न खोले,  शब्दों से कुछ बोले या न बोले, अनुभूतियाँ तो मुखर हो उठेंगी. भाव – भंगिमाओं से तो प्रकट हो ही जायेगा, पुलकित रोम-रोम भेद की बात तो बता ही देंगे – ‘दिन हुये अनगिनत / रातें लंबी अनन्त / जिंदगी वीरान / हर पल एक विराम / मैं अकेली थी / तेरे बिना / मेरे कृष्ण / तुम आ आ ही गए / मेरे, सिर्फ मेरे बनकर’.

परन्तु सभी के लिए प्रेम इतना सुलभ कहाँ? समाधि तो दूर, एहसास और अनुभूति तक मे नहीं. कोरे शब्दों में भी नहीं. अन्वेषी मन इस वास्तविकता को, इस सच्चाई को स्वीकार करता है तभी तो कह पाता है – ‘इतना आसान कहाँ / शब्दों से जीत पाना / कम से कम / मुझ जैसे नौसिखिये के लिए तो / बिलकुल भी नहीं / और उस पर तुम्हारा प्यार / देखो तो इत्ते दिन हुये / हुबह से रात भी हो आई / पर तुम ना आये / शब्दों तक में कहीं’. यह तो विरह की दारुण स्थिति है. भले ही इस विरहिणी मन को प्रतीक्षा हो पिया मिलन की, लेकिन इसी बहने उसने जान लिया है – प्रेम मिलन की स्थिति, परिस्थिति, परिभाषा और अभिलाषा को. तभी तो किसी को सचेत करती है – ‘ऐ लड़की! / सच्ची बता / तुझे कहीं इश्क तो नहीं हो गया? / इत्ते सारे रंग तो बस / इश्क होने पर ही खिला करते हैं / महबूब से मिलने पर ही उडा करते हैं / सुन पगली! कब्बी इश्क ना करना / ना, कब्बी नहीं / वर्ना ये रंग तुझे कहीं का नहीं छोड़ेंगे / पागल तो तू पहले से ही है / अब क्या मरने का इरादा है?’ सचेत करने वाला यह मन शायद इस बात को नहीं जनता कि जो प्रेम में पागल न हुआ उसने प्यार किया कहाँ? और जो पागल हो गया हो वह मरने से कब डरेगा? यह शारीर तो उपादान मात्र है, इसका महत्व ही क्या? और प्रेम यग्य में यदि आहुति न बन सका तो इसकी उपयोगिता भी क्या? महत्वपूर्ण है तत्व से तत्व का संयोग.
                                                   क्रमशः
                             
                         डॉ. जय प्रकाश तिवारी
                           संपर्क – ९४५०८०२२४०








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Tuesday, September 4, 2012

काव्य-संग्रह ‘कस्तूरी’: जैसा मैंने समझा (भाग - १)


    शब्द और अर्थ दोनों का
     सम्बन्ध है अन्योन्याश्रित,
     शब्द का महत्व है अर्थबोध
     लेकिन जिनका अर्थ हम
     नहीं जान पाए हैं अबतक
     क्या वे अर्थहीन हैं? नहीं,
     औचित्य विहीन हैं? नहीं.
     अर्थबोध की विलक्षणता ही
     देती उसे नवऊर्जा नवजीवन.

यह सर्व विदित है कि ‘कस्तूरी’ मृग की नाभिक में ही अवस्थित होता है परन्तु उसकी सुगंध से सुवासित हो मृग-मन भटकता रहता है जंगल में दरबदर, इस कोने से उस कोने तक. उसी कस्तूरी की तलाश में काव्य संग्रह ‘कस्तूरी’ में भटक रहे हैं ब्लाग जगत के श्रेष्ठ युवा चिन्तक-कवि. प्रथम जिज्ञासा तो यही है कि वह कौन सा तत्व है जिसे इन चितकों ने ‘कस्तूरी-तत्व’ की संज्ञा दी है, उस कस्तूरी तत्व की पहचान करना आवश्यक है. संख्या की दृष्टि से इन अन्वेषी चिंतकों की संख्या २४ है. आध्यात्मिक दृष्टि से २४ की संख्या अत्यंत महत्वपूर्ण है, सुप्रसिद्ध गायत्री महामंत्र में २४ अक्षर हैं. २४ घंटे मिलकर दिवस और रात्रि का एक आयाम पूर्ण करते है. समाज की सर्जनात्मक प्रवृर्त्तियाँ ही दिवस है तथा नकारात्मक विध्वसत्मक प्रवृर्त्तिया ही रात्रि. इस सन्दर्भ में दूसरी जिज्ञासा यह है कि ये २४ युवा चिन्तक जिस कस्तूरी-तत्व की खोज में हैं, क्या उन्हें इसकी प्राप्ति हुई  अथवा ये अभीतक भटक ही रहे हैं, कानन मृग की तरह? आगे बढ़ने से पूर्व इन जिज्ञासाओं पर विचार करना अनिवार्य सा जान पड़ता है.

उत्तर को खोज में अन्वेषी मन जब काव्य सागर में उतरा तो उसे अधिक श्रम नहीं करना पड़ा, उसके सूत्र प्रथम रचना में ही दिख गए, तथापि सम्पूर्ण अध्ययन आवश्यक था, अस्तु सूक्ष्म दृष्टि से काव्य की गहराइयों में घुस कर इसकी तलाश, इसका अवगाहन करता रहा. और मैंने पाया कि सामान्य रूप से जो अन्तःधारा इन कवियों की लेखनी का विषयवस्तु बना है, वह है –‘प्रेम तत्व’. विषय नया नहीं है लेकिन कथ्य नया है, तर्क नए हैं और युक्ति तथा शैली में भी नवीनता है. आग्रह और समर्पण के साथ निराशा, विरक्ति और फटकार भी है. लेकिन बहुत अच्छा लगता जब ये युवा मन अपनी बात को निःसंकोच प्रकट कर देते है. उन्हें इस बात कि चिंता नहीं कि साहित्यिक अभिव्यक्ति कि दृष्टि से उन्हें कहाँ स्थान मिलेगा? किस श्रेणी में रखा जायेगा? उनकी रचना को काव्य कहा जायेगा या गद्य काव्य या और कुछ... उनके लिए अभिव्यक्ति ही प्रधान है और यह कोई दोष नहीं है. भाव जब भी उछाल मारता है वह सीमा की परवाह कहाँ करता है? फिर भी ये चिन्तक कहीं भी अमर्यादित नहीं हुये है हैं. इस लेखन दायित्व का उन्होंने सम्यक पालन किया है, ऐसा मैंने पाया है.

इस काव्य संकलन के प्रथम कवि का चयन मात्र संयोग है या सुविचारित, इसे मैं नहीं जनता लेकिन एक अन्वेषी दृष्टि का सूत्रपात यह कवि कर देता है – ‘जिंदगी के सफर में / खुशियों का कोई नगर है / जिसकी तलाश में निकले हैं / जाने वो किधर है / जाने वो किधर है...”. इसी तलाश में, इसी अर्थ्वात्तापूर्ण खोज में वह पा जाता है एक ‘नाम’. यह नाम बहुत बड़ी चीज है. लोग दूध्ते रहते हैं इस जीवन भर, जन्म-जन्मातर तक, परन्तु मिलता नहीं यह नाम. जिसे मिल जाता है वह बोल ही पड़ता है मीरा की तरह – ‘पायो जी मैंने राम रतन धन पायो’, या फिर मौन हो जाता है, बुद्ध की तरह. अथवा सभी सांकेतिक नामों को छोडकर केवल ‘नाम’ को ही रटने लग जाता है, यह नाम ही उसके जीवन में रच-बस जाता है. यह नाम ही पदार्थ है.., नाम ही तत्व है, नाम ही सत्य है. गुरु नानकदेव जी ने इसे सतनाम कहा है – ‘१ ओंकार सतनाम...’ . कवि हैरान है, वह जानना चाहता है इसका कारण. आखिर वह पूछ ही बैठता है – ‘हैरान हूँ तुम्हारे नाम से इतनी मुहब्बत क्यों है? यह मुहब्बत ही है वह ‘कस्तूरी-तत्व’ जो इस काव्य संग्रह का केन्द्रीय विन्दु है और उसी खोज में, इस ‘क्यों’ के उत्तर की तलाश में निकल पड़े है ये युवा कवि, अपनी-अपनी भावनाओं – सम्वेदानाओं के शब्द प्रवाह के साथ. इस प्रवाह में यह स्पष्ट हो जाता है कि यह नाम व्यक्ति वाचक नहीं, समष्टि वाचक है. इस मुहाब्बत का इस कोटि का विस्तार पा जाना ही उनकी प्रगति है जो उन्हें आध्यात्मिकता की कोटि में पंहुचा देती है. फिर उसकी दृष्टि तो यही देखती है कबीर की तरह – ‘लाली मेरे लाल की जित देखूं तित लाल लाली देखन मैं गई मैं भी हो गई लाल’. कवि की दृष्टि भी कुछ ऐसा ही स्वरुप ग्रहण करती है, वह कहता है – ‘तुम्हारे तसव्वुर का साया छाया हुआ है इस कदर / बात किसी से भी करूं मुसलसल ख्याल तू ही तू है / .. हर शेर हर गजल में शामिल तू ही तू है.. ’. इस प्रकार केन्द्रीय ‘कस्तूरीतत्व’ का पूर्ण परिचय प्रथम कवि की संवेदी अभिव्यक्ति से सहज ही हो जाता है. इन रचनाओं में दार्शनिक दृष्टि से सर्वेश्वरवाद और सूफी अद्य्यात्म्वाद की प्रौढ़ झलक इसमें मिल जाती है. यह धारा आगे चलकर कई प्रकार का मोड, आयाम और प्रवाह भी धारण करता है लेकिन अंतर्धारा यही है, प्रेम की धारा. नदी का पाट चौडा होने से कहीं प्रवाह मंद है तो पाट की संकीर्णता में प्रवाह की यह गति अत्यंत तीव्र है.

अनुभूति और जिज्ञासा का यह प्रवाह द्वितीय कवि की रचनाओं में भी मिलाता है, रचनाओं में बोल फूट ही पड़ते है दार्शनिक अंदाज में कुछ यूं – ‘मैं एक हूँ / मैं अनेक भी /  मैं साकार हूँ / कल्पना भी मैं../ मैं खुद चकित हूँ / कौन हूँ / मैं मुखर हूँ / मौन हूँ’. और जब इन प्रश्नों का उत्तर मिल जाता है तो समाज कल्याण के लिए चिल्ला उठता है यही संवेदी मन. अपनी अनुभूतियों संवेदनाओं को वह रोक नहीं पता और स्वर कुछ विद्रोही सा रूप धारण कर लेता है. वह नकारात्मक वृत्तियों का विरोध करता है, उसकी आलोचना करता है – ‘तुमने / कभी नहीं सुना / गुलाब के टेढ़े काँटों का दर्द / नहीं सुनी दरकती जमीन की प्यास / कभी नही देखा आंसुओं का सूख जाना’.
   

                                 डॉ. जय प्रकाश तिवारी
                                  संपर्क – ९४५०८०२२४०


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Thursday, August 30, 2012

पीड़ा: नौकर की


नाम का भूखा नहीं हूँ मैं
धन का भी भूखा नहीं हूँ मैं,
लेकिन कैसे मैं यह कह दूँ
इस कोठी में भूखा नहीं हूँ मैं?

प्रकृति की मार को झेल रहा हूँ
तन पर आघात भी झेल रहा हूँ,
मन को मैं कब का मार चुका हूँ
पगड़ी इस सिर की उतार चुका हूँ.

पड़ गए हैं हाथ में, मोटे छाले
ये पाँव बने बिन पिए मतवाले,
संगीत भी लगता बहुत ही रूखा
आखिर कब तक मैं बैठूं भूखा ?

मालिक कहता, अब घर को जा
थक गया है तू अब वापस जा,
मत बोझ बनो, अब दर पर तू
अब घर को जा, घर को जा तू.

जानता मुझे वह अच्छी तरह
चूस लिया जवानी अच्छी तरह,
खेला जज्बातों से अच्छी तरह
आज बतला दी उसने मुझको
मेरी औकात भी, अच्छी तरह.

इस घर में जब मैं आया था
नादान-सा छोटा एक बालक था,
जब बड़ा हुआ आई यह समझ
उस घर में, तब मैं चालक था.

जिन्हें स्कूल छोड़ने जाता था
वे सब बड़े हुये साहब भी हुये,
बूढा मैं भाजी-सब्जी लाता था
इनके बच्चों को टहलता था.

आज जर्जर मेरा तन-मन है
अपना परिवार भी नहीं बसा,
तय क्या थी मेरी पगार?
यह अब तक मैंने ना जाना.

खाना कपडा सब मिलता था
बातों का सुख भी मिलता था,
सोची न कभी अलगाव की बात
आई मन न कभी दुराव की बात.

अब मन में बहुत कुछ आता है
यह समय, बहुत ही चिढाता है,
तब कहता था मैं, छत है क्या?
समझा मैं आज यह छत है क्या?