Sunday, June 19, 2011
साहित्य और पाठक का मनोविज्ञान
हाथ में आने के बाद कोई भी साहित्य चाहे वह कविता हो, कहानी हो, या आध्यात्मिक सन्देश; जिसे रचा हो किसी अनामदास या भगवानदास ने अथवा किसी नवीनचंद और फकीरचंद ने. इस नाम का कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता. फर्क इसका भी नहीं पड़ता कि इसका रचनाकार कौन है, कोई नया कवि या पुराना घिसा-पिटा कहानीकार, क्योकि पुस्तक हाथ में उठाने से पूर्व पाठक इस ऊहापोह की स्थिति और ग्रन्थ चयन की उधेड़बुन से कब का बाहर आ चुका है. अब सर्वाधिक महत्वपूर्ण यह है कि हम उस ग्रन्थ को पढ़ते कैसे हैं ? पढ़ते - पढ़ते सो जाते हैं? जागते हैं अथवा पात्रों पर हँसतें हैं ठहाका लगाकर ? करते हैं विचार, चलो अच्छा हुआ - वह दुष्ट था, विलेन था...मर गया. और वह बच गया. उसे तो अंततः बचना ही था. वह क्यों बच गया.. ? क्योंकि आप जानते हैं अच्छे बुरे का भेद. अच्छे और बुरे की शक्ति को. लेकिन क्या कभी सोचा है आपने, जो पात्र मरा, वह मर क्यों गया ? और आखिर कौन था वह ? क्या हमारे मन का ही, अपने अन्तःपुर का ही विकृत मनोभाव नहीं था ?
क्या समय - समय पर हमने भी जाने -अनजाने समाज से छिप -छिपाकर, कुहासे और अँधेरे में नहीं जिया है वैसा ही जीवन? यदि हाँ तो निश्चित जानिये, एक दिन वह भी आयेग, हमरा - आपका - सबका, जो भी हैं इन प्रवृत्तियों के संवाहक, एक दिन यही हस्र होगा. साहित्य की समझ का एक मात्र निहितार्थ यह है कि हम अपने अन्तः करन के रावण और कंस का वध करें. हँसते तो रहें हैं हम सदियों से, रावण जैसों का पुतला फूंककर. परन्तु प्रत्येक वर्ष वह आ धमकता है पूरे दल -बल और चमक -दमक के साथ. जब तक हम हँसते रहेंगे वाह्य रावण पर, रावण मरेगा नहीं .... और बढ़ेगा. आज रावण गली - गली में है, चौराहे - चौराहे पर है. अब तो वह घरों में भी प्रवेश कर चुका है और कर लिया है कैद उसने हमारी सुख - शान्ति को, हमारे चैन, हमारी संवेदनाओं को. कर लिया है अपहृत विश्वास रूपिणी सद्भावरूपी सीता का, और छोड़ दिया कंचन मृग को........उसी कंचन मृग के पीछे हम सब भाग रहें है.....तेज गति से....
राम तो गए थे सीता के आग्रह पर, परन्तु लक्ष्मण गया है, आज का राम पूरा माल हड़प न ले. तीर दोनों छोड़ते है, आपस में लड़ते हैं, एक दूजे को पछाड़ते हैं. यह कहानी या कविता घर-घर क़ी है. रामायण हो या महाभारत या फिर कोई आधुनिक रचना, जो उसे पढता है और हँसता है; समझो कहानी क़ी समझ नहीं है उसे. जो रोता है, कहानी क़ी परख उसे भी नहीं, और जो सीने पर रख कर सो जाता है, अब उसे क्या कहें ? क्या सोचते हैं आप ? वह मूर्ख है.. ? अनाड़ी.. है, कहानी और कविता उसके समझ में नहीं आयी ? अरे! खूब आयी समझ में......इतनी कि खुद पात्र बन गया वह. उसकी मनो विकृतियाँ जो मरने लगीं हैं......., वह पुलिस अधिकारी बने हीरो से बचने का उपाय ढूढने लगी है.
अब हो जाइये सावधान! जो व्यक्ति किसी साहित्य को, कविता या कहानी को सीने पर रख कर सो जाता है या करता है विश्राम. वास्तव में वह मन ही मन हो गया है परेशान ... अब उसका मन ही नहीं तन भी हो गया है शिथिल.. और अब वह कर रहा है आराम. वह भाग रहा है कहानी से, कविता से, सत्य से, दिन के उजाले से, अपने दायित्व और कर्त्तव्यों से...लेकिन कब तक भागेगा ? कहाँ तक भागेगा..? अंततः वह पकड़ा जाएगा और कृत कर्मों का फल पायेगा. लेकिन मूर्ख ही है वह...क्यों ? क्योकि अंततः जो बाजी जीतता है , वह कौन है? अरे! वह भी तो वही है, वह इसे जान ही नहीं पाता. दंड और प्रायश्चित ने उसकी विकृतियों को मार डाला है और वह अब बन गया है - 'कहानी का नायक', 'महा नायक' और 'असली हीरो'. दिव्य पुरुष, पुरुषार्थी और महा-पराक्रमी. और यही अंततः किसी भी कविता, किसी भी कहानी या साहित्य की जीत है. यही बर्बरता पर मानवता का जयघोष है..., विजय नाद है ..., छलकता निनाद है....
नोट: सभी चित्र गूगल के सौजन्य से.
Saturday, June 18, 2011
फूल और दीपक
मंदिर में देखो भक्तों ने नैवेद्य चढ़ाये फूल चढ़ाये दीप जलाये.
अपने सुगंध की मादकता में, हर्षित सब फूल बहुत इठलाये.
मंद पवन के झोंकों से, सुगंध यह दूर दूर तक फैला.
लेकिन जब हुयी हवा प्रतिकूल, सारा सुगन्ध उड़ चला.
तब भी इस प्रतिकूलता में, वह दीपक क्या खूब जला.
अब हुयी हवा प्रचंड मगर, लहर लहर कर दीप जला.
पानी गरज गरज कर बरसा, फिर भी दीपक बुझा नहीं.
तूफ़ान भी कमजोर न था,वह दीपक फिर भी उड़ा नहीं.
उड़े फूल नैवेद्य भी विखरा, लेकिन वह दीपक बुझा नहीं.
हुआ अन्धेरा संभले सब भक्त, कारण दीपक के गिरे नहीं.
हैरान फूल था देख रहा, पूछा वहीँ से ये राज है क्या?
हंसकर बोला नन्हा दीपक, जलेंगे जबतक साथ अपनों का.
सोचूंगा मै तब जब छोड़ेंगे साथ मेरा घी और बत्ती.
जब तक साथ है खूब जलूँगा, बात है बिल्कुल पक्की.
तुम डाली को छोड़ चुके थे, अहंकार से नाता जोड़ चुके थे.
आखिर टिकते फिर भी कितना, साथ अपनों का छोड़ चुके थे.
अपने सुगंध की मादकता में, हर्षित सब फूल बहुत इठलाये.
मंद पवन के झोंकों से, सुगंध यह दूर दूर तक फैला.
लेकिन जब हुयी हवा प्रतिकूल, सारा सुगन्ध उड़ चला.
तब भी इस प्रतिकूलता में, वह दीपक क्या खूब जला.
अब हुयी हवा प्रचंड मगर, लहर लहर कर दीप जला.
पानी गरज गरज कर बरसा, फिर भी दीपक बुझा नहीं.
तूफ़ान भी कमजोर न था,वह दीपक फिर भी उड़ा नहीं.
उड़े फूल नैवेद्य भी विखरा, लेकिन वह दीपक बुझा नहीं.
हुआ अन्धेरा संभले सब भक्त, कारण दीपक के गिरे नहीं.
हैरान फूल था देख रहा, पूछा वहीँ से ये राज है क्या?
हंसकर बोला नन्हा दीपक, जलेंगे जबतक साथ अपनों का.
सोचूंगा मै तब जब छोड़ेंगे साथ मेरा घी और बत्ती.
जब तक साथ है खूब जलूँगा, बात है बिल्कुल पक्की.
तुम डाली को छोड़ चुके थे, अहंकार से नाता जोड़ चुके थे.
आखिर टिकते फिर भी कितना, साथ अपनों का छोड़ चुके थे.
Sunday, June 12, 2011
मिटायेंगे देश से भ्रष्टाचार
जनता के दिल की आवाज हूँ मैं
अब तक था दबा अब नहीं दबूंगा.
जनता के ऊपर नित भ्रष्टाचार
बहुत सहा, अब नहीं सहूंगा..
हो रहे उजागर नित प्रतिदिन
भ्रष्ट आचरण और भ्रष्टाचार.
सुबह उठा और देखा पेपर
सुर्ख़ियों में छाया भ्रष्टाचार..
आचार विचार सब गौड़ हुए
हुआ प्रधान अब भ्रष्टाचार.
अब होती है इसपर चर्चा इतनी
लोकप्रिय न हो जाय भ्रष्टाचार.
रोज रोज जब जाप करोगे
परस्पर विरोधी बातकरोगे.
नियम कानून ताक पे रख
कहीं छा न जाए भ्रष्टाचार.
नयी पीढ़ी दीवानी शार्टकट की
उसे भा न जाए यह भ्रष्टाचार.
है कोढ़ समाज का भ्रष्टाचार.
मिटाना हमे है यह भ्रष्टाचार.
करो बात यदि भ्रष्टाचार की.
एक स्वर से फिर यही बात करो.
लो मिट्टी हाथ और करो संकल्प
मिटायेंगे इस देश से भ्रष्टाचार.
अब तक था दबा अब नहीं दबूंगा.
जनता के ऊपर नित भ्रष्टाचार
बहुत सहा, अब नहीं सहूंगा..
हो रहे उजागर नित प्रतिदिन
भ्रष्ट आचरण और भ्रष्टाचार.
सुबह उठा और देखा पेपर
सुर्ख़ियों में छाया भ्रष्टाचार..
आचार विचार सब गौड़ हुए
हुआ प्रधान अब भ्रष्टाचार.
अब होती है इसपर चर्चा इतनी
लोकप्रिय न हो जाय भ्रष्टाचार.
रोज रोज जब जाप करोगे
परस्पर विरोधी बातकरोगे.
नियम कानून ताक पे रख
कहीं छा न जाए भ्रष्टाचार.
नयी पीढ़ी दीवानी शार्टकट की
उसे भा न जाए यह भ्रष्टाचार.
है कोढ़ समाज का भ्रष्टाचार.
मिटाना हमे है यह भ्रष्टाचार.
करो बात यदि भ्रष्टाचार की.
एक स्वर से फिर यही बात करो.
लो मिट्टी हाथ और करो संकल्प
मिटायेंगे इस देश से भ्रष्टाचार.
Saturday, June 11, 2011
चर्चा-परिचर्चा बुद्ध के पत्रों पर
अत्यंत हर्ष का विषय है कि प्रज्ञा पुरुष महात्मा बुद्ध पर लिखे पत्र "बुद्ध का पत्र यशोधरा के नाम" पर ब्लॉग मनीषियों की सार गर्भित प्रतिक्रियाएं / समीक्षाएं प्राप्त हुईं, उनमे सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रश्न था - 'बुद्ध को तो मुक्ति मिल गयी पर यशोधरा की क्या गति? क्या उसे मुक्ति मिली?" इसी प्रकार के कई और प्रश्न थे जिसके समाधान के लिए "बुद्ध का दूसरा पत्र" नामक रचना अस्तित्व में आयी. इस प्रश्न की समीक्षा में भी कुछ प्रश्न उठे जिसमे सर्वाधिक महत्पोर्ण और विचारणीय प्रश्न था - 'क्या संसार से दुःख मिटा? क्या बुद्ध को मुक्ति मिली?'. इस सन्दर्भ में परिचर्चा को आगे बढाते हुए विनम्रता पूर्वक निवेदन है -
हाँ बुद्ध अभी भी बद्ध,
हुए न अब तक मुक्त
नहीं हुआ पूरा संकल्प
इसीलिए हैं अभिशप्त.
दुःख निरोध नहीं आसान,
वैश्विकस्तर से बड़ा है काम
'मैत्रेय' रूप उन्हें आना होगा,
वादा अपना निभाना होगा.
आज की यशोधरा भी कहाँ
कर रही वचनों का निर्वाह?
लौकिक यश के मोह जाल में
फंस नित हो रही है हैरान.
गौतम ने त्यागा राजपाट,
वह संग्रह में राज्य के जुटी हुयी है,
बुद्ध तो चाहते हैं - 'निर्वाण',
वह भोग में आज भी डूबी हुयी है.
जब तक होगा द्वन्द जगत में
और विरोधाभास...,
अनुभूति के स्तर पर,
तब तक दुःख का आभास.
यदि दुःख को जड़ से मिटाना है,
समता आदर्शों में लाना होगा,
आर्यसत्य हैं नहीं असत्य,
उनके तथ्यों को अपनाना होगा.
पहला सत्य, जगत यह दुखमय,
दूजा, इस दुःख का भी कोई कारण है.
कारण का निदान 'अष्टांग योग',
चौथा सत्य दुःख निरोध संभव है.
और इसी का नाम 'निर्वाण' है.
इसे ही अब अपनाना होगा,
जगत से दुःख भगाना होगा.
निर्वाण ही है सत्य अंतिम.
अंततः सबकी है गति अंतिम.
मेरा निजी विचार:
बुद्ध गौरव हैं भारत भूमि के,
वे ऐतिहासिक पुरुष नहीं,
एक "प्राज्ञ पुरुष" हैं,
स्वयं एक इतिहास हैं,
यह सृष्टि उनकी करुणा
का विकास और विलास है.
नहीं हूँ विरोधी बुद्ध का मै,
उनका 'शील' उनकी 'संयम',
उनकी 'वेदना' उनकी ' प्रज्ञा',
उनका 'बोध' उनकी 'समाधि',
बहुत - बहुत प्रिय है मुझे.
उनके 'चार आर्य सत्य''
उनका 'अष्टांग योग',
उपयोगी ही नहीं....
अनिवार्य तत्व हैं ..
मानवता की स्थापना के लिए.
गंभीर अध्ययन किया है
उनके 'जीवन यान' का..,
'हीनयान' और 'महायान' का भी.
खूब पढ़ा है - 'बोधि सत्व' को,
और नागार्जुन के 'शून्यवाद' को भी.
फिर भी क्यों...? आखिर क्यों..?
सहमत नहीं हूँ मैं, उनके प्रयाण से ...
उनकी परिकल्पना के 'निर्वाण' से...
जीवन तो एक उल्लास है,
इसमें शांति की सहज प्यास है.
.'निर्वाण' तो एक आभास है,
और 'लौ' तो स्वयं प्रकाश है.
कितने वे लगते हैं अच्छे,
जब कहते - "आप्पो दीपो भव".
जब चर्चा करते "बुझ जाने की"
तब विल्कुल बच्चे लगते हैं.
पूछता हूँ स्वयं से एक प्रश्न,
बार - बार फिर बारम्बार,
प्रत्युत्तर में कहीं दूर अन्तः से,
आती है एक स्पष्ट आवाज:
नहीं चाहिए मुझे 'प्रयाण',
यदि अर्थ है इसका बुझ जाना.
मैंने केवल 'लौ' को जाना.
आंधी और तूफ़ान में देखो,
'लौ' को खूब लहराए दीपक,
बुझने से पहले भी देखो;
सौ - सौ दीप जलाये दीपक.
मुझको यह दीपक है प्यारा,
प्यारा इसका जलते रहना.
इस जलते दीपक की खातिर,
जन्म - मृत्यु सब कुछ है सहना.
हाँ बुद्ध अभी भी बद्ध,
हुए न अब तक मुक्त
नहीं हुआ पूरा संकल्प
इसीलिए हैं अभिशप्त.
दुःख निरोध नहीं आसान,
वैश्विकस्तर से बड़ा है काम
'मैत्रेय' रूप उन्हें आना होगा,
वादा अपना निभाना होगा.
आज की यशोधरा भी कहाँ
कर रही वचनों का निर्वाह?
लौकिक यश के मोह जाल में
फंस नित हो रही है हैरान.
गौतम ने त्यागा राजपाट,
वह संग्रह में राज्य के जुटी हुयी है,
बुद्ध तो चाहते हैं - 'निर्वाण',
वह भोग में आज भी डूबी हुयी है.
जब तक होगा द्वन्द जगत में
और विरोधाभास...,
अनुभूति के स्तर पर,
तब तक दुःख का आभास.
यदि दुःख को जड़ से मिटाना है,
समता आदर्शों में लाना होगा,
आर्यसत्य हैं नहीं असत्य,
उनके तथ्यों को अपनाना होगा.
पहला सत्य, जगत यह दुखमय,
दूजा, इस दुःख का भी कोई कारण है.
कारण का निदान 'अष्टांग योग',
चौथा सत्य दुःख निरोध संभव है.
और इसी का नाम 'निर्वाण' है.
इसे ही अब अपनाना होगा,
जगत से दुःख भगाना होगा.
निर्वाण ही है सत्य अंतिम.
अंततः सबकी है गति अंतिम.
मेरा निजी विचार:
बुद्ध गौरव हैं भारत भूमि के,
वे ऐतिहासिक पुरुष नहीं,
एक "प्राज्ञ पुरुष" हैं,
स्वयं एक इतिहास हैं,
यह सृष्टि उनकी करुणा
का विकास और विलास है.
नहीं हूँ विरोधी बुद्ध का मै,
उनका 'शील' उनकी 'संयम',
उनकी 'वेदना' उनकी ' प्रज्ञा',
उनका 'बोध' उनकी 'समाधि',
बहुत - बहुत प्रिय है मुझे.
उनके 'चार आर्य सत्य''
उनका 'अष्टांग योग',
उपयोगी ही नहीं....
अनिवार्य तत्व हैं ..
मानवता की स्थापना के लिए.
गंभीर अध्ययन किया है
उनके 'जीवन यान' का..,
'हीनयान' और 'महायान' का भी.
खूब पढ़ा है - 'बोधि सत्व' को,
और नागार्जुन के 'शून्यवाद' को भी.
फिर भी क्यों...? आखिर क्यों..?
सहमत नहीं हूँ मैं, उनके प्रयाण से ...
उनकी परिकल्पना के 'निर्वाण' से...
जीवन तो एक उल्लास है,
इसमें शांति की सहज प्यास है.
.'निर्वाण' तो एक आभास है,
और 'लौ' तो स्वयं प्रकाश है.
कितने वे लगते हैं अच्छे,
जब कहते - "आप्पो दीपो भव".
जब चर्चा करते "बुझ जाने की"
तब विल्कुल बच्चे लगते हैं.
पूछता हूँ स्वयं से एक प्रश्न,
बार - बार फिर बारम्बार,
प्रत्युत्तर में कहीं दूर अन्तः से,
आती है एक स्पष्ट आवाज:
नहीं चाहिए मुझे 'प्रयाण',
यदि अर्थ है इसका बुझ जाना.
मैंने केवल 'लौ' को जाना.
आंधी और तूफ़ान में देखो,
'लौ' को खूब लहराए दीपक,
बुझने से पहले भी देखो;
सौ - सौ दीप जलाये दीपक.
मुझको यह दीपक है प्यारा,
प्यारा इसका जलते रहना.
इस जलते दीपक की खातिर,
जन्म - मृत्यु सब कुछ है सहना.
Saturday, June 4, 2011
बुद्ध का दूसरा पत्र
तू मेरे प्रथम -ज्ञान की प्रतिमा
तेरे स्फुलिंग मेरी ज्योति जली.
देखा जगत को अग्नि में जलते
क्या 'यश' मेरी भी जल जाएगी?
क्या जायेगी सूख ये बगिया मेरी
ये वाटिका आज जो है हरी-भरी.
सच मनो तेरे चिंतन ने ही मेरे
अंतर्मन में अति उत्साह भरी.
तुझे अजर अमर-अजीर्ण बनाने
छोड़ के प्रासाद निकल पड़ा हूँ.
दवा तेरी जग - दंश हरेगा ,
धरा की यश का सुयश होगा .
नहीं चाहता था तुझे खोना
अब भी नहीं चाहता हूँ खोना.
लेकिन खोना और पाना क्या
बिना 'निर्वाण' सब खुछ सूना.
एक प्रतनिधि छोड़ मैं आया हूँ
तेरे मन को वह बहलायेगा.
लेकिन वह भी मोह ही ...है..
'निर्वाण' में बाधा लाएगा....
जब तू सचेत हो जायेगी
मुझे दोष न तब दे पाएगी.
मेरा क्या, मै तो करूंगा
प्रतीक्षा तेरी! चिर प्रतीक्षा.
तुझे सिद्धार्थ बनकर जीना है
दायित्व मातु-पिता का ढोना है.
तुझको फिर बुद्ध बना करके
धरा के यश को फैलाऊंगा .
तुम नहीं केवल यशोधरा
तुम तो इस धरा की यश हो.
ढूंढो तुम निर्वाण जगत में
मैं पथ -निर्वाण जगत को दूंगा .
हम और तुम नहीं हैं दो
यह अंतर केवल जगत बीच .
'निर्वाण जगत' में भेद नहीं
अनंत ये सारा शून्य बीच .
अनंत और शून्य दो अति वाद हैं
इन अतिवादों से हमें बचना है.
अपनाना है हमको मध्य मार्ग
माध्यम का आदर्श बताना है.
एक बार हूँ चाहता फिर बतलाना
अविश्वास नहीं तुम मुझपर लाना.
जब तक जगत में दुःख होगा
यह बुद्ध नहीं फिर मुक्त होगा.
तेरे स्फुलिंग मेरी ज्योति जली.
देखा जगत को अग्नि में जलते
क्या 'यश' मेरी भी जल जाएगी?
क्या जायेगी सूख ये बगिया मेरी
ये वाटिका आज जो है हरी-भरी.
सच मनो तेरे चिंतन ने ही मेरे
अंतर्मन में अति उत्साह भरी.
तुझे अजर अमर-अजीर्ण बनाने
छोड़ के प्रासाद निकल पड़ा हूँ.
दवा तेरी जग - दंश हरेगा ,
धरा की यश का सुयश होगा .
नहीं चाहता था तुझे खोना
अब भी नहीं चाहता हूँ खोना.
लेकिन खोना और पाना क्या
बिना 'निर्वाण' सब खुछ सूना.
एक प्रतनिधि छोड़ मैं आया हूँ
तेरे मन को वह बहलायेगा.
लेकिन वह भी मोह ही ...है..
'निर्वाण' में बाधा लाएगा....
जब तू सचेत हो जायेगी
मुझे दोष न तब दे पाएगी.
मेरा क्या, मै तो करूंगा
प्रतीक्षा तेरी! चिर प्रतीक्षा.
तुझे सिद्धार्थ बनकर जीना है
दायित्व मातु-पिता का ढोना है.
तुझको फिर बुद्ध बना करके
धरा के यश को फैलाऊंगा .
तुम नहीं केवल यशोधरा
तुम तो इस धरा की यश हो.
ढूंढो तुम निर्वाण जगत में
मैं पथ -निर्वाण जगत को दूंगा .
हम और तुम नहीं हैं दो
यह अंतर केवल जगत बीच .
'निर्वाण जगत' में भेद नहीं
अनंत ये सारा शून्य बीच .
अनंत और शून्य दो अति वाद हैं
इन अतिवादों से हमें बचना है.
अपनाना है हमको मध्य मार्ग
माध्यम का आदर्श बताना है.
एक बार हूँ चाहता फिर बतलाना
अविश्वास नहीं तुम मुझपर लाना.
जब तक जगत में दुःख होगा
यह बुद्ध नहीं फिर मुक्त होगा.
Thursday, June 2, 2011
भ्रष्टाचार: महिमा पोटली की

बधी रहती थी घिग्घी सदा जिनकी हमसे
खड़े हो गए देखो आज वे कैसे तन के ?
रहते थे घुसकर बिलों में कभी जो.
अब करते हैं बाते वे देखो अकड़ के.
खुला राज जब भौचक्के हुए हम.
यह उनका नहीं ये दम हैं पोटली के.
ये दौलत की पोटली जो करा दे वो कम है.
सही फाइलों को भी झटक देते हैं झट से.
अब आदत इतनी बिगड़ गयी है उनकी.
फेंक देते हैं वे पोटली जो हल्की पलट के.
Sunday, May 22, 2011
बुद्ध का पत्र यशोधरा के नाम
बुद्ध का पत्र यशोधरा के नाम
मन मेरा भी घबराया था.
रह रह के मन फिर सोचता है
औचित्य का प्रश्न कचोटता है.
मन पर हठ का जोर लगाया
व्रत उपवास का राह दिखाया.
लेकिन चला न कोई जादू
बार बार मन हुआ बेकाबू.
मृदुल हास परिहास ने तेरे
मुझको ऐसा नाच नचाया.
सुस्त सुनी और शांत मन को
चंचल और गतिशील बनाया.
लुट गयी नीद रात की मेरी
दिन का भी सुख चैन छिना.
सूना - सूना सब लगता है,
अन्दर बाहर एक तेरे बिना.
पहले तो ऐसी बात नहीं थी
क्या मन के अन्दर चाह नहीं थी?
किया अंतर सब इस दूरी ने
क्या संवेदना और जज्बात नहीं थी?
इस दूरी में क्या बात है ऐसी?
क्यों विह्वलता - चंचलता ऐसी?
गति से इसको क्या माप सकेंगे?
इस हास की कीमत जान सकेंगे?
इस एक हास की खातिर ही
दौड़े थे राम ' मृग' के पीछे.
इस एक हास की खातिर ही
भागे मधुसूदन 'मणि' के पीछे.
इस हास में इतना जादू क्यों?
परिहास में मन बेकाबू क्यों?
हास-परिहास सब मन के भाव
जब पूरित मन तब नहीं अभाव.
मैं क्यों भागू इसके पीछे?
क्या मिला उन्हें जो भागे थे?
उनको भी क्या मिल गया?
छल - वैर- घृणा जो साधे थे.
सब कुछ मन की ही माया है
कहीं खिला धूप कहीं छाया है.
मन को वश में करना होगा
इसकी चंचलता को हरना होगा.
थमती चंचलता - 'आक्टेट' से,
थमती चंचलता - 'अष्टांगयोग' से.
थमती चंचलता - 'यम-नियम' से,
थमती चंचलता - 'योग -क्षेम' से.
तुझे सोता छोड़ जब आया था
तब मेरा मन घबराया था.
अब मन में नहीं कोई हलचल
थम गया अंतर का कोलाहल.
जो तोड़ चुका जग बंधन को
वह कैद में क्या रह पायेगा?
आर्यसत्य और बोधिसत्व को
जन - जन तक फैलाएगा.
मन को पाषण करना होगा
धारण 'निर्वाण' करना होगा.
आर्य सत्य पहचानना होगा
अंतिम सत्य को जानना होगा.
निर्वाण ही सत्य है अंतिम
अंततः सबकी गति है अंतिम.
जब तक धारा पर दुःख होगा
यह बुद्ध नहीं फिर मुक्त होगा.
दुख धरा से वह मिटाएगा
सबको पद 'निर्वाण' दिलाएगा.
शब्द संकेत / निहितार्थ
'
आक्टेट' = रसायन विज्ञान के अक्रिय गैस की स्थिति जहां इलेक्ट्रान की चंचलता थम जाती है.
'अष्टांगयोग' = यह बौध दर्शन की साधना प्रक्रिया है.
'यम-नियम' = यह योग दर्शन की अष्टांग साधना क्रिया है.
योग -क्षेम' = यह गीता का दर्शन है.
निर्वाण = यह मुक्ति की अंतिम अवस्था है जहां से पुनः जन्म की, दुःख की सारी संभावनाएं समाप्त हो जाती है ठीक उसी प्रकार से जैसे भुने चने से अंकुरण की सारी संभावना समाप्त हो जाती है.
मृग = रामायण का चर्चित स्वर्ण मृग.
'मणि' = पौराणिक चर्चित कौस्तुभ मणि
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