Wednesday, April 13, 2011

बड़ा कौन-'ज्ञान' या 'परिकल्पना'?


ज्ञान बड़ा है या परिकल्पना?
बोध बड़ा है या कोई संरचना?
अस्तित्व बड़ा या है संरचना?
विचार बड़ा है या कोई रचना?

ज्ञान है; विज्ञान और बोध द्वारा
परीक्षित - प्रमाणित एक नाम.
और स्वयं विज्ञान क्या है?
परिकल्पनाओं का परीक्षण.
और क्या? तथा अस्तित्व है -
इन्हीं मापकों का मापन.
प्रमाणों को भी 
प्रमाणित करनेवाला प्रमाण.

और दृश्यमान यह कृत्रिम संरचना?
यह है विज्ञान का लाडला पुत्र,
'तकनीक', जिसके एक हाथ में 
है -'ध्वंस' और दूसरे में 'सृजन'.

'विज्ञान' ज्ञानरूप में तो है -
निश्छल - निर्वैर और निस्पृह.
परन्तु तकनीक रूप में भयावह.
उसके ट्रिगर और बटन पर
है शासन संकल्प और 
परिकल्पनारूपी उँगलियों का.

परिकल्पना, जिसके मूल में है
एक चाहत, जो होता है विकसित
आचार से, संस्कार से, विचार से.
कि वह विश्व पर करना चाहता है 
शासन या बनता है विश्वामित्र.
भाई को समझता है शत्रु या मित्र.   

विज्ञान तो है बूढा - लाचार,
थमा दी है उसने अपनी
मशाल बन्दर के हाथ में.
और बन्दर जिसका अपना 
कोई घर नहीं होता.. जब भी 
जलाएगा दूसरे का ही छप्पर.
श्रम-श्वेद से निर्मित कुटिया.
किन्तु बन्दर को इससे लेना क्या,
डूबे जिस भी गरीब की लुटिया.

विज्ञान मौन है,
तकनीक अश्वत्थामा रूपी 
विज्ञान का वह ब्रह्मास्त्र है 
जिसे छोड़ा तो जा सकता है
परन्तु लौटाया नहीं जा सकता.

तो कौन संभालेगा-
विज्ञान के इस बिगडैल पुत्र को?
अरे वही जिसने मोड़ी था दिशा,
अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्र का -'कृष्ण'.
आज वही मोड़ेगा विज्ञान के 
इस बिगडैल के अस्त्र को.
आज का कृष्ण है -
'नैतिकता' और 'इंसानियत'.
'मानवता', 'दिव्यमानव' की 
संकल्पना और परिकल्पना.

हाँ, परिकल्पना जो है देन,
चिन्तक और चिंतन की.
दार्शनिक और दर्शन की.
यह चिंतन ही बन जाता है -
आवश्यक परीक्षण के पश्चात 
एक सुनिश्चित ज्ञान, विज्ञान.

हां, परिकल्पना ही है -
सदियों पहले, ज्ञान और विज्ञान के,
मध्य में भी है, ज्ञान और विज्ञान के,
है पश्चात भी, ज्ञान और विज्ञान के.
यह परिकल्पना ही खेल है
उस निर्गुण - निराकार का भी,
जो खेलता है खेल, करता है लीला;
धारण कर विविधरूप सगुण-सरूप का.

Sunday, April 10, 2011

आत्मोत्सर्ग का स्वरुप


 
श्रद्धेय श्री अन्ना जी के समर्थन में १४ फ़रवरी को blog 'प्रज्ञान विज्ञान' पर तथा मासिक पत्रिका 'युग गरिमा' लखनऊ से प्रकाशित, के मार्च २०११ अंक में प्रकाशित रचना का पुनः प्रकाशन. इस रचना में कहीं न कहीं उसी भावनावों को जागृत करने की सदीच्छा है जो आज पूरे देश ने कर  दिखाया. यह रचना ब्लॉग जगत की ओर से श्री अन्ना जी को ही सादर समर्पित.

समाज में व्याप्त अत्याचार, अनाचार, भ्रष्टाचार शोषण का सामना करते -करते एक दिन वह स्थिति आ जाती है जब अन्दर सोया पुरुषार्थ भी जागृत हो उठता है. नहीं ...अब ...और नहीं...., बहुत दिन सह लिया..बहुत ज्यादा सह लिया..अब और नहीं सहूंगा...मिटा डालूँगा इसे....अन्याय का यह अस्वीकार बोध मानव मन को दो विकल्प उपलब्ध कराता है - प्रथम, हम अन्याय और शोषण की ओर से पूरी तरह विरक्त हो जाय, यह मान लें कि हमारे चरों ओर जो कुछ घटित हो रहा है हम उसके सहभागी नहीं है. हम कुछ नहीं कर सकते. अतएव हमारा कोई दायित्व नहीं. द्वितीय, यह स्थिति अन्याय, शोषण और भ्रष्टाचार से सीधे प्रतिकार और टकराव का है. पहली  स्थिति पलायनवादिता है, विवशता और पराधीनता की स्थिति है. दूसरी स्थिति अन्याय से आमने - सामने जूझने की स्थिति है जहां जीवन का मोह निरर्थक हो जाता है. और मृत्यु का वरण पहली अनिवार्य शर्त बन  जाती है.जहां मृत्यु के अनजाने भय में भी दायित्व का सौन्दर्य और विवेक का प्रकाश दिखाई देने लगता है. मन बोल ही उठता है - 'पहिला मरण कबूल कर जीवन की छड़ आस', यहाँ मृत्यु की कोई चिंता नहीं और जीवन से कोई मोह भी नहीं. बिना तत्त्वज्ञान के यह होता भी नहीं, वह शक्ति -साहस और ऊर्जा तभी मिलती है जब व्यक्ति में ज्ञान और दायित्व का, कर्त्तव्यबोध का उदय होता है. जब ऐसा होता है तो वह अन्याय और भ्रष्टाचार को सहने से इनकार कर देता है. यह स्थिति  पहले भी कई बार आयी है ..और आज भी आ उपस्थित हुई है.... 

परन्तु आज परिस्थितिया बदल गई है, शस्त्र नहीं उठाना है, अपना काम नियम - कानून और संविधान की परिधि में रहकर पूर्णतया अनुशासित ढंग से करना है. इसके लिए एक मात्र ब्रह्मास्त्र है -"वोट का अधिकार'. सोच-समझकर इसका प्रयोग करना है. हमें बलिदान भी देना होगा, शीश भी कटाना होगा: परन्तु वह शीश होगा जातिवाद का, क्षेत्रवाद का, धर्मवाद का, अलगाववाद का. हमें कुनबे की छोटी सोच की कुर्बानी देनी होगी. राष्ट्रीयता को सर्वोपरि और सर्वोच्च मानकर ही अपना अगला कदम उठाना होगा. व्यक्तिगत हितों की, स्वार्थों की, व्यापक हित के लिए होम करना पडेगा. यदि हम राष्ट्र के नाम पर इस दायित्व बोध को समझ सकें तो यही जागृति है, यही आज का आत्मोत्सर्ग है, अह्मोत्सर्ग है. अहंकारोत्सर्ग है, बलिदान है.. आखिर आप इस देश के संवेदनशील नागरिक हैं, जागरूक है, शूर वीर है. ऐसे ही शूर-वीरों के लिए कबीर ने कहा था कभी - 'सूरा सोई सराहिये जो लड़े दीन के हेतु / पुर्जा पूर्जा कटि मरे ताऊ न छड़े खेत //' . यहाँ मरना नहीं है, मन को मारना है, वह भी स्व के लिए, सर्व के लिए जूझना है मैदान छोड़कर भागना नहीं है..

हम चार दीवारी के अन्दर भले ही हिन्दू रहे या मुसलमान , चार दीवारी  के बाहर हम भारतीय हैं और केवल भारतीय हैं.. आज का राष्ट्रधर्म और व्यक्ति धर्म दोनों ही यही है. यहाँ केवल सृजन है...., निर्माण है..., नवीन भारत का पुनर्जागरण है. यह किसी राजनीतिक की भाषा या प्रचार प्रसार नहीं, अपने अंतर्मन की आवाज है जो सिर्फ मित्रों और दोस्तों को हो सुनायी जा सकती है, दूसरों को नहीं. आज यही कार्य एक दायित्व मानकर राष्ट्रीयहित में एक आह्वान और एक निवेदन दोनों है. हमें अवांछनीय कार्यो को दृढ़ता से रोकना होगा. शार्टकट के सारे रास्ते और सुविधाशुल्क के प्रचलन पर दृढ़ता से रोक लगाना होगा. कम से कम हम स्वयं तो यह कार्य न करें. न अपनों को करने दे. संख्या हमारी अवश्य बढ़ेगी. आखिर हम भ्रष्टाचार, अनाचार, अत्याचार को कब तक सहें........क्यों सहें .......? 

Sunday, April 3, 2011

अध्यात्म में छिपा: विज्ञान कहानी

अध्यात्म में छिपा: विज्ञान कहानी


पुष्प -1

मुझे इस बात को स्वीकार करने में थोड़ी भी हिचक नहीं है कि इस 'अध्यात्म में छिपी हुई विज्ञान कहानी' को ढूढने की प्रेरणा को एक अतिरिक्त ऊर्जा, सहस और बल श्री अरविन्द के इस अन्वेषी विचार से मिला. श्री अरविन्द अपने ग्रन्थ 'मानव चक्र' में यह क्रांतिकारी विचार लिखते हैं -
"हमारे लिए कविता बुद्धि तथा भावना का विलास मात्र है, कल्पना एक खिलौना तथा आमोद-प्रमोद की वस्तु, हमारा मन बहलाने वाली नर्तकी है. परन्तु प्राचीन लोगों के लिए कवि द्रष्टा होता था, अन्तर्निहित गूढ़ तथ्यों का उदघाटन करने वाला ऋषि, और कल्पना राजदरबार में नाचनेवाली नर्तकी न होकर भगवान के मंदिर की पुजारिन होती थी. दुरूह तथा छिप्र हुए सत्यों को मूर्तिमान करना उसका निर्दिष्ट कार्य था; मगढ़ंत तानाबाना बुनना नहीं. वैदिक शैली में रूपक या उपमा भी गंभीर अर्थों में प्रयोग किया गया है और उससे विचारों के लिए आकर्षक अलंकारों के सुझाव देने की नहीं, अपितु किसी वास्तविकता को भलीभांति दर्शाने की ही आशा की जाती थी."    
 
  -(मानव चक्र, पृष्ट - ५)

अध्यात्म और साहित्य के क्षेत्र में 'वशिष्ठ' और 'विश्वामित्र' दोनो ही बहुचर्चित और बहुआयामी व्यक्त्तित्ववाले ऐतिहाहिक और पौराणिक नाम है. इनके आपसी संबंधों और संदर्भो पर अनेक छोटी- बड़ी कहानियाँ ग्रंथों, साहित्य और लोक-कथाओं में गद्य और काव्य दोनों विधाओं में व्यापक रूप से मिलती हैं. इन कथाओं में एक प्रमुख कथा विश्वामित्र द्वारा वशिष्ठ के पुत्रों का वध करके उनकी प्रिय गाय नंदिनी (कामधेनु) को बलात छिन लेने का प्रसंग सर्वाधिक प्रसिद्द है. आध्यात्मिक प्रवचनों में व्यासपीठ से इसकी तरह-तरह की विवेचना आचार्यों द्वारा की जाती रही है.परन्तु जब हम तर्क और ज्ञान के आलोक में लीक हटकर गहराई में सोचते हैं तो हमें इस कथानक में एक वैज्ञानिक कहानी, उसके सूत्र, उसकी विधियों /सिद्धांतों का प्रस्फुटन स्पष्ट रूप से होने लगता है.
       
संदर्भि कथा संक्षिप्त रूप में इस प्रकार है- जब विश्वामित्र ने वशिष्ठ के सौ पुत्रों का वध करके उनकी प्रिय गौ का अपहरण कर लिया तो पुत्र शोक में वशिष्ठ ने आत्म हत्या करनी चाही. उन्होंने कई बार प्रयास किया परन्तु मरे नहीं. परेशान होकर अंतिम बार अपने को पाश (रस्सी) में बाँध कर उरिंजिरा नदी में प्रविष्ट को गए. परन्तु वहाँ भी उसे मृत्यु नसीब नहीं हुई, मरे नहीं. अंतिम बार संकल्प बद्ध होकर अपने को बंधन में जकदकर नदी में प्रविष्ट हो गए. परन्तु आशा के विपरीत वे उस पाश और बंधन से मुक्त होकर 'विपाश' हो गए. जनश्रुति है कि तभी से इस नदी का नाम विपाशा पड़ गया.  पंचम वेद कहे जानेवाले महाभारत के आदिपर्व में यह कहानी इस प्रकार वर्णित है  -
 
वसिष्ठो घातितान श्रुत्वा विश्वामित्रेण तान सुतान /
धारयामासं    तं    शोकं    महाद्रिरिव    मेदितिम  //   (१७३.४३)
चक्रे    चात्म    विनाशाय   बुद्धिं   स     मुनिसत्तम /
न  त्वेव   कौशिकोच्छेदम   मेने   मतिमतां  वाराह //   (१७३.४४)
स   मेरु    कूटादात्मानाम    मुमोच   भगवा   न्रिषिः  /
गिरेस्तस्य    शिलायम   तु    तुलाराषा  विवापतत  //  (१७३.४५)
स    समुद्रम    अभिप्रेक्ष्य    शोकाविष्टो    महामुनिः  /
बध्वा   कंठे   शिलाम   गुर्वी   निपपात   तदाम्भसि  //  (१७३.४८)
...........
इस कहानी में बशिष्ठ, विश्वामित्र, गौ तथा वशिष्ठपुत्र मुख्य पात्र हैं. यदि प्रयुक्त संज्ञावाचक शब्दों के एक से अधिक अर्थ हो तो निश्चित रूप से कहानी का स्वरुप और निहितार्थ भी बदल जायेगा. सुविधा के लिए हम इन शब्दों के प्रचलित अर्थ से भिन्न अन्य अर्थों को ढूढ़ते हैं -
वशिष्ठ:
(i) निरुक्त के अनुसार वशिष्ठ का अर्थ है, जल (आपः) के  संघात से आच्छादित रहने वाला - "वशिष्ठो अप्याच्छादित उदतसंघात वसुमतम ". (५.१४)
(ii) शतपथ ब्राह्ममण के अनुसार जो अन्धकार में व्यापक रूप से निवास करता है, वह है वशिष्ठ. - "तद वस्त्रीतमो वसति तेनो वशिष्ठ". (८.१.१.६.)

विशिष्ठ पुत्र:
उपरोक्त सन्दर्भ में वशिष्ट पुत्र जल के पुत्र छोटे अंश, जल बिंदु के अर्थ में लेना समीचीन और यथोचित होगा.

विश्वामित्र:
सर्वप्रकाशक, ऊर्जा का अजस्रस्रोत होने के कारण आदित्य सूर्य ही विश्व का असली मित्र होने के कारण विश्वामित्र है. 'विष्णु सहस्रनाम' में आदित्य (सूर्य) को विश्वामित्र कह कर ही सम्बोघित किया गया है.

गौ:
गौ शब्द के विभिन्न अर्थ हैं, इसका एक अर्थ पृथ्वी भी है. निघत्तु (१.१) में इसे "गौ पृथ्वीनाम " कहकर इसे स्पष्ट भी किया गया है.

अब इन बदले हुए अर्थों और सन्दर्भों में यह कहानी इस प्रकार कही जा सकती है. सृष्टि की प्रारंभिक अवस्था में जब , रात्रि जैसे गहन अंधकार में जलमग्न / जलबूंदों से आच्छादित पृथ्वी को, तेजस्वी सूर्य ने प्रभात होते ही इन जलबूंदों को विनष्ट कर डाला और पृथ्वी को मुक्त करा लिया. पृथ्वी को जलबूंदों से मुक्त करना ही इसे ही वशिष्ठ पुत्रों की हत्या कर एस पृथ्वी "गौ' का अपहृत करना कहा गया है. विभिन्न ऋतुओं और मौसम के बदलते क्रम में यह पृथ्वी जीवन तथा धन - धान्य से परिपूर्ण हो कामधेनु बन गयी.

वहीँ पुत्र जलांश (वशिष्ठ) बादल बन कर पर्वतों की चोटियों पर गिरते बरसते नदी-सरिताओं के माध्यम से पुनः समुद्र तक  पहुच  गया. सब  कुछ  हुआ  परन्तु वह मरा नहीं. अब वह वशिष्ठ मेघ के बन्धनों में बंध कर फिर प्रविष्ट हुआ, वर्षा रूप में यह
मेघ के बन्धनों से मुक्त होकर, बंधन मुक्त अर्थात विपाश हो गया और लगातार अस्तित्वमान बना रहा और आज भी अस्तित्वमान है. यह कहानी आज भी बारम्बार दुहराई जा रही है.

इस कहानी को अध्यात्म औत विज्ञान दोनों ने लिखा है, गाया है, समझाया है. साहित्यकारों के लिए भी यह कहानी आकर्षण का केंद्र बनी हुई है. क्या आप बता सकते हैं कि विज्ञान ने इस कहानी का नाम क्या दिया है? ....हाँ. बिल्कुल ठीक पहचाना आपने - 'जल चक्र ' या 'Water Cycle'. इसे निम्नांकित चित्रों के माध्यम से सरलता से समझा जा सकता है -






Monday, March 21, 2011

प्रकृति का रोष या मानव का दोष




कैसा आया यह भयंकर भूकंप
भीषण लाया कहर निज संग.
देखो! ये लाया संग है सुनामी,
जन-जीवन की कठिन कहानी.

मृदुल प्रकृति क्यों हुई कुपित?
सोचो पुनः क्यों हो तुम चकित?
क्या यह क्रोध प्रकृति का केवल?
या करनी इसमें कुछ अपनी भी?

पीछे इसके छेड़-छाड़ है विज्ञान की?
क्या अवहेलना नियम साहचर्य की?
आवश्यक सामंजस्य व संतुलन की?
क्या रह गयी कमी अंतर्मिलन की?

करना होगा गहन विचार हमें,
यदि भविष्य सुरक्षित रखना है?
क्या जाने आगे फिर कैसा ...?
दुर्दिन हमको और देखना है?

हमें क्यों लगता है ऐसा.?
अति- वृष्टि और अनावृष्टि,
यह सुनामी और भूकंप,
यह प्रकृति का दोष नहीं.

अति भौतिकता की दौड़ में,
उपेक्षित प्रकृति का रोष है.
प्रकृति नहीं है केवल जड़,
चेतना तक है उसकी जड़.

गर है इसमें कुछ भी सच्चाई,
होगी यह एक  बड़ी अच्छाई.
सब छोड़ के पीछे हम अब..,
करें पड़ताल, जाने सच्चाई..

अच्छी बात, करें उपयोग अणु का
आणविक-परमाणविक ऊर्जा का.
पर रखे ध्यान सुरक्षित प्रकृति का
पहला दायित्व तो यह है अपना,

करें सुरक्षित मानव को, मानवता को
दूजा यह कि रखें संतुलित प्रकृति को.
अपनी सभ्यता अपनी संस्कृति को.
अपनी सभ्यता अपनी संस्कृति को.

Saturday, March 19, 2011

होली का सामाजिक - वैज्ञानिक दर्शन


होली का पर्व मात्र परंपरागत उत्सव नहीं; जीवन का मनोविज्ञान है, इसका एक
सामाजिक दर्शन है. पर्व और त्योहारों की सांस्कृतिक स्वीकृति ही इसलिए है कि
समाज का प्रबुद्ध वर्ग इसे समझेगा, समाज को समझाएगा. यदि हम बात होली पर्व की
करें तो केवल इसी एक पर्व को भली - भांति समझ लिया जाये तो मानव जीवन की आधी
उलझने, समस्याएं, उहापोह की स्थिति का शमन, समाधान और निराकरण स्वयं हो जायेगा;
इसमें किंचित भी संदेह नहीं. तो क्या है होली? बात यहीं से प्राम्भ करते हैं..
होली का सर्वश्रेष्ठ अर्थ तो इसके अक्षर विन्यास में ही सन्निहित है - (अर्थात
होली = हो + ली). जो हो गया, जो बीत गया.. अच्छा या बुरा, उचित या अनुचित; उस
बात को छोड़ दो, ढोते न रहो. छोड़ने का तात्पर्य मात्र यह है कि उससे उत्पन्न
निराशा और अवसाद - विषाद को कंधे पर लादे न रहो, मन - मष्तिस्क पर बोझ न बनाओ.
घटना के मूल में स्वयं की सहभागिता ढूंढो. यदि उसमे कोई त्रुटि हो और संशोधन की
सम्भावना हो तो बेहिचक करो. अपनी लिखी कॉपी का मूल्यांकन स्वयं कीजिए. अपना
निरीक्षक - परीक्षक स्वयं बनिए, आधी समस्या का समाधान तो इस प्राथमिक स्तर पर
ही हो जायेगा. पूरा नहीं भी हुआ तो मात्र इतने से ही एक सार्थक और समुचित मार्ग
मिल जायेगा, यदि परीक्षक की भूमिका बिना पक्षपात, पूरी ईमानदारी और सत्यनिष्ठा
के साथ निभाई गयी है! यह सभी व्यक्ति और व्याधियो की अचूक दवा है. स्वयं से
प्रारंभ कर परिवार और समाज में निखार लाया जा सकता है. निजत्व के स्तर पर
प्रारंभ हुआ यह परिष्कार, सामाजिक परिष्कार और राष्ट्र की अंतर्शक्ति सुदृढ़ कर
उसे अंतर्राष्ट्रीय मॉडल के रूप में एक प्रेरणास्रोत बनाया जा सकता है. व्यक्ति
विकास की यह प्रगति, राष्ट्रीय प्रगति में परिणित हो सकती है, जिसकी आज महती
आवश्यकता है.

होली पर्व मनाने के दो चरण हैं -
(i) होलिका - दहन
(ii) रंग - गुलाल प्रक्षेपण
क्या है यह "होलिका - दहन"? होलिका न तो कोई स्त्री प्रतीक है, न पुरुष प्रतीक.
वह हमारी स्वयं की अपनी आतंरिक वृत्ति है, बुराई है, उसी को दहन करना है.
विकृति और बुराई को अंकुरित होते ही, पनपते ही नष्ट कर डालना दैनिक साधना और
आत्म संस्कार का उद्देश्य है. यह आदत, यह भाव मनोमालिन्य को धो डालता है. जो
लोग किसी कारणवश इस दैनिक साधना से नहीं जुड़ पाते हैं, उन्हें इस वार्षिक
साधना से तो अवश्य ही जुड़ना चाहिए. सामूहिक बुराइयों का दहन सामूहिक रूप से हो
और सभी के समक्ष हो, यही तो है - "होलिका - दहन". यही है इस होलिका - दहन का
सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पक्ष. इस पक्ष को दूसरे ढंग से भी समझा जा सकता है. अब
प्रचलित प्रासंगिक कहानी से जुड़े हम..! अग्नि सुरक्षा कवच धारण करने वाली
'होलिका' अग्नि के प्रकोप से बच नहीं पाई, क्यों? विचारणीय बिंदु है यह. सत्य
के विरुद्ध, लोकमंगल के विरूद्ध, पाप वृत्तियाँ, अनाचार - भ्रष्टाचार चाहे
कितने भी सुरक्षा प्रबंध करें, भेद खुल ही जायेगा और अंततः दोषी को परास्त होना
ही पड़ेगा. 'होलिका - दहन' ध्वंसात्मक और नकारात्मक वृत्तियों की हार और
'प्रह्लाद की सुरक्षा', सत्य तथा सृजनात्मक वृत्ति, लोकमंगल की विजय है, इस
होली पर्व का तत्त्व-दर्शन है. इसे ही समझने की आवश्यकता है.

बुराइयों के उन्मूलन के पश्चात, अच्छाइयों की शुरुआत अपने आप होने लगती है.
होलिका के प्रतीक लकड़ियों के ढेर में आग लगते ही हर्षोल्लास से आप - हम क्यों
चिल्ला उठते हैं? क्यों हमारे अंग - प्रत्यंग थिरकने लगते हैं? क्योंकि
अच्छाइयों और सदगुणों की प्रचंड आंधी ने दिल - दिमाग के कपाट खोल दिए हैं. हम
प्रत्येक व्यक्ति से, छोटा हो या बड़ा, बच्चा हो या बूढा, गले से लिपट जाते
हैं, रंग - गुलाल पोत देते हैं. हाँ, स्नेह और सद्भाव के रंग में भीगकर दूसरे
को भी सराबोर कर देना, सद्भाव में डूब जाना ही होली है! यह होली प्रतिदिन दैनिक
निजी - साधना में हो, तो बहुत अच्छी बात है. यदि यह कार्य दैनिक नहीं हो पाता,
तो भी कोई बात नहीं; वार्षिकोत्सव रूप में मनाएं, लेकिन एकल नहीं सामूहिक साधना
के रूप में! इस पर्व में तो परिष्कार ही परिष्कार है, उल्लास ही उल्लास, उमंग
ही उमंग है. इस उल्लास - परिष्कार - उमंग को वार्षिक ऊर्जा के रूप में तन - मन
- आचरण में संचित कर लेना ही इसकी सफलता है. संक्षेप में यही इस पर्व का
निहितार्थ, यही इसका सामाजिक और मनोवैज्ञानिक पक्ष है. आपसी मनोमालिन्य दूर कर
प्रेम - सौहार्द्र को शुभारम्भ कर उसे परिपुष्ट करने के सामूहिक शुभदिवस का नाम
है - "होली". मानव को अपने अन्दर की मानवता को विकसित करने के लिए होली से बड़ा
कोई पर्व हो ही नहीं सकता...! यह किसी एक समुदाय का पर्व नहीं, मानव - समुदाय
का, मानव - जाति का पर्व है. इस पर्व के भौंडेपन से, कुरीतियों से, अमर्यादित
भाषा प्रयोग से यथासंभव बचें...! अन्दर की विकृतियाँ निकाल बाहर करें.
विकृतियों के बहिर्गमन से रिक्त जगह में सभ्यता और संस्कृति का वास होगा, निवास
होगा. विरोधियो और शत्रुओं को स्नेह और सद्भाव के रंग में इतना रंग दो कि वह
बाहर से ही नहीं, अन्दर से भी रंगीन हो जाये और विरोध का स्वर भूलकर सहयोग का
जाप करने लगे. शत्रु को मित्र बना लेने की कला ही इस पर्व की सार्थकता है, यही
इस पर्व की पराकाष्ठा भी है.

होली का एक दूसरा स्याह - धूमिल पक्ष भी है! न जाने कब और कैसे इस पर्व में
हुडदंग के साथ - साथ अश्लीलता ने भी अपनी जडें जमा लीं..? दावे से साथ कुछ भी
कह पाना कठिन है. लेकिन, आज जब हम होली का निहितार्थ जान गए हैं, फिर इसमें
फूहड़ता और अश्लीलता का क्या काम? कपड़े यदि गंदे हो जाते हैं तो क्या उन्हें
साफ़ नहीं किया जाता? मकान - दुकान की मरम्मत और रंगाई - पुताई नहीं होती? तन -
बदन की मैल को क्या धुला नहीं जाता? तो फिर फूहड़ता को, विकृतियों को निकाल
फेंकने में संकोच क्यों? चोर दरवाजे से आ घुसे विकृतियों को निकाल बाहर करने का
दायित्व भी तो उन्ही का है, जो इस पथ को जान गए हैं, इसकी उपादेयता और महत्व को
पहचान गए हैं. पहला कदम तो वही बढ़ाएंगे.... तो आइये, एक सत्साहस भरा संकल्प
लें - "हम होली मनाएंगे, खूब मनाएंगे... कलुष - कषाय - कल्मश और बुराइयों की
होलिका जलाएंगे तथा विकृतियों, फूहड़पन, हुडदंग और अश्लीलता को दूर
भगायेंगे...!"

सभी को होली की शुभकामनाएं!
एक नयी होली..... शुभ होली..... सार्थक होली..... भावनात्मक होली.....
सृजनात्मक होली.....

Monday, March 14, 2011

प्रज्ञान-विज्ञान और आइन्स्टीन


१४ मार्च, आज विज्ञान जगत के देदीप्यमान सितारा अलबर्ट आइन्स्टीन का जन्म दिवस
है. आइन्स्टीन एक ऐसा नाम जो विश्व शान्ति के लिए सदा प्रयत्नशील रहे, अनेकता
में एकता और विखराव में समन्वय ढूंढते रहे. उनके इस विलक्षण खोजी प्रवृत्ति ने
कब उन्हें वैज्ञानिक से एक दार्शनिक और कब  दार्शनिक से वैज्ञानिक बना दिया; न
वे खुद जान पाए और न यह जगत. लेकिन आइन्स्टीन जानते थे और कहते भी थे - 'अध्यात्म बिना विज्ञान के गूंगा है और विज्ञान बिना अध्यात्म के लंगडा'
इसलिए वे चलते रहे अपनी राह, अपने निराले अंदाज में. इसमें रोड़े भी आये और
खाई भी आई, लेकिन राह पथिक का रोक न पायी. आज उनके जन्मदिवस पर उस युगपुरुष को
नमन करते हुए स्नेहांजलि रूप में यह काव्यांजलि समर्पित है, जिसका शीर्षक है - 'प्रज्ञान-विज्ञान और आइन्स्टीन'

आखिर क्या है रूप तुम्हारा भोले,
प्रज्ञान - विज्ञान दोनों तुझे तोले.

'विन्दु' रूप जग कहता तुझको.
'नाद' रूप भी वह कहता है .
'नाद -विन्दु' से किन्तु अलग
रूप सगुण वह क्यों रचता है?

है कैसा रूप तेरा, कैसी माया
भटक रहा जग उसके बीच,
तुझे तौल रहे सब तर्क बुद्धि से
जग के बाहर और जगत बीच.

प्रज्ञान कहे तुझे -'गौरी शंकर'
विज्ञान तुन्हें 'न्यूट्रान' पुकारे,
कुछ कहते 'ऊर्जा - तरंग' तुझे
कुछ रूप 'प्रणव' तुम्हार बतावें .

दर्शनशास्त्र 'ओंकार' कहे तुम्हे
पुरुष - प्रकृति की बात बतावे,
जान गया कुछ तेरे रहस्य को
काहेको जे. पी. को तू भरमाये.

जल में थल, थल ऊपर जल है
जल-थल दोनों के बीच समाये,
जल-थल भेद से लेना हमें क्या?
हम तो अरूप के रूप निहारें.

जल बीच नाव, नाव में नाविक
नाविक तो पतवार हिलावे
आपे नाव, औ सवार हो आपे
जल हो आप, पतवार हो आपे.

चाहे बनो सरिता-गिरि-कानन
मानुष रूप भभूत है - आनन्,
तेरे इशारे पर खेल दिखावत
विष्णु हों खुद या हों चतुरानन.

सबसे अलग पर सबमे तुम्ही हो
अकार -उकार-मकार तुम्ही हो
तुम्ही 'पतझड़' और तुम्ही 'बसंत'
तुम्ही हो 'शून्य' और तुम्ही 'अनंत'.

ऊर्जा रूप तुम्ही हो -* 'E'* हो
द्रव्य रूप* 'm'* भी तुम्ही हो.
ऊर्जा रूप निर्गुण है तुम्हारा,
द्रव्य रूप में तुम्ही सगुण हो.

ऊर्जा - द्रव्य में क्या संबंध?
यह पूछो तुम आइन्स्टीन से.
दोनों हैं रूप बदलते कैसे?
यह भी पूछो आइन्स्टीन से.

ऊर्जा हो या हो - 'द्रव्यमान'
एक ही सत्ता के दो ये रूप.
द्रव्य निष्क्रिय और मूर्तरूप
ऊर्जा सक्रिय, 'अमूर्त-अरूप'.

ये ठीक बिल्कुल है - 'वैसे'
जैसे निर्गुण है, सगुण सरूप.
यदि भेद कोई लगता हो इसमे
विरोधाभास दिखता हो इसमें

आप को हम एक सूत्र बताएं
सारे विरोध फुर्रर्रर्र हो जाएँ.
आओ ये सारे भेद मिटायें
'थियरी रिलेटिविटी' अपनाएँ.

भाव दृष्टि से -'सेवक स्वामी',
बुद्धि दृष्टि से -'अंश और अंशी'.
ज्ञान दृष्टि से - 'समं तुभ्यं',
नमामि-नमामि शिव शंकरं.

चर्म दृष्टि देखो तो -'अनेक',
आत्म दृष्टि सभी हैं - 'एक'.
एक ही है जो अनेक सा दीखे,
है एक अनेक, नहीं कुछ भेद.

तेरे  सिवा  कोई  और न .दूजा...
तुम्ही न्यूट्रान, पोजिट्रान,  न्युट्रीनो
प्रोटान, इलेक्ट्रान, फोटान तुम्ही हो,
तुम्ही हो,.तुम्ही हो,.तुम्ही हो, तुम्ही हो,
तुम्ही हो., तुम्ही हो, तुम्ही हो,.तुम्ही हो.

Wednesday, March 9, 2011

हे भोले! बंद अधर अब खोलो




सिर के ऊपर जटा जूट
उसमे लिपटी सुरसरि है,
वक्र चन्द्र है भाल विराजे
गले में सर्पों की माला है.
शोभित शक्ति वाम में उनके
वाहन सिंह बैठा है सामने.

बार-बार वह नंदी बैल को, 
जाने क्यों देखो घूर रहा है....
नंदी भी आँख मिलाये उससे
न जाने क्या बात कर रहा.
पलकों को अपने नचा-नचा,
मैत्री सन्देश को सुना रहा है.


उधर सर्प की माला पर देखो -
मयूर की तीखी नजर गाड़ी है. 
पर दृष्टि है सर्प की मूषक पर
जो मोदक हाथ लगाय रहा है.

.
ज्यों मातु पिता, भाई भाई
बहनों ने गाढ़ी प्रीती बढ़ाई है,
वैसे ही ये जीवन-शत्रु परस्पर
आपस में एकता-मैत्री बनाई है.

यह तो उनकी वृत्ति-प्रवृत्ति है
मिटती नहीं यह जल्दी है.
अनुरक्ति अपर्णा की शिव से
सुरसरि से नहीं विरक्ति है.
वाहनों में देखो मिटा वैर सब
अब स्नेह - सद्भाव बढ़ाया है.
निज वैर- भाव भुलाकर के...
मानव को सन्देश सुनाया है.


गुणों में भेद जीवन में भेद 
शैली में भेद गति में भी भेद
आकृति में भेद प्रकृति में भेद
भेदों के बीच सब एक- 'अभेद'.

वैर न जाने कहाँ खो गया..?
मिटा वैर और प्रेम हो गया.
हे भोले! तुम सन्देश सुनाते
स्नेह सद्भाव का पाठ पढ़ाते

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काश आप से सीख हम पाते.
.जीवन में अपने इसे निभाते.
इतनी कठिन परीक्षा न लो
अपने बंद अधर अब खोलो!

चाहते हो - 'मानव में एकता'
एक बार मुख से यह बोलो!!
अपने बंद अधर अब खोलो!!  
अपने बंद अधर अब खोलो!!