Monday, March 14, 2011

प्रज्ञान-विज्ञान और आइन्स्टीन


१४ मार्च, आज विज्ञान जगत के देदीप्यमान सितारा अलबर्ट आइन्स्टीन का जन्म दिवस
है. आइन्स्टीन एक ऐसा नाम जो विश्व शान्ति के लिए सदा प्रयत्नशील रहे, अनेकता
में एकता और विखराव में समन्वय ढूंढते रहे. उनके इस विलक्षण खोजी प्रवृत्ति ने
कब उन्हें वैज्ञानिक से एक दार्शनिक और कब  दार्शनिक से वैज्ञानिक बना दिया; न
वे खुद जान पाए और न यह जगत. लेकिन आइन्स्टीन जानते थे और कहते भी थे - 'अध्यात्म बिना विज्ञान के गूंगा है और विज्ञान बिना अध्यात्म के लंगडा'
इसलिए वे चलते रहे अपनी राह, अपने निराले अंदाज में. इसमें रोड़े भी आये और
खाई भी आई, लेकिन राह पथिक का रोक न पायी. आज उनके जन्मदिवस पर उस युगपुरुष को
नमन करते हुए स्नेहांजलि रूप में यह काव्यांजलि समर्पित है, जिसका शीर्षक है - 'प्रज्ञान-विज्ञान और आइन्स्टीन'

आखिर क्या है रूप तुम्हारा भोले,
प्रज्ञान - विज्ञान दोनों तुझे तोले.

'विन्दु' रूप जग कहता तुझको.
'नाद' रूप भी वह कहता है .
'नाद -विन्दु' से किन्तु अलग
रूप सगुण वह क्यों रचता है?

है कैसा रूप तेरा, कैसी माया
भटक रहा जग उसके बीच,
तुझे तौल रहे सब तर्क बुद्धि से
जग के बाहर और जगत बीच.

प्रज्ञान कहे तुझे -'गौरी शंकर'
विज्ञान तुन्हें 'न्यूट्रान' पुकारे,
कुछ कहते 'ऊर्जा - तरंग' तुझे
कुछ रूप 'प्रणव' तुम्हार बतावें .

दर्शनशास्त्र 'ओंकार' कहे तुम्हे
पुरुष - प्रकृति की बात बतावे,
जान गया कुछ तेरे रहस्य को
काहेको जे. पी. को तू भरमाये.

जल में थल, थल ऊपर जल है
जल-थल दोनों के बीच समाये,
जल-थल भेद से लेना हमें क्या?
हम तो अरूप के रूप निहारें.

जल बीच नाव, नाव में नाविक
नाविक तो पतवार हिलावे
आपे नाव, औ सवार हो आपे
जल हो आप, पतवार हो आपे.

चाहे बनो सरिता-गिरि-कानन
मानुष रूप भभूत है - आनन्,
तेरे इशारे पर खेल दिखावत
विष्णु हों खुद या हों चतुरानन.

सबसे अलग पर सबमे तुम्ही हो
अकार -उकार-मकार तुम्ही हो
तुम्ही 'पतझड़' और तुम्ही 'बसंत'
तुम्ही हो 'शून्य' और तुम्ही 'अनंत'.

ऊर्जा रूप तुम्ही हो -* 'E'* हो
द्रव्य रूप* 'm'* भी तुम्ही हो.
ऊर्जा रूप निर्गुण है तुम्हारा,
द्रव्य रूप में तुम्ही सगुण हो.

ऊर्जा - द्रव्य में क्या संबंध?
यह पूछो तुम आइन्स्टीन से.
दोनों हैं रूप बदलते कैसे?
यह भी पूछो आइन्स्टीन से.

ऊर्जा हो या हो - 'द्रव्यमान'
एक ही सत्ता के दो ये रूप.
द्रव्य निष्क्रिय और मूर्तरूप
ऊर्जा सक्रिय, 'अमूर्त-अरूप'.

ये ठीक बिल्कुल है - 'वैसे'
जैसे निर्गुण है, सगुण सरूप.
यदि भेद कोई लगता हो इसमे
विरोधाभास दिखता हो इसमें

आप को हम एक सूत्र बताएं
सारे विरोध फुर्रर्रर्र हो जाएँ.
आओ ये सारे भेद मिटायें
'थियरी रिलेटिविटी' अपनाएँ.

भाव दृष्टि से -'सेवक स्वामी',
बुद्धि दृष्टि से -'अंश और अंशी'.
ज्ञान दृष्टि से - 'समं तुभ्यं',
नमामि-नमामि शिव शंकरं.

चर्म दृष्टि देखो तो -'अनेक',
आत्म दृष्टि सभी हैं - 'एक'.
एक ही है जो अनेक सा दीखे,
है एक अनेक, नहीं कुछ भेद.

तेरे  सिवा  कोई  और न .दूजा...
तुम्ही न्यूट्रान, पोजिट्रान,  न्युट्रीनो
प्रोटान, इलेक्ट्रान, फोटान तुम्ही हो,
तुम्ही हो,.तुम्ही हो,.तुम्ही हो, तुम्ही हो,
तुम्ही हो., तुम्ही हो, तुम्ही हो,.तुम्ही हो.

Wednesday, March 9, 2011

हे भोले! बंद अधर अब खोलो




सिर के ऊपर जटा जूट
उसमे लिपटी सुरसरि है,
वक्र चन्द्र है भाल विराजे
गले में सर्पों की माला है.
शोभित शक्ति वाम में उनके
वाहन सिंह बैठा है सामने.

बार-बार वह नंदी बैल को, 
जाने क्यों देखो घूर रहा है....
नंदी भी आँख मिलाये उससे
न जाने क्या बात कर रहा.
पलकों को अपने नचा-नचा,
मैत्री सन्देश को सुना रहा है.


उधर सर्प की माला पर देखो -
मयूर की तीखी नजर गाड़ी है. 
पर दृष्टि है सर्प की मूषक पर
जो मोदक हाथ लगाय रहा है.

.
ज्यों मातु पिता, भाई भाई
बहनों ने गाढ़ी प्रीती बढ़ाई है,
वैसे ही ये जीवन-शत्रु परस्पर
आपस में एकता-मैत्री बनाई है.

यह तो उनकी वृत्ति-प्रवृत्ति है
मिटती नहीं यह जल्दी है.
अनुरक्ति अपर्णा की शिव से
सुरसरि से नहीं विरक्ति है.
वाहनों में देखो मिटा वैर सब
अब स्नेह - सद्भाव बढ़ाया है.
निज वैर- भाव भुलाकर के...
मानव को सन्देश सुनाया है.


गुणों में भेद जीवन में भेद 
शैली में भेद गति में भी भेद
आकृति में भेद प्रकृति में भेद
भेदों के बीच सब एक- 'अभेद'.

वैर न जाने कहाँ खो गया..?
मिटा वैर और प्रेम हो गया.
हे भोले! तुम सन्देश सुनाते
स्नेह सद्भाव का पाठ पढ़ाते

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काश आप से सीख हम पाते.
.जीवन में अपने इसे निभाते.
इतनी कठिन परीक्षा न लो
अपने बंद अधर अब खोलो!

चाहते हो - 'मानव में एकता'
एक बार मुख से यह बोलो!!
अपने बंद अधर अब खोलो!!  
अपने बंद अधर अब खोलो!!

Saturday, March 5, 2011

एक पत्र: शिवशंकर के नाम


एक पत्र: शिवशंकर के नाम

गंगा धारण किये हो सिर पर  
फिर भी नेत्रों में ज्वाला है..,
है भूषित भाल वक्र चन्द्र से
उर उदधि तरल सहजता है.

है गले हलाहल का प्याला
लिपटे उसपर विषधर माला.
वे लपक लपक नि:श्वांस छोड़ते
ज्यों उठे मही अंतर की ज्वाला.


लेकिन आप अलिप्त सभी से
अप्रभावित निर्लिप्त सभी से.
मृदुल हास्य परिहास करते हो
रच जाल उसी में खुद फंसते हो.

पाश हाथ, डमरू की धुन पर
काल चक्र में गति भरते हो,
कभी लेते नहीं हो दोष स्वयं पर
परिस्थितियाँ सारी खुद रचते हो.


हे शिव शंकर! , हे त्रिपुरारी !!
हे आशुतोष ! हे भवभयहारी!!
हे प्रलयंकर ! हे अभ्यंकर !!
हे औघड़दानी! हे गंगाधर !!

एक कान में नर का कुंडल
दूजे शोभित नारी की बाली,
अर्द्ध अंग मृग चरम है लिपटी
अर्द्ध अंग चुनरी की साड़ी.

  

नाच-नाच कर किसे नचाते?
हे भोले ! तुम किसे बुलाते?
सब कुछ तो उर में धारण है, 
नृत्य मनोहर किसे दिखाते?

तुम आप्तकाम, तुम कामरूप,
तू निराभिमान, अभिमान तू,
तू महामृदुल, तू महाभयंकर.
तू सहजरूप, दुर्बोध अभयंकर.


तू ही पोषक,  तू शोषक है
तू प्रलयरूप,  तू परमगुप्त,
तू दाता है,  तू परम दानी
सर्वस्व लुटा क्यों बने मसानी?

यह मानव है तेरी प्यारी रचना
इसने सीखा केवल संचय करना,
एक लुटिया जल के बदले
चाहत कुबेर सा बन जाना.

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तुम भी दे देते जाने क्यों?
इंसान जो मांगे है तुझसे?
क्या तरस नहीं आती तुझको?
क्यों भ्रम में उसे फंसाते हो?

वह तो बटोरता कंकड़-पत्थर
हीरे - मोती वह कहता है,
वह हंसता उसको निरख परख
तू बुद्धि पर उसके हंसता है.

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कैसा तू खेल दिखाता है?
कैसी तेरी यह माया है?
देते क्यों दिव्य दृष्टि नहीं?
क्यों दौलत में उसे फंसाते हो?

अब नहीं हैं हम फंसनेवाले,
देखो बन गए पूरे मतवाले 
अब हमको आती लाज नहीं
दिल लुटा बने हैं - 'दिलवाले'.

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Tuesday, March 1, 2011

काल और महाकाल




क्या है - 'काल'?
घडी की माप?
पल - विपल...,
गणना या चाप?
जब घडी नहीं थी
घड़ीसाज नहीं था,
नहीं था कैलेण्डर
कोई पञ्चांग नहीं था.

जब नहीं थी नदी,
और पर्वत नहीं था.
पृथ्वी, पवन, आकाश
कुछ भी नहीं था.
सोचो तब भी -
क्या काल विद्यमान
नहीं था.....?

भूत,  वर्तमान 
और भविष्यत
यह तो दृश्य हैं,
काल खण्ड हैं.
काल तो है -
इन सबका द्रष्टा.
काल ही है -
इन सबका स्रष्टा.

सबसे अलग और 
सम्मिलित सब में,
अमूर्त रूप वह
सर्व अखंड है.
भक्तों के हित
मूर्तरूप में
वही स्थापित
विग्रहरूप सपिंड है. 
कहलो समय या 
'महाकाल' उसे,
वह युग्मरूप
शिवलिंग है.

Monday, February 28, 2011

विखर रहा: 'देश-परिवार




देखा था मैंने तन को नाचते
मन को भी नाचते देखा था;
अब धन को नचाते देख रहा हूँ.
धन में होती शक्ति है कितनी?
यह बैठे - बैठे सोच रहा हूँ.

बड़ो-बड़ों को ताल पर इसके
झूमते थिरकते हिलते डुलते,
कमर लचकते देखा था...
अब कहे कमर की कौन?
यहाँ तो कमरा डोल रहा है.
अब कमरे तक भी रही न बात,
पूरा सांचा-ढाचा ही दरक रहा है....

धन का नशा अब छाने लगा है.
रिश्तों को भी ठुकराने लगा है
छोटा बड़ा यहाँ कोई नहीं है,
सबके पास जो ...पैसा... है..
बाप जहां पर रहा न बाप
बेटा न यहाँ पर बेटा है....
धन की इस ज्वाला ने देखो
पूरा परिवार, पूरा देश लपेटा है.

कैसे बच पायेंगे ये सब ?
कुछ सीख भी क्या ये मानेंगे?
हैं सभी चूर धन के मद में
क्या भ्रम को ये कुछ टालेंगे?
खो गयी कहाँ विवेक शक्ति अब?
यह जड़ता सी क्यों छायी है?
क्यों झुलस रहे सब अंगारों में?
क्या इसी में इनकी भलायी है?
अब रास्ता कौन दिखाएगा?
क्या समझ में इनके आयेगा?
यह धन आया है जहां से,
क्या चला वहीँ फिर जाएगा?
सब हैं धमकाते एक दूजे को.

रिश्तों की अब परवाह कहाँ?
क्या विखर सभी ये जायेंगे?
धरती पर इनके पाँव कहा?
होता है कष्ट देख के हमको,
क्या विखराव रोक हम पायेंगे?
उग्र आज है वही इस सबसे,
मान- सम्मान प्यार - दुलार 
कुछ अधिक ही जो पाया है.

अब होगा वही जो होना है.
कर्मों का फल भी तो ढोना है.
क्या शासक बनना इतना जरूरी?
चल रहा जनता पर दनादन छूरी.
कुछ तो डरो समाज से, इतिहास से,
आखिर एक दिन वह भी आएगा जब 
तू भ्रातृहन्ता, कुलहन्ता  कहलायेगा.

Wednesday, February 23, 2011

'पूर्णता' का विज्ञानं- दर्शन 


भारतीय संस्कृति में वर्णित उपनिषदिक दर्शन को प्रायः 'पूर्णता का दर्शन'  कहा जाता है. क्या है यह पूर्णता का दर्शन और क्यों कहा जाता है इसे पूर्णता का दर्शन? आइये आज इसे समझने का प्रयास करते हैं. इसके लिए श्वेताश्वर उपनिषद् के एक मन्त्र को यदि हम प्रतिनिधि और बीजमंत्र कर रूप में स्वीकार कर सकें तो यह पूर्णता अपने दिव्य रूप में वहाँ प्रकट होता है, समझने और समझाने दोनों ही दृष्टि से यह उत्तम है.यह मन्त्र है -

'एको देवः सर्वर्भूतेषु गूढः  सर्वव्यापी सर्व भूतान्तरात्मा 
कर्माध्यक्षः सर्व भूताधिवासः साक्षी चेता केवलः निर्गुणश्च'  - (६.११)  

अर्थात, सभी प्राणियों में स्थित ईश्वर एक है, वह सर्व व्यापक. समस्त भूतों का अंतरात्मा, कर्मों का अधिष्ठाता, समस्त प्राणियों में बसा हुआ साक्षी, परम चैतन्य, परम शुद्ध और निर्गुण है. यह तो हुआ इस मन्त्र का शब्दार्थ. परन्तु यह मन्त्र है बहुत रहस्यपूर्ण, ....आइये इसे दूसरे दृष्टिकोण से देखें, संख्याओं में विभाजित कर गणितीय रूप में देखें  -
      १ - एको देवः 
      २ - सर्वर्भूतेषु गूढः  
      ३ - सर्वव्यापी 
      ४ - सर्वभूतान्तरात्मा 
      ५ - कर्माध्यक्षः 
      ६ - सर्व भूताधिवासः 
      ७ - साक्षी 
      ८ - चेता 
      ९ - केवलः 
      १० - निर्गुणश्च

इस मन्त्र में हम देख सकते हैं कि पूरे मन्त्र को '१' से '१०' तक की संख्याओ में आसानी से विभाजित किया जा सकता है. '१' ब्रह्म की एकता का प्रतीक है. '२' उसकी गूढता और जटिलता का, '३' सर्व्यापकता का. '४'  स्व 'अणु' की पहचान के द्वारा 'विभु ', 'विराट' और 'भूमा' स्वरुप को पहचानने की ज्ञानात्मक / सध्नानात्मक दृष्टि है. '५' आस्तिकों और नैतिक व्यक्तित्व वाले का संबल है, उसके न्यायी प्रकृति के कारण ही व्यक्ति सत्य के लिए अपने 'स्व', अपने अहं  को बलिदान करने की प्रेरणा पता है.  '६' वह परमात्मा केवल मानव, केवल चेतन, केवल जड़ तक ही सीमित नहीं है. वह कण -कण  में परिव्याप्त है, यह दृष्टि केवल प्रकृति के साथ भावनात्मक और पारिवारिक सम्बन्ध जो दती है, प्राकृतिक वस्तुओं के साथ मधुर रिश्ते स्थापित करती है, विश्ववन्धुत्व की भावना विकसित करने के लिए यहीं से ऊर्जा मिलती है. यह दृष्टि ग्रह -नक्षत्रो, नदी-पहाड़ से लेकर वनस्पतियों तक से रिश्ते की परिकल्पना की है.  नाम और रूप तो अलग-अलग है परन्तु, परन्तु तत्वतः  नहीं . संतों ने इसीलिए तो गाया है - 'आपे रसिया आप रस, आपे रावनहार / आपे होवे चोलादा आपे सेज भतार // ' ७' वह द्रष्टा है, समदर्शी है, इसी गुणों के कारण वह परमन्यायी है. इस लोक में न्याय न मिल पाने पर भी यह विश्वास भक्त को न्याय पथ से नहीं डिगा सकता क्योकि यह विश्वास दृढ है कि यदि यहाँ न्याय नहीं मिला तो क्या हुआ. वहाँ तो मिलेगा. यदि यह विश्वास टूट जाय तो सोचिये क्या होगा? जब इस देश में कोई कानून को कितना मानता है तो क्या नैतिकता, ईमानदारी, जिम्मेदारी और मानवीय मूल्यों का कोई महत्व रह जाएगा ?  '८' वह परम चैतन्य है, चेतन होने के कारण ही अपने भक्तों की आर्द्र पुकार सुन लेता है,यह गरीबो, और निर्बलों का एक मात्र बल है,...शक्ति है... संबल है..... 
इसी साहस के बल पर एक चींटी भी विशालकाय हठी से लड़ने और उसे परस्त करने का हौसला पता है. यह विश्वास औए आस्था का ही बल है जो अग्निसुरक्षा कवचधारी, वरदान प्राप्त होलिका को तो भस्म कर देता है लेकिन प्रह्लाद का विश्वास विजयी होता है. यह वह श्वास-प्रश्वास है जिसमे लौह का दम्भ भी लाल पानी बन जाता है. उसका ठोसपना, उसका दम्भ सब  गल जाता है.

आज का मानव टुकडे-टुकडे देखने का अभ्यस्त हो गया है समग्रता में वह देख ही नहीं पाता. जिस दिन समग्र दृष्टि आ जायेगी वह विवेकानंद, अरविंदो और  आइन्स्टीन की तरह आध्यात्मिक वैज्ञानिक बन जायेगा. Philosopher of science' बन जाएगा. ईश्वर के स्तित्व को नकारते देखा-सुना गया है परन्तु क्या कोई सत्य को नकार सकता है? सत्य की परिभाषा क्या है? 'परम सत्यम, सत्यम परम' अर्थात जो सत्य है वही परम है और जो परम है वही एक मात्र सत्य है. जो कभी बदले नहीं. परिवर्तित न हो वही तो सत्य है. सत्य ईश्वर का समानार्थी नहीं पर्यायवाची है. आखिर सत्य तो माननेवाला भला ब्रह्म के स्तित्व को कैसे नकार सकता है? आज के युग में ऐसी अलौकिक शक्ति आज केवल राजनीतिक व्यक्ति के पास है. उसे यह अधिकार है क़ि इस 'सत्य' में जब चाहे 'अ' जोड़ दे, जब चाहे 'अ' घटा दे......

अब हम संख्याओं पर लौटते हैं. इन संख्याओं में  एक अंक की सबसे बड़ी संख्या '९' है और यह संख्या 'केवल' है. केवल वही है- दूसरा नहीं. और दसवी संख्या निर्गुण है जिसका गुणन नहीं हो सकता, वह 'शून्य' है. शून्य स्वतः निर्गुण है ऊपर वाले '१' पर इस निर्गुण शून्य को रख देने से '१०' संख्या स्वतः बन जाती है. इस '१०' में सम्मिलित '१' ब्रह्म और आत्मा दोनों का प्रतिधित्व करता है. इसमें '१०' नाम-रूपमय सृष्टि का वाचक है. इस '१' के अभाव में समस्त सृष्टि 'o' शून्य है. मृत है, प्रलायावास्था में है, मूल्यहीन है तथा '१' के साथ रहने पर वही मूल्यवान है, सजीव है. '९' अंक केवल है, पूर्ण है, सम्पूर्ण है. अतएव '९' अंक जहां भी रहता है, अपने 'केवली' स्वरुप का परित्याग कभी नहीं करता. अतः केवल है, अतः केवल वही रहेगा जो वस्तुतः है. तत्त्वतः है, जो 'actual' ' और  'factual' दोनों है . इस परम तत्त्व  को पहचानना होगा और जो इसे पहचानेगा वही ज्ञानी और पंडित कहलायेगा, कोई दूसरा नहीं.  - 'निर्गुण सरगुन आपे सोई, तत पछाड़े सो पंडित होई'....

उदाहराणार्थ :     ९ के गुणनफल का योग सदैव ९ ही होगा.
                         ९ x १ = ९
                         ९ x २ = १८,     (१ + ८ = ९ )
                         ९ x 3 = २७,    (२ + ७ = ९ )
                         ९ x ४ = ३६,     (३ + ६ = ९ )
                         ........................................
इतना ही नहीं योग (+) और घटाव (-) की क्रिया में भी यह ९ अपने स्वरुप का परित्याग कभी नहीं करता. आइये देखें कैसे - 
() -  ९ + ८ + ७ + ६ + ५ + ४ + ३ + २ + १ = ४५ (४ + ५ = ९)

(आ) - ९ ८ ७ ६ ५ ४ ३ २ १           कुल योग = ४५ (४ + ५ = )
  (-)  १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९           कुल योग = ४५ (४ + ५ = )
      ---------------------------
   =  ८ ६ ४ १ ९ ७ ५ ३ २          कुल योग = ४५ (४ + ५ = )
     ................................

अतः कह सकते है:    (९ - ९ = ९) या 
             पूर्ण - पूर्ण = पूर्ण 

इसीलिए उपनिषदों में कहा गया है कि ब्रह्म परमपूर्ण है, वह (अदः) और यह (इदं), 'that' और  'this', 'he' और 'she', दोनों में ही वह इकाई रूप में सामान भाव से है. परमतत्त्व पूर्ण , परिपूर्ण है, सम्पूर्ण है. उस पूर्ण में से पूर्ण को घटाने पर भी सम्पूर्ण ही शेष बचता है. उसमे  रंच  मात्र  भी  न्यूनता  नहीं  आने पाती, इसलिए उपनिषद् कहते हैं - 
.
'ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात पूर्णमुदच्यते 
  पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते'. 

इस दर्शन के अनुसार 'ब्रह्म' आदि में पूर्ण है, मध्य में पूर्ण है और अन्त में पूर्ण है, सभी काल में पूर्ण है. सच तो यह है कि वह काल का भी काल है - 'कालः कालौ' है. काल का भी है, इसीलिए साक्षी है, द्रष्टा है. इस मन्त्र में निर्गुण और सगुण दोनों ही सिद्धांतो का, विचारधाराओं का अद्भुत मेल है. सृष्टि के प्रारम्भ में वह 'ब्रह्म' अकेला था, सृष्टि रचना के बाद भी, सब कुछ अपने अन्दर समेट कर एक '१' रहा भी..., और नहीं भी रहा...., वह अनेक  '१०' बन गया.., जगत बन गया, सृष्टि बन गया. '१ ' विहीन '१०' (जगत) शून्य '०' है. निर्गुण है. एक '१' के साथ सम्मिलित रूप में वही '१०' ...है, सृष्टि है, ...सगुण है. ....परन्तु यह सगुण भी अंततः निर्गुण ही है.... 
       
      (१ + ० = १, अर्थात 'लौकिक जगत सत्य है')    
        
      (१  - ० = १, अर्थात 'पारलौकिक जगत सत्य है') और      
        
     (१ x ० = ०, अर्थात 'जगत असत्य है, आभास है'). 

यही इस 'ब्रह्म' का 'सगुण', 'निर्गुण', और 'सगुण - निर्गुण', उभय रूप का खेल है, वह विलक्षण है, अव्याख्येय और अनिर्वचनीय है, जिसे शब्दों में बाँधने के प्रयास में, गणित के सूत्रों में पिरोने के प्रयत्न में ज्ञानी -ध्यानी, संत-महात्मा और दार्शनिक से लेकर वैज्ञानिक तक सभी अनवरत उलझे हुए हैं..., अपनी-अपनी परिकल्पनाओं... .. व्याख्याओं......और माडलों ......के साथ......'आखड वाले जेतड़े सब आखी रहे लिव लाई ' ........

हमारे विविध पुराण इनमे से केवल दो-चार गुणों को प्रमुख मानकर चलते है ... इसलिए कभी.-.कभी परस्पर विरोधी सा भी जान पड़ते है, परन्तु समग्रता के आलोक में समस्त विरोध स्वतः मिट जाते हैं. अतः समग्रता में जानना चाहिए, यह बोध उपनिषद् कराता है.

Monday, February 21, 2011

पूर्णता का दर्शन

 


भारतीय संस्कृति में वर्णित उपनिषदिक दर्शन को प्रायः 'पूर्णता का दर्शन'  कहा जाता है. क्या है यह पूर्णता का दर्शन और क्यों कहा जाता है इसे पूर्णता का दर्शन? आइये आज इसे समझने का प्रयास करते हैं. इसके लिए श्वेताश्वर उपनिषद् के एक मन्त्र को यदि हम प्रतिनिधि और बीजमंत्र कर रूप में स्वीकार कर सकें तो यह पूर्णता अपने दिव्य रूप में वहाँ प्रकट होता है, समझने और समझाने दोनों ही दृष्टि से यह उत्तम है.यह मन्त्र है -

'एको देवः सर्वर्भूतेषु गूढः  सर्वव्यापी सर्व भूतान्तरात्मा 
कर्माध्यक्षः सर्व भूताधिवासः साक्षी चेता केवलः निर्गुणश्च'  - (६.११)  

अर्थात, सभी प्राणियों में स्थित ईश्वर एक है, वह सर्व व्यापक. समस्त भूतों का अंतरात्मा, कर्मों का अधिष्ठाता, समस्त प्राणियों में बसा हुआ साक्षी, परम चैतन्य, परम शुद्ध और निर्गुण है. यह तो हुआ इस मन्त्र का शब्दार्थ. परन्तु यह मन्त्र है बहुत रहस्यपूर्ण, ....आइये इसे दूसरे दृष्टिकोण से देखें, संख्याओं में विभाजित कर गणितीय रूप में देखें  -
      १ - एको देवः 
      २ - सर्वर्भूतेषु गूढः  
      ३ - सर्वव्यापी 
      ४ - सर्वभूतान्तरात्मा 
      ५ - कर्माध्यक्षः 
      ६ - सर्व भूताधिवासः 
      ७ - साक्षी 
      ८ - चेता 
      ९ - केवलः 
      १० - निर्गुणश्च
इस मन्त्र में हम देख सकते हैं कि पूरे मन्त्र को १ से १० की संख्या में विभाजित किया जा सकता है. संख्या का प्रारंभ १ से है और एक अंक की सबसे बड़ी संख्या ९ है और यह संख्या 'केवल' है. दसवी संख्या निर्गुण है जिसका गुणन नहीं हो सकता, वह शून्य है. शून्य स्वतः निर्गुण है ऊपर वाले १ पर इस निर्गुण शून्य को रख देने से १० संख्या स्वतः बन जाती है. इस १० में सम्मिलित '१' ब्रह्म और आत्मा दोनों का प्रतिधित्व करता है. इसमें '१०' नाम-रूपमय सृष्टि का वाचक है. इस '१' के अभाव में समस्त सृष्टि 'o' शून्य है. मृत है, प्रलायावास्था में है, मूल्यहीन है तथा '१' के साथ रहने पर वही मूल्यवान है, सजीव है. '९' अंक केवल है, पूर्ण है, अतएव '९' अंक जहां भी रहता है, अपने स्वरुप का परित्याग नहीं करता. अतः केवल है, अतः केवल वही रहेगा जो वस्तुतः है..

उदाहराणार्थ :   ९ के गुणनफल का योग सदैव ९ ही होगा.
            ९ x १ = ९
            ९ x २ = १८,     (१ + ८ = ९ )
            ९ x 3 = २७,    (२ + ७ = ९ )
            ९ x ४ = ३६,     (३ + ६ = ९ )
                         ........................................
इतना ही नहीं योग (+) और घटाव (-) की क्रिया में भी यह ९ अपने स्वरुप का परित्याग नहीं करता. आइये देखें कैसे - 
(अ) - ९ + ८ + ७ + ६ + ५ + ४ + ३ + २ + १ = ४५,  
                                            (४ + ५ = ९)

(आ) -  ९ ८ ७ ६ ५ ४ ३ २ १       कुल योग = ४५ (४ + ५ = )
   (-)   १ २ ३ ४ ५ ६ ७ ८ ९       कुल योग = ४५ (४ + ५ = ९)
    ---------------------------
     =  ८ ६ ४ १ ९ ७ ५ ३ २       कुल योग = ४५ (४ + ५ = )
              .................................
इसीलिए उपनिषदों में कहा गया है कि ब्रह्म परमपूर्ण है, वह (अदः) और यह (इदं) दोनों ही पूर्ण है. उस पूर्ण में से पूर्ण को घटाने पर भी सम्पूर्ण ही शेष बचता है.- 
.'ॐ पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात पूर्णमुदच्यते 
  पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते'. 

इस दर्शन के अनुसार 'ब्रह्म' आदि, मध्य और अन्त, सभी काल में पूर्ण है. इस मन्त्र में निर्गुण और सगुण दोनों ही सिद्धांतो का, विचारधाराओं का अद्भुत मेल है. सृष्टि के प्रारम्भ में वह 'ब्रह्म' अकेला था, सृष्टि रचना के बाद भी, सब कुछ अपने अन्दर समेट कर एक '१' रहा भी..., और नहीं भी रहा...., वह अनेक  '१०' बन गया.., जगत बन गया, सृष्टि बन गया. '१ ' विहीन '१०' (जगत) शून्य '०' है. निर्गुण है. एक '१' के साथ सम्मिलित रूप में वही '१०' ...है, सृष्टि है, ...सगुण है. ....परन्तु यह सगुण भी अंततः निर्गुण ही है.... 
-       (१ + ० = १, अर्थात 'लौकिक जगत सत्य है')    
        (१  - ० = १, अर्थात 'पारलौकिक जगत सत्य है') और      
        (१ x ० = ०, अर्थात 'जगत असत्य है, आभास है'). 

यही इस 'ब्रह्म' का 'सगुण', 'निर्गुण', और 'सगुण - निर्गुण', उभय रूप का खेल है, वह विलक्षण है, अव्याख्येय और अनिर्वचनीय है, जिसे शब्दों में बाँधने के प्रयास में, गणित के सूत्रों में पिरोने के प्रयत्न में ज्ञानी -ध्यानी, संत-महात्मा और दार्शनिक से लेकर वैज्ञानिक तक सभी अनवरत उलझे हुए हैं..., अपनी-अपनी परिकल्पनाओं... और व्याख्याओं...और माडल ...के साथ.......