हरे पत्तों और मुलायम घास की खोज में अपनी ही धुन में अलमस्त बकरी, गाते-गुनगुनाते निकल गयी थी, दूर तक जंगल में. तभी कुछ आहट पाकर जब सिर उठाया, तो सामने भेडिए को खडा पाया. सकपकाई - घबराई बकरी मौत को सन्निकट पाकर, वात्सल्य के नाम पर सदा की भांति मिमियाई .....युवराज! मेमने भूखे होंगे, हमें तनिक समय चाहिए, उन्हें भर पेट निहारने का, दुलारने का, मातृत्व लुटाने का. फिर लौट आउंगी, आपकी छुधातृप्ति के लिए, सच कहती हूँ.....भेडियाने एक विजेता की तरह अपनी आँखों को नचाया, मन ही मन मुस्कुराया, मूंछों को ऊपर-नीचे घुमाया, दो-चार बूंद लार टपकाया और अभयदान दे दिया बकरी को, .....जाओ ऐश करो ! .. मेरे पुरखे बुद्धू थे जो बकरी को ग्रास बनाते थे. मैंने बकरी खाना छोड़ दिया और तुझे अभयदान दिया. जाओ दीर्घाय हो ! फूलो - फलो !! गांधारी की तरह शत - शत बलशाली पुत्रों की माता बनो.
बकरी हैरान थी, इस अद्भुत परिवर्तन को देखकर परेशान थी, भावातिरेक में बोल पड़ी - आप महान है ! आप तो संत हैं - युवराज ! संत हैं, महासंत हैं !! जय हो ! जय हो !! जंगल ने आजादी के बासठ साल बाद गांधी - दर्शन को अपनाया है; अब तो नाचने - गाने - मुस्कराने का मंगल अवसर पहली बार आया है.
अरे बुद्धू ! ........गांधीवाद को तो उनके अनुयाइयों ने ही नहीं अपनाया, और गांधीगिरी मुन्ना भाई को ही मुबारक हो .... हम भी प्रगतिशील है -.... दिल्ली - नोयडा घूमकर आये है, इसलिए हमने गौतम, महाबीर और गांधी का नहीं; .निठारी के सिद्धांत को अपनाया है, और इसके लिए; पंढेर और कोली को अपना आदर्श बनाया है.
अरे महामूर्ख !! ..अब भी नहीं समझी, अरे! तू जिसे दूध पिलाना चाहती है; जिसपर मातृत्व और ममत्व लुटाना चाहती है, वह तो न जाने कब से.... मेरे गहरे उदर में समाया है. माँ के गोश्त से स्वादिष्ट गोश्त बच्चे का होता है, ..यह बात जंगली जानवर को मानव की नई सभ्यता ने सिखाया है.
कुछ क्षण रुक कर भेड़िया पुन: बोला .....मत कहो मुझे युवराज और मत कहो मुझे संत. ये विशेषण हैं इंसानों के लिए, नहीं है उसकी बुद्धि का अंत. वे मानव हैं - मानवता छोड़ सकते हैं, वादे तोड़ सकते हैं...स्वधर्म - राजधर्म भूल सकते हैं, दोस्ती तोड़ सकते हैं, कभी देव, कभी दानव, तो कभी संत-महंथ और न जाने क्या-क्या बन सकते हैं. परन्तु हम तो जंगली है, जानवर हैं, पशु हैं, हिंसक है, कैसे छोड़ दे - पाशविकता? फिर भी उनसे अच्छे है, जंगली और हिंसक होते हुए भी, वादे निभाते हैं, पेट भरने के बाद, नहीं करते दूसरा शिकार. बचा खुचा शिकार औरों के लिए छोड़ जातें हैं. परन्तु देखो यह इंसान कितना अजीब है, जूठन भी फ्रिज में रखता है, वह केवल पेट नहीं, फ्रिज और गोदाम भरता है. ..कहीं कोई भूखा मरता है तो कहीं अन्न सड़ता रहता है. बहना ! सच कहूँ तो मैं भी पहले ऐसा नहीं था ......मुझे मक्कार तो मानव की नई सभ्यता ने बनाया है.
Sunday, November 14, 2010
Thursday, November 11, 2010
Duality in Upanishad उपनिषद् में द्वैतवाद
नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुनाश्रुतेन।
यमेवैष वृणुते लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम्॥
- कठोपनिषद् १.२.२३
शब्दार्थः
न = नहीं
अयम = यह
आत्मा = आत्मा या ब्रह्म (God or Brahman)
प्रवचनेन = प्रवचन से, शास्त्र-अध्ययन से
लभ्य = प्राप्त किया जाता है ।
न = नहीं
मेधया = बुद्धि द्वारा,
न = नहीं
बहुनाश्रुतेन = बहुत श्रवण करने से ।
यम् एव एषः = जिस किसी को ही यह परमात्मा
वृणुते = वरण करता है, चुनता है, अधिकारी मानता है, मनोनीत करता है,
तेन लभ्यः = उसके द्वारा ही वह प्राप्त हो पाता है ।
तस्य = उसके लिए (for that Individual Soul)
एषः = यह
आत्मा = आत्मा या ब्रह्म (God or Brahman)
स्वाम् = अपने
तनूम् = स्वरूप को
विवृणुते = उद्घाटित – प्रकाशित कर देता है, उसके प्रति ही वह प्रकट होता है ।
This Atman (God) cannot be attained by mere discourses – by the study of the Vedas, or by intelligence, or by much hearing of the sacred books. It is attained by him alone whom It chooses. To such a one Atman (God) reveals Its own form.
इस उपनिषद् मन्त्र में मुख्य बात यह कही गई है कि ईश्वर साक्षात्कार के लिए साधक को अपनी योग्यता बनानी चाहिए । केवल योग्य व्यक्ति ही इस कार्य में सफल हो सकता है । शुद्ध ज्ञान, शुद्ध कर्म तथा शुद्ध उपासना सम्पन्न साधक को ईश्वर योग्य – अधिकारी समझ कर अपने अत्यन्त विचित्र, अलौकिक व परम कल्याणकारी स्वरूप का परिज्ञान = साक्षात्कार समाधि अवस्था में कराता है । केवल शाब्दिक ज्ञान, प्रवचन-कौशल, श्रवण, तर्क शक्ति इत्यादि से व्यक्ति ईश्वर साक्षात्कार नहीं कर पाता । ईश्वर की दृष्टि में हम योग्य बने तब ही सफलता मिलती है, अन्यथा नहीं । इस मन्त्र पर विचार करने से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि उपनिषत्कार ईश्वर तथा जीव के भेद को भी मान्य करता है । जैसे कि –
(१) यहां ब्रह्म-प्राप्ति की बात की गई है । ब्रह्म को कौन प्राप्त करना चाह्ता है? – जीव । ब्रह्म स्वयं अपने को प्राप्त करना या अपना ही साक्षात्कार करना चाहता है - ऐसा कहना तो सर्वथा अनुचित है ।
(२) प्रवचन, श्रवण, मेधाशक्ति का प्रयोग – ये सब कर्म - क्रियाएं अल्पज्ञ जीव ही करता है, सर्वज्ञ ब्रह्म या ईश्वर नहीं ।
(३) ईश्वर या ब्रह्म अपना स्वरूप किसको प्रकाशित करता है? – जीव को ।
अतः यही सिद्धान्त ठीक है कि ईश्वर (ब्रह्म = परमात्मा) और जीव (=जीवात्मा) एक नहीं हैं, परन्तु पृथक्- पृथक् हैं । उपनिषद् अद्वैतवाद का समर्थन नहीं, बल्कि प्रकारांतर से खण्डन ही करता है ।
यमेवैष वृणुते लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम्॥
- कठोपनिषद् १.२.२३
शब्दार्थः
न = नहीं
अयम = यह
आत्मा = आत्मा या ब्रह्म (God or Brahman)
प्रवचनेन = प्रवचन से, शास्त्र-अध्ययन से
लभ्य = प्राप्त किया जाता है ।
न = नहीं
मेधया = बुद्धि द्वारा,
न = नहीं
बहुनाश्रुतेन = बहुत श्रवण करने से ।
यम् एव एषः = जिस किसी को ही यह परमात्मा
वृणुते = वरण करता है, चुनता है, अधिकारी मानता है, मनोनीत करता है,
तेन लभ्यः = उसके द्वारा ही वह प्राप्त हो पाता है ।
तस्य = उसके लिए (for that Individual Soul)
एषः = यह
आत्मा = आत्मा या ब्रह्म (God or Brahman)
स्वाम् = अपने
तनूम् = स्वरूप को
विवृणुते = उद्घाटित – प्रकाशित कर देता है, उसके प्रति ही वह प्रकट होता है ।
This Atman (God) cannot be attained by mere discourses – by the study of the Vedas, or by intelligence, or by much hearing of the sacred books. It is attained by him alone whom It chooses. To such a one Atman (God) reveals Its own form.
इस उपनिषद् मन्त्र में मुख्य बात यह कही गई है कि ईश्वर साक्षात्कार के लिए साधक को अपनी योग्यता बनानी चाहिए । केवल योग्य व्यक्ति ही इस कार्य में सफल हो सकता है । शुद्ध ज्ञान, शुद्ध कर्म तथा शुद्ध उपासना सम्पन्न साधक को ईश्वर योग्य – अधिकारी समझ कर अपने अत्यन्त विचित्र, अलौकिक व परम कल्याणकारी स्वरूप का परिज्ञान = साक्षात्कार समाधि अवस्था में कराता है । केवल शाब्दिक ज्ञान, प्रवचन-कौशल, श्रवण, तर्क शक्ति इत्यादि से व्यक्ति ईश्वर साक्षात्कार नहीं कर पाता । ईश्वर की दृष्टि में हम योग्य बने तब ही सफलता मिलती है, अन्यथा नहीं । इस मन्त्र पर विचार करने से यह भी स्पष्ट हो जाता है कि उपनिषत्कार ईश्वर तथा जीव के भेद को भी मान्य करता है । जैसे कि –
(१) यहां ब्रह्म-प्राप्ति की बात की गई है । ब्रह्म को कौन प्राप्त करना चाह्ता है? – जीव । ब्रह्म स्वयं अपने को प्राप्त करना या अपना ही साक्षात्कार करना चाहता है - ऐसा कहना तो सर्वथा अनुचित है ।
(२) प्रवचन, श्रवण, मेधाशक्ति का प्रयोग – ये सब कर्म - क्रियाएं अल्पज्ञ जीव ही करता है, सर्वज्ञ ब्रह्म या ईश्वर नहीं ।
(३) ईश्वर या ब्रह्म अपना स्वरूप किसको प्रकाशित करता है? – जीव को ।
अतः यही सिद्धान्त ठीक है कि ईश्वर (ब्रह्म = परमात्मा) और जीव (=जीवात्मा) एक नहीं हैं, परन्तु पृथक्- पृथक् हैं । उपनिषद् अद्वैतवाद का समर्थन नहीं, बल्कि प्रकारांतर से खण्डन ही करता है ।
Tuesday, November 9, 2010
हम और तुम
हममे तुझमे जो अंतर है,
वह बीच में रेखा खीचता है.
हममे तुझमे जो गहनता है,
जग उसे क्यों नहीं देखता है?
हम तुम देखो जुड़े हैं- कैसे?
नदी के तीर आपस में जैसे.
चलते-चलते थक जायेंगे
बहते - बहते मिट जायेंगे.
शंख- सीप-मोती लुटाकर भी
मिलने को तरस हम जायेंगे.
मिल सकते हैं दोनों तब जब
दरिया - हिमनद सुख जायेंगे.
लेकिन कब हम चाहेंगे ऐसा?
क्या चाह हमारी स्वार्थ जैसा?
हम ऐसे ही बहते जायेंगे,
मिट्टी को बना के उपजाऊ.
प्यार की फसल खिलाएंगे
नहीं सूखने देंगे हिमनद को,
हम अश्रु यूं ही पी जायेंगे
ऐसे ही ...चलते जायेंगे.....
ऐसे ही ...बहते जायेंगे.....
अभी हवा का झोंका आया
साथ मधुर संगीत भी लाया,
"तन से तन का मिलन हो
जरूरी नहीं, मन से मन का
मिलन कोई कम तो नहीं".
हम इसे आदर्श बनायेंग,
मन को भी समझायेंगे.
अब अश्रु नहीं बहायेंगे,
अपना फर्ज निभायेंगे...
,
वह बीच में रेखा खीचता है.
हममे तुझमे जो गहनता है,
जग उसे क्यों नहीं देखता है?
हम तुम देखो जुड़े हैं- कैसे?
नदी के तीर आपस में जैसे.
चलते-चलते थक जायेंगे
बहते - बहते मिट जायेंगे.
शंख- सीप-मोती लुटाकर भी
मिलने को तरस हम जायेंगे.
मिल सकते हैं दोनों तब जब
दरिया - हिमनद सुख जायेंगे.
लेकिन कब हम चाहेंगे ऐसा?
क्या चाह हमारी स्वार्थ जैसा?
हम ऐसे ही बहते जायेंगे,
मिट्टी को बना के उपजाऊ.
प्यार की फसल खिलाएंगे
नहीं सूखने देंगे हिमनद को,
हम अश्रु यूं ही पी जायेंगे
ऐसे ही ...चलते जायेंगे.....
ऐसे ही ...बहते जायेंगे.....
अभी हवा का झोंका आया
साथ मधुर संगीत भी लाया,
"तन से तन का मिलन हो
जरूरी नहीं, मन से मन का
मिलन कोई कम तो नहीं".
हम इसे आदर्श बनायेंग,
मन को भी समझायेंगे.
अब अश्रु नहीं बहायेंगे,
अपना फर्ज निभायेंगे...
,
Wednesday, November 3, 2010
तन दीपक मेरा मन दीपक

तन दीपक मेरा मन है दीपक, दीपक मेरा सपना है;
जग को कहीं करे आलोकित उससे रिश्ता अपना है.
घर को करे प्रकाशित दीपक, कुल का मान बढाता दीपक,
उषा का साथ निभाता दीपक, निशा को दूर भगाता दीपक .
आता है नित संध्या के संग, क्या-क्या रूप दिखाता दीपक,
घर में किरण को लाये दीपक, ज्योत्सना गले लगाये दीपक.
उज्ज्वलता को बाहर बाहर , काजल को ह्रदय समाये दीपक,
कोमल कांति, तेल शान्ति संग, दीपशिखा को भाता दीपक.
गौर वर्ण का प्यारा दीपक, कजरी मन को भाये दीपक,
बैठी काजल कंचन के ऊपर, स्नेह डोर से बंधा है दीपक.
चौकठ पर पहरेदार है दीपक, प्रवेश द्वार लहराए दीपक,
आंधी और तूफ़ान में देखो, साहस खूब दिखाए दीपक.
मिटटी का दीपक,पीतल का दीपक रोब जमाये चांदी दीपक,
सारे दीपक पड़ जाये फीके, जब कनकलता संग आये दीपक.
काया कांति हो जाए सो गुनी, जब अंतर लाओ जलाए दीपक,
काया की भी रहे न छाया , जब शव को आग लगाये दीपक.
देखो ध्यान से यदि दीपक को आशा की सदा जलाए दीपक.
कबीर के घर तेज है दीपक, वे लिए लुकाठी हाथ है दीपक.
तुलसी के घर भक्ति है दीपक, सूर का है वात्सल्य यह दीपक.
मीरा के पाव घुघरू है दीपक, नाची बन गिरिघर संग दीपक.
देखो जिसका घर उजियारा, गीता वहां कुरान है दीपक.
तुम भी बन जाओ मेरे भैया! , मेरे विश्व वसुधा का दीपक,
रखो, संभालो अपना दीपक, कर्त्तव्य का दूसरा नाम है दीपक.
हुई भंग यदि विधि व्यवस्था, घर को भी आग लगाता दीपक.
नहीं चाहिए मुझे निर्वाण, यदि अर्थ है इसका - 'बुझ जाना'.
मुझको मेरा दीपक है प्यारा, प्यारा उसका जलते रहना.
तन दीपक, मेरा मन है दीपक, दीपक मेरा सपना है,
जग को कहीं भी करे आलोकित, उससे रिश्ता अपना है.
Saturday, October 30, 2010
ब्रह्माण्ड की प्रथम दीपावली
"....तम आसीत् ...तमासा गूढं अग्रे...न सत आसीत् .. न असत आसीत्...रजः न आसीत ...न व्योमा ...न मृत्यु आसीत ...न अमृत आसीत ...." .
नासदीय सूक्त के इन खण्ड पंक्तियों का भाव यह है कि...तब सृष्टि के पूर्व, था केवल सघन ..घनीभूत ..अँधेरा...तम ..ही ..तम ..नीरवता - नि:शब्दता का ही साम्राज्य था वहाँ. .....तब शान्ति भी ....डरावनी शान्ति सी ..लग रही थी, उस घोर गहन अन्धकार में ...... जहां नाम - रूप - संज्ञा - सर्वनाम - विशेषण - विशेष्य ...सभी का एकदम अभाव. क्रियाशीलता भी कार्य से विरत होकर निष्क्रियता की मोटी चादर ओढ़े प्रगाढ़ निद्रा में कहीं पड़ी सो रही थी. श्वांस -प्रश्वांस भी तो नहीं था वहाँ . सत्य-असत्य , जन्म-मृत्यु से परे ...एकदम स्तब्ध कर देने वाली सन्नाटा -... कुहासा - कालिमा - अन्धेरा ही फैला हुआ था दूर-दूर तक....इसे 'शून्यता' तो नहीं कह सकते, हाँ इसका गणितीय मान 'शून्य' ही था ...क्योकि समस्त 'ब्रह्मांडीय ऊर्जा' स्थितिज ऊर्जा में संचित और संरक्षित थी. नासदीय सूक्त का (2 श्लोक ) द्रष्टव्य -
नासदासीन्नोसदासीत्तादानीं नासीद्रजो नो व्योमापरो यत |
किमावरीव: कुहकस्यशर्मन्नम्भ: किमासीद्गहनं गभीरं || १ ||
न मृत्युरासीदमृतं न तर्हि न रात्र्याऽआह्नऽआसीत्प्रकेतः |
आनीदवातं स्वधया तदेकं तस्माद्धान्यन्नपर: किन्चनास || २
वहाँ केवल और केवल एक 'अकेला चैतन्य' जिसे "तदेकं" कहा गया है, स्वयं में ही समाधिस्थ था. - "तत एकं अवातं स्वधया आसीत". उससे परे कुछ भी न था - ''तस्मात् - अन्यत - किंचन परः न आस' . पवन - पानी - ऊष्मा ...कुछ भी तो नहीं था. चैतन्य की शान्ति भंग हुई..उसने तप किया, चिंतन किया - यह प्रथम क्रिया थी. उसने संकल्प किया और कार्य प्रारंभ हो गए; यह दूसरी क्रिया थी, ...'कामः तत्र अग्रे समवर्तत'. अन्धेरा छटा, प्रकाश पुंज फैली, प्रकाश और ऊष्मा की परस्पर अभि क्रिया से 'सलिलं' / 'आर्णव' (जल) की उत्पत्ति हुई. उस जल में चैतन्य ने अपनी कामना का बीजारोपण किया. कामना जल में 'अंडा' रूप में 'तैरती दृष्टिगत हुयी. उसी प्रथम सृजन को को 'ब्रहमांड-बीज', गर्भ, 'Universe Egg' ..इत्यादि नामों से विभिन्न ग्रंथों में वर्णित किया गया है. वह अंडा सुदीर्घ काल तक जल में पड़ा रहा. पुनः तदेकं की समाधि से जाग्रति हुयी. कामना रंग लाई, अब अंडा सुवर्णमय, स्वर्णिम हो गया हो गया, हिरण्मय हो गया, उसकी कान्ति हिरण्यं सी रमणीय हो गयी. अब इसे कहा गया 'हिरण्यगर्भ' या 'Golden Egg' ..उस हिरण्यगर्भ' के 'स्फोट' से उसमे अंतर्भूत सभी प्रकार के संचित तत्त्वों / पदार्थों का दूर - दूर तक दसों दिशाओं में प्रक्षेपण हो गया. यह था ब्रह्माण्ड का प्रथम - 'पटाखा'....भरपूर ...जोरदार धमाका... धमाके से बिखरे छोटे -बड़े पिंडों ने - पिंड - गृह - नक्षत्र - तारे और निहारिकाओं का रूप धारण किया, पञ्च महाभूत अस्तित्व में आये और 'पुरुष" सिद्धांत से' विराट प्राकट्य हुआ, जिसकी प्रथम पहचान 'प्रजापति सिद्धांत' के रूप में हुयी, बाद में आगे चलकर थोड़े - बहुत परिवर्तन - परिवर्द्धन के बाद इसे ही 'ब्रह्मा सिद्धांत' और 'विश्वकर्मा सिद्धांत' भी कहा गया. विज्ञान / अंतरिक्ष विज्ञान कहता है इस सृष्टि का कारण महाविस्फोट 'Bigbang' है., अध्यात्म कहता है - 'स्फोट' है. बातें वहीँ हैं, जोर का धमाका. विज्ञान का धमाका आहट ध्वनि (घर्षण प्रादुर्भूत) है, जबकि अध्यात्म का धमाका 'अनाहत ध्वनि' है.यही 'ओमकार' है. घनीभूत अंडे का फूटना , प्रकाश और स्वर्णिम पदार्थों का, चकाचौध कर देने वाला प्रकीर्णन, प्रक्षेपण - प्रकाशोत्सव. यही है - 'ब्रह्माण्ड की प्रथम दीपावली'. अभियान था - अन्धकार से प्रकाश की ओर यात्रा - तमसो माँ ज्योतिर्गमय. इसे सार्थक बनाया , असत से सत की ओर उन्मुख होने की ललक ने - 'असतो माँ सदगमय', और जिसका अंतिम उद्देश्य था - मृत्यु को नकार कर अमृतत्त्व की प्राप्ति - 'मृत्युर्मा अमृतंगमय. इस सन्देश को, इस उद्देश्य को फैलाने का कार्य दीपक को है. हां चौकठ का दीपक, कलश का दीपक, यज्ञ का दीपक ...यही दीपक, जलता दीपक - ज्ञानरुपी पुरोहित है -'अग्निमीले पुरोहितं'. दीपक लघु रूप है और सूर्य - तारे विराट रूप है दीपक का. सूर्य पूजन का "छठ पर्व' यदि इसी परिप्रेक्ष्य हो तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए.
इस ज्ञान प्रकाश का प्रभाव क्या हुआ? पहले जो अँधेरी कालिमा थी, चारो दिशाओं, दसों दिशाओं में व्याप्त होने के कारण चतुर्भुजी - अष्टभुजी - दसभुजी क़ाली - कराली - कपालिनी और डरावनी थी, वही अब दिव्य ज्ञान के आलोक में 'गोरी' हो गयी है, 'गौरी' हो गयी है. गिरिजा - शैलजा - शैलपुत्री बन गयी है. क्षीरसागर निवासिनी कमला - कल्याणी हो गयी है....लक्ष्मी - महालक्ष्मी - वैभव लक्ष्मी हो गयी है. लक्ष्मी तो सागर पुत्री है, सलिल तनया है, उसी की आराधना - वंदना पूजा का त्योहार है - 'प्रकाशपर्व, ज्योतिपर्व दीपावली'. लक्ष्मी को पाना है तो सागर में गोता लगाना होगा. इसके लिए सत्साहस, बुद्धि - विवेक और श्रम की अनिवार्यता. लक्ष्मी के साथ गणेश पूजन इसी का प्रतीक है. गणेश यानी बड़ा कान, सुनो सबकी, सभी मान्यताओं / सिद्धांतों / तर्क - कुतर्क सुने; लेकिन लक्ष्य में सूक्ष्मता हो, केवल लक्ष्य को देखो! उसी का संधान करो!! 'लक्ष्मी जी' आलसी - अविवेकी को लभ्य नहीं है. लेकिन हम तथ्यों को न समझकर दीप मालाओं की लडियां, झिलमिलाते झालरों, बल्बों के डिजाइनदार जालों से, आकर्षक रूप में घरों को, भवनों को सजा लेना ही इसकी योग्यता मान बैठे है.
क्या कभी आपने सोचा है - कहीं वहाँ कोई कालिमा, कोई धब्बा, कोई ईर्ष्या-द्वेष तो नहीं है मन के आँगन में? यदि है तो मिटा डालिए इसी ज्ञानदीप से उस कालिमा को, धो डालिए उस धब्बे को.क्योकि मानव मन के इसी अन्धकार को, बुराइयों को विजित कर 'प्रकाश' और 'ज्ञान' फैलाने का पावन पर्व है - 'दीपावली'. यह प्रत्येक मन में उठने वाले स्नेहिल उत्साह और उमंग प्रदर्शन का भी प्रतीक है - 'दीपावली'. परन्तु अफ़सोस! बहुत ही अफ़सोस !! न जाने कब और कैसे जुआ और चौपा खेलने जैसी कुरीति और बुराई ने दीपावली से नाता जोड़ लिया. यह बद्तोब्याघात है और दीपावली का घोर अपमान भी. इस कुरीति को मिटाना ही दीपावली की श्रेष्ठ पूजा है. दीपावली तो मन का उल्लास है, जब भी मानव का मन खुश होता है, वह प्रसन्न होता है - जोर से ठहाके लगाता है, जोरदार पटाखे बजता है, घर को खुशियों से रोशन करता है. बुराई पर अच्छाई की जीत मानव की सामूहिक जीत है. रावण पर राम की विजय सभी के मन को इसीलिए भाती है. .नगर वासियों ने राम के स्वागत में नगर को सजाया, पटाखे छोड़े, मंगल गीत गाये, सत्य का, अच्छाई का समर्थन किया. अब अच्छाई की यह जीत एक रूढी बन गयी है.यहाँ बताते चलें; मानव मन बुरा नहीं है, बुरा होता तो दीपावली नहीं मनाता. परन्तु विडम्बना यह है कि दीपावली मनाने का ढंग आज भव्यता और धन-प्रदर्शन की अभिरुचि ने ले रखा है. इस भोंडा प्रदर्शन ने दीपावली की महिमा बधाने की बजाय घटाई है. अंतर के उमंग को, अंतर की ज्योति को, अंतरात्मा के घर को यदि ज्योति से जगमगा दिया जाय तो यही दीपावली सर्वश्रेष्ठ दीपावली है. बारूद के पटाखे छोड़ना, पर्यावरण को दूषित करना, बुद्धिमानी नहीं. इस विन्दु पर बुद्धिजीवी वर्ग को ही बार-बार चिंतन करने की आवश्यकता है.
आज भी हम उसी परम्परा को निभा रहे है. और सच कहा जाय तो अब इस परम्परा को ढो रहें है. कहाँ गया हमारा पवित्र उद्देश्य? कहाँ गए हमारे अंतर के छलकते - उमड़ते - घुमड़ते प्यार? परमात्मा ने, 'तदेकं' ने जब दीपावली मनायी - ब्रह्माण्ड का सृजन किया. हमने दीपावली में क्या सृजित किया? इस प्रश्न पर अवश्य ही विचार करना चाहिए. निद्रा देवी की गोद में जाने से पूर्व यदि हम-आप द्वारा अपने दैनिक कृत्य का स्व मूल्यांकन कर लिया जाय, अपने तन-मन को ही दीपक बना लिया जाय तो यही होगी सबसे बड़ी - 'दीपावली'. यही होगी इस पर्व की सबसे बड़ी उपयोगिता और उपादेयता. मैंने तो बना लिया दीपक, अपने तन को, अपने मन को. क्या आप तैयार है साथ निभाने के लिए? अरे ! यह दीपक अत्यंत महत्वपूर्ण है, यह माता-पिता के सामान पालक - पोषक - कल्याणकारी है -"स न: पितवे हूँ वेगने सूपायनो भव". इसलिए मै तो यही कहूँगा और कहता रहूंगा ----
तन दीपक मेरा मन दीपक / दीपक मेरा सपना है / जग को कहीं करे आलोकित / उससे रिश्ता अपना है / दम्भ बताना दीपक को / दीपक का अपमान है / यह आपबी नादानी और / विवेक हीनता की पहचान है / दीपक तो प्रतीक है / सामजिक एकता और प्रकृति के साथ / अद्भुत सौहार्द्र और सद्भाव का / सामंजस्य का .. / खेत की मिट्टी / तालाब का जल / रजनीश की शीत / दिनकर का प्रकाश / पवन की श्वांस / आकाश का अवकाश / बॉस का डंडा / गो-वंश का कंडा / कुम्भकार का श्रम / अग्नि की दाहकता / चित्रकार की कल्पना / फूलों का रंग / घूमते चाक का नृत्य / तेली का तेल / किसान का घृत / कपास की पौध / पौध की रूई / जिसे बनाकर बत्ती / दादी माँ ने अपनी श्रद्धा / है उसमे पिरोई / तब ई है दीपक में जान / देखो कैसे देखा रहा है शान / मिटा देगा अब अँधेरे का नामों ईशान / हमको भी दीपक बन जाना है / इसका आदर्श निभाना है / बदल सकता है दीपक का रंग -रूप / आकार - प्रकार / पर नहीं बदल सकता / दीपक का विशिष्ट व्यवहार / क्योकि वह व्यवहार ही / दीपक का प्राण है / इसके अभाव में वह निर्जीव - निष्प्राण है / ज्योतिहीन दीपक निररथक / और निष्प्राण ही नहीं / कलंक है - कुल का, समाज का, राष्ट्र का..
Tuesday, October 26, 2010
कुछ पूछना है मुझे
स्वर्ण और आभूषण में
सागर और लहरों में,
सूर्य और किरणों में
रजनीश और रश्मियों में.
आखिर क्या है - भेद?
और क्या है - अभेद?
आभूषण जो बनता है
स्वर्ण से ही किन्तु
स्वर्णकार और कलाकार
की हथौड़ी खाने के बाद.
लहरें जो उठती है सागर में
ही लेकिन पवन के झकोरों
ज्वार -भाता की हलचल
और उमंगों तरंगों के बाद.
किरने भी आती है धरती पर
सूर्य की चिता जलने के बाद.
रश्मियाँ भी धरा पर आती हैं
हने बार- बार ललचाती है
परन्तु सूर्य किरणों के चन्द्र
सतह से टकराने के बाद.
इनमे पूर्ववर्ती यदि अक्षर है
तो परवर्ती है - शब्द व्यापार.
जो तैयार करता है किसी
साहित्य किसी काव्य का आधार
इसी साहित्य में इसी काव्य में
अपने अस्तित्वपूर्ण अर्थ का विस्तार
पाता है - वह स्वर्ण, वह सागर..,
वह दिनकर वह रजनीश ....
बनकर किसी वागीश का शिष्य.
सागर और लहरों में,
सूर्य और किरणों में
रजनीश और रश्मियों में.
आखिर क्या है - भेद?
और क्या है - अभेद?
आभूषण जो बनता है
स्वर्ण से ही किन्तु
स्वर्णकार और कलाकार
की हथौड़ी खाने के बाद.
लहरें जो उठती है सागर में
ही लेकिन पवन के झकोरों
ज्वार -भाता की हलचल
और उमंगों तरंगों के बाद.
किरने भी आती है धरती पर
सूर्य की चिता जलने के बाद.
रश्मियाँ भी धरा पर आती हैं
हने बार- बार ललचाती है
परन्तु सूर्य किरणों के चन्द्र
सतह से टकराने के बाद.
इनमे पूर्ववर्ती यदि अक्षर है
तो परवर्ती है - शब्द व्यापार.
जो तैयार करता है किसी
साहित्य किसी काव्य का आधार
इसी साहित्य में इसी काव्य में
अपने अस्तित्वपूर्ण अर्थ का विस्तार
पाता है - वह स्वर्ण, वह सागर..,
वह दिनकर वह रजनीश ....
बनकर किसी वागीश का शिष्य.
Thursday, October 21, 2010
संवाद: गंगा और यमुना का
गंगा - यमुना दो बहने हैं
उदगम दोनों का हिमालय है,
गंगा की जन्मस्थली -'गोमुख'
यमुना की वहीं -'यमुनोत्री' है.
दोनों ही बहती प्यार लिए
स्नेहिल वेगमय धार लिए,
दोनों का पथ है अलग -अलग
संगम पर एकदिन जा के मिले.
थी मिलने की खुशियाँ भी बहुत
पर रंजोगम कुछ कम भी न था,
जब कुशल क्षेम की बात चली
मन का भांडा फिर फूट पड़ा.
बोली यमुना यूँ गंगा से -
मुझमे तुझमे यह भेद है क्यों?
सांवली हूँ मै तू गोरी है...,
इस रंग पर इतनी गर्विता क्यों?
माना तू प्रिय है -भोले को ,
उच्श्रृंखला हो मस्तक जा बैठी
कुछ शर्म करो उस भगिनी का,
क्यों हक उसका तुम छिन बैठी?
हक मेरा छिनना चाहती हो
क्यों इतना मुझे सताती हो?
क्या रंग - रूप ही है सब कुछ,
इतना जो तुम इतराती हो.
यह मानव जाती पूजती तुमको,
मै पड़ी - पड़ी ललचाती हूँ.
क्या तुझमे अधिक है मुझसे?
आज तुमसे ही सुनना चाहती हूँ.
बोली गंगा - सुनो बहना मेरी!
है भ्रम तेरा यह ईर्ष्या है तेरी.
थी बसती मै 'हरि चरणों में',
अनुरक्ति मेरी 'हरि चरणों में'.
उन चरणों का ही प्रसाद मिला,
मुझे तारने का अधिकार मिला.
जिसको हो समझती उच्श्रृंखलता
वह गर्व नहीं है - समर्पण है'..
समर्पित का स्थान है - 'दो ही',
एक दिल है और एक मस्तक है.
दिल में रहती मेरी भगिनी है,
मुझे मिला स्थान जो, 'मस्तक' है.
था अधिकार यह भोले को,
चाहे जैसा व्यवहार करें.
मै तो हूँ - 'शिष्या' उनकी,
मत करो संदेह पवित्रता पर.
निज मन की यह विकृति तेरी,
कुछ शर्म करो! कुछ शर्म करो! !
पूछा तुमने जब अंतर है,
उसको अब तुम्हे बताती हूँ,
जिस 'हर' की हूँ दासी मै.
तू उसकी गेंद चुराती है.
शरण स्थली बनी रही हो,
ताज दिया तूने मर्यादा है.
पहले था संरक्षण कालिया को,
अब संरक्षण विधि छलिया को.
सीख मान लो बहना मेरी!
संकल्प सहित यह यह कहती हूँ.
है साक्षी इसकी सरस्वती यहाँ,
चलो सभे संग अब बहती हूँ.
मुझमे तुझमे कुछ भेद नहीं,
जो गंगा है वह यमुना है.
मिटा राग - ईर्ष्या जब से
नाम -रूप रंजोगम खो गाया,
मन का सब मालिनी धुल गया.
अब तो सब गंगा ही गंगा.
मिला संयुक्त अधिकार जब तारने का
निज नाम भूल गयी यमुना अब,
लगी कहने निज को भी गंगा-गंगा अब.
सभी के मन में बसती हैं ये,
गंगा - यमुना जो नदियाँ हैं.
अब तेरे ऊपर है मेरे भाई!
कौन बहती तेरी 'अखियाँ हैं'.
उदगम दोनों का हिमालय है,
गंगा की जन्मस्थली -'गोमुख'
यमुना की वहीं -'यमुनोत्री' है.
दोनों ही बहती प्यार लिए
स्नेहिल वेगमय धार लिए,
दोनों का पथ है अलग -अलग
संगम पर एकदिन जा के मिले.
थी मिलने की खुशियाँ भी बहुत
पर रंजोगम कुछ कम भी न था,
जब कुशल क्षेम की बात चली
मन का भांडा फिर फूट पड़ा.
बोली यमुना यूँ गंगा से -
मुझमे तुझमे यह भेद है क्यों?
सांवली हूँ मै तू गोरी है...,
इस रंग पर इतनी गर्विता क्यों?
माना तू प्रिय है -भोले को ,
उच्श्रृंखला हो मस्तक जा बैठी
कुछ शर्म करो उस भगिनी का,
क्यों हक उसका तुम छिन बैठी?
हक मेरा छिनना चाहती हो
क्यों इतना मुझे सताती हो?
क्या रंग - रूप ही है सब कुछ,
इतना जो तुम इतराती हो.
यह मानव जाती पूजती तुमको,
मै पड़ी - पड़ी ललचाती हूँ.
क्या तुझमे अधिक है मुझसे?
आज तुमसे ही सुनना चाहती हूँ.
बोली गंगा - सुनो बहना मेरी!
है भ्रम तेरा यह ईर्ष्या है तेरी.
थी बसती मै 'हरि चरणों में',
अनुरक्ति मेरी 'हरि चरणों में'.
उन चरणों का ही प्रसाद मिला,
मुझे तारने का अधिकार मिला.
जिसको हो समझती उच्श्रृंखलता
वह गर्व नहीं है - समर्पण है'..
समर्पित का स्थान है - 'दो ही',
एक दिल है और एक मस्तक है.
दिल में रहती मेरी भगिनी है,
मुझे मिला स्थान जो, 'मस्तक' है.
था अधिकार यह भोले को,
चाहे जैसा व्यवहार करें.
मै तो हूँ - 'शिष्या' उनकी,
मत करो संदेह पवित्रता पर.
निज मन की यह विकृति तेरी,
कुछ शर्म करो! कुछ शर्म करो! !
पूछा तुमने जब अंतर है,
उसको अब तुम्हे बताती हूँ,
जिस 'हर' की हूँ दासी मै.
तू उसकी गेंद चुराती है.
शरण स्थली बनी रही हो,
ताज दिया तूने मर्यादा है.
पहले था संरक्षण कालिया को,
अब संरक्षण विधि छलिया को.
सीख मान लो बहना मेरी!
संकल्प सहित यह यह कहती हूँ.
है साक्षी इसकी सरस्वती यहाँ,
चलो सभे संग अब बहती हूँ.
मुझमे तुझमे कुछ भेद नहीं,
जो गंगा है वह यमुना है.
मिटा राग - ईर्ष्या जब से
नाम -रूप रंजोगम खो गाया,
मन का सब मालिनी धुल गया.
अब तो सब गंगा ही गंगा.
मिला संयुक्त अधिकार जब तारने का
निज नाम भूल गयी यमुना अब,
लगी कहने निज को भी गंगा-गंगा अब.
सभी के मन में बसती हैं ये,
गंगा - यमुना जो नदियाँ हैं.
अब तेरे ऊपर है मेरे भाई!
कौन बहती तेरी 'अखियाँ हैं'.
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