Saturday, July 31, 2010

गंगा क्या है - नदी, आस्था या विज्ञान?

गंगा एक नदी है
जो निकलती है गोमुख
गंगोत्री से और
आकर नीचे हिमालय से
हरिद्वार - प्रयाग - काशी होते हुए
ऋषि - मुनियों के कुटीरों का
स्पर्श - संश्पर्शन करते हुए ..
जा मिलती है - सागर से.
और बन जाती है - "गंगा सागर".


गंगा हमारी संस्कृति है
जो विष्णु के नख से निःसृत हो
जा समाई ब्रह्मा के कमंडल में.
और जब निकली कमंडल से बन के,
वेगवती - रूपवती - प्रलयंकारी,
जा उलझी खुली जटाओं में शिव के.
इस प्रकार गंगा योजक है -
भारतीय संस्कृति के नियामक त्रिमूर्ति का.
हमारी आस्था - विश्वास और भावनाओं का.


गंगा है आस्था
और विश्वास का अटूट संगम,
केवल गंगाजल ही है समर्थ,
तारने मैं राजा सागर के भस्मीभूत
हो चुके सहस्रों लाडलो को.
इसलिए गंगावतर
ण बन गया था,
एक पवित्र मिशन भगीरथ के लिए.
भगीरथ की सफलता के बाद
गंगा बन गयी - 'भागीरथी'.
तारनहार और पालनहार!!
हो गयी सुलभ जनसामान्य के लिए,
और बन गयी है प्रबल केंद्र,
आस्था का, श्रद्धा का, विश्वास का ..


परन्तु, हाय रे नगरीय सभ्यता !
हाय रे भौतिकता की प्रगति !!
तूने तो सत्यानाश ही कर डाला,
सैकड़ों नाले - सीवर का मुह खोलकर,
कूड़ा - कचरा बहाकर इस पवित्र नदी में.
खून कर डाला है तूने, कोटिशः आस्थाओं का.
क्या हक है तुझे किसी की आस्था
और भावनाओं को कुचलने का?
किसने दिया तुझे यह अधिकार?
कुछ शर्म करो! तुझे धिक्कार!!
बार-बार और पुनः-पुनः धिक्कार!!


गंगावतरण विज्ञान है-
एक .सूत्र है भौतिकी का,
कहती है जिसे वह -"ओह्म्स ला".
उच्च वोल्टेज हिमालय (V) से
निम्न वोल्टेज गंगासागर के बीच
बहने वाली गंगा इस प्रवाह (I)
के परिपथ को जोडती है.
शिव की जटायें प्रतिरोध (R)
की भूमिका निभाते हुए
प्रदान करती है - 'वांछित धारा'.
उपयोगार्थ और प्रयोगार्थ.
साथ ही प्रदान करती है-
एक माडल - "ओह्म्स ला" के लिए.

;,

Friday, July 30, 2010

गोदान से श्रेष्ठ है रक्तदान और नेत्रदान

देखा था टपकते बोतल से
रक्त की लाल सी बूंदों को,
जो दे रही थी नवजीवन
बेजान पड़े किसी मानव को.

नहीं जानता हममे कोई
थी किसकी ये बूंदे?
किसी किशोर या प्रौढ़ की
हिन्दू मुस्लिम या बौद्ध की.
जड़ सींच रही थी वह तो
मस्ती में अपनी किसी
अजनवी के बेजान पौध की.

नहीं जानता हममे कोई
आखिर वह बूंदे थी किसकी?
किसी पुरुष या नारी की
योगी - भोगी किसी गृहस्थ
अथवा किसी ब्रह्मचारी की?
रक्त तो है यह - 'मात्र रक्त'
हो स्वेच्छा की या लाचारी की.

दे सकता है 'रक्त' हमारा
दम तोड़ते को पुनर्जीवन,
ले सकता है - 'दंभ' हमारा
हँसता हुआ किसी का जीवन.
अहम् में घुलकर यही ताकत
कुछ उबल-उबल सा जाता है,
यह उबला रक्त समाज को
यूँ ही फिर कहाजाता है.

रक्त - रक्त में भेद है भाई
इस अंतर को जानो तुम भाई,
एक रक्त है - 'जीवनदाता',
दूजा 'समाज का कोढ़' कहलाता.
हम भी करें काम कुछ ऐसा
उपयोगी हो रक्तदान है जैसा,
कौन जाने यह क्या कर जाए?
किसको नव जीवन दे जाए?

नेत्रदान भी महा दान है
परन्तु जनता अब भी अनजान है,
आओ हम ऐसा कर जाएँ,
नेत्रदान कर राह दिखाए.
'गोदान' के फल को देखा नहीं
रक्तदान को नेत्रदान को देखा है,
क्यों उलझें गोदान के पीछे?
गोदान में एक छिपा स्वार्थ है
रक्तदान - नेत्रदान महा पुरुषार्थ है.


Monday, July 26, 2010

सृजन: 'सत्प्रवृत्तियों का'

कहता था और
कहता रहूँगा,
लिखता था और
लिखता रहूँगा कि -
सत्प्रवृत्तियों पर
आवरण का,
जो गहन-गंभीर
अँधेरा पड़ा है,
उसे हटाना है - ' केवल '.
इस अँधेरे को हटाना
और मिटाना ही है :
सृजन - ' सत्प्रवृत्तियों का '.


सत्प्रवृत्तियों में -
श्रम नहीं उल्लास है,
आंतरिक उच्छ्वास है;
दुष्प्रवृत्तियों में थकान,
और जीवन का ह्रास है.
दुष्प्रवृत्तियों में व्यथा श्रम,
और सामाजिक उपहास है.


जानते है हम भी,
आप भी और सभी;
लेकिन डरते क्यों हैं
इस अँधेरे से....?
जानते है हम भी,
आप भी और सभी;
तिमिर यहाँ स्थाई नहीं.
इसे तो मिट जाना ही है,
राह लो थोड़ी देर और ,
उषा को सुबह में आना ही है.


लेकिन करें क्यों इन्तजार,
हम प्राची का ?
हम हैं मानव जलाएंगे दीप,
यह हाथ नहीं है याची का.
गर हम सभी मिलकर ,
दीवाली सा दीप जलाएंगे,
क्या यह अँधेरा और तिमिर,
धारा पर टिक पाएंगे ?

सृजन नहीं कर सकते?
चलो कोई बात नहीं.
मंदिर-मस्जिद नहीं जा सकते,
अब भी कोई बात नहीं.
अपने चौकठ पर,
दीप जला तो सकते हो,
अपने घर के अँधेरे को,
भगा तो सकते हो,
नहीं जानते तुम,
यह एक दीप नहीं,
प्रवृत्ति है.
बन जाये आदत,
यही सत्प्रवृत्ति है.

Saturday, July 24, 2010

बाल गंगाधर तिलक को भावभीनी श्रद्धांजलि.

बाल गंगाधर तिलक को भावभीनी श्रद्धांजलि.

बाल
= बाल हनुमान रूप जिसने अंग्रेजी राज्य के सूर्य को निगल लिया.

गंगाधर
= गंगा को धारण करनेवाले शिव का रूद्र रूप, जिनके तीसरे नेत्र से स्वतंत्रता की ऐसी ज्वाला फूटी जिसमे अंग्रेजी राज्य भस्म हो गया.

तिलक
= उस स्वतंत्रता की भस्म को हम चन्दन / रोली मानकर माथे पर धारण कर रहें है. यह है स्वतंत्रता की मशाल बाल गंगाधर तिलक के नाम और व्यक्तित्वा कप्रभाव. उनके जन्म दिन पर नमन, वंदन और भावभीनी श्रद्धांजलि.

बाल गंगाधर तिलक को भावभीनी श्रद्धांजलि.


बाल = बाल हनुमान रूप जिसने अंग्रेजी राज्य के सूर्य को निगल लिया.
गंगाधर = गंगा को धारण करनेवाले शिव का रूद्र रूप, जिनके तीसरे नेत्र से स्वतंत्रता की ऐसी ज्वाला फूटी जिसमे अंग्रेजी राज्य भस्म हो गया.
तिलक = उस स्वतंत्रता की भस्म को हम चन्दन / रोली मानकर माथे पर धारण कर रहें है. यह है स्वतंत्रता की मशाल बाल गंगाधर तिलक के नाम और व्यक्तित्वा कप्रभाव. उनके जन्म दिन पर नमन, वंदन और भावभीनी श्रद्धांजलि.

Friday, July 23, 2010

नहीं चाहिए मुझे निर्वाण

बुद्ध गौरव हैं भारत भूमि के,
वे ऐतिहासिक पुरुष नहीं,
एक "प्राज्ञं पुरुष" हैं,
स्वयं एक इतिहास हैं,
सृष्टि उनकी करुणा
का .......विलास है...


नहीं हूँ विरोधी बुद्ध का,
उनका 'शील' उनकी 'संयम',
उनकी 'वेदना' उनकी ' प्रज्ञा',
उनका 'बोध' उनकी 'समाधि',
बहुत - बहुत प्रिय है मुझे.
उनके 'चार आर्य सत्य''
उनका 'अष्टांग योग',
उपयोगी ही नहीं....
अनिवार्य तत्व हैं मानवता के.


अध्ययन किया है
उनके 'जीवन यान' का,
'हीनयान' और 'महायान' का भी.
खूब पढ़ा है - 'बोधि सत्व' को,
और नागार्जुन के 'शून्यवाद' को भी.
फिर भी क्यों...? आखिर क्यों..?
सहमत नहीं हूँ मैं, उनके प्रयाण से ...
उनकी परिकल्पना के 'निर्वाण' से.


जीवन तो एक उल्लास है,
इसमें शांति की सहज प्यास है.
.'निर्वाण' तो एक आभास है,
और 'लौ' तो स्वयं प्रकाश है.
कितने वे लगते हैं अच्छे,
जब कहते - "आपो दीपो भव".
चर्चा करते "बुझ जाने की"
तब विल्कुल बच्चे लगते हैं.


पूछता हूँ स्वयं से एक प्रश्न,
बार - बार फिर बारम्बार,
प्रत्युत्तर में कहीं दूर अन्तः से,
आती है एक स्पष्ट आवाज:
नहीं चाहिए मुझे 'प्रयाण',
यदि अर्थ है इसका बुझ जाना.
मैंने केवल 'लौ' को जाना.


आंधी और तूफ़ान में देखो,
"'लौ' को महूब लहराए दीपक,
बुझने से पहले भी देखो;
सौ - सौ दीप जलाये दीपक.
मुझको यह दीपक है प्यारा,
प्यारा इसका जलते रहना.
इस जलते दीपक की खातिर,
जन्म - मृत्यु सब कुछ है सहना.

Sunday, July 18, 2010

कैसे सुलझाऊ उलझन मन की

आखिर ऐसा क्यों होता है?
भार यह मन फिर क्यों ढोता है?
प्रिय की डांट भी लगती प्यारी,
प्यार भी उनका क्यों चुभता है?


प्रिय की कुटिल हास्य में बांकपन,
तकरार में लाड का रूप दीखता है,
उनकी स्नेहमयी वाणी भी आखिर,
दिल में तीर सा क्यों चुभता है ?


प्रिय की डांट से सुमन सा झरता,
निवेदन भी उनका कड़वा लगता,
दिल मेरा तो एक है फिर भी,
दोरंगी बात है वह क्यों करता?


क्या चिंतन है मेरा दोषपूर्ण?
या न्याय मेरा ही कलुषित है,
लेकिन अनुभूति की दर्पण ने,
क्यों दो - दो बिम्ब दिखाया है?


क्या दिल मेरा ही है बेईमान?
बेंच दिया जिसने अपना ईमान?
लेकिन बेईमान कहाँ करते हैं?,
इस तरह दिश अपना स्वीकार?


पक्ष - विपक्ष तो मैं ही हूँ खुद,
क्या न्याय स्वयं से कर पाउँगा?
कर न सका यदि न्याय स्वयं से,
तो नजरों अपनी ही गिर जाउंगा.