समाचारों में पढ़ा, टीवी में भी देखा,
ये नक्सली अब बौखला से गए हैं.
मरने - मारने पर उतारू तो थे ही,
अब जन सामान्य पर तो पूरी तरह
कहर बन कर छा गए हैं.
ट्रेन और बसों को उड़ा गए हैं.
ऐसी ही ख़बरें पढ़ते-पढ़ते ना जाने कब?
नीद की आगोश में समां गया, अथवा
कोई नक्सली आप बीती सुनाने उठा ले गया.
मैंने देखा:
उनके घरों को, झोपड़ पट्टे को,
अधपके मोटे चावल ......,
बिना नमक - तेल की सब्जी को.
उसने दिखाया अपनी स्थिति,
...रो रहे बच्चे को.
बोला - भूखा है यह,
इसकी माँ को दूध नहीं उतरता,
गाँव में कोई दूध नहीं देता,
कोई काम नहीं देता.
मैंने कहा:
तुम लोग शहर जाकर
कोई काम धंधा क्यों नहीं करते?
शहर जाने का किराया नहीं,
बिचौलिया पैसा नहीं देता.
ठीकेदार कमीशन ही नहीं खाता,
घरवाली पर डोरे भी डालता साब.
ऐसे पैसे वालों को हम क्यों छोड़ेगा साब ?
परन्तु तुम लोग
ट्रेन यात्रियों को क्यों मारते हो?
ये भी ठीकेदार और बनियों का
साथी होता साब, जेब में पैसा है,.
तभी तो ए.सी. में और ...
स्लीपर में चलता साब.
सरकार सारा डिब्बा एक जैसा
क्यों नहीं बनाता साब?
उनका पेट फूला -फूला और
हमारा पीठ में क्यों घुसा साब?
ये यात्री लोग हमें अपना भाई - वाई
कुछ नहीं मानता साब,
एक दिन ना चलने से,
इनका क्या बिगड़ता साब?
हमारी आवाज सरकार,
कुछ तो सुनता साब.
ये जब हमको अपना नहीं मानता,
हम क्यों माने साब?
हमारे एरिया में एक भी स्कूल,
अस्पताल क्यों नहीं साब?
आज बड़ों के बच्चे कंप्यूटर चलाते
और हमारे अंगूठा लगाते साब.
आखिर ऐसा कब तक चलेगा साब?
क्या आजादी के लिए हमारे पुरखे नहीं लड़े?
इन्हीं पेड़ों में मेरे दादा को रस्सी से बाँध कर
लटका दिया था फिरंगियों ने.
बापू बताता था, अपनी पीठ पर
कोड़े का निशान दिखाता था.
फिरंगियों से तो बच गया था,
देश के सूदखोरों से नहीं बच पाया.
इन्ही कटीली झाड़ियों में घसीटा था,
बहुत बेइज्जत किया था........
खून उगल कर मरा था.............,
बाप मेरा, इसी जगह पर साब.
क्या जन्म लेना अपने हाथ में है साब?
हाथ में होता, किसी बड़े के यहाँ जन्म लेता.
हेलीकोप्टर में, जहाज में, झूला झूलता साब .
यह बिधाता का लेखा है, हमारे साथ तो धोखा है.
मैंने पूछा-
हथियार कहाँ से लाते हो?
रहस्यमयी मुस्कान होठो पे लाकर बोला,
साब आप भी अजीब बात करता है.
साहब लोग बोरा के बोरा नोट कहाँ से लाता है?
उसी को छीनते हैं, अपना पेट भरते हैं
और बाकी जो बचता है,
उससे हथियार खरीदते है.
यदि बोरे के नोट बंद हो जाय,
हथियार बंद हो जाएगा साब.
परन्तु हम जानते हैं, यह बंद नहीं होगा.
ना आप लोग जनता को लूटना बंद करेगा,
ना हम आप को लूटना बंद करेगा.
यह तो इन्साफ की बात है साब,
आप खाते- खाते मरेगा, हम भूखों मरेगा.
यह नहीं होगा साब, कभी नहीं होगा.
मैंने कहा -
क्या अपने मुखिया से मिलाओगे,
.......... कुछ बात - वात कराओगे?
वह बोला, शाम को मिलेगा साब,
इस समय हथियारों के डीलर के पास गया है.
वह कहाँ रहता है? ...
.कुछ दूसरे नेता भी तो होंगे, उन्हें बुलाओ
अरे रग्घू काका!
देखो एक साहब आया है
तुम्हे बुलाया है,
अपनी बात सरकार तक पहुचाने की,
बात करता है, और अपने को
एक पत्रकार कहता है.
आगंतुक बोला, बातों में
शायराना अंदाज का मिसरी घोला.
यदि हँसना जो चाहा हमने,
अरे कौन सा गुनाह किया हमने?
तुम्हे क्या पता, एक पल के लिए,
क्या- क्या नहीं सहा है हमने?
जागृत हुई है चेतना जब से,
दर्द से नाता रहा है तब से.
कितनी राते रो - रो के गुजारी,
पूछो इस बूढ़े अश्वत्थ से.
फिर भी है गर्व, लिया है जन्म
इसी जमी पे, यह समाज मेरा घर है.
आज नहीं दे रहा तो क्या है?
आगे मिलने का अवसर तो है.
यह विश्वास जगाये बैठा....,
आशा बहुत लगाये बैठा.....
उम्र हुई अब साठ बरस की,
हाथ ना अब तक है कुछ आया.
भटक गयी संताने अपनी,
रोका-टोका, पर समझ ना आया.
कहते हैं हक लेंगे अपना,
हम बन्दूक की नोक से,
नोच भगायेंगे इन सबको,
जकड़े हैं जो जोंक से.
लेकिन यह तो गलत है,
बिलकुल अनुचित मार्ग है यह,
उन्हें समाज की
मुख्य धारा में लौटना होगा,
बातों से हल निकालना होगा,
सरकार भी संवेदनहीन नहीं है.
अब आगे कदम बढ़ाना होगा,
वार्ता की मेज पर आना होगा.
तब तक किसी ने,
मेरे सिर को जोर से झकझोरा....
देखा, श्रीमतीजी हाथ में
चाय का प्याला लिए खड़ी है,
बोली - शादी के पहले
तो मेरा नाम जपते थे,
अब शादी के बाद,
यह किसका जाप कर रहे हो?
मै झल्लाया, चीखा, चिल्लाया,
तुम यहाँ भी टांग अड़ा गयी.
मै नक्सलियों की बस्ती में गया था,
कोई समझौता हो गया होता,
कोई फ़ॉर्मूला, कोई बीच का
रास्ता निकल गया होता....,
तो मेरा भी काम बन गया होता,
नाम के साथ दाम भी मिला होता.
कोरी पत्रकारिता से क्या होगा?
चाय की चाय ही रहेगी.
ये नक्सली भी वीरप्पन से कम नहीं,
देखा था, उस समय कितनो की चाँदी थी.
हाय! मालामाल होने का,
हाथ आया एक अवसर गया.
हर बार की तरह इस बार भी
यह सेहरा, तेरे ही सिर गया
Tuesday, June 15, 2010
Sunday, June 13, 2010
माँ कभी मरती नहीं
बहुत ..बीमार... है ..माँ....
आज माँ के पास बैठा ..हूँ.
बहुत निकट, उससे एकदम सट कर.
तो क्या एक दिन माँ मर जायेगी?
क्या माँ फिर नजर नहीं आएगी?
ना जाने कैसे मन की बात सुन लिया?
वह धीरे ..से ...फुसफुसाई..........,
बहुत धीमी मंद आवाज आई.....-
"माँ मरती नहीं, कभी मरती नहीं बेटे "
हाँ, माँ ने बिलकुल ठीक कहा था:
माँ मरती नहीं ...माँ मर नहीं सकती,
देख रहा हूँ उसे..., प्रकृति में ,
शून्य में...विलीन होते हुए ....आज...
माँ, अब शारीर नहीं है.., रूप नहीं है...,
स्वरुप नहीं है.., आकृति..नहीं है .
माँ, केवल शब्द ....नहीं है ....
'शब्द' - 'अर्थ' के बंधन को वह तोड़ चुकी है.
अब तो ...........अब ........तो...........
माँ, एक सम्पूर्ण ... अभिव्यक्ति है........
माँ, एक जिम्मेदारी है, एक दायित्व है,
माँ ही पृथ्वी के रूप में उत्पादक है,
नदी और जल रूप में पोषक है,
मेघ रूप में वर्षा है, पुष्प रूप सुगंध है,
झरना रूप प्रवाह है, पपीहा रूप में गान है,
राग रूप दुलार है वह, और डांट रूप निर्माण है.
रोटी रूप में भोजन है वह, श्वेद रूप में श्रम है.
थल रूप ठोस वही, तरल रूप में बहता जल है.
स्वप्न रूप में लक्ष्य वही है, साहस रूप में गति है.
प्रेरक वही, प्रेरणा वही, सन्मार्ग रूप प्रगति है.
माँ अब वैयक्तिक आत्मा नहीं..., .
विश्वात्मा है......, परमात्मा है.....
माँ को अब इसी रूप में निहारना है,
माँ तो दे चुकी, उसको जो कुछ भी देना था.
सन्मार्ग दिखाने आयी थी, नाता तो एक बहाना था.
अब हमको पथ पर चलना है,
जो कुछ है अबतक सिखलाया,
काम वही अब करना है. प्रकृति रुपी माँ!,
हे विश्व रुपी माँ!! , हे श्रृष्टि रुपी माँ!!! ,
तुम्हे नमन!, बारम्बार नमन!! , कोटिशः नमन!!!
आज माँ के पास बैठा ..हूँ.
बहुत निकट, उससे एकदम सट कर.
तो क्या एक दिन माँ मर जायेगी?
क्या माँ फिर नजर नहीं आएगी?
ना जाने कैसे मन की बात सुन लिया?
वह धीरे ..से ...फुसफुसाई..........,
बहुत धीमी मंद आवाज आई.....-
"माँ मरती नहीं, कभी मरती नहीं बेटे "
हाँ, माँ ने बिलकुल ठीक कहा था:
माँ मरती नहीं ...माँ मर नहीं सकती,
देख रहा हूँ उसे..., प्रकृति में ,
शून्य में...विलीन होते हुए ....आज...
माँ, अब शारीर नहीं है.., रूप नहीं है...,
स्वरुप नहीं है.., आकृति..नहीं है .
माँ, केवल शब्द ....नहीं है ....
'शब्द' - 'अर्थ' के बंधन को वह तोड़ चुकी है.
अब तो ...........अब ........तो...........
माँ, एक सम्पूर्ण ... अभिव्यक्ति है........
माँ, एक जिम्मेदारी है, एक दायित्व है,
माँ ही पृथ्वी के रूप में उत्पादक है,
नदी और जल रूप में पोषक है,
मेघ रूप में वर्षा है, पुष्प रूप सुगंध है,
झरना रूप प्रवाह है, पपीहा रूप में गान है,
राग रूप दुलार है वह, और डांट रूप निर्माण है.
रोटी रूप में भोजन है वह, श्वेद रूप में श्रम है.
थल रूप ठोस वही, तरल रूप में बहता जल है.
स्वप्न रूप में लक्ष्य वही है, साहस रूप में गति है.
प्रेरक वही, प्रेरणा वही, सन्मार्ग रूप प्रगति है.
माँ अब वैयक्तिक आत्मा नहीं..., .
विश्वात्मा है......, परमात्मा है.....
माँ को अब इसी रूप में निहारना है,
माँ तो दे चुकी, उसको जो कुछ भी देना था.
सन्मार्ग दिखाने आयी थी, नाता तो एक बहाना था.
अब हमको पथ पर चलना है,
जो कुछ है अबतक सिखलाया,
काम वही अब करना है. प्रकृति रुपी माँ!,
हे विश्व रुपी माँ!! , हे श्रृष्टि रुपी माँ!!! ,
तुम्हे नमन!, बारम्बार नमन!! , कोटिशः नमन!!!
Saturday, June 12, 2010
मेरी बूढी माँ

माँ मेरी अब बूढी हो गयी,
पड़ गयी हैं झुरियां चेहरे पर.
लटक गए हैं उन बाँहों से,
चमड़ी के लोथड़े जिन्हें बनाकर
झूला मुझे लिटाया था और
व्योम में भी उछाला था.
कंधे पर बिठा के खपरैल की मुंडेर
के पीछे .इन्हीं हाथों से दिखा - दिखा के
चंदामामा को, गौरैया को, कबूतर को..,
न जाने कितनी बार, दिन में - रात में,
कटोरी और गिलास से दूध पिलाया था.
माँ जिसे दिखता नहीं अब मोटे चश्मे से भी,
हर चीज पहचानती है वह, बस आभास से..,
एहसास से.., उसके होने के विश्वास भर से.
किन्तु, ...माँ को सब...दीखता है.....,
बहुत स्पष्ट दिखता है, सैकड़ो मील दूर से...
मेरा बेटा, मेरी बहू, मेरे नाती - पोते..,
क्या कर रहें हैं? ..कैसे खेल रहें हैं?
कौन सो रहा है? ..कौन रो रहा है?
कौन है बीमार ? .और कौन है परेशान?
माँ, जो कभी भेजती थी चिट्ठी,
आज कराती है फोन.
लुटती है जान, जो अब बची ही कहाँ?
कहती थी जिसे कभी फिजूलखर्ची,
अब उसी पर है लट्टू.
लालायित है जानने को बच्चो की मर्जी.
परन्तु बेटे क्या करते हैं.....?
फोन पर कभी-कभी झल्ला जाते हैं,
उसी पर पूरा इतिहास और भूगोल
समझा जाते हैं.
माँ सब समझती है, खूब समझती है,
जाने कैसे मर्म को भेदती है?
फोन न करने की कसमे खा-खाकर भी,
हर तीसरे - चौथे दिन घंटी जरूर बजती है.
हो जाता मन बेचैन क्यों, जब फोन नहीं आता है.
खुद ही रिंग करने का, फिर साहस क्यों खो जाता है?
Thursday, June 3, 2010
जीवन क्या है ?
जीवन क्या है ?
जन्म से मृत्यु तक की
यात्रा या और भी कुछ ?
संस्कृति का वरदान,
या प्रकृति की नियति ?
यदि संस्कृति का वरदान है
तो ढेर सारे प्रश्न है -
समाधान हेतु; और
यदि प्रकृति की नियति है
तो, वहां प्रश्न कहाँ ?
और जहाँ प्रश्न नहीं,
वहां विचार कहाँ ? और
जहाँ विवेक - विचार नहीं,
तर्क - वितर्क नहीं;
वहां मानवता कहाँ ?
इंसानियत कहाँ ..?
सभ्यता कहाँ ....?
और मानवता विहीन,
नैतिकता से हीन
हम क्या हैं?
कहीं वही तो नहीं,
जिसे परिभाषित किया गया है -
"मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति" में.
क्या जीवन का प्रथम प्रश्न
औचित्य का प्रश्न नहीं है?
हाँ यही प्रथम प्रश्न है
और महत्वपूर्ण प्रश्न है,
जिसके समाधान हेतु
मानव का सम्पूर्ण जीवन;
अनवरत लगा हुआ है -
भूत से वर्तमान और
वर्तमान से भविष्यत तक.
समय विहंस रहा है;
दोनों को परख रहा है,
प्रकृति के सर्वश्रेष्ठ कृति पर,
जिसे अपने बुद्धि - विवेक,
ज्ञान -विज्ञान पर दंभ तो है,
परन्तु औचित्य के प्रश्न पर
चिन्तन - मंथन
अनवरत जारी है..........
यह भूत का प्रश्न था,
वर्तमान का प्रश्न है और,
भविष्यत का भी प्रश्न रहेगा.
समय सब कुछ निरख रहा है,
सूक्ष्म दृष्टि से परख रहा है;
दोनों में कितना है अंतर?
भली भांति यह समझ रहा है.
संस्कृति का वरदान -
औचित्य का परिणाम है,
यह मृत्यु को नकार,
मृत्युंजय बनने की प्रक्रिया है.
और प्रकृति की नियति -
उन्मुक्त काम - वासना ,
यौनपिपासा की कुत्सित विकृति है.
जीवन के इस कुरुक्षेत्र में, पुनः
आ डटे हैं - कौरव और पांडव,
परन्तु गीतामृत पान करानेवाला
वह दिव्य सारथि कहाँ है?
आज का अर्जुन तो व्यामोह में
खडा है, दायित्व और कर्त्तव्य के
द्वंद्व में आज भी फंसा है.
कालचक्र फिर घूमा है;
निर्णय अर्जुन को लेना है,
और आज,यदि द्वंद से
निकल नहीं पाया तो
इस वर्तमान का क्या अर्थ है?
फिर तो औचित्य का प्रश्न भी व्यर्थ है.
जन्म से मृत्यु तक की
यात्रा या और भी कुछ ?
संस्कृति का वरदान,
या प्रकृति की नियति ?
यदि संस्कृति का वरदान है
तो ढेर सारे प्रश्न है -
समाधान हेतु; और
यदि प्रकृति की नियति है
तो, वहां प्रश्न कहाँ ?
और जहाँ प्रश्न नहीं,
वहां विचार कहाँ ? और
जहाँ विवेक - विचार नहीं,
तर्क - वितर्क नहीं;
वहां मानवता कहाँ ?
इंसानियत कहाँ ..?
सभ्यता कहाँ ....?
और मानवता विहीन,
नैतिकता से हीन
हम क्या हैं?
कहीं वही तो नहीं,
जिसे परिभाषित किया गया है -
"मनुष्यरूपेण मृगाश्चरन्ति" में.
क्या जीवन का प्रथम प्रश्न
औचित्य का प्रश्न नहीं है?
हाँ यही प्रथम प्रश्न है
और महत्वपूर्ण प्रश्न है,
जिसके समाधान हेतु
मानव का सम्पूर्ण जीवन;
अनवरत लगा हुआ है -
भूत से वर्तमान और
वर्तमान से भविष्यत तक.
समय विहंस रहा है;
दोनों को परख रहा है,
प्रकृति के सर्वश्रेष्ठ कृति पर,
जिसे अपने बुद्धि - विवेक,
ज्ञान -विज्ञान पर दंभ तो है,
परन्तु औचित्य के प्रश्न पर
चिन्तन - मंथन
अनवरत जारी है..........
यह भूत का प्रश्न था,
वर्तमान का प्रश्न है और,
भविष्यत का भी प्रश्न रहेगा.
समय सब कुछ निरख रहा है,
सूक्ष्म दृष्टि से परख रहा है;
दोनों में कितना है अंतर?
भली भांति यह समझ रहा है.
संस्कृति का वरदान -
औचित्य का परिणाम है,
यह मृत्यु को नकार,
मृत्युंजय बनने की प्रक्रिया है.
और प्रकृति की नियति -
उन्मुक्त काम - वासना ,
यौनपिपासा की कुत्सित विकृति है.
जीवन के इस कुरुक्षेत्र में, पुनः
आ डटे हैं - कौरव और पांडव,
परन्तु गीतामृत पान करानेवाला
वह दिव्य सारथि कहाँ है?
आज का अर्जुन तो व्यामोह में
खडा है, दायित्व और कर्त्तव्य के
द्वंद्व में आज भी फंसा है.
कालचक्र फिर घूमा है;
निर्णय अर्जुन को लेना है,
और आज,यदि द्वंद से
निकल नहीं पाया तो
इस वर्तमान का क्या अर्थ है?
फिर तो औचित्य का प्रश्न भी व्यर्थ है.
Tuesday, June 1, 2010
चिन्तक, चेतना और मूल्य
पूछते हो -
चिन्तक को समाज से
प्रतिदान में मिलता है क्या ?
परन्तु,
चिन्तक को कभी
मान - सम्मान,
मकान - दुकान की
लिप्सा रही है क्या ?
पूछते हो -
चिन्तक समाज को
देता है क्या ?
अरे! चिन्तक
समाज को बनाने,
सवांरने और मिटाने की दवा है.
यही विज्ञान रूप में सिद्धांत
और संतरूप में दुआ है.
चिन्तक समाज को बिन मोल
वह दे देता है जिसे धन
कभी खरीद सकता है क्या?
उसकी पूँजी तो हैं -
उसकी संवेदनाएं;
समाज का दर्द,
प्रकृति की चित्कार,
औचित्य का प्रश्न.
जो ग्रहण करता है वह
अपने ही आस - पास से,
परन्तु लड़ता है;
लोक मंगल के लिए,
जन कल्याण के लिए.
वह ऋणी है -
समाज का, सभ्यता का, .....
संस्कृति का; प्रकृति का,
प्रज्ञान का और विज्ञान का....
वह संतुष्ट है -
संवेदनाओं को पाकर,
आहात होकर.
वह आह्लादित है -
नीलकंठ होने के पथ पर चलकर.
ऐश्वर्यशाली है -
औचित्य के प्रश्न का
समाधान ढूंढकर.
कर्मयोगी है वह,
निठल्ला नहीं,
टुकड़ों पर पलनेवाला
.....कोई पिल्ला नहीं.
कनक और कामिनी...
उसकी कमजोरी नहीं,
इसलिए उसके पास
कोई तिजोरी नहीं.
आखिर वह भूखों
तो मरता नहीं,
कभी खाली पेट सो जाय,
अलग बात है.
सुनकर सभ्यता - संस्कृति के
.......... क्रन्दन को.
प्रकृति के करुण
चित्कार - पुकार को;
चिन्तक की लेखनी
रुक कहाँ पाएगी?
चैन छिन जाएगा,
नींद उड़ जायेगी.
छलक पड़ेंगे उदगार,
गर्जन करेंगे उद्घोष -
सुनो! सुनो!! और सुनो!!!
अरे ओ सभ्य मानव!
प्रगतिशीलता के ध्वजवाहक;
तू प्रगतिशीलता के नाम पर
मूर्खता क्यों कर रहा?
स्वतंत्रता और स्वच्छंदता में
अंतर क्यों नहीं कर रहा?
धरती माँ की हरि चादर
क्यों हटा रहा?
प्यारी प्रकृति को,
उसकी मधुमय वृत्ति को,
जहरीली क्यों बना रहा?
विज्ञान को वरदान ही
रहने दो, मेरे दोस्त!
इसे मानव जीवन के लिए
अभिशाप क्यों बना रहा?
क्या तू इतना मदान्ध हो गया
कि यह भी नहीं पता;
कि जिस डाल पर बैठा है,
तू उसी को काट रहा.
अब भी समय है - स्वयं चेत
और दूसरों को चेता.स्वयं को
पूर्वार्द्ध का नहीं, उत्तरार्द्ध का
कालिदास और आइन्स्टीन बना.
अरे भाई!
चिन्तक के इन तीरों को
समाज सह लेता है,
पूरा ना सही,
कुछ ना कुछ तो कर लेता है.
चिन्तक के परितोष के लिए,
यही क्या कम है?
अरे! यही तो असली
मान-सम्मान और प्रतिदान है.
चिन्तक न सुविधाभोगी है,
न वेतनभोगी;
वह तो जगत का यार है,
जग से ही उसे प्यार है.
प्रतिदान और अवदान की बात
तो निरा व्यापार है.
और चिन्तक को
व्यापार से नहीं,
अपने दायित्व और
कर्त्तव्य से प्यार है. और
एक चिन्तक के जीवन
और मृत्यु का,
यही मात्र एक आधार है.
चिन्तक को समाज से
प्रतिदान में मिलता है क्या ?
परन्तु,
चिन्तक को कभी
मान - सम्मान,
मकान - दुकान की
लिप्सा रही है क्या ?
पूछते हो -
चिन्तक समाज को
देता है क्या ?
अरे! चिन्तक
समाज को बनाने,
सवांरने और मिटाने की दवा है.
यही विज्ञान रूप में सिद्धांत
और संतरूप में दुआ है.
चिन्तक समाज को बिन मोल
वह दे देता है जिसे धन
कभी खरीद सकता है क्या?
उसकी पूँजी तो हैं -
उसकी संवेदनाएं;
समाज का दर्द,
प्रकृति की चित्कार,
औचित्य का प्रश्न.
जो ग्रहण करता है वह
अपने ही आस - पास से,
परन्तु लड़ता है;
लोक मंगल के लिए,
जन कल्याण के लिए.
वह ऋणी है -
समाज का, सभ्यता का, .....
संस्कृति का; प्रकृति का,
प्रज्ञान का और विज्ञान का....
वह संतुष्ट है -
संवेदनाओं को पाकर,
आहात होकर.
वह आह्लादित है -
नीलकंठ होने के पथ पर चलकर.
ऐश्वर्यशाली है -
औचित्य के प्रश्न का
समाधान ढूंढकर.
कर्मयोगी है वह,
निठल्ला नहीं,
टुकड़ों पर पलनेवाला
.....कोई पिल्ला नहीं.
कनक और कामिनी...
उसकी कमजोरी नहीं,
इसलिए उसके पास
कोई तिजोरी नहीं.
आखिर वह भूखों
तो मरता नहीं,
कभी खाली पेट सो जाय,
अलग बात है.
सुनकर सभ्यता - संस्कृति के
.......... क्रन्दन को.
प्रकृति के करुण
चित्कार - पुकार को;
चिन्तक की लेखनी
रुक कहाँ पाएगी?
चैन छिन जाएगा,
नींद उड़ जायेगी.
छलक पड़ेंगे उदगार,
गर्जन करेंगे उद्घोष -
सुनो! सुनो!! और सुनो!!!
अरे ओ सभ्य मानव!
प्रगतिशीलता के ध्वजवाहक;
तू प्रगतिशीलता के नाम पर
मूर्खता क्यों कर रहा?
स्वतंत्रता और स्वच्छंदता में
अंतर क्यों नहीं कर रहा?
धरती माँ की हरि चादर
क्यों हटा रहा?
प्यारी प्रकृति को,
उसकी मधुमय वृत्ति को,
जहरीली क्यों बना रहा?
विज्ञान को वरदान ही
रहने दो, मेरे दोस्त!
इसे मानव जीवन के लिए
अभिशाप क्यों बना रहा?
क्या तू इतना मदान्ध हो गया
कि यह भी नहीं पता;
कि जिस डाल पर बैठा है,
तू उसी को काट रहा.
अब भी समय है - स्वयं चेत
और दूसरों को चेता.स्वयं को
पूर्वार्द्ध का नहीं, उत्तरार्द्ध का
कालिदास और आइन्स्टीन बना.
अरे भाई!
चिन्तक के इन तीरों को
समाज सह लेता है,
पूरा ना सही,
कुछ ना कुछ तो कर लेता है.
चिन्तक के परितोष के लिए,
यही क्या कम है?
अरे! यही तो असली
मान-सम्मान और प्रतिदान है.
चिन्तक न सुविधाभोगी है,
न वेतनभोगी;
वह तो जगत का यार है,
जग से ही उसे प्यार है.
प्रतिदान और अवदान की बात
तो निरा व्यापार है.
और चिन्तक को
व्यापार से नहीं,
अपने दायित्व और
कर्त्तव्य से प्यार है. और
एक चिन्तक के जीवन
और मृत्यु का,
यही मात्र एक आधार है.
Saturday, May 29, 2010
स्वाभिमान की कीमत क्या होती है?
स्वाभिमान की कीमत क्या होती है?
पूछो - किसी जवानी से.
और जान की कीमत क्या होती है?
पूछो - उस बलिदानी से.
अपमान की कीमत क्या होती है?
पूछो -किसी कहानी से.
अरे! आन की कीमत क्या होती है?
पूछो - झाँसी की रानी से.
त्याग की कीमत क्या होती है?
पूछो - किसी 'दधीचि' से.
छल की कीमत क्या होती है?
पूछो - किसी 'मारीच' से.
नारीत्व की कीमत होती क्या?
कुछ जानते मेरे भैया?
त्रिदेवों को शिशु बना दिया,
था नाम उसका,-'अनुसुइया'.
सत्य की कीमत क्या होती है?
पूछो - 'राजा हरिश्चंद्र' से.
कर्तव्य की कीमत क्या होती है?
पूछो - 'राजा रामचंद्र' से.
भोग की कीमत क्या होती है?
पूछो - 'राजा नहुष' से.
डोरी की कीमत क्या होती है?
पूछो - किसी धनुष से.
अनुराग की कीमत क्या होती है?
यह पूछो - तुम मीरा से.
ताज की कीमत क्या होती है?
यह पूछो - तुम हीरा से.
राज्य की कीमत क्या होती है?
तू पूछ - भरत सम ज्ञानी से.
युद्ध की कीमत क्या होती है?
तू पूछ - दशानन अभिमानी से.
बम की विभीषिका क्या होती है?
तू पूछ - किसी जापानी से.
वात्सल्य की कीमत क्या होती है?
तू पूछ - किसी भी नानी से.
अविवेक की कीमत क्या होती है?
तू पूछ - इसे 'ध्रितराष्ट्र' से.
आतंक की मार है होती क्या?
तू पूछ - इसे - महाराष्ट्र से.
मन्त्र की शक्ति क्या होती है?
पूछो - तुम 'गायत्री' से.
विवेक की शक्ति क्या होती है?
इसे पूछो - तुम 'सावित्री' से.
ज्ञान की कीमत क्या होती है?
तू पूछ - इसे 'नचिकेता' से.
शिशु की कीमत क्या होती है?
पूछो - तुम नई प्रसूता से.
बेटे की कीमत क्या होती है?
पूछो - तू अपनी माता से.
बेटी की कीमत क्या होती है?
पूछो - अपनी अभिलाषा से.
पश्चाताप की कीमत क्या होती है?
पूछो - किसी 'सुकन्या' से.
वर की कीमत क्या होती है?
पूछो - दुल्हन बनी किसी कन्या से.
तेल की कीमत क्या होती है?
पूछो - किसी चिराग से.
टिप्पणी की कीमत क्या होती है?
पूछो - किसी 'ब्लॉग' से.
पूछो - किसी जवानी से.
और जान की कीमत क्या होती है?
पूछो - उस बलिदानी से.
अपमान की कीमत क्या होती है?
पूछो -किसी कहानी से.
अरे! आन की कीमत क्या होती है?
पूछो - झाँसी की रानी से.
त्याग की कीमत क्या होती है?
पूछो - किसी 'दधीचि' से.
छल की कीमत क्या होती है?
पूछो - किसी 'मारीच' से.
नारीत्व की कीमत होती क्या?
कुछ जानते मेरे भैया?
त्रिदेवों को शिशु बना दिया,
था नाम उसका,-'अनुसुइया'.
सत्य की कीमत क्या होती है?
पूछो - 'राजा हरिश्चंद्र' से.
कर्तव्य की कीमत क्या होती है?
पूछो - 'राजा रामचंद्र' से.
भोग की कीमत क्या होती है?
पूछो - 'राजा नहुष' से.
डोरी की कीमत क्या होती है?
पूछो - किसी धनुष से.
अनुराग की कीमत क्या होती है?
यह पूछो - तुम मीरा से.
ताज की कीमत क्या होती है?
यह पूछो - तुम हीरा से.
राज्य की कीमत क्या होती है?
तू पूछ - भरत सम ज्ञानी से.
युद्ध की कीमत क्या होती है?
तू पूछ - दशानन अभिमानी से.
बम की विभीषिका क्या होती है?
तू पूछ - किसी जापानी से.
वात्सल्य की कीमत क्या होती है?
तू पूछ - किसी भी नानी से.
अविवेक की कीमत क्या होती है?
तू पूछ - इसे 'ध्रितराष्ट्र' से.
आतंक की मार है होती क्या?
तू पूछ - इसे - महाराष्ट्र से.
मन्त्र की शक्ति क्या होती है?
पूछो - तुम 'गायत्री' से.
विवेक की शक्ति क्या होती है?
इसे पूछो - तुम 'सावित्री' से.
ज्ञान की कीमत क्या होती है?
तू पूछ - इसे 'नचिकेता' से.
शिशु की कीमत क्या होती है?
पूछो - तुम नई प्रसूता से.
बेटे की कीमत क्या होती है?
पूछो - तू अपनी माता से.
बेटी की कीमत क्या होती है?
पूछो - अपनी अभिलाषा से.
पश्चाताप की कीमत क्या होती है?
पूछो - किसी 'सुकन्या' से.
वर की कीमत क्या होती है?
पूछो - दुल्हन बनी किसी कन्या से.
तेल की कीमत क्या होती है?
पूछो - किसी चिराग से.
टिप्पणी की कीमत क्या होती है?
पूछो - किसी 'ब्लॉग' से.
Friday, May 28, 2010
क्या मानव होना इतना कठिन है?
संस्कृति के उत्थान और
पतन के साथ ही साथ,
मानवसमाज के उत्थान
और पतन की कहानी सुनी है,
उसे इतिहास - भूगोल के आईने,
तथा युगीन सभ्यता के झरोखों से
देखा परखा भी है,
विभिन्न गोष्ठियों, - सेमिनारों में
इस पर गहन विमर्श किया है,
परन्तु धर्म के नाम पर जैसा
अधर्म, जैसी क्रूरता...., विभत्सता....,
आज दृष्टिगत हो रही है....,
क्या उसे हम धर्म कहेंगे?
क्या इस पर पुनर्विचार करेंगे?
देव मंदिर, लोकतंत्र का मंदिर,
न्याय मंदिर भी नहीं है सुरक्षित.
आदिम मनुष्य तो अशिक्षित था,
अनपढ़, गवार, निरा भावुक था..,
उसका कृत्य तो फिर भी
कुछ समझ में आता है.
परन्तु आज ....२१वी सदी में
यह कलह - कोलाहल... क्यों है?
मजे की बात यह कि धर्म के
ये सभी ठेकेदार डिग्री धारक हैं.
क्या मनुष्य आज अपने धर्म को
पहचान पाया है?
धर्म की बात छोडिये, जाने दीजिये,
क्या स्वयं को पहचान पाया पाया है?
आज का मानव न दाढ़ीवाला रहा,
न चोटीवाला, और न टाई वाला,
अंतर्जातीय वैवाहिक संबंधों के कारण,
आज वह न किसी कुल का रहा,
न किसी परिवार का और
न ही किसी परंपरा विशेष का .
आज मानव की पहचान
मात्र नंबर है, केवल नंबर...,
वह या तो मकान नंबर है,
या राशन कार्ड नंबर.
वह इस नंबर में ही हैरान है,
और निन्यानबे के चक्कर में
परेशान है...........
अंततः वही प्रश्न, आखिर वह है कौन?
क्या वह मोबाइल नंबर और फोन नंबर है?
अथवा पैन कार्ड, वोटर कार्ड, आई कार्ड है?
वह दो पहिया वाहन का नंबर है, या
तीन पहिया और चार पहिया का? ,
वह बैंक नंबर है या टिकेट नंबर है हवाई?
वह हिन्दू है, मुस्लिम है, सिख है या ईसाई?
आखिर इस सभी मान्यताओं
और व्यवस्थाओं के बीच
मात्र मानव क्यों नहीं है?
क्या मानव होना इतना कठिन है?
क्या इतना दुरूह और दुष्कर है?
परन्तु मानवता से बढकर,
क्या कुछ भी श्रेष्ठतर है?
अब दुराग्रह छोडो!,
निद्रा तोड़ो!!, तन्द्रा तोड़ो!!!
अब आगे कदम बढ़ाना होगा,
काट सभी बंधन को हमें,
मानवता को अपनाना होगा.
हां, मानवता को अपनाना होगा.
पतन के साथ ही साथ,
मानवसमाज के उत्थान
और पतन की कहानी सुनी है,
उसे इतिहास - भूगोल के आईने,
तथा युगीन सभ्यता के झरोखों से
देखा परखा भी है,
विभिन्न गोष्ठियों, - सेमिनारों में
इस पर गहन विमर्श किया है,
परन्तु धर्म के नाम पर जैसा
अधर्म, जैसी क्रूरता...., विभत्सता....,
आज दृष्टिगत हो रही है....,
क्या उसे हम धर्म कहेंगे?
क्या इस पर पुनर्विचार करेंगे?
देव मंदिर, लोकतंत्र का मंदिर,
न्याय मंदिर भी नहीं है सुरक्षित.
आदिम मनुष्य तो अशिक्षित था,
अनपढ़, गवार, निरा भावुक था..,
उसका कृत्य तो फिर भी
कुछ समझ में आता है.
परन्तु आज ....२१वी सदी में
यह कलह - कोलाहल... क्यों है?
मजे की बात यह कि धर्म के
ये सभी ठेकेदार डिग्री धारक हैं.
क्या मनुष्य आज अपने धर्म को
पहचान पाया है?
धर्म की बात छोडिये, जाने दीजिये,
क्या स्वयं को पहचान पाया पाया है?
आज का मानव न दाढ़ीवाला रहा,
न चोटीवाला, और न टाई वाला,
अंतर्जातीय वैवाहिक संबंधों के कारण,
आज वह न किसी कुल का रहा,
न किसी परिवार का और
न ही किसी परंपरा विशेष का .
आज मानव की पहचान
मात्र नंबर है, केवल नंबर...,
वह या तो मकान नंबर है,
या राशन कार्ड नंबर.
वह इस नंबर में ही हैरान है,
और निन्यानबे के चक्कर में
परेशान है...........
अंततः वही प्रश्न, आखिर वह है कौन?
क्या वह मोबाइल नंबर और फोन नंबर है?
अथवा पैन कार्ड, वोटर कार्ड, आई कार्ड है?
वह दो पहिया वाहन का नंबर है, या
तीन पहिया और चार पहिया का? ,
वह बैंक नंबर है या टिकेट नंबर है हवाई?
वह हिन्दू है, मुस्लिम है, सिख है या ईसाई?
आखिर इस सभी मान्यताओं
और व्यवस्थाओं के बीच
मात्र मानव क्यों नहीं है?
क्या मानव होना इतना कठिन है?
क्या इतना दुरूह और दुष्कर है?
परन्तु मानवता से बढकर,
क्या कुछ भी श्रेष्ठतर है?
अब दुराग्रह छोडो!,
निद्रा तोड़ो!!, तन्द्रा तोड़ो!!!
अब आगे कदम बढ़ाना होगा,
काट सभी बंधन को हमें,
मानवता को अपनाना होगा.
हां, मानवता को अपनाना होगा.
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