Saturday, May 22, 2010

छोटे प्रश्न का बड़ा उत्तर

हमलोगों ने प्रायः देखा है,
प्रहरीरूप में एक पुलिस वाले को;
कुछ चुस्त - दुरुस्त, सतर्क,
और कुछ अलमस्त.


हाथ में कभी बन्दूक, कभी
पिस्टल और कभी एक डंडा.
इनमे कोई है ..मुच्छड़,....
तो कोई ...निरा मुछमुंडा .


समाज में इनकी क्रिया कलापों के,
आलोचक तो बहुत हैं, समालोचक थोड़े,
परन्तु प्रेरक और प्रशंसक?
उनकी तो बात ही ना करो,
शायद समाधिस्थ है यह वर्ग आजकल?


फिर वही प्रश्न, आखिर
एक पुलिस वाला क्या है?
एक रोबोट या हाड़-माँस का लोथड़ा?
या कोई ऐसा व्यक्तित्व जो देकर
अपनी भावनाओं को तिलांजलि,
बना रहता है. खादीवाले के सन्देश और
हैटवाले के निर्देशों का मात्र अनुपालक?


जो खड़ा रहता है.. निरंतर, ...लगातार .....
तपती दुपहरी में, जाड़े की ठिठुरन भरी
सर्द रातों में, भींगते बरसातों में,
गरजते - कौंधते मेघों के नीचे.


अथवा कंट्रोलरूम में सामंजस्य बैठाते,
अधिकारियों - कर्मचारियों के बीच;
कण्ट्रोल टेबुल पर बैठा हुआ,
घिसता रहता है अपने.
तन... - बदन.... - मन... को.......
लगा रहता है त्रुटि रहित प्रसारण में,
समन्वय - समाधान बनाने में,
नीति - निर्देश, आदेश - सन्देश को
पढने और पढ़ाने में. लिखने और लिखाने में.


पुलिस लाइन से चौराहे, चौकी से थाने..
फल मंडी से, घासमंडी तक,
चिकित्सालय, विद्यालय से न्यायालय,
मदिरालय और वेश्यालय... तक.
चाय मंदिर से देव मंदिर.... तक.....
विस्तृत है जिका कार्य क्षेत्र.....
,

सडक पर पटकते डंडे से,
संभ्रांत नागरिक तो समझ जाते हैं,
इसके अर्थ को, इसके निहितार्थ को,
अपेक्षानुरूप करते हैं सहयोग भी .
परन्तु वही डंडा, .छिटक जाता है,
उस अनियंत्रित वाहन के टक्कर से,
जिसमे सवार हैं, समाज के नवोदित सेवक.
जिनके लिए सडक .और समाज के क़ानून..
को तोडना, शर्म की नहीं .......;
गर्व .....और ....गौरव... की बात है.


किस - किस जगह, कानून के रखवालों को,
कब, कहाँ, कैसे नचाया, कितना बेवकूफ बनाया,
और 'बड़ों' से शिकायत कर, कैसी उलटी फटकार
लगवाया, इसका गुणगान अपने आकाओं से करते हैं.


उदंडताओं की बढती संख्या, उन्हें इस क्षेत्र में,
डिप्लोमा और डिग्री धारक बनती है.
परन्तु एक पुलिसवाले को, ये घटनाएं ,
उसको अपनी हैसियत बतलाती है,
जब अपना पक्ष प्रस्तुतीकरण पर
फटकार ही प्रायः उनके हिस्से आती है.


क्या एक पुलिस वाले की
उसकी कर्त्तव्यपरायणता का,
कोई मान नहीं.........?
संवेदनाओं का भावनाओं का कोई मूल्य नहीं?
आखिर वह कब तक..... 'पी' से 'पोलाईट',
'ओ' से 'ओबीदिएंट बना रहेगा?
लायल्टी, ओबिदिएन्सी, चातुर्य, दक्षता,
साहस - शौर्य ....की, कोई कमी नहीं......
परन्तु, पुचकार, संश्पर्श, अपनत्व और
संरक्षण के अभाव में वह कब तक टिकेगा?
क्या यह विचारणीय बिंदु नहीं है?


'अर्ध सत्य' की कहानी
जब से दुहराया जाने लगा है,
उसका परिणाम निश्ठावानो पर
नजर आने लगा है.
कर्त्तव्यपरायणता, निष्ठां के बदले
मिली कुंठा, अब बाहर आने लगा है,
अपना विकृत रूप दिखाने लगा है.
कहीं का आक्रोश, ...कहीं...,
नजर आने लगा है.
कहर बनकर छाने लगा है.
'सौत का गुस्सा कठौत पर'
उतरने ....लगा ...है.......
सबल का गुस्सा निर्बल पर ............
परिणाम - कहीं थाने पर पिटाई,
कहीं मौत की घटनाएं......
आये दिन कहीं न कहीं
सभीको नजर आने लगा हैं.


केवल थाने पर ही नहीं, उनका गुस्सा
अब अपने बीबी - बच्चों पर भी
छाने लगी है. अब तो हद हो गयी.....,
उसकी अपनी गोली उसी की
कनपटी में सामने लगी है.
कोई यूँ ही तो जान नहीं देता ..


एक पुलिस वाले के लिए यह शर्म की बात है,
कानून के रखवाले को कानून हाथ में लेना,
बद्तोव्याघात है. स्वयं पर क्रूर आघात है.
परन्तु सबको सोचना होगा.......,
आखिर यह किसकी करामात है?
इसके पीछे किसका हाथ है ?


अपराधी को निलंबित, बर्खास्त करना,
समस्या का, समाधान नहीं.
मिटाकर अपराधी को,
अपराध मिटाया नहीं जा सकता.
न्याय देकर ही, है न्याय को पाया जा सकता.
घटना के पीछे कार्यरत
मनोविज्ञान को समझना होगा.
न्याय का देकर आश्वासन,
स्वयं भी खरा उतना होगा.


करना होगा विचार हमे,
फिर उन्ही तीन प्रश्नों पर -
दागदार खादी का रंग,
सफ़ेद क्यों है?
दिन रात सेवा में जुटे
खाकी का रंग मटमैला क्यों है?
और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी
सीमा पर डटे रहने वाले,
सैनिकों की वर्दी धब्बेदार क्यों है?


.
.

Friday, May 21, 2010

एक बहुत छोटा सा प्रश्न

दागदार खादी का रंग,
सफ़ेद क्यों है?
दिन रात सेवा में जुटे
वर्दी का रंग मटमैला क्यों है?
प्रतिकूल परिस्थितियों में भी
सीमा पर डटे रहने वाले,
सैनिकों की वर्दी धब्बेदार क्यों है?

डायरी का एक डरावना पृष्ठ

धुधली - धुधली सी रजनी थी,
पीपल भी नहीं था डोल रहा,
कुछ ठनी हुई थी पवन के संग,
रजनीश भी मेघ के अन्दर था.

व्योम के नीचे अम्बर है,
अम्बर के नीचे एक टिम्बर है,
उस टिम्बर में कोई हलचल है,
मैंने सोचा कोई बन्दर है.

पंहुचा पास जब मै उसके,
था बहुत सतर्क; फिर भी उसने,
था एक झपट्टा मार दिया,
उछल - कूद के वार किया.

मै भी था कुछ कम तो नहीं,
बाजू में उसे फिर जकड लिया,
जब कड़े - कड़े दो हाथ पड़े,
चिल्लाया फिर वह 'बाप - बाप'.

गौर से देखा जब उसको....,
वह बंदर के वेश लफंदर था.
था पढ़ा - लिखा कुछ ख़ास नहीं,
दो कलम जेब के अन्दर था.

पड़ी जेब में डायरी थी,
जिसमे ढेर सा नम्बर था.
कुछ बड़े - बड़े थे नाम पते,
उसमे एक गुप्त कलेंडर था.

जिसे देख उड़ जाए होश,
ऐसी चीज भी उसके अंदर था.
था बिलकुल वह 'रावण' जैसा,
वेश बदल कर आया था.

था किसी और के चक्कर में,
भ्रम से पड़ा मेरे पल्ले था.
मै भी बन गया था 'बाली' तब,
सब कुछ उससे बकवा डाला.

रह गया 'सन्न' एकदम से मै,
आ दुश्मन ने डेरा डाला था.
थी दूर कि कोई बात नहीं,
मेरे ऑफिस का ही सौदा था.

बन बगुला भगत वह बोल रहा,
"है स्टाफ आपका डोल रहा,
पहले संभालिय अपनों को,
क्यों 'डालर' पर वह लोट रहा" ?

थे सहयोगीगण जांबाज सभी,
देश पर मर - मिटने वाले,
उनमे था बिका हुआ फिर कौन?
प्रश्नों ने मुझको मथ डाले.

मै लीन इन्ही सब बातो में,
शिर उठा मेरा, जब शोर हुआ.
मै जिसे पकडकर लाया था,
था गिरकर, वह अब ढेर पड़ा.

खा लिया था; उसने वह 'कैप्सूल' जिसे,
साथमें लाया था, जाने कहाँ छिपाया था?
वह तो सीधे परलोक गया ..........,
पर जटिल प्रश्न .....था .....छोड़ गया.

अब राज यह कैसे खुल पायेगा?
कलंक यह कैसे धुल पायेगा?
हुआ अबतक तो कोई हानि नहीं,
फिर आगे अब क्या होगा?

शक करे तो कैसे साथी पर?
ना करें तो क्या आघात होगा?
काश! कहीं कुछ ऐसा हो जाए,
आरोप लफंदर का मिथ्या हो जाए.

Thursday, May 20, 2010

ब्लॉग मित्रों के नाम खुला पत्र

कुछ कहता हूँ तुमसे!, सुनो मेरे मित्र.!
कुछ सुनो, कुछ गुनो, कुछ करो मेरे मित्र.!!
स्नेह सद्भाव को हम बढ़ाते रहें....,
कर्त्तव्य अपना सदा हम निभाते रहें.

'कर्त्तव्य बड़ा है सदा', किसी भी अधिकार से,
इस नीति को हम निभाते रहें, हाँ निभाते रहें;
विवादों को हम यूँ मिटाते रहें, हाँ मिटाते रहें;
'हम सभी के लिए', 'सब हमारे लिए', मनाते रहें.

लड़ते हो तुम ...ब्लॉग पर... भैया,
क्या घर में तुम्हारे इतनी शान्ति है?
लगता है फिर, क्यों हमको ऐसा?
घर में तुम्हारे अधिक अशांति है.

हम लड़ते रहें हैं जीवन में, क्या कुछ अभी?
की 'ब्लॉग पर' भी भिड़ने की जरूरत आ पड़ी,
किस भाषा के तुम हो? और कौन हमारी बोली?
लेकिन मिलन से है देखो! ये कैसी कविता खिली?

हिन्दुस्तानी हैं हम, पहचान रखते कुछ अलग.
आन अपने वतन की भी है कुछ अलग,
अपनी मिटटी की खातिर क्या -क्या न किये?
पूछो! इतिहास से, हम हैं कैसे मरे, और कैसे जिए?

आई है परीक्षा घडी... जब कभी...,
शीश हँसते दिए, परतु सीsss न किये हैं.
साथ आबो हवा का निभाते रहें हैं,
अपनी मिटटी का ऋण हम चुकाते रहें है.

अपनी मिटटी सुगन्धित है, अपनी संस्कृति से,
सभ्यता - संस्कार, प्यारी प्रकृति से,
सुगंधी इसकी चतुर्दिक फैलाते रहें,
मान के आँचल की लाज हम बचाते रहें.

यह सही है,' स्वतंत्र हैं हम'; 'स्वच्छंद नहीं हैं मगर',
नित बंधें हुए हैं, नैतिकता - मर्यादा - संविधान से,
कार्य ऐसा करें, मुस्कुराएँ सभी, दिल लुटाएं सभी,
'मिटटी की सुगंध', लुटाते हुए, हँसते रहे और हँसाते रहें.

बात इतनी सी अगर मान लो मेरे मित्र!
समझो प्रगतिशीलता का पट खुल गया.
जीने का फिर नया, एक ढंग मिल गया,
आचरण की सभ्यता से सींचना है हमें.

इस उपवन की मन्जरी न मुरझाये कभी,
हरीतिमा, इसकी खुशबू न जाए कभी,
लोभ - दंभ - नफरत, नहीं पास आये कभी,
भेद भाषा का, शैली का, ना आये कभी.....

नेट पर जब भी बैठा, तुम्ही याद आये मेरे मित्र!
बात दिल की कहूँ, तो कहूँ किससे मित्र ..?
ओ मेरे मित्र!, ओ मेरे प्यारे- प्यारे, अपरिचित मित्र !!
बात दिल की कहूँ, तो कहूँ किससे मित्र ...?

ओ मेरे मित्र!,.... ..ओ मेरे मित्र!!,.... ...ओ मेरे मित्र!!!,
साथ कितना निभाओगे? ओ मेरे मित्र!,...ओ मेरे मित्र!, ..
ब्लॉग मित्रों के नाम खुला पत्र

Tuesday, May 18, 2010

हे काव्य! तुम्हारा गुरु है कौन?

हे काव्य! तुम्हारा गुरु है कौन?
कुछ तो बोलो, क्यों हो तुम मौन?
कहाँ से पाई सूक्ष्मतर दृष्टि यह?
अतल - वितल तेरे रहता कौन?

कैसे करती शब्द श्रृंगार तुम?
यह विरह कहाँ से लाती हो?
रहस्य रोमांच का सृजन कैसे?
पल भर में तुम कर जाती हो.

कभी लगती हो तुतलाता बच्चा,
कभी किशोर बन जाती हो,
क्षण भर में तु रूप बदलती कैसे?
कैसे कुलांच भर जाती हो?

तेरी एक झलक पा जाने को,
कुछ नयन ज्योति बढ़वाते हैं.
कुछ तो हैं इतने दीवाने,
नित नए लेंस लगवाते हैं.

नजर नहीं आती फिर भी तुम,
क्या इतनी भी सूक्ष्म रूप हो?
दिखती फिर तुम सूर को कैसे?
तुलसी घर चन्दन क्यों घिसती हो?

बैठ के कंधे पर तुम रसखान के,
कबिरा के संग खूब घूमती हो.
रास रचाए तू संग बिहारी के,
घन आनंद प्यारे को क्यों छलती हो?

नीर की बादल बनी है महादेवी,
यशोधरा गुप्त है दिनकर उर्वशी,
प्रसाद है खेलत संग कामायनी के,
पन्त है छेड़े चिदंबरा रागिनी.

वीणा बजाये निराला के संग तू,
मीरा को खूब तू नाच नचाये है,
कालि के मेघ को नभ में नचावत,
श्याम का चेतक धूम मचाये है.

केशव बैठ के केश निहारत,
उम्र बढ़ी पर कवि ना कहायो,
रचा ग्रन्थ को हठ्वश अपने,
कठिन काव्य के प्रेत कहायो.

ग्रन्थ लिखाए तू व्यास के हाथ से,
राधा की तन पर कान्हा नचायो है,
जाना रहस्य ना कोई तुम्हारा,
उम्र तलक तुम नाच नचाये है.

क्या तुम महेश की मानस पुत्री?
अथवा विरंचि की भार्या हो?
या हो वाग्दत्ता बाल्मीकि की,
या हिंद की लाडली आर्या हो?

क्या 'क्रौंच आह' से जन्म तेरा?
अश्रु स्वरों तेरी धार बही?
अगणित है बधिक अब घूम रहे,
क्यों ना उनके अंतर कोई आह उठी?

याद करो! तू ने ही कहा था -
"सन्देश नहीं मै स्वर्ग लोक का लाई,
इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आई."
संकल्प तेरा क्यों टूट रहा अब?
ये कौन सी रीति तुने अपनाई है,
सोचा बहुत पर सोंच न पाया.
बात क्या तेरे ह्रदय में समायी है?

जान न पाया तुम्हे अब भी मै,
गुरूद्वारे का अब तो मार्ग बताओ.
हे काव्य तुम्हारा गुरु है कौन?
कुछ तो बोलो, क्यों हो तुम मौन?

Friday, May 14, 2010

बापू से अनुरोध हमारा

बापू! मै भारत का वासी, तेरी निशानी ढूंढ रहा हूँ.
बापू! मै तेरे सिद्धान्त को, तेरे दर्शन सद्विचार को ढूंढ रहा हूँ.
सत्य अहिंसा असतेय अपरिग्रह, यम नियम सब ढूंढ रहा हूँ.
बापू! तुझको तेरे देश में, दीपक लेकर ढूंढ रहा हूँ.

उचट गया मन राजनीति से, देखो कितनी दूषित है.
रीति- नीति सब कुचल गयी है, नभ जल थल सभी प्रदूषित है.
घूमा बहुत इधर उधर, मन बार बार तुमपर टिकता है.
अब फिर आजाओ गांधी बाबा, तू ही तो एक हकीकत है.

संत भगीरथ ने अपने पुरखों को, गंगाजल से तारा है.
तुम भी तो एक राजसंत थे, हमने बहुत विचारा है.
अब तुम्ही भगीरथ बन जाओ, अब तुम्हे गंगाजल लाना है.
नई पौध को सिंचित कर के, भारत नया बनाना है.

अपनी गंगा तो सूख सी गयी, पर नहीं मानव की भूख गयी है.
सूख गयी थी पहले ही सरस्वती, अब गंगा यमुना की बारी है.
देखो गंगोत्री- जमुनोत्री - गंगासागर को, वहां लगा ग्रहण कुछ भारी है.
दशा सुधरने में हम अक्षम, कुछ कर न सके, अफ़सोस यही लाचारी है.

एक आस विश्वास तुम्ही पर, कुछ हक़ है, तभी पुकारी है.
थोडा सा हूँ जिद्दी मै भी, अभियान प्रदूषण मुक्ति की ठानी है.
अस्त्र- शस्त्र है मात्र लेखनी, उसी के बल जंग ये जीती जानी है.
बिना शस्त्र तो तुम भी लड़े थे, बड़ों- बड़ो को चित किये थे .

देखो! मै भी शस्त्र हीन हूँ, तुम्हे मेरा साथ निभाना है.
अब तुम्ही भगीरथ बन जाओ, अब तुम्हे गंगाजल लाना है.
गंगाजल जो तुम लाओगे उस धारा को गोमुख से हम जोड़ेंगे.
गंगा - यमुना नहीं सूखने देंगे, जलधारा को अजस्र स्रोत से जोड़ेंगे

दूषित नीति मिटायेंगे, सब कलुष - कलेश भगायेंगे.
नयी उमंगें, नई तरंगे; अब नया सवेरा लायेंगे.
अब तुम्ही भगीरथ बन जाओ, अब तुम्हे गंगाजल लाना है.
जल्दी गंगाजल लेकर आओ, यह अनुरोध हमारा है.
यह अनुरोध हमारा है. ....हाँ ... यह अनुरोध हमारा है.

Thursday, May 13, 2010

परशुराम के बहाने सांस्कृतिक विमर्श

हम क्या थे, क्या हैं, होंगे क्या?
अब यही बैठ कर सोच रहाँ हूँ.
शिक्षा में ह्रास भिक्षा की आस.
हर बात में पश्चिम देख रहा हूँ.
आज प्रतिगामी सोच वाले
शुक्राचार्यों की भरमार तो सब और है,

परन्तु प्रगतिशीलता के पोषक वशिष्ठ, कोण
कौटिल्य, कबीर, नानक. विवेकानंद और
परशुराम का आभाव क्यों है?
नैतिक मूल्यों में ह्रास क्यों है?
और भौतिकता की आंधी में
अध्यात्मिकता का उपहास क्यों है?

कहीं पढ़ा था - "कोई भी गम मनुष्य के
साहस से बड़ा नहीं वही हारा जो लड़ा नहीं".
यह विचार नहीं, सिद्धांत है.
हमें लड़नी है, एकसाथ दो लडाइयां;
एक सांस्कृतिक पुनरुत्थान की और
दूसरी मधुमय संतुलित प्रकृति की.
उसके संरक्षण और अनुरक्षण की.

मूल अधिकार यह हक़ है अपना,
नहीं कोई यह भिक्षा है.
'कंठ में शास्त्र' और 'कर में शस्त्र',
यह परशुराम की शिक्षा है.

शास्त्र पर तो चर्चा बहुत मिलती है.
कुछ चर्चा उनके अस्त्र पर,
उनके परशु और शास्त्र पर.
परशुराम का सन्देश स्पष्ट है -
जब शास्त्र की मर्यादा, राष्ट्रीय स्वाभिमान,
अपना अस्तित्व, अपनी संस्कृति और
अपनी प्यारी प्रकृति हो संकट में,
अन्याय के दमन और लोकमंगल हेतु
सर्वथा उचित है शस्त्र प्रयोग.

परन्तु आज का शस्त्र परशु नहीं,
संवैधानिक अधिकार, सांस्कृतिक विमर्श है.
तेजस्वी विश्वामित्र ने स्वीकार किया था कभी-
क्षात्र शक्ति बलम नास्ति ब्रह्म तेजो बलं बलम.
सांस्कृतिक अधिकार में, दायित्वा निर्वहन में,
उसी राष्ट्रीय उर्जा का प्रस्फुटन होना चाहिए.

परशु हमेशा शिरोच्छेदक ही नहीं होता.
होता है यह सर्जक और पोषक भी.
अवांछित टहनियों को काट-छाँट कर,
स्वस्थ शाखा, समर्थ वृक्ष के निर्माण में,
देखो ! इसका कितना सुंदर उपयोग.
लोकमंगल की तुला पर ही
अब करना है इसका प्रयोग.

परशुराम की यह शिक्षा
छठे नानक के रूप में रंग लाई,
जब 'मीरी' और 'पीरी' के रूप में,
इसे जीवन संगिनी बनाई.
दशमेश पिता ने किया इसे साकार,
बना दिया जिसने नर को एक ही साथ,
"संत" - "सिपाही" और "सरदार".

रम रहा जो जीव - जगत में,
एक वही तो है - "राम".
साथ विवेकी परशु हो जब,
जानो उसे ही - "परशुराम".
था संस्कृति का रक्षक वह,
"धनुष - भंग" सहता कैसे ?
देखा जब पूरी घटना, सारा विवरण.
जाना उत्तराधिकारी का अवतरण.
क्षणमात्र ना किया विलम्ब तब,
दिया सौप सब भार उसे तत्क्षण.

संघेशक्ति कलियुगे, विचार नहीं सच्चाई है,
करनी होगी स्वीकार इसे, इसी में सबकी भलाई है.
हम मिल बैठ विचार करेंगे, हे संभव उपचार करेंगे,
साथ जियेंगे, साथ मरेंगे, आज यही संकल्प करेंगे.
कर उपाय हरसंभव संतुलित पारिस्थितिकी निर्माण करेंगे.
अब तक चाहे जितना खोया, अबसे हम उत्कर्ष करेंगे.
कैसे हो सिरमौर राष्ट्र? अब इसका भी सुप्रबंध करेंगे.