हे काव्य! तुम्हारा गुरु है कौन?
कुछ तो बोलो, क्यों हो तुम मौन?
कहाँ से पाई सूक्ष्मतर दृष्टि यह?
अतल - वितल तेरे रहता कौन?
कैसे करती शब्द श्रृंगार तुम?
यह विरह कहाँ से लाती हो?
रहस्य रोमांच का सृजन कैसे?
पल भर में तुम कर जाती हो.
कभी लगती हो तुतलाता बच्चा,
कभी किशोर बन जाती हो,
क्षण भर में तु रूप बदलती कैसे?
कैसे कुलांच भर जाती हो?
तेरी एक झलक पा जाने को,
कुछ नयन ज्योति बढ़वाते हैं.
कुछ तो हैं इतने दीवाने,
नित नए लेंस लगवाते हैं.
नजर नहीं आती फिर भी तुम,
क्या इतनी भी सूक्ष्म रूप हो?
दिखती फिर तुम सूर को कैसे?
तुलसी घर चन्दन क्यों घिसती हो?
बैठ के कंधे पर तुम रसखान के,
कबिरा के संग खूब घूमती हो.
रास रचाए तू संग बिहारी के,
घन आनंद प्यारे को क्यों छलती हो?
नीर की बादल बनी है महादेवी,
यशोधरा गुप्त है दिनकर उर्वशी,
प्रसाद है खेलत संग कामायनी के,
पन्त है छेड़े चिदंबरा रागिनी.
वीणा बजाये निराला के संग तू,
मीरा को खूब तू नाच नचाये है,
कालि के मेघ को नभ में नचावत,
श्याम का चेतक धूम मचाये है.
केशव बैठ के केश निहारत,
उम्र बढ़ी पर कवि ना कहायो,
रचा ग्रन्थ को हठ्वश अपने,
कठिन काव्य के प्रेत कहायो.
ग्रन्थ लिखाए तू व्यास के हाथ से,
राधा की तन पर कान्हा नचायो है,
जाना रहस्य ना कोई तुम्हारा,
उम्र तलक तुम नाच नचाये है.
क्या तुम महेश की मानस पुत्री?
अथवा विरंचि की भार्या हो?
या हो वाग्दत्ता बाल्मीकि की,
या हिंद की लाडली आर्या हो?
क्या 'क्रौंच आह' से जन्म तेरा?
अश्रु स्वरों तेरी धार बही?
अगणित है बधिक अब घूम रहे,
क्यों ना उनके अंतर कोई आह उठी?
याद करो! तू ने ही कहा था -
"सन्देश नहीं मै स्वर्ग लोक का लाई,
इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आई."
संकल्प तेरा क्यों टूट रहा अब?
ये कौन सी रीति तुने अपनाई है,
सोचा बहुत पर सोंच न पाया.
बात क्या तेरे ह्रदय में समायी है?
जान न पाया तुम्हे अब भी मै,
गुरूद्वारे का अब तो मार्ग बताओ.
हे काव्य तुम्हारा गुरु है कौन?
कुछ तो बोलो, क्यों हो तुम मौन?
Tuesday, May 18, 2010
Friday, May 14, 2010
बापू से अनुरोध हमारा
बापू! मै भारत का वासी, तेरी निशानी ढूंढ रहा हूँ.
बापू! मै तेरे सिद्धान्त को, तेरे दर्शन सद्विचार को ढूंढ रहा हूँ.
सत्य अहिंसा असतेय अपरिग्रह, यम नियम सब ढूंढ रहा हूँ.
बापू! तुझको तेरे देश में, दीपक लेकर ढूंढ रहा हूँ.
उचट गया मन राजनीति से, देखो कितनी दूषित है.
रीति- नीति सब कुचल गयी है, नभ जल थल सभी प्रदूषित है.
घूमा बहुत इधर उधर, मन बार बार तुमपर टिकता है.
अब फिर आजाओ गांधी बाबा, तू ही तो एक हकीकत है.
संत भगीरथ ने अपने पुरखों को, गंगाजल से तारा है.
तुम भी तो एक राजसंत थे, हमने बहुत विचारा है.
अब तुम्ही भगीरथ बन जाओ, अब तुम्हे गंगाजल लाना है.
नई पौध को सिंचित कर के, भारत नया बनाना है.
अपनी गंगा तो सूख सी गयी, पर नहीं मानव की भूख गयी है.
सूख गयी थी पहले ही सरस्वती, अब गंगा यमुना की बारी है.
देखो गंगोत्री- जमुनोत्री - गंगासागर को, वहां लगा ग्रहण कुछ भारी है.
दशा सुधरने में हम अक्षम, कुछ कर न सके, अफ़सोस यही लाचारी है.
एक आस विश्वास तुम्ही पर, कुछ हक़ है, तभी पुकारी है.
थोडा सा हूँ जिद्दी मै भी, अभियान प्रदूषण मुक्ति की ठानी है.
अस्त्र- शस्त्र है मात्र लेखनी, उसी के बल जंग ये जीती जानी है.
बिना शस्त्र तो तुम भी लड़े थे, बड़ों- बड़ो को चित किये थे .
देखो! मै भी शस्त्र हीन हूँ, तुम्हे मेरा साथ निभाना है.
अब तुम्ही भगीरथ बन जाओ, अब तुम्हे गंगाजल लाना है.
गंगाजल जो तुम लाओगे उस धारा को गोमुख से हम जोड़ेंगे.
गंगा - यमुना नहीं सूखने देंगे, जलधारा को अजस्र स्रोत से जोड़ेंगे
दूषित नीति मिटायेंगे, सब कलुष - कलेश भगायेंगे.
नयी उमंगें, नई तरंगे; अब नया सवेरा लायेंगे.
अब तुम्ही भगीरथ बन जाओ, अब तुम्हे गंगाजल लाना है.
जल्दी गंगाजल लेकर आओ, यह अनुरोध हमारा है.
यह अनुरोध हमारा है. ....हाँ ... यह अनुरोध हमारा है.
बापू! मै तेरे सिद्धान्त को, तेरे दर्शन सद्विचार को ढूंढ रहा हूँ.
सत्य अहिंसा असतेय अपरिग्रह, यम नियम सब ढूंढ रहा हूँ.
बापू! तुझको तेरे देश में, दीपक लेकर ढूंढ रहा हूँ.
उचट गया मन राजनीति से, देखो कितनी दूषित है.
रीति- नीति सब कुचल गयी है, नभ जल थल सभी प्रदूषित है.
घूमा बहुत इधर उधर, मन बार बार तुमपर टिकता है.
अब फिर आजाओ गांधी बाबा, तू ही तो एक हकीकत है.
संत भगीरथ ने अपने पुरखों को, गंगाजल से तारा है.
तुम भी तो एक राजसंत थे, हमने बहुत विचारा है.
अब तुम्ही भगीरथ बन जाओ, अब तुम्हे गंगाजल लाना है.
नई पौध को सिंचित कर के, भारत नया बनाना है.
अपनी गंगा तो सूख सी गयी, पर नहीं मानव की भूख गयी है.
सूख गयी थी पहले ही सरस्वती, अब गंगा यमुना की बारी है.
देखो गंगोत्री- जमुनोत्री - गंगासागर को, वहां लगा ग्रहण कुछ भारी है.
दशा सुधरने में हम अक्षम, कुछ कर न सके, अफ़सोस यही लाचारी है.
एक आस विश्वास तुम्ही पर, कुछ हक़ है, तभी पुकारी है.
थोडा सा हूँ जिद्दी मै भी, अभियान प्रदूषण मुक्ति की ठानी है.
अस्त्र- शस्त्र है मात्र लेखनी, उसी के बल जंग ये जीती जानी है.
बिना शस्त्र तो तुम भी लड़े थे, बड़ों- बड़ो को चित किये थे .
देखो! मै भी शस्त्र हीन हूँ, तुम्हे मेरा साथ निभाना है.
अब तुम्ही भगीरथ बन जाओ, अब तुम्हे गंगाजल लाना है.
गंगाजल जो तुम लाओगे उस धारा को गोमुख से हम जोड़ेंगे.
गंगा - यमुना नहीं सूखने देंगे, जलधारा को अजस्र स्रोत से जोड़ेंगे
दूषित नीति मिटायेंगे, सब कलुष - कलेश भगायेंगे.
नयी उमंगें, नई तरंगे; अब नया सवेरा लायेंगे.
अब तुम्ही भगीरथ बन जाओ, अब तुम्हे गंगाजल लाना है.
जल्दी गंगाजल लेकर आओ, यह अनुरोध हमारा है.
यह अनुरोध हमारा है. ....हाँ ... यह अनुरोध हमारा है.
Thursday, May 13, 2010
परशुराम के बहाने सांस्कृतिक विमर्श
हम क्या थे, क्या हैं, होंगे क्या?
अब यही बैठ कर सोच रहाँ हूँ.
शिक्षा में ह्रास भिक्षा की आस.
हर बात में पश्चिम देख रहा हूँ.
आज प्रतिगामी सोच वाले
शुक्राचार्यों की भरमार तो सब और है,
परन्तु प्रगतिशीलता के पोषक वशिष्ठ, कोण
कौटिल्य, कबीर, नानक. विवेकानंद और
परशुराम का आभाव क्यों है?
नैतिक मूल्यों में ह्रास क्यों है?
और भौतिकता की आंधी में
अध्यात्मिकता का उपहास क्यों है?
कहीं पढ़ा था - "कोई भी गम मनुष्य के
साहस से बड़ा नहीं वही हारा जो लड़ा नहीं".
यह विचार नहीं, सिद्धांत है.
हमें लड़नी है, एकसाथ दो लडाइयां;
एक सांस्कृतिक पुनरुत्थान की और
दूसरी मधुमय संतुलित प्रकृति की.
उसके संरक्षण और अनुरक्षण की.
मूल अधिकार यह हक़ है अपना,
नहीं कोई यह भिक्षा है.
'कंठ में शास्त्र' और 'कर में शस्त्र',
यह परशुराम की शिक्षा है.
शास्त्र पर तो चर्चा बहुत मिलती है.
कुछ चर्चा उनके अस्त्र पर,
उनके परशु और शास्त्र पर.
परशुराम का सन्देश स्पष्ट है -
जब शास्त्र की मर्यादा, राष्ट्रीय स्वाभिमान,
अपना अस्तित्व, अपनी संस्कृति और
अपनी प्यारी प्रकृति हो संकट में,
अन्याय के दमन और लोकमंगल हेतु
सर्वथा उचित है शस्त्र प्रयोग.
परन्तु आज का शस्त्र परशु नहीं,
संवैधानिक अधिकार, सांस्कृतिक विमर्श है.
तेजस्वी विश्वामित्र ने स्वीकार किया था कभी-
क्षात्र शक्ति बलम नास्ति ब्रह्म तेजो बलं बलम.
सांस्कृतिक अधिकार में, दायित्वा निर्वहन में,
उसी राष्ट्रीय उर्जा का प्रस्फुटन होना चाहिए.
परशु हमेशा शिरोच्छेदक ही नहीं होता.
होता है यह सर्जक और पोषक भी.
अवांछित टहनियों को काट-छाँट कर,
स्वस्थ शाखा, समर्थ वृक्ष के निर्माण में,
देखो ! इसका कितना सुंदर उपयोग.
लोकमंगल की तुला पर ही
अब करना है इसका प्रयोग.
परशुराम की यह शिक्षा
छठे नानक के रूप में रंग लाई,
जब 'मीरी' और 'पीरी' के रूप में,
इसे जीवन संगिनी बनाई.
दशमेश पिता ने किया इसे साकार,
बना दिया जिसने नर को एक ही साथ,
"संत" - "सिपाही" और "सरदार".
रम रहा जो जीव - जगत में,
एक वही तो है - "राम".
साथ विवेकी परशु हो जब,
जानो उसे ही - "परशुराम".
था संस्कृति का रक्षक वह,
"धनुष - भंग" सहता कैसे ?
देखा जब पूरी घटना, सारा विवरण.
जाना उत्तराधिकारी का अवतरण.
क्षणमात्र ना किया विलम्ब तब,
दिया सौप सब भार उसे तत्क्षण.
संघेशक्ति कलियुगे, विचार नहीं सच्चाई है,
करनी होगी स्वीकार इसे, इसी में सबकी भलाई है.
हम मिल बैठ विचार करेंगे, हे संभव उपचार करेंगे,
साथ जियेंगे, साथ मरेंगे, आज यही संकल्प करेंगे.
कर उपाय हरसंभव संतुलित पारिस्थितिकी निर्माण करेंगे.
अब तक चाहे जितना खोया, अबसे हम उत्कर्ष करेंगे.
कैसे हो सिरमौर राष्ट्र? अब इसका भी सुप्रबंध करेंगे.
अब यही बैठ कर सोच रहाँ हूँ.
शिक्षा में ह्रास भिक्षा की आस.
हर बात में पश्चिम देख रहा हूँ.
आज प्रतिगामी सोच वाले
शुक्राचार्यों की भरमार तो सब और है,
परन्तु प्रगतिशीलता के पोषक वशिष्ठ, कोण
कौटिल्य, कबीर, नानक. विवेकानंद और
परशुराम का आभाव क्यों है?
नैतिक मूल्यों में ह्रास क्यों है?
और भौतिकता की आंधी में
अध्यात्मिकता का उपहास क्यों है?
कहीं पढ़ा था - "कोई भी गम मनुष्य के
साहस से बड़ा नहीं वही हारा जो लड़ा नहीं".
यह विचार नहीं, सिद्धांत है.
हमें लड़नी है, एकसाथ दो लडाइयां;
एक सांस्कृतिक पुनरुत्थान की और
दूसरी मधुमय संतुलित प्रकृति की.
उसके संरक्षण और अनुरक्षण की.
मूल अधिकार यह हक़ है अपना,
नहीं कोई यह भिक्षा है.
'कंठ में शास्त्र' और 'कर में शस्त्र',
यह परशुराम की शिक्षा है.
शास्त्र पर तो चर्चा बहुत मिलती है.
कुछ चर्चा उनके अस्त्र पर,
उनके परशु और शास्त्र पर.
परशुराम का सन्देश स्पष्ट है -
जब शास्त्र की मर्यादा, राष्ट्रीय स्वाभिमान,
अपना अस्तित्व, अपनी संस्कृति और
अपनी प्यारी प्रकृति हो संकट में,
अन्याय के दमन और लोकमंगल हेतु
सर्वथा उचित है शस्त्र प्रयोग.
परन्तु आज का शस्त्र परशु नहीं,
संवैधानिक अधिकार, सांस्कृतिक विमर्श है.
तेजस्वी विश्वामित्र ने स्वीकार किया था कभी-
क्षात्र शक्ति बलम नास्ति ब्रह्म तेजो बलं बलम.
सांस्कृतिक अधिकार में, दायित्वा निर्वहन में,
उसी राष्ट्रीय उर्जा का प्रस्फुटन होना चाहिए.
परशु हमेशा शिरोच्छेदक ही नहीं होता.
होता है यह सर्जक और पोषक भी.
अवांछित टहनियों को काट-छाँट कर,
स्वस्थ शाखा, समर्थ वृक्ष के निर्माण में,
देखो ! इसका कितना सुंदर उपयोग.
लोकमंगल की तुला पर ही
अब करना है इसका प्रयोग.
परशुराम की यह शिक्षा
छठे नानक के रूप में रंग लाई,
जब 'मीरी' और 'पीरी' के रूप में,
इसे जीवन संगिनी बनाई.
दशमेश पिता ने किया इसे साकार,
बना दिया जिसने नर को एक ही साथ,
"संत" - "सिपाही" और "सरदार".
रम रहा जो जीव - जगत में,
एक वही तो है - "राम".
साथ विवेकी परशु हो जब,
जानो उसे ही - "परशुराम".
था संस्कृति का रक्षक वह,
"धनुष - भंग" सहता कैसे ?
देखा जब पूरी घटना, सारा विवरण.
जाना उत्तराधिकारी का अवतरण.
क्षणमात्र ना किया विलम्ब तब,
दिया सौप सब भार उसे तत्क्षण.
संघेशक्ति कलियुगे, विचार नहीं सच्चाई है,
करनी होगी स्वीकार इसे, इसी में सबकी भलाई है.
हम मिल बैठ विचार करेंगे, हे संभव उपचार करेंगे,
साथ जियेंगे, साथ मरेंगे, आज यही संकल्प करेंगे.
कर उपाय हरसंभव संतुलित पारिस्थितिकी निर्माण करेंगे.
अब तक चाहे जितना खोया, अबसे हम उत्कर्ष करेंगे.
कैसे हो सिरमौर राष्ट्र? अब इसका भी सुप्रबंध करेंगे.
पहचानो कौन हैं वे
हे स्वप्न सुन्दरी बात सुनो!
इतना तुम क्यों शर्माती हो?
दिन में क्यों नजर नहीं आती?
बस ख़्वाबों में मुस्काती हो.
क्यों दिखती केवल श्रीमानों को ही,
तेरी गुणगान सदा वे करते है,
सारी प्रगति, सब काम नदारत,
जिस बात को मंच से कहते हैं.
क्या उनसे तेरा कोई नाता है?
जो दोनों ही नजर नहीं आते,
तुम रूपवती हो केवल रातों में,
उनका सब काम है, केवल बांतो में.
अस्तित्व तुम्हारा कुछ भी नहीं,
सारे वादे भी उनके झूठे हैं,
क्या जन्म तेरा हुआ झूठो से?
वे दिन रात ही झूठ में पलते हैं.
तुम रहती केवल घंटे पांच,
वे पांच वर्ष तक रहते हैं.
क्या बतलाऊ अब कहूं कैसे?
कैसे ये वर्ष फिर कटते हैं?
अनुरोध हमारा है तुमसे,
कभी सच भी तुम बन जाया करो,
दिन में भी झलक दिखलाया करो.
क्या पता सुधर जाएँ वे भी ?
कुछ ऐसी दया दिखलाया करो.
इतना तुम क्यों शर्माती हो?
दिन में क्यों नजर नहीं आती?
बस ख़्वाबों में मुस्काती हो.
क्यों दिखती केवल श्रीमानों को ही,
तेरी गुणगान सदा वे करते है,
सारी प्रगति, सब काम नदारत,
जिस बात को मंच से कहते हैं.
क्या उनसे तेरा कोई नाता है?
जो दोनों ही नजर नहीं आते,
तुम रूपवती हो केवल रातों में,
उनका सब काम है, केवल बांतो में.
अस्तित्व तुम्हारा कुछ भी नहीं,
सारे वादे भी उनके झूठे हैं,
क्या जन्म तेरा हुआ झूठो से?
वे दिन रात ही झूठ में पलते हैं.
तुम रहती केवल घंटे पांच,
वे पांच वर्ष तक रहते हैं.
क्या बतलाऊ अब कहूं कैसे?
कैसे ये वर्ष फिर कटते हैं?
अनुरोध हमारा है तुमसे,
कभी सच भी तुम बन जाया करो,
दिन में भी झलक दिखलाया करो.
क्या पता सुधर जाएँ वे भी ?
कुछ ऐसी दया दिखलाया करो.
मानव सृष्टि की कविता है
क्या है कविता - एक उपासना;
कविता साध्य है या साधना?
कविता लक्ष्य है या आराधना?
कविता यथार्थ है या भावना?
कविता बोध है या संभावना?
कविता अश्रुधार है या अभिव्यक्ति?
कविता उच्छ्वास है या आभ्यंतरशक्ति?
कविता प्रणय है या समर्पण और भक्ति?
कविता कोलाहल है या पूर्ण संतृप्ति?
कविता हलाहल है या जीवन का वरदान?
कविता अंतर की शांति है या अतृप्त अरमान?
कविता सन्देश है, प्रदर्शन है या अभिमान?
कविता निजत्व का विलोपन है या पहचान?
कविता उत्साह है या बहकता एक उमंग?
कविता एक धार है या उठती हुई तरंग?
कविता एक विकार है या जीवन का रंग?
कविता भौतिकता है या एक सत्संग?
कविता कृति है मानव की,
फिर मानव है कृति किसकी?
मानव सृष्टि की कविता है;
सृष्टि यह कविता है किसकी?
कविता साध्य है या साधना?
कविता लक्ष्य है या आराधना?
कविता यथार्थ है या भावना?
कविता बोध है या संभावना?
कविता अश्रुधार है या अभिव्यक्ति?
कविता उच्छ्वास है या आभ्यंतरशक्ति?
कविता प्रणय है या समर्पण और भक्ति?
कविता कोलाहल है या पूर्ण संतृप्ति?
कविता हलाहल है या जीवन का वरदान?
कविता अंतर की शांति है या अतृप्त अरमान?
कविता सन्देश है, प्रदर्शन है या अभिमान?
कविता निजत्व का विलोपन है या पहचान?
कविता उत्साह है या बहकता एक उमंग?
कविता एक धार है या उठती हुई तरंग?
कविता एक विकार है या जीवन का रंग?
कविता भौतिकता है या एक सत्संग?
कविता कृति है मानव की,
फिर मानव है कृति किसकी?
मानव सृष्टि की कविता है;
सृष्टि यह कविता है किसकी?
Sunday, May 2, 2010
नैराश्यभाव से तार न जोड़ो
हो न निराश तुम्हे मिला नहीं,
यदि बेला, चंपा और गुलाब.
नैराश्यभाव से तार न जोड़ो,
आशा की कोई राग तो छेड़ो.
देखते हो केवल रंग-रूप तुम,
उससे रिसता लहू भी देखो...
भ्रमित हुए हैं जीवन में कितने.
कुछ अंतस में भी घुस कर देखो.
पुष्प केवल बेला और गुलाब नहीं,
....अब गेंदा कनेर से नाता जोड़ो.
इस गुलाब ने, बेला ने लुटे हैं,
घरौदें, एक नहीं....बहुतेरे....
बहुतों के गम दूर किये हैं -
गेंदा ....और ....कनेरे.........
अधिकारों की माँग बहुत है,
गुलदस्तों में ये गरजते हैं.
कर्त्तव्यों का है बोध उसे,
अंगारे पर जो चलते हैं.
यह बेला- गुलाब बिछ पथ में
उनके पैरों में फिर चुभता है.
यह तो है गेंदा कनेर जो
पग के घाव को भरता है.
राग जुड़ेगा सत्व से जब,
सब रंग - रूप भूल जाएगा.
मोहकता ही नहीं है सबकुछ,
परख कभी जब हो जाएगा.
यदि बेला, चंपा और गुलाब.
नैराश्यभाव से तार न जोड़ो,
आशा की कोई राग तो छेड़ो.
देखते हो केवल रंग-रूप तुम,
उससे रिसता लहू भी देखो...
भ्रमित हुए हैं जीवन में कितने.
कुछ अंतस में भी घुस कर देखो.
पुष्प केवल बेला और गुलाब नहीं,
....अब गेंदा कनेर से नाता जोड़ो.
इस गुलाब ने, बेला ने लुटे हैं,
घरौदें, एक नहीं....बहुतेरे....
बहुतों के गम दूर किये हैं -
गेंदा ....और ....कनेरे.........
अधिकारों की माँग बहुत है,
गुलदस्तों में ये गरजते हैं.
कर्त्तव्यों का है बोध उसे,
अंगारे पर जो चलते हैं.
यह बेला- गुलाब बिछ पथ में
उनके पैरों में फिर चुभता है.
यह तो है गेंदा कनेर जो
पग के घाव को भरता है.
राग जुड़ेगा सत्व से जब,
सब रंग - रूप भूल जाएगा.
मोहकता ही नहीं है सबकुछ,
परख कभी जब हो जाएगा.
आखिर हिंदी अपनी हार गयी,
आखिर हिंदी अपनी हार गयी,
हिंद के गले की 'हार' गयी.
होता है कष्ट कहें कैसे ?
यह हिंदी हिंद में हार गयी.
यह 'आह' - 'वाह' की बात नहीं,
दिल पर भी नया आघात नहीं.
दिल भरा - भरा है घावों से,
है कष्ट दिलों से भाषा की प्यार गयी.
हर देश की अपनी भाषा है,
क्यों भारत में ही निराशा है?
एक जुबाँ के लिए तरसते हैं,
बाहर तो खूब गरजते हैं.
जब सदन में चर्चा उठती है,
हिंदी की लुटिया डूबती है.
हाउस में वो शर्माते हैं,
जो हिंदी की ही खाते हैं.
चुप बैठे वे क्यों रहते हैं?
जो बाहर खूब गरजते हैं.
क्या भय है अन्दर उनके,
जो घुट-घुट कर वे सहते हैं?
अब आंग्ल भाषा आयी है,
दिलों पर सबके छाई है.
यह नटखट छैल-छबीली है,
यह कटी पूँछ की बिल्ली है.
हिंदी के घर की खाती है,
पर 'हाई', 'हेल्लो" करती है.
हिंदी को समझती चुहिया सा,
पंजों से वार ये करती है.....
जब से संगति हुयी इससे,
वे बन गए तब से 'रंगे सियार',
पहले बदले वस्त्र - विचार,
फिर बदल गए सारे व्यवहार.
जाब सूट - बूट में आते हैं,
अंग्रेजी में गुर्राते हैं.....
जब बाँध के पगड़ी आते हैं,
बैठे - बैठे शर्माते हैं......
अब आचरण एक पहेली है,
रहस्यमयी एक हवेली है.
है बुढ़िया यह जादूगरनी सी,
वे समझे यह नई - नवेली है.
यह पर्दा कौन हटाएगा ?
वह वीर कहाँ से आयेगा ?
अब भी तुम जगे नहीं भाई!,
निश्चय ही 'क्लीव' कहलायेगा.
हिंद के गले की 'हार' गयी.
होता है कष्ट कहें कैसे ?
यह हिंदी हिंद में हार गयी.
यह 'आह' - 'वाह' की बात नहीं,
दिल पर भी नया आघात नहीं.
दिल भरा - भरा है घावों से,
है कष्ट दिलों से भाषा की प्यार गयी.
हर देश की अपनी भाषा है,
क्यों भारत में ही निराशा है?
एक जुबाँ के लिए तरसते हैं,
बाहर तो खूब गरजते हैं.
जब सदन में चर्चा उठती है,
हिंदी की लुटिया डूबती है.
हाउस में वो शर्माते हैं,
जो हिंदी की ही खाते हैं.
चुप बैठे वे क्यों रहते हैं?
जो बाहर खूब गरजते हैं.
क्या भय है अन्दर उनके,
जो घुट-घुट कर वे सहते हैं?
अब आंग्ल भाषा आयी है,
दिलों पर सबके छाई है.
यह नटखट छैल-छबीली है,
यह कटी पूँछ की बिल्ली है.
हिंदी के घर की खाती है,
पर 'हाई', 'हेल्लो" करती है.
हिंदी को समझती चुहिया सा,
पंजों से वार ये करती है.....
जब से संगति हुयी इससे,
वे बन गए तब से 'रंगे सियार',
पहले बदले वस्त्र - विचार,
फिर बदल गए सारे व्यवहार.
जाब सूट - बूट में आते हैं,
अंग्रेजी में गुर्राते हैं.....
जब बाँध के पगड़ी आते हैं,
बैठे - बैठे शर्माते हैं......
अब आचरण एक पहेली है,
रहस्यमयी एक हवेली है.
है बुढ़िया यह जादूगरनी सी,
वे समझे यह नई - नवेली है.
यह पर्दा कौन हटाएगा ?
वह वीर कहाँ से आयेगा ?
अब भी तुम जगे नहीं भाई!,
निश्चय ही 'क्लीव' कहलायेगा.
Subscribe to:
Posts (Atom)