Tuesday, July 26, 2016

दर्द की भाषा-परिभाषा (4)


दर्द -
एक टीस है
उसकी अपनी 
ही एक रीति है
रोने नहीं देता
वह चैन से
सोने नहीं देता
दर्द की
दुहाई नहीं होती
दर्द सदा
बेवफाई नहीं होती
दर्द देते हैं-
अपने भी, पराये भी
दर्द धोते हैं -
अपने भी, पराये भी
दर्द बाँटते हैं -
अपने भी, पराये भी.
पर, होते हैनं
कुछ दर्द ऐसे
जिसे बंटाना तो दूर
कोई जान नहीं पाता
व्यक्ति अकेले ही
उसे आजीवन ढोता
यह दर्द ही उसका
प्यारा मीत होता
जीने का संबल होता
हार में भी जीत होता ..
(क्रमशः जारी)
डॉ जयप्रकाश तिवारी

Monday, July 25, 2016

दर्द की भाषा-परिभाषा (3)


कुछ पाकर दर्द
विखर जाते हैं
कुछ पाकर दर्द 
संवर जाते हैं
संभावना दर्द की
है असीम अपार .
हाँ, इस दर्द के
विभिन्न रंग है
बिना कोई दर्द
जीवन बदरंग है
दर्द चिमटा है
दर्द कुर्सी है
दर्द घुघरू है
दर्द पायल है
इसी के पीछे
दुनिया घायल है .
दर्द यह
बुनता है जाल
करता आक्रमण
अधिकार बनकर
कर्त्तव्य बनकर
प्यार बनकर
क्रोध बनकर
हंसी बनकर
ग्लानि बनकर
योगी बनकर
सन्यासी बनकर
कभी काबा और
कभी काशी बनकर ..
(क्रमशः जारी)
डॉ जयप्रकाशतिवारी

Wednesday, July 20, 2016

दर्द की भाषा-परिभाषा (२)


क्या दर्द वही
जो छलक पडे?
क्या दर्द वही 
जो लोचन बहे?
क्या दर्द वही
जिससे गुबार
यदि दर्द यही,
तो क्या है वह?
अंतर में जो
घुटता रहता है
आता ही नहीं
जो बाहर को
विदग्ध लहर
जो रहता है
पी नयनों का
जल खारा
शुष्क किये
जो रहता है.
(क्रमशः जारी)
डॉ जयप्रकाशतिवारी

Monday, July 11, 2016

दर्द की परिभाषा

दर्द  है -
भाव वाचक संज्ञा 
नपुंसक लिंग 
जिसके अनेक रूप 
अनेकशः भाषा 
परन्तु क्या है 
दर्द की परिभाषा ?

दर्द की भाषा 
दर्द की परिभाषा 
कितनी विचित्र 
जितनी सूक्ष्म 
उतनी ही व्यापक 
जितनी कोमल 
उतनी ही घातक 
जितना क्रूर क्रूर 
उतनी आराधक। 

दर्द 
तीव्र अनुभूति है 
उसी में प्यास 
उसी में तृप्ति है 
दर्द ही सौंदर्य 
दर्द ही विकृति है 
सम्पूर्ण जगत 
प्रेम और दर्द 
की ही कृति है। 

डॉ जयप्रकाश तिवारी 

Thursday, June 2, 2016

गीत और दीप

हो व्यथा की वेदना या अंतर का उल्लास 
पीड़ा मन की तीव्र हो या प्रियतम की चाह 
अति चंचला हो भावना जब हिल्लोर लेती है 
वही तब बूँद बनती है, वही तब गीत बनती है। 

जब खुले आकाश से भी  सुमन झरते हैं  
या उसी आकाश से कुछ सितारे टूटते हैं  
आसमां की इस दशा का उपहास होता है  
व्यथा से अंतर्मन में काव्य प्रकाश होता है। 

कहीं भी छूट न जाए व्यथा की यह कहानी 
चीत्कार उठता है यही बचपना हो या जवानी 
व्यथा की अश्रुओं को भावना के गेह में रख कर 
सदा जलता रहा है रात्रि में भी डीप वह बनकर। 

हमारी आस्था के बल को, विश्वास वैभव को 
कहीं चुरा न ले यह तमस, बन कुटिल एक चोर 
जब कभी भी, जब कहीं भी कुछ ऐसा होता है 
तब आस्था की दीप्ति-विश्वास को गीत ढोता है। 

यह 'दीप' भी एक गीत है जो गुनगुनाता है 
यह दीप ही मन से अँधेरा दूर भगाता है 
दीप  हो या गीत, नियति है एक सी इनकी 
ज्योति का संचार, सनातन रीति है इनकी। 

डॉ जयप्रकाश तिवारी 

Saturday, July 25, 2015

पलकें, क्यों मुरझाई शाम को

सुबह- सुबह जो खिली थी पलकें, क्यों मुरझाई शाम को ?
बैठ रहा है मन-मस्तिष्क, क्या दूंगा मैं उत्तर श्याम को ?
पलकें ये हों खुली या बंद, ये विस्मित ही अच्छी लगती हैं ।
कौन सा जुगत लगाऊँ अब मैं? क्या समझाऊँगा श्याम को?

कैसे कह दूँ, निर्दोष हूँ मैं? सारा दोष तो है इन्हीं पलकों मे ?
पलकों मे तो मैं ही बसता था, कोई चोट नहीं दी पलकों ने ॥
क्या उत्तर दूंगा मैं इसका? क्यों छोड़ दिया घर पलकों का?
बताऊ तब, गुनाह हो जब, कोई गुनाह नहीं इन पलकों का ॥
आज भय मेरा मुझसे पूछ रहा, तू कहेगा क्या फरियाद मे?
हो जाएगा दोनों का निर्णय, आज ही श्याम की अदालत मे ॥
पलकों ने मुझे फिर मात दिया, अपराध को अपने माथ लिया ।
लेकिन निर्णय तो निर्णय था, श्याम ने उचित फरियाद किया ॥
कुछ सीख मूर्ख ! तू इन पलकों से, दिन रात जो बहती रहती है ।
देती कितना मान तुझे, अब भी तेरे पर दोष न एक ये मढ़ती है ॥
अंतर है यही नारी और नर मे, नारी जिसे चुनती,फिर चुनती है ।
उसमे इतना धैर्य कहाँ ? गर्व जिसका ?,वह नारी की शक्ति है ॥
डॉ जयप्रकाश तिवारी

Sunday, July 19, 2015

अपलक निहारता रहा, मैं तेरी पलक को

अपलक निहारता रहा, मैं तेरी पलक को
फिर भी रहा तरसता, तेरी एक झलक को
खिंजा सी छा जाती है, झुकती जब पलक
बसंत बहार आ जाती है, उठती जब पलक
इन पलकों पे वारूँ, जन्म जन्म की पलक
बिन पलकों के भी देखूँ, मैं तेरी यह पलक
ऐ पलक ! तेरी पलकों मे कैसी है ये पुलक ?
लाख छुपाओ छलक ही जाती है यह पुलक ।
तेरी पलकों की पुलक मे बिछी कितनी पुलक?
कुछ समझ भी है दुनिया की? ओ मेरी पलक !
अपलक की पलक मे ही है, सृष्टि की झलक
मैं तो ढूँढता उसे, रवि- शशि हैं जिसके पलक
इन पलकों मे ही डूबी रहती है मेरी यह पलक
क्या देखूँ? क्यों देखूँ और कोई दूजा पलक ?
तू वो तो हरगिज नहीं, जिसे मन पूजता मेरा
तू वो भी नहीं, जिसके लिए तन जूझता मेरा ॥
डॉ जयप्रकाश तिवारी