Thursday, June 2, 2016

गीत और दीप

हो व्यथा की वेदना या अंतर का उल्लास 
पीड़ा मन की तीव्र हो या प्रियतम की चाह 
अति चंचला हो भावना जब हिल्लोर लेती है 
वही तब बूँद बनती है, वही तब गीत बनती है। 

जब खुले आकाश से भी  सुमन झरते हैं  
या उसी आकाश से कुछ सितारे टूटते हैं  
आसमां की इस दशा का उपहास होता है  
व्यथा से अंतर्मन में काव्य प्रकाश होता है। 

कहीं भी छूट न जाए व्यथा की यह कहानी 
चीत्कार उठता है यही बचपना हो या जवानी 
व्यथा की अश्रुओं को भावना के गेह में रख कर 
सदा जलता रहा है रात्रि में भी डीप वह बनकर। 

हमारी आस्था के बल को, विश्वास वैभव को 
कहीं चुरा न ले यह तमस, बन कुटिल एक चोर 
जब कभी भी, जब कहीं भी कुछ ऐसा होता है 
तब आस्था की दीप्ति-विश्वास को गीत ढोता है। 

यह 'दीप' भी एक गीत है जो गुनगुनाता है 
यह दीप ही मन से अँधेरा दूर भगाता है 
दीप  हो या गीत, नियति है एक सी इनकी 
ज्योति का संचार, सनातन रीति है इनकी। 

डॉ जयप्रकाश तिवारी 

Saturday, July 25, 2015

पलकें, क्यों मुरझाई शाम को

सुबह- सुबह जो खिली थी पलकें, क्यों मुरझाई शाम को ?
बैठ रहा है मन-मस्तिष्क, क्या दूंगा मैं उत्तर श्याम को ?
पलकें ये हों खुली या बंद, ये विस्मित ही अच्छी लगती हैं ।
कौन सा जुगत लगाऊँ अब मैं? क्या समझाऊँगा श्याम को?

कैसे कह दूँ, निर्दोष हूँ मैं? सारा दोष तो है इन्हीं पलकों मे ?
पलकों मे तो मैं ही बसता था, कोई चोट नहीं दी पलकों ने ॥
क्या उत्तर दूंगा मैं इसका? क्यों छोड़ दिया घर पलकों का?
बताऊ तब, गुनाह हो जब, कोई गुनाह नहीं इन पलकों का ॥
आज भय मेरा मुझसे पूछ रहा, तू कहेगा क्या फरियाद मे?
हो जाएगा दोनों का निर्णय, आज ही श्याम की अदालत मे ॥
पलकों ने मुझे फिर मात दिया, अपराध को अपने माथ लिया ।
लेकिन निर्णय तो निर्णय था, श्याम ने उचित फरियाद किया ॥
कुछ सीख मूर्ख ! तू इन पलकों से, दिन रात जो बहती रहती है ।
देती कितना मान तुझे, अब भी तेरे पर दोष न एक ये मढ़ती है ॥
अंतर है यही नारी और नर मे, नारी जिसे चुनती,फिर चुनती है ।
उसमे इतना धैर्य कहाँ ? गर्व जिसका ?,वह नारी की शक्ति है ॥
डॉ जयप्रकाश तिवारी

Sunday, July 19, 2015

अपलक निहारता रहा, मैं तेरी पलक को

अपलक निहारता रहा, मैं तेरी पलक को
फिर भी रहा तरसता, तेरी एक झलक को
खिंजा सी छा जाती है, झुकती जब पलक
बसंत बहार आ जाती है, उठती जब पलक
इन पलकों पे वारूँ, जन्म जन्म की पलक
बिन पलकों के भी देखूँ, मैं तेरी यह पलक
ऐ पलक ! तेरी पलकों मे कैसी है ये पुलक ?
लाख छुपाओ छलक ही जाती है यह पुलक ।
तेरी पलकों की पुलक मे बिछी कितनी पुलक?
कुछ समझ भी है दुनिया की? ओ मेरी पलक !
अपलक की पलक मे ही है, सृष्टि की झलक
मैं तो ढूँढता उसे, रवि- शशि हैं जिसके पलक
इन पलकों मे ही डूबी रहती है मेरी यह पलक
क्या देखूँ? क्यों देखूँ और कोई दूजा पलक ?
तू वो तो हरगिज नहीं, जिसे मन पूजता मेरा
तू वो भी नहीं, जिसके लिए तन जूझता मेरा ॥
डॉ जयप्रकाश तिवारी

Tuesday, July 7, 2015

ऐसे चिंतकों को धिक्कार है

चिंतक- समीक्षक - कवि
न तो होता सुविधा भोगी
न ही होता वह वेतन भोगी,
होते हैं जो सुविधा भोगी
हो जाते हैं शिकार वे
बुरी तरह,  उसी सुविधा के ।
फिर कब हो जाती है कुंठित
उनकी कलाम की तीव्र धार,
कब बन जाती कविता व्यापार
नहीं जान पाते, वे स्वयं भी।
जानती है यह, उनकी सुविधा॥

चिंतक और समीक्षक तो
इस जगत का यार है
स्रष्टा -सृष्टि से ही उसे प्यार है
सिद्धन- सूत्र ही उसका शृंगार है
परिदान- अवदान - सुविधा
ये बातें तो नीरा व्यापार है,
और चिंतक, समीक्षक, कवि को
व्यापार से नहीं, दायित्व से प्यार है।
चिंतक की विद्वता, प्रतिभा
तो 'माँ सरस्वती' की देन  है
लेखनी - तूलिका मे सामर्थ्य
तो ;माँ सुरगे' की देन है, लेकिन
बिक जाना उसका सुविधा के हाथों
मित्रों ! बताओ यह किसकी देन है?
यह तो चिंतन का निरा अपमान है
ऐसे चिंतकों को धिक्कार है ॥

डॉ जयप्रकाश तिवारी  

Sunday, June 28, 2015

आषाढ़ का एक दिन: संदर्भ पुराने, अर्थ नए


आया आषाढ़ बढ़ गया ताप
उठी हवाएँ गगन मे तेज तेज
मन मे हलचल उससे भी तेज
घिर आई घटाएँ चहुं ओर से
स्मृति पटल छाये घनघोर मेघ,
मन कितना चंचल मनचला है
जा पाहुचा अतीत की उस घड़ी मे
जहां भीगे थे हम दोनों आषाढ़ मे
बादलों की जलधारा मे ही नहीं
भावों की वर्षा, शब्द फुहार मे ।
बसे थे कितने ही मोहक इरादे
संवेदनाओं की बलखाती लहरों मे॥
       -2-
..............दशकों बाद ..........
इस स्मृति ने इतनी हलचल मचाई
अब लौट आया अतीत से वर्तमान मे
रिमझिम फुहारें बड़ी बूंदों मे बदल गयी
बरसात ने पकड़ लिया ज़ोर और मैं
भीग गया पूरा ही आषाढ़ की बरसात मे,
ठीक उसी तरह जिस तरह भीगे थे तब
हो गया था तन – मन गीला मेरा
तब उस समय भी, औए आज अब भी ।
हाथ मे मेरे वर्षा से बचाव का अस्त्र
यही कलम तब भी थी... अब भी है
लेकिन कलाम वर्षा से बचाती कहाँ है
यह तो और भिगो देती है, अंदर तक॥
             -3-   
सहसा विजली ज़ोर से कौंधी-कड़की
... इस चमक मे मुझे साया सी दिखी
वो साया ... तुम थी, भला भूलता कैसे?
दौड़ कर तुझे पकड़ लिया, तू भाग न पाई
कृशकाय-बदन, धँसी-आँखें, पिचके कपोल
कुछ कहो या न कहो, खोल दी सारी पोल
एक अलगाव ने कितना बदल दिया तुम्हें
पूछने पर कुछ बताती नहीं, हो गयी हो मौन
ऊपर से दिखता नहीं, कोई घाव-चोट- मरहम
हैरान हूँ, विस्मित भी, कैसी हो गयी हो तुम
अब न तुझे वर्षा भिगो पाती, न ही कलम
यह कलम तो मदहोश थी तुम्हें लिखने मे
कब सोचा इसने, देखने की तुम्हें वास्तव मे?
          -4-
तुम्हें ‘मल्लिका’ का किरदार बहुत पसंद था
और समय ने सचमुच मल्लिका बना दिया
मैं मातृगुप्त बनकर राज सुख भोगता रहा
‘मेघदूत’ और ‘ऋतुसंहार’ ... ही लिखता रहा
कभी सुना था इतिहास अपने को दुहराता है
सचमुच इतिहास अपने को दुहराता है ....
ऐतिहासिक मातृगुप्तनिभा नहीं पाया था
न राज-धर्म, न प्रिय-धर्म, न प्रेयसि-धर्म
लेकिन यह मातृगुप्त विधिवत निभाएगा
राज-धर्म भी, प्रिय-धर्म भी, प्रेयसि-धर्म भी
आज इतिहास अब ...एकदम बदल जाएगा  
जब एश्वर्य की सिंदूरी रेखा मांग सजाएगा
औए कभी अट्टहास करने वाला यही समय
अब भांति – भांति के मंगल गीत गाएगा॥

डॉ जयप्रकाश तिवारी





Friday, June 26, 2015

मानव कौन और दानव कौन?

तू शर्म हया की 
बात न कर 
ये तो कब की 
बिक चुकी यहाँ,
यहाँ सूरत बिकती
यहाँ सीरत बिकती 
बिकता है 
यहाँ भोलापन ।
सब कुछ मिलता 
यहाँ दौलत से 
मिलेगा न कुछ
यदि पास है केवल 
कोरा पावन मन ॥
बिकने वाला 
यहाँ मानव है तो
खरीदने वाला भी 
मानव ही है,
बिकने वाले के
वस्त्र श्वेत 
क्रेता के उससे 
अधिक श्वेत ।
यहाँ कठिन हो गया 
करना  भेद  
यहाँ मानव कौन?
और दानव है  कौन?

डॉ जयप्रकाश तिवारी

Tuesday, June 23, 2015

प्रेम तो निर्मल दिव्य तरंग है.


'प्रेम'; सरस सर्वत्र सनातन,
सागर कलोल यह करता है.
जो होता है जितना संवेदी,
उर उतना उसके रहता है.

जिसे समझते निजी संपत्ति,
वह तो भ्रम है, एक धोखा है,
सहित जिससे, अभिसिंचित वह,
रहित उससे, रेत सम सूखा है.

अभिव्यक्त वहीँ होता है यह,
जहाँ क्षमता धारणशीलता की.
ये तो निर्मल हैं, दिव्य तरंगें है,
नहीं इसमें कहीं कुछ क्षुद्रता सी.

बन जाता व्यक्ति जो क्षुद्र/महान,
वह पात्र की निजी पात्रता है.
टिक पाती कितनी अवधि तक,
है संवेदना, नहीं स्वतन्त्रता है.

जब बात स्वतन्त्रता की आयी,
मानव करता है प्रायः दुरुपयोग.
कुछ ही होते इतने सुलझे,
जो करते इसका सदुपयोग.

सदुपयोग इसे जो करते हैं,
अलौकिक रूप विचरते हैं.
नहीं मानते अनुचित नियम,
वे तो धार में प्रेम के बहते हैं.

जो धार में प्रेम की बहता है,
वह सृजन कार्य को करता है.
प्रेम तो है स्वभाव से योजक,
कभी ध्वंश नहीं वह करता है.

डॉ जयप्रकाश तिवारी