Sunday, June 7, 2015

तुम त्याज्य हो 'का-पुरुष' ! (लघु कथा)

कहते हो -
रिश्ते को तूने मजबूरी मे छोड़ा!
लेकिन छोड़ा, तुम्ही ने उसे तोड़ा !
कैसे मर्द हो?
मर्द हो? या खुदगर्ज हो?
तुम माहौल बदल सकते थे
परिस्थितियों मे अनुकूलता रच सकते थे
परिवार तो परिवार ही है आखिर
तुम्हारे ताप से सब पिघल सकते थे ,
तुम्हारी चाहत मे तीव्रता होती तो
गालों पर लुढ़कते मेरे ये गरम आँसू
तेरी आँखों से भी बह सकते थे ।
मैंने कब चाहा था यह
घर वालों के विरुद्ध हथियार उठा लो?
अरे ! भावुक क संवेदना से तो
पत्थर दिल भी पिघल सकते थे ।
किन्तु संवेदनाओं को ढोंग कहने वाले
हृदयहीन, तुम एक का-पुरुष !,
प्रेम का स्वांग रचनेवाले ढोंगी !
संवेदना की गर्मी कब समझ सकते थे?
जान लो - 'विषमता को तोड़ना ही पुरुषार्थ है',
और नारीत्व की चाहत- 'यही पुरुशार्थ' है ।
मजबूरी तो ढाल है-
कुतर्क है- 'क्लीवता की', 'कायरता की' ।
अपमान यह पुरुष का, पुरुषार्थ का..
नारी ले लिए त्याज्य है वह नर
जिसमे भाव नहीं पुरुषार्थ का ।
अब परिस्थितियों का रोना मत रो !
यहाँ दम हिलाने की जरूरत नहीं,
हमने तो वही किया जो कर सकते थे ॥

डॉ जयप्रकाश तिवारी

Friday, June 5, 2015

मणिपुर मे 19 सैनिको की उग्रवादियो द्वारा हत्या: कारण क्या है ? निवारण क्या है?


समाचारों में पढ़ा, टीवी में भी देखा,
मणिपुर मे 19 सैनिको की
उग्रवादियो द्वारा नृशंस हत्या
ये नक्सली / उग्रवादी अब बौखला से गए हैं.
मरने - मारने पर उतारू तो थे ही, अब
जन सामान्य पर कहर बन कर छा गए हैं.
ट्रेन और बसों को उड़ा गए हैं.
ऐसी ही ख़बरें पढ़ते - पढ़ते ना जाने कब?
नीद की आगोश में समां गया, अथवा
कोई नक्सली आप बीती सुनाने उठा ले गया.
मैंने देखा:
उनके घरों को, झोपड़ पट्टे को,
अधपके मोटे चावल, बिना नमक - तेल की सब्जी को.
उसने दिखाया अपनी स्थिति, ...रो रहे बच्चे को.
बोला - भूखा है यह, इसकी माँ को दूध नहीं उतरता,
गाँव में कोई दूध नहीं देता, कोई काम नहीं देता.
मैंने कहा:
तुम लोग शहर जाकर कोई काम धंधा क्यों नहीं करते?
शहर जाने का किराया नहीं, बिचौलिया पैसा नहीं देता.
ठीकेदार कमीशन ही नहीं खाता, घरवाली पर डोरे भी डालता साब.
ऐसे पैसे वालों को हम क्यों छोड़ेगा साब ?
परन्तु तुम लोग ट्रेन यात्रियों को क्यों मारते हो?
ये भी ठीकेदार और बनियों का साथी होता साब,
जेब में पैसा है, तभी तो ए.सी. में और स्लीपर में चलता साब.
सरकार सारा डिब्बा एक जैसा क्यों नहीं बनाता साब?
उनका पेट फूला -फूला और हमारा पीठ में क्यों घुसा साब?
ये यात्री लोग हमें अपना भाई नहीं मानता साब,
एक दिन ना चलने से, इनका क्या बिगड़ता साब?
हमारी आवाज सरकार, कुछ तो सुनता साब.
ये जब हमको अपना नहीं मानता, हम क्यों माने साब?
हमारे एरिया में एक भी स्कूल, अस्पताल क्यों नहीं साब?
आज बड़ों के बच्चे कंप्यूटर चलाते और हमारे अंगूठा लगाते साब.
आखिर ऐसा कब तक चलेगा साब?
क्या आजादी के लिए हमारे पुरखे नहीं लड़े?
इन्हीं पेड़ों में मेरे दादा को लटका दिया था फिरंगियों ने.
बापू बताता था, अपनी पीठ पर कोड़े का निशान दिखाता था.
फिरंगियों से तो बच गया था, देश के सूदखोरों से नहीं बच पाया.
इन्ही कटीली झाड़ियों में घसीटा था, बेइज्जत किया था.
खून उगल कर मरा था, बाप मेरा, इसी जगह पर साब.
क्या जन्म लेना अपने हाथ में है साब?
हाथ में होता, किसी बड़े के यहाँ जन्म लेता.
हेलीकोप्टर में, जहाज में, झूला झूलता साब .
यह बिधाता का लेखा है, हमारे साथ तो धोखा है.
मैंने पूछा-
हथियार कहाँ से लाते हो?
रहस्यमयी मुस्कान होठो पे लाकर बोला,
साब आप भी अजीब बात करता है.
साहब लोग बोरा के बोरा नोट कहाँ से लाता है?
उसी को छीनते हैं, अपना पेट भरते हैं और
बाकी जो बचता है, उससे हथियार खरीदते है.यदि
बोरे के नोट बंद हो जाय, हथियार बंद हो जाएगा साब.
परन्तु हम जानते हैं, यह बंद नहीं होगा.
ना आप लोग जनता को लूटना बंद करेगा,
ना हम आप को लूटना बंद करेगा.
यह तो इन्साफ की बात है साब,
आप खाते- खाते मरेगा, हम भूखों मरेगा.
यह नहीं होगा साब, कभी नहीं होगा.
मैंने कहा -
क्या अपने मुखिया से मिलाओगे,
हमारी कुछ बात कराओगे?
वह बोला शाम को मिलेगा साब,
इस समय हथियारों के डीलर के पास गया है.
वह कहाँ रहता है? ...
कुछ दुसरे भी तो होंगे, उन्हें बुलाओ
अरे रग्घू काका! देखो एक साहब आया है
तुम्हे बुलाया है, अपनी बात सरकार तक पहुचाने की,
बात करता है, और अपने को एक पत्रकार कहता है.
आगंतुक बोला, बातों में शायराना अंदाज का मिसरी घोला.
यदि हँसना जो चाहा हमने, अरे कौन सा गुनाह किया हमने?
तुम्हे क्या पता, एक पल के लिए, क्या- क्या नहीं सहा हमने?
जागृत हुई है चेतना जब से, दर्द से नाता रहा है तब से.
कितनी राते रो - रो के गुजारी, पोछो इस बूढ़े अश्वत्थ से.
फिर भी है गर्व, लिया है जन्म इसी जमी पे, यह समाज मेरा घर है.
आज नहीं दे रहा तो क्या है? आगे मिलने का अवसर तो है.
यह विश्वास जगाये बैठा...., आशा बहुत लगाये बैठा.....
उम्र हुई अब साठ बरस की, हाथ ना अब तक है कुछ आया.
भटक गयी संताने अपनी, रोका - टोका, पर समझ ना आया.
कहते हैं हक लेंगे अपना, हम बन्दूक की नोक से,
नोच भगायेंगे इन सबको, जकड़े हैं जो जोंक से.
लेकिन यह तो गलत है,
बिलकुल अनुचित मार्ग है यह,
उन्हें समाज की मुख्या धरा में लौटना होगा,
बातों से हल निकलना होगा,
सरकार भी संवेदनहीन नहीं है अब.
अब आगे कदम बढ़ाना होगा,
तुम्हें वार्ता की मेज पर आना होगा.
तब तक किसी ने, मेरे सिर को जोर से झकझोरा....
देखा, श्रीमतीजी हाथ में चाय का प्याला लिए खड़ी है,
बोली - शादी के पहले तो मेरा नाम जपते थे,
अब शादी के बाद, यह किसका जाप कर रहे हो?
मै झल्लाया,
उन पर चीखा, चिल्लाया,
तुम यहाँ भी टांग अड़ा गयी.
मै नक्सलियों की बस्ती में गया था,
कोई समझौता हो गया होता,
कोई फ़ॉर्मूला, कोई बीच का रास्ता निकल गया होता....,
तो मेरा भी काम बन गया होता,
नाम के साथ दाम भी मिला होता.
कोरी पत्रकारिता से क्या होगा?
चाय की चाय ही रहेगी.
ये नक्सली भी वीरप्पन से कम नहीं,
देखा उस समय कितनो की चाँदी थी.
हाय ! मालामाल होने का, हाथ आया एक अवसर गया.
हर बार की तरह इस बार भी, यह सेहरा, तेरे ही सिर गया.
डॉ जयप्रकाश तिवारी

Thursday, June 4, 2015

द्रोणाचार्य को सजा दिलाओ



अरे ! क्या हुआ? कैसे हुआ यह?
अरे ! इतना होनहार तेजस्वी बालक
इस ट्रेन से कट कर मर गया ! 
लोग तरह तरह की चर्चा कर रहे थे
कुछ प्रेम मे पागल, व्यथित दीवाना
तो कुछ सनकी पढ़ाकू बता रहे थे ,
तभी उसके एक मित्र ने पर्दाफास किया
फोर फस्ट है, इंटरव्यू की तैयारी कर रहा था
पिछले कई बार से इंटरव्यू से लौट रहा था
अबकी बार अर्जुन की तरह 'आँख पर लक्ष्य'
लगाने का कठिन संधान कर रहा था
अब 'लक्ष्य ' ही देखता है, 'केवल लक्ष्य' ।
इस बार उसी का शिकार हुआ
इसके ट्रेन का प्लेटफॉर्म बदल गया
इसने लक्ष्य देखा और सीधे चल पड़ा
दायें बाएँ देखने की आदत छोड़ दी थी इसने ,
और इसका परिणाम आपने सामने रहा।
इस दुर्घटना का कारण द्रोणाचार्य हैं
सब लोग मिलकर आवज उठाओ,
द्रोणाचार्य को सजा दिलाओ
उनकी तकनीक आज एकदम फेल है
आज लक्ष्य केवल वह भेदता है जो
'लक्ष्य' को नहीं, सत्ता - शासन को देखता है ।
कार्यालय, बाबू और आसान को देखता है ॥
डॉ जयप्रकाश तिवारी

Saturday, May 30, 2015

संस्मरण: बहुत कलम चलते हो..मेरे बारे में लिखना..

लखनऊ जं॰ का रेलवे प्लेटफार्म 4 
ट्रेन की प्रतीक्षा, यात्री परेशान,
कुछ तो हैं हमे देख कर हैरान.
आखिर यह आदमी इतनी 
देरसे क्या लिख रहा.......?
धीमे से एक बोला पता नहीं
यह मानव है या कोई 'भूत' ..?
इतनी गर्मी में भी .... 
पड़ा नहीं अभी तक सुस्त.
मैंने दृष्टि उठाई और पूछा -
आदमी की परख होती है कहाँ?
बहुत अनुभवी था वह,
तपाक से बोला - 'ट्रेन में'.
वहीँ लग जाता है पता,
सब कुछ एकदम मुफ्त में.
कौन है कितना दयालु ?
कृपालु और समझदार ?

मैंने सोचा -
आदमी है यह समझदार,
ठीक ही तो कहता है -
बिलखते  हुए बच्चों को
कितने हैं जो पिला देते है 
अपने बोतल का पानी ?
शायद यह उनकी मजबूरी भी हो,
क्योकि यात्रा के समय 
सबसे सस्ती और सबसे महँगी
यही चीज है - 'पानी'.
इस ट्रेन में कितनों की 
पानी बचती है और कितनो की
उतरती है पल भर में,
कई बार इसे करीब से देखा है.

बात में बात मिलाकर वह बोला-
अरे साहब! 
कुछ चुल्लूभर पानी को तरसते हैं
और कुछ उसी डिब्बे में,
चुल्लू भर पानी में डूब मरते हैं.
देखे हैं ऐसे-ऐसे शरीफ महानुभाव
जिनके बोतल की कौन कहे
नज़रों में भी पानी नहीं.
हैं वे 'इन्डियन साहब' ही ....
कोई विदेशी जापानी नहीं.
जिंदगी जीते हैं बड़े शान से
पड़े चाहे दस - बीस रोज...,
परन्तु होते कभी भी 
पानी - पानी नहीं.

बड़े दिलचस्प लगते हो भाई!
करते क्या हो, मैंने पूछा?
बह  बोला - पानी में रहता हूँ,
पानी भरता हूँ, पानी बेचता हूँ,
पानी चढ़ाता हूँ और यहीं खड़े खड़े
बड़ो - बड़ो की पानी उतारता हूँ.
मैंने कहा- अरे भाई! बस .बस...
सीधे ये क्यों नहीं कहते कि
मछुआरे हो जाल बिछाते हो,
यहाँ लोगों को फंसाते हो....
वह बोला - हाँ किसी हद तक...,
लेकिन मैं बंशी नहीं फंसाता,
छोटी मछली नहीं मारता,
मगर मच्छ मारता हूँ.
मछली से कहाँ खर्च चलेगा
इस बढती महगाई के युग में.

मैं कहा - 
फिर नदी में जाओ यहाँ क्या काम?
वह बोला बड़े भोले हो साहब!
इतना भी नहीं समझते?
सब आप ही की तरह टूटी चप्पल वाले नहीं हैं.
यदि आप की जेब में अठन्नी के सिवा कुछ नहीं है
तो पूरी दुनिया को फ़कीर क्यों समझते हो?
मै स्टेशन पर ही रहता हूँ,
टिकट खिड़की से लेकर आठ - दस स्टेशनों की
सफ़र भी कर लेता हूँ इसी में
कहीं न कहीं मिल जाते हैं - 'मगरमच्छ'.
अरे साहब ! एक नहीं - 'अनेक'.

मैं भी कभी विश्वविद्यालय का छात्र था,
पी.जी. प्रथम श्रेणी में हूँ, 
रिसर्च पूरी नहीं हुई ..
गाइड और हेड की खीच-तान में.
प्रातक्रिया वाद ने रंग दिखलाया,
जब संभला तो अपने को दलदल में पाया.
अब स्टेशन की ख़ाक छानता हूँ.
बहुत कलम चलाते हो साहब... !
कभी मेरे बारे में भी कुछ लिखना..
हो सके तो सरकार से कुछ कहना....
मैं लगा सोचने 
आज देश की क्या दशा है?
आखिर मै क्या लिखूं...?
किसे लिखूं, कहाँ - कहाँ लिखूं..? .
उसी से  पूछने के लिया सिर उठाया,
लिकिन वह स्वयं तो 
नौ दो न्याराह हो गया और 
मुझे एक कठिन प्रश्न दे गया,
मुझे मेरी औकात बता गया...
मुझे अपनी कलम और डायरी 
के सहारे नितांत अकेला छोड़ गया.
डॉ जयप्रकाश तिवारी 

Wednesday, May 13, 2015

अनोखी अपनी राम कहानी

 
निहारा था उसे इस विचार से कि
बेवफाई तो एक अदा है सौंदर्य की
लेकिन वह तो ऐसी बावफा निकली 
समा गयी मेरे पूरे तन - बदन मे
हो गए द्वारपाल सब नतमस्तक
एक सम्मोहन, ऐसी वह दिखा गयी
अब तो दिल ही नहीं दिमाग पर भी
उसी का एक मात्र साम्राज्य है
अब तो बन गया हूँ मैं उपासक
अब वही मेरी एक मात्र आराध्य है
जब भी मैं कलम उठाता हूँ
मन मस्तिष्क मे वो छ जाती है
लिखना चाहता हूँ और कुछ
अपने मन की वह लिखवाती है
मैं तो हूँ एक निमित्त मात्र अब
जो कुछ भी अब, उसी का सब ॥
यूं कहने को तो साथ हैं दशकों से
सौंदर्य की प्रतिमा है, अब जाना ॥
डॉ जयप्रकाश तिवारी

Sunday, May 10, 2015

'माँ' की पूजा -अर्चना


जला है मेरा, अब दीप विशेष
इसके लौ को यूं ही जलने दो
दियाली बनाई काया की हमने
'रुधिर का तेल' इसमे भरने दो ...
वर्तिका लगी सत्कर्म की इसमे
क्रोध - दंभ इसमे जलने दो
मैं नहीं ला पाया पुष्पों का हार
मन का भाव इसमे रमने दो
जला है मेरा, अब दीप विशेष
इसके लौ को यूं ही जलने दो।
कहाँ सुगंध सुलगाने जाऊँ
राग -द्वेष इसमे जलने दो
लाये हैं साथी नैवेद्य विविध
मन अर्पित मुझको करने दो,
क्यों लाऊं मैं गंगा का जल
मुझे अश्रु स्नेह अर्पित करने दो
नहीं रागिनी कोई आरती की
हृदय राग इसमे भरने दो
जला है मेरा, अब दीप विशेष
इसके लौ को यूं ही जलने दो ।
अनभिज्ञ तंत्र विद्या से हूँ मैं
भाव मंत्र मुझको पढ़ने दो
रोली तिलक लगता हूँ नहीं
शुचिता चन्दन अर्पित करने दो
औरों के जितनी बड़ी नहीं यह
दिव्यता की एक छटा है इसमे
दिग- दिगंत तक दिव्यता को
माँ के स्नेहाशीष को फैलने दो
जला है मेरा, अब दीप विशेष
इसके लौ को यूं ही जलने दो॥

डॉ जयप्रकाश तिवारी

Monday, May 4, 2015

पंथ निहार रही 'यशोधरा'


मेरे प्रियतंम तुम कब आओगे
सूखे ये तन मन, सूखी सरिता
सूखे ये बाग बन पंथ निहार
इसमे फूल उगाने कब आओगे?
मेरे प्रियतम ! तुम कब आओगे?
निहार - निहार पथ थके नयन
कब दरस विधाता दिखलाओगे
नाम पद गया कलिंकिनी मेरा
यह दाग मिटाने कब आओगे ?
मेरे प्रियतम ! तुम कब आओगे?
झर - झर झरना, नयना बरसे
सुबह - दोपहरी - शाम को तरसे
मन की सब सारी मैल धुल गयी
सुख की सेज तुम कब लाओगे?
मेरे प्रियतम ! तुम कब आओगे?
जग बैरी हो गया, मुझे जीने ना दे
एक आस तुम्हारी मरने भी ना दे
दम घुटा जा रहा इससे है हमारा
तुम मुझे बचाने कब आओगे?
बोलो प्रियतम ! तुम कब आओगे?

डॉ जयप्रकाश तिवारी