Thursday, June 4, 2015

द्रोणाचार्य को सजा दिलाओ



अरे ! क्या हुआ? कैसे हुआ यह?
अरे ! इतना होनहार तेजस्वी बालक
इस ट्रेन से कट कर मर गया ! 
लोग तरह तरह की चर्चा कर रहे थे
कुछ प्रेम मे पागल, व्यथित दीवाना
तो कुछ सनकी पढ़ाकू बता रहे थे ,
तभी उसके एक मित्र ने पर्दाफास किया
फोर फस्ट है, इंटरव्यू की तैयारी कर रहा था
पिछले कई बार से इंटरव्यू से लौट रहा था
अबकी बार अर्जुन की तरह 'आँख पर लक्ष्य'
लगाने का कठिन संधान कर रहा था
अब 'लक्ष्य ' ही देखता है, 'केवल लक्ष्य' ।
इस बार उसी का शिकार हुआ
इसके ट्रेन का प्लेटफॉर्म बदल गया
इसने लक्ष्य देखा और सीधे चल पड़ा
दायें बाएँ देखने की आदत छोड़ दी थी इसने ,
और इसका परिणाम आपने सामने रहा।
इस दुर्घटना का कारण द्रोणाचार्य हैं
सब लोग मिलकर आवज उठाओ,
द्रोणाचार्य को सजा दिलाओ
उनकी तकनीक आज एकदम फेल है
आज लक्ष्य केवल वह भेदता है जो
'लक्ष्य' को नहीं, सत्ता - शासन को देखता है ।
कार्यालय, बाबू और आसान को देखता है ॥
डॉ जयप्रकाश तिवारी

Saturday, May 30, 2015

संस्मरण: बहुत कलम चलते हो..मेरे बारे में लिखना..

लखनऊ जं॰ का रेलवे प्लेटफार्म 4 
ट्रेन की प्रतीक्षा, यात्री परेशान,
कुछ तो हैं हमे देख कर हैरान.
आखिर यह आदमी इतनी 
देरसे क्या लिख रहा.......?
धीमे से एक बोला पता नहीं
यह मानव है या कोई 'भूत' ..?
इतनी गर्मी में भी .... 
पड़ा नहीं अभी तक सुस्त.
मैंने दृष्टि उठाई और पूछा -
आदमी की परख होती है कहाँ?
बहुत अनुभवी था वह,
तपाक से बोला - 'ट्रेन में'.
वहीँ लग जाता है पता,
सब कुछ एकदम मुफ्त में.
कौन है कितना दयालु ?
कृपालु और समझदार ?

मैंने सोचा -
आदमी है यह समझदार,
ठीक ही तो कहता है -
बिलखते  हुए बच्चों को
कितने हैं जो पिला देते है 
अपने बोतल का पानी ?
शायद यह उनकी मजबूरी भी हो,
क्योकि यात्रा के समय 
सबसे सस्ती और सबसे महँगी
यही चीज है - 'पानी'.
इस ट्रेन में कितनों की 
पानी बचती है और कितनो की
उतरती है पल भर में,
कई बार इसे करीब से देखा है.

बात में बात मिलाकर वह बोला-
अरे साहब! 
कुछ चुल्लूभर पानी को तरसते हैं
और कुछ उसी डिब्बे में,
चुल्लू भर पानी में डूब मरते हैं.
देखे हैं ऐसे-ऐसे शरीफ महानुभाव
जिनके बोतल की कौन कहे
नज़रों में भी पानी नहीं.
हैं वे 'इन्डियन साहब' ही ....
कोई विदेशी जापानी नहीं.
जिंदगी जीते हैं बड़े शान से
पड़े चाहे दस - बीस रोज...,
परन्तु होते कभी भी 
पानी - पानी नहीं.

बड़े दिलचस्प लगते हो भाई!
करते क्या हो, मैंने पूछा?
बह  बोला - पानी में रहता हूँ,
पानी भरता हूँ, पानी बेचता हूँ,
पानी चढ़ाता हूँ और यहीं खड़े खड़े
बड़ो - बड़ो की पानी उतारता हूँ.
मैंने कहा- अरे भाई! बस .बस...
सीधे ये क्यों नहीं कहते कि
मछुआरे हो जाल बिछाते हो,
यहाँ लोगों को फंसाते हो....
वह बोला - हाँ किसी हद तक...,
लेकिन मैं बंशी नहीं फंसाता,
छोटी मछली नहीं मारता,
मगर मच्छ मारता हूँ.
मछली से कहाँ खर्च चलेगा
इस बढती महगाई के युग में.

मैं कहा - 
फिर नदी में जाओ यहाँ क्या काम?
वह बोला बड़े भोले हो साहब!
इतना भी नहीं समझते?
सब आप ही की तरह टूटी चप्पल वाले नहीं हैं.
यदि आप की जेब में अठन्नी के सिवा कुछ नहीं है
तो पूरी दुनिया को फ़कीर क्यों समझते हो?
मै स्टेशन पर ही रहता हूँ,
टिकट खिड़की से लेकर आठ - दस स्टेशनों की
सफ़र भी कर लेता हूँ इसी में
कहीं न कहीं मिल जाते हैं - 'मगरमच्छ'.
अरे साहब ! एक नहीं - 'अनेक'.

मैं भी कभी विश्वविद्यालय का छात्र था,
पी.जी. प्रथम श्रेणी में हूँ, 
रिसर्च पूरी नहीं हुई ..
गाइड और हेड की खीच-तान में.
प्रातक्रिया वाद ने रंग दिखलाया,
जब संभला तो अपने को दलदल में पाया.
अब स्टेशन की ख़ाक छानता हूँ.
बहुत कलम चलाते हो साहब... !
कभी मेरे बारे में भी कुछ लिखना..
हो सके तो सरकार से कुछ कहना....
मैं लगा सोचने 
आज देश की क्या दशा है?
आखिर मै क्या लिखूं...?
किसे लिखूं, कहाँ - कहाँ लिखूं..? .
उसी से  पूछने के लिया सिर उठाया,
लिकिन वह स्वयं तो 
नौ दो न्याराह हो गया और 
मुझे एक कठिन प्रश्न दे गया,
मुझे मेरी औकात बता गया...
मुझे अपनी कलम और डायरी 
के सहारे नितांत अकेला छोड़ गया.
डॉ जयप्रकाश तिवारी 

Wednesday, May 13, 2015

अनोखी अपनी राम कहानी

 
निहारा था उसे इस विचार से कि
बेवफाई तो एक अदा है सौंदर्य की
लेकिन वह तो ऐसी बावफा निकली 
समा गयी मेरे पूरे तन - बदन मे
हो गए द्वारपाल सब नतमस्तक
एक सम्मोहन, ऐसी वह दिखा गयी
अब तो दिल ही नहीं दिमाग पर भी
उसी का एक मात्र साम्राज्य है
अब तो बन गया हूँ मैं उपासक
अब वही मेरी एक मात्र आराध्य है
जब भी मैं कलम उठाता हूँ
मन मस्तिष्क मे वो छ जाती है
लिखना चाहता हूँ और कुछ
अपने मन की वह लिखवाती है
मैं तो हूँ एक निमित्त मात्र अब
जो कुछ भी अब, उसी का सब ॥
यूं कहने को तो साथ हैं दशकों से
सौंदर्य की प्रतिमा है, अब जाना ॥
डॉ जयप्रकाश तिवारी

Sunday, May 10, 2015

'माँ' की पूजा -अर्चना


जला है मेरा, अब दीप विशेष
इसके लौ को यूं ही जलने दो
दियाली बनाई काया की हमने
'रुधिर का तेल' इसमे भरने दो ...
वर्तिका लगी सत्कर्म की इसमे
क्रोध - दंभ इसमे जलने दो
मैं नहीं ला पाया पुष्पों का हार
मन का भाव इसमे रमने दो
जला है मेरा, अब दीप विशेष
इसके लौ को यूं ही जलने दो।
कहाँ सुगंध सुलगाने जाऊँ
राग -द्वेष इसमे जलने दो
लाये हैं साथी नैवेद्य विविध
मन अर्पित मुझको करने दो,
क्यों लाऊं मैं गंगा का जल
मुझे अश्रु स्नेह अर्पित करने दो
नहीं रागिनी कोई आरती की
हृदय राग इसमे भरने दो
जला है मेरा, अब दीप विशेष
इसके लौ को यूं ही जलने दो ।
अनभिज्ञ तंत्र विद्या से हूँ मैं
भाव मंत्र मुझको पढ़ने दो
रोली तिलक लगता हूँ नहीं
शुचिता चन्दन अर्पित करने दो
औरों के जितनी बड़ी नहीं यह
दिव्यता की एक छटा है इसमे
दिग- दिगंत तक दिव्यता को
माँ के स्नेहाशीष को फैलने दो
जला है मेरा, अब दीप विशेष
इसके लौ को यूं ही जलने दो॥

डॉ जयप्रकाश तिवारी

Monday, May 4, 2015

पंथ निहार रही 'यशोधरा'


मेरे प्रियतंम तुम कब आओगे
सूखे ये तन मन, सूखी सरिता
सूखे ये बाग बन पंथ निहार
इसमे फूल उगाने कब आओगे?
मेरे प्रियतम ! तुम कब आओगे?
निहार - निहार पथ थके नयन
कब दरस विधाता दिखलाओगे
नाम पद गया कलिंकिनी मेरा
यह दाग मिटाने कब आओगे ?
मेरे प्रियतम ! तुम कब आओगे?
झर - झर झरना, नयना बरसे
सुबह - दोपहरी - शाम को तरसे
मन की सब सारी मैल धुल गयी
सुख की सेज तुम कब लाओगे?
मेरे प्रियतम ! तुम कब आओगे?
जग बैरी हो गया, मुझे जीने ना दे
एक आस तुम्हारी मरने भी ना दे
दम घुटा जा रहा इससे है हमारा
तुम मुझे बचाने कब आओगे?
बोलो प्रियतम ! तुम कब आओगे?

डॉ जयप्रकाश तिवारी

Tuesday, April 7, 2015

प्रेम गति: आदि से अबतक


प्रारम्भ में थी केवल निश्चेतना
था अन्धकार-जड़त्व-निष्क्रियता.
प्रेम ही बना प्रथम अभिव्यक्ति.
तब से कर रहा निरंतर ही गति.
प्रेम गति एक दिव्य तरंग है,
गति का उसका अजीब ढंग है.
जड़ को जागृत करने खातिर
जड़त्व अन्दर स्वयं समाया.
सुषुप्त चेतना अलसायी थी,
थपकी दे तन्द्रा दूर भगायी.
रही न जड़ता  कहीं व्याप्त
अंतर चेतना उसी ने जगायी.
अतल-वितल की गहराई से
ऊर्ध्वमुखी यह गति करता है.
वृक्ष की जड़ से होकर ही यह
तंतु-पुतन्तु सबको सींचता है.
गति यह करता पत्थरों में भी
परन्तु गति वह धीमी होती.
मानव मन तो अति चंचल
उसकी गति कब धीमी होती?
लता - वल्लरी में गति है
ऊर्ध्व गमन यह आरोहण की.
कारण उसका भी यही प्रेम है
प्रेम - अभीप्सा आरोहण की.
दिन में करके अवरोहण गति
तंतु -पुतन्तु -पत्तों -डाली से.
जड़ तक, फिर यही पहुँचता है
कोश - कोश संतृप्त करता है.
प्रेम गति में तैर, वही फिर
शिखर तक ऊर्ध्व पहुँचता है.
अखिल विश्व में इसी तरह
आरोह-अवरोह क्रम चलता है.
दिव्य तरंग के इस प्रवाह में
मानव मन फिर डूबता है.
जिसकी जितनी है क्षमता
उतनी गागर जल भरता है.
स्व-संवेदना से माप उसी को
सुख और दुःख वह कहता है.
प्रेम तो है, दोनों से अलिप्त
ये दोनों, मन में ही संलिप्त.
अलिप्त-संलिप्त के द्वंद्व में
घिसता-पिसता, मानव मन.
करो अनुभूत इस प्रेम रूप को.
करो बोध! अपने स्वरुप को.
तू जड़ नहीं, एक चेतना है
शरीर नहीं, तू आत्मा है.
चेतना की पराकाष्ठा में
सर्व रूप तू जगदात्मा है.
सार तत्त्व वह, इसी प्रेम का
अभिव्यक्ति जो इसी ऐक्य का.
पड़ गया नाम उसका आनन्द
आत्मात्म ऐक्य ही परमानन्द.

डॉ जयप्रकाश तिवारी

Saturday, March 28, 2015

यज्ञकुण्ड की धूम्र लहरियाँ हैं - ‘रामचरितमानस’

बात माह नवंबर 2014 की 20वीं तारीख की है, हम दो मित्र रेलगाड़ी मे दिल्ली से वाराणसी तक की यात्रा करते हुये समसामयिक प्रसंग के रूप मे समाचार-पत्रों मे छपे हरियाणा की घटना (संत रामपाल प्रकरण) पर आपस मे कुछ चर्चायेँ कर रहे थे, तभी सामने की सीट पर बैठे एक सज्जन को शायद हमारी बातें पसंद नहीं आई। उन्होने कुछ रोषपूर्ण शब्दों मे मुझसे पूछा- क्या मानस पढ़ी है?

मैंने कहा- किसकी?

उन्होने कहा– मज़ाक मत करो। इसे हास-परिहास का विषय मत बनाओ। किसी व्यक्ति के मानस पटल की बात नहीं कर रहा, मैं ग्रंथ की बात कर रहा हूँ। बात कर रहा हूँ तुलसीदासजी की, उनके विश्वप्रसिद्ध कृति रामचरितमानस की।

मैंने कहा- हाँ, हाँमहोदय पढ़ी है, गुनी भी है और क्षमतानुरूप अपने विवेकानुसार कुछ न कुछ समझा भी है; अब जैसा भी समझ पाया उसे .... । 

वे मुस्कुराकर बोले- तो क्या समझा है अभी तक? कुछ विचित्र ही समझा होगा, उसमे दर्शनशास्त्र और मनोविज्ञान भी अवश्य ही घुसा होगा, फिर भी बताओ तो क्या – क्या समझा है?

मैंने कहा- यही कि रामचरितमानस तो तुलसीदास से कहीं अधिक रत्नावली है, हवनकुण्ड है… सार्वभौमिक योनिकुण्ड है ...। औररामचरितमानस’ है इस यज्ञ कुण्ड से उठती हुई धूम्र की लहराती-बलखाती धूम्र-लहरियाँ। सचमुच यह मानस तो यज्ञपुरी’ ही है, एक ऐसी यज्ञपुरी जिसमे काया-नगरी, माया-नगरी, भाव-नगरी, भोग-नगरी, योग-नगरी की अनेक छोटी-बड़ी वेदियाँ हैं, उपकुण्ड और लघुकुण्ड के रूप मे। इन हवनकुण्डों से उठता हुआ सघनतम-विरलतम धुआँधूम्रलहरियाँ, धुआँ की कुछ सरल-सी, कुछ टेढ़ी--सी कुछ लकीरें, कुण्डों को समर्पित आहुतियाँ... विभिन्न प्रकार की समिधाएँ... समवेत स्वर-लहरियों, मंत्र-तंत्र-यंत्रों की अनुगूँज... निरंतर... अनवरत... लगातार दिखती हैं, कभी-कभी क्षणिक विराम और अवकाश के साथ-साथ पुनः-पुनः गतिमान रूप मे। और उसी रूप मे जन मानस को प्रभावित भी करता है यह ग्रंथयही दिखता है मुझे इस रामचरितमानस मेयत्र-तत्र-सर्वत्र। विभिन्न प्रकार की भौतिक-आध्यात्मिक भावोंसंवेदनाओं की सरससरल सी अनुभूति अपनी अभिव्यक्ति के साथ-साथप्रथम अध्याय से लेकर अंतिम अध्याय तक।

प्रथम अध्याय बालकाण्ड’ के प्रारम्भ मे ही दक्ष-यज्ञ है। अहंकार-यज्ञ है यह; वैभव प्रदर्शनविभिन्न प्रकार की आहुतियाँ, एक से बढ़कर एक, सौन्दर्यपरक, भावपरक, दुर्भावपरक, अभिमानपरक, स्वाभिमानपरक और माया की आहुति... सती-काया की आहुति... और अंततः यज्ञ ध्वंश-विध्वंश। भीषण कलह, भयानक कोलाहल ... भयंकर नाश-विनाश ... देखते ही देखते। यज्ञ अधूरा...। लेकिन यज्ञ हो या मिशन, नहीं रहता देर तक अधूरा...। होता ही है यह जैसे-तैसे किसी न किसी रूप मे पूरा। दक्ष मुख्य यजमान था... कैसे हो सकता था उसका नाश, सर्वनाश, सत्यानाश...आचार्यगण साथ मे थे अस्तु उसे जीवित करना पड़ा, आचार्यों ने ही मार्ग ढूंढादक्ष को पुनर्जीवित होना पड़ामान-अभिमान त्यागकर उस निरा-अहंकारी भौतिकता के प्रतीक को विनयी-विनीत होना ही पड़ा। अध्यात्म का शरणागत अंततः होना ही पड़ा उसे। सार्वभौमिक योनिकुण्ड मे जब सनातन ज्योतिर्लिंग की आहुति पड़ीतब दक्ष-यज्ञ पूर्ण हुआ... । मैं... मै... करने वाला मेमना, वह अज (दक्ष) दिव्य मंत्रोच्चार करने लगा ... पशुता ने मानवता को धारण किया,इस मानवता ने प्रगति कीदेवत्व की प्राप्ति की।

दूसरा यज्ञ अवध नरेश दशरथ का पुत्रेष्टि-यज्ञ है, मानवीय अभिलाषा, मानवीय पुरुषार्थ के रूप मे। परिणाम स्वरूप चत्वारि पुरुषार्थों (धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष) की उन्हे प्राप्ति हुयी। राजा की कामना-मनोकामना पूर्ण हुयी। तीसरा यज्ञ महर्षि विश्वामित्र का निष्काम-यज्ञ है। यह समष्टि के कल्याण के लिए है,सर्वसमाज के उत्कर्ष के लिए है। विश्व के उत्कर्ष के लिए विश्व के सच्चे मित्र ही ऐसी याज्ञिक-क्रियाए संचालित करते रहते हैं, लेकिन बाधाएँ उत्पन्न होती हैं इसमे। बाधाओंका नाश धर्म और अर्थ’, ‘अध्यात्म और भौतिकता के संयुक्त शक्ति, सम्मिलित प्रयास द्वारा ही हो सकता है ... और ऐसा ही होता भी है। लेकिन सत्कर्म के लिए धर्म और अर्थ को भी शोधित करना पड़ता है, दोनों को ही आध्यात्मिक-ज्ञान और दार्शनिक-विवेक से प्रशिक्षित होना पड़ता है।

चौथ यज्ञ धनुष-यज्ञ है, यह विदेह-नगरी (ज्ञानियों की नगरी) मे सम्पन्न होता है। ज्ञानी के पास ही भक्ति हो सकती हैकहीं अन्यत्र नहीं। सीता भक्ति है, भक्ति को पाने के लिए अहंकार की अकड़ रूपी धनुष को तोड़ना पड़ता है। कोई भी अहंकारी अहंकार को भला कैसे तोड़ सकता था? इसीलिए अहंकारी राजा इसे तोड़ क्या पाते, हिला-डुला भी नहीं पाये। अकड़-अहंकार तोड़ने के लिए अनिवार्यता है ज्ञान की, गुरु कृपा की। अहंकार गलाने का, तोड़ने का अधिकार धर्म का है। धर्म संत के दिशा-निर्देशों का पालन करता है, संत निर्देशन के अभाव मे यही धर्म शब्दानुगामी बनकर, शब्दजाल मे फँसकर संप्रदाय-पंथ-कुपंथ भी बन जाया करता है, यह ऐतिहासिक सत्य है। संत का निर्देश हुआ - उठहु राम  भंजहु भाव चापा और धनुष की अकड़ता भंग हुयी...। ज्ञान और भक्ति का मिलन हुआ... महा-मिलन ... अद्भुत मिलन ... ।

एक और यज्ञ है सुंदरकाण्ड मे– उपहास-यज्ञ, जो लंका विध्वंश के पूर्व लंका-दहन के रूप मे सामने आता है। इसके लिए कोई हवनकुण्ड नहीं है, बाल ब्रह्मचारी के लिए कैसा हवनकुण्ड? और कैसा योनिकुण्ड? उपहास और विकृत परिहास भी कैसा विनाश लता है, इसका आभास उपहास कर्ताओं को नहीं होता। यदि उन्हे इसका थोड़ा सा भी आभास होता तो क्यों लाते अपने ही विनाश सामग्री के रूप मे समिधाएँ- अपने वस्त्र, तेल, घी ... इस महाविनाश के लिए? क्यों पढ़ते मंत्रों की जगह व्यानवाणी और कर्कश वचनों के छंद? इस सुंदरकाण्ड को ब्रह्मचारी दूत की बात मानकर सुंदर बनाया जा सकता था। दूसरी बात यज्ञाग्नि तो अरणि-घर्षण से उत्पन्न होती है, लगाई नहीं जाती। जिस यज्ञ मे वाहरी अग्नि से कुण्ड प्रज्वालित किया जाता है, वह अपना ही घर, अपनी ही नगरी जलाती है; होतागणों का सत्यानाश कर देती है। यज्ञ वही उत्तम होता है जिसमे जनकल्यणार्थ आहुतियाँ पड़ें। विनाशक यज्ञ प्रायः सफल होते भी नहीं, ये प्रतिकूल प्रभाव दिखलाते हैं लेकिन रामायण परिचर्चा करने वाले कुछ तथाकथित तत्वज्ञानी भी ये सब कहाँ सीख पाते है, आये दिन आरोप उनपर लगते रहते हैं। श्वेत वस्त्रों मे दाग वैसे भी गाढ़ा और दूर से दिखाई देता है। कथावाचकों को अत्यंत सजग-सतर्क रहने की आवश्यकता है।

लंकाकाण्ड मे दो यज्ञ हुये हैं क्रमशः मेघनाद और रावण के द्वारा। ये दोनों ही आचार्य विहीन यज्ञ थे, इनमे मुख्य यजमान स्वयं ही यज्ञाचार्य भी था। भटकाव... ध्वंश... मे पुनर्स्थापित-पुनर्जीवी नहीं हो पाया। फलतः यज्ञ अधूरा-अपूर्ण रहा… यजमानों का ही विनाश हुआ। और अंतिम अध्याय उत्तरकाण्ड मेज्ञान-यज्ञ के अनेक दृश्य हैं, अनेक आचार्य हैं, प्रवचन अनवरत चल रहा है, शंकाओं का शमन हो रहा है ... मानव को मानवता और मानवत्व से देवत्व प्राप्ति का मार्ग समझाया जा रहा है। ज्ञान-यज्ञ मे हवन कुण्ड की अनिवार्यता नहीं होती, ये तपाग्नि से प्रज्ज्वलित होते हैं, इसमे धूम्र नहीं निकलता, ज्ञान-प्रकाश की प्रखर ज्योति-वर्षा होती है। मन की कालिमा और काम की उद्दाम लालिमा भी ज्योतिर्मय हो उठती है।

सचमुचमानव के पास प्रकृति का सर्वश्रेष्ठ उपहार है बुद्धि, बुद्धि ज्ञान चाहती हैप्रमा-पिपासु है लेकिन यह बुद्धि प्रमाण चाहती है। बुद्धि को विश्वास तभी होता है जब वह परख लेती हैसम्यक परीक्षण कर लेती है। परीक्षित पर ही उसे विश्वास है। यही परीक्षण कार्य आज भी हो रहा है, विज्ञान के क्षेत्र मे भी और अध्यात्म क्षेत्र मे भी। हवनकुण्डों का प्रचलन सदा से ही रहा है। हिरण्यगर्भ मे यह हवनकुण्ड ही मानसों रेतः है। मन ही हवनकुण्ड है, कामनाओं की आहुति है और उसी से सृष्टि का विकास हुआ है। हवनकुंडों का प्रचलन सदा से ही रहा है, कभी प्रधानता यज्ञशाला की रही है, कभी प्रयोगशाला की। आज समाज मे हवन कुण्ड (योनि-कुण्ड) की मर्यादा नहीं रही, अब पूजा नहीं, उसका घोर अपमान हो रहा है ...। इतिहास साक्षी हैजब-जब इनहावन कुंडों का दुरुपयोग हुआ है, सदी-गली विकृत भावनाओं की आहुतियाँ पड़ी हैं, मांस के लोथड़ों की समिधाएँ डाली गयी हैं, तब-तब नाश हुआ है, सत्यानाश हुआ है...। आज महती आवश्यकता है पवित्रता की, विवेक की; क्षेत्र चाहे यज्ञशाला की हो, प्रयोगशाला की हो या परिवारिक, समाजिक संस्कारशाला की। मैंने तो बस यही समझा है श्रीमानअब आपने चाहे जो समझा हो। उन्होने कनिष्ठा उंगली उठाई, अभी आते हैं कहकर जो गए वाराणसी स्टेशन पर ही लौटे। तबतक परितोषिक यह मिला कि हम सो भी न पायेउनके सामान की रखवाली करते रहे।
  
डॉ जयप्रकाश तिवारी