Thursday, January 22, 2015

क्या दर्द वही जो...

क्या दर्द वही जो छलक पड़ता? 
क्या दर्द वही जो लोचन बहता? 
क्या  वही जिससे मन में गुबार 
यदि दर्द यही, तो क्या है वह ?
अंतर में जो घुटता रहता है 
आता ही नहीं बाहर  को जो 
विदग्ध लहर जो जःता है 
औ पीकर नयनों का खारा जल
उसे शुष्क किये जो रहता है 

डॉ जयप्रकाश तिवारी  

Tuesday, January 20, 2015

मैं हूँ एक राही पथ का अपने

मैं हूँ एक राही पथ का अपने
इसी पथ पर देखे कुछ सपने
करने साकार उसे निकल पड़ा हूँ
देखा नहीं साथ कितने हैं अपने,
मैं वो राही जिसने कभी न जाना ...
होता क्या है,पथ पर रुक जाना
सीखा नहीं, कभी सर को झुकाना
झुकता यह वहीँ जहाँ इसे झुकाना
नहीं चिंता, मंज़िल मिले, न मिले
मैं तो यह जानता, अब रुकना नहीं
चाहूँ भी रुकना यदि कभी तो चेतना
राह में मुझको नहीं रुकने ये देगी
चरमरा के जी रहा, पर चल रहा हूँ
मर-मर के जी रहा , पर चल रहा हूँ
कहेगी क्यादुनिया, नहीं मैं जानता
किन्तु स्व को तो हूँ मैं पहचानता
पहचान ही सम्बल है मेरा एक मात्र
पहचान ही कारण है मेरी गति का
कुछ को लगता है, मैं सो रहा हूँ
और लगता कुछ को, मैं रो रहा हूँ
क्या पता उनको कि इस राह में
हंसकर रोना, रोकर हँसना, पड़ाव है
यात्रा है यह, नहीं कोई ठहराव है।

डॉ जयप्रकाश तिवारी

Thursday, January 15, 2015

gazal

अँधेरा हो या दिन का उजाला यादों ने तसल्ली दी। 
कैसी याद है तेरी जिसने बगावटी चिंगारी फूंक दी। . 
 
तुझे कुछ पता भी है, इससे कुछ नहीं होगा हासिल। 
दिल- दिमाग के साथ-साथ व्यवस्था बदलनी होगी। 
 
यहाँ घोर अँधेरा गली में ही नहीं,इन दिलों में भी बसा है.. 
तू दीपक बन चिंगारी बन तम दूर भगा दिलों में बसा है 
 
मायूस उदासी ने इस समाज को गमगीन बना दिया है 
आंसू नहीं स्वेद बहा,नेतृत्व कर, गूँजे,गतिशील किया है।   
 
तलवार उठाने से कुछ नहीं होगा,औचित्य का प्रश्न उठा। 
व्यवस्था बदल, सिद्धान्त बदल, तू नेतृत्व का प्रश्न उठा। 

डॉ जयप्रकाश तिवारी 

Monday, January 12, 2015

इस ग़ज़ल ने कहा

इस ग़ज़ल ने कहा था जिंदगी गुनगुनाकर देखिये 
जिंदगी संवर जायेगी, प्यार के सुमन खिल जाएंगे 

तब से रोज गुनगुना रहा हूँ, उँगलियों को जल रहा हूँ 
पूछती है बीबी क्या कर रहे हो?बताते हुए शर्मा रहा हूँ 

लो आ गयी किचन में, बोली वाह! कितने अच्छे हो 
मेरे नहाने के लिए पानी अभी से ही गुनगुना रहे हो 

सचमुच इस ग़ज़ल ने तो प्यार करना ही सीखा दिया 
अब रोज गुनगुनाता हूँ, पानी के साथ चाय भी गर्माता हूँ 

थैंक्स तूने जिंदगी सवार दी, मीठी छुरी सीने में उतार दी 
ग़ज़ल मुस्कुराई हौले से मेरा हाथ दबाई, और पूछ ही बैठी 

न जाने लोग गज़लें क्यों ढूंढते हैं शायरी की किताबों में?
मैं तो उनके अंतर में बसती, देखते ही नहीं अंदरखाने मे.  

                                     डॉ जयप्रकाश तिवारी 

Sunday, January 11, 2015

शक की बीमारी

प्रिये!
तुझे शक की
बीमारी है
तो शक करो
खूब करो ...
बेशक करो
किन्तु इस तरह
इतनी बेदर्दी से
निचोड़ो तो नहीं
मैं तो वैसे भी
हूँ अकड़ू-सा
नहीं सुकोमल
हूँ मैं तुझ-सा
जान तुम्हारी ही
जायेगी इस तरह
देखना !
सच कहता हूँ
इस दिल में
तू ही तू बसती है
इसे भी देखना
ध्यान में रखना
यह न कहना
चेताया नहीं
साजिश के तहत
बतया नहीं
वैसे मर्जी तुम्हारी
मौका अच्छा है
चाहो तो मुक़दमा
चला सकती हो
हत्या न सही
आत्महत्या के
उकसावे का आरोप
तो लगा सकती हो
मेरा क्या
विरोध करना नहीं
लेकिन डरता हूँ
कल को
तुम ही पछताओगी
जीवन नर्क बनाओगी।


डॉ जयप्रकाश तिवारी

Friday, January 9, 2015

अनुभूति में परिवर्तन



डूबा रहा स्नेह में जब तक
लगा, जीवन यह मेरा है
पहुंचा जब प्रेम यह तक ...
लगा, जीवन तो यह तेरा है
डूबा जब तेरी आराधना में
लगा, जीवन तो यह सबका है
जो सबका है वह अपना है
जो मेरा है, वह सबका है।


डॉ जयप्रकाश तिवारी

Thursday, January 8, 2015

तू नटराज सा लगता है

 'मेरा' बदला अब 'तेरा' में
तू ह्रदय बसा सम्राट बना
मैं तुझे अकेला समझा था ...
तू तो यह सृष्टि विराट बना,
हर जीव में 'तू ही' बसता है
कण-कण में तू ही दिखता है
लगती यह सृष्टि संगीतमयी
और तू नटराज सा लगता है।
अब प्रेम भक्ति का रोना गाना
यह बचपन का खेल खिलौना
सब छूट गया, अब मौन हुआ
मैं वही क्या था,अब कौन हुआ?
तुम विंदु-सिंधु का खेल खेलते
हम विंदु-सिन्धु के बीच डोलते
कभी बून्द ही सिंधु बन जाता
कभी सिन्धु बूँद में डूब जाता। .


डॉ जयप्रकाश तिवारी