Sunday, October 26, 2014

कल, आज और कल

कल तक - 
सर्वसुलभ था मैं 
अम्बर हवा पानी सा 
ह्रदय अम्बर था 
मन  पवन  था 
जीवन जल था   
कितना सरल था 
संवेदनाएं सघन थीं 
अनुभूतियों में हर्ष था 
अभिव्यक्ति मृदंग था

आज -
जटिल हूँ महंगा भी
ए। सी. की हवा सा
बोतल के पानी सा
भावनाएं मर रहीं हैं 
इंटरनेट एस एम एस  
मोबाइलसंग बह रही है
रिश्तों में गहराई कहाँ 
 मन ऊषणतर हो रहा 
कटुता नित बढ रही है
जीवन हुआ बेमानी सा.

और कल - 
लगता है अब 
दुर्लभ सा हो जाऊँगा  
हवा को विषाक्त और 
जल को गरल बनाऊंगा 
संवेदनाओं को मिटाकर  
पहचान मिटाने पर तुला हूँ
इसे अपने हाथों मिटाऊंगा 
मानव से रोबोट बन जाऊँगा 
और गर्व से छाती ठोककर 
प्रगतशील इंसान कहलाऊंग 
इंसान की परंपरागत परिभाषा 
पूरी तरह बदल जाऊँगा। 

जब 
पीछे मुड़ता हूँ सोचता हूँ
यदि प्रगति है यही तो 
ह्रास क्या है? विनाश क्या है?
यह चिंतन नहीं, चिंता है 
क्या कोई इसमें हाथ बताएगा या 
वह भी मेरी तरह जिन्दा  जाएगा ?

डॉ  जय  प्रकाश तिवारी  

Wednesday, September 24, 2014

कविता को तुम शोर न कहो

कविता को तुम शोर न कहो

कविता यह कोई शोर नहीं है
हाँ इसकी ध्वनि दूर टक पहुचती है
जब जीवन की लय, जूनून की धुन पर
तर्कों के संबल में अंगड़ाई लेती है
तब बच्छों बुड्ढों में भी तरुनाई जगती है
उनके मानस में तीव्र हलचल मचाती है.
फी भी यह न शोर है न उन्मादिनी है
काव्य स्वर है अन्तः का ज्वर है
काव्य स्वर उन्मादिनी नहीं मन्दाकिनी है
यदि इसे शोर या शेर कहा भी जाय
तो यह उठकर अब थमने वाला नहीं
उर्मियों की तरह दम तोडनेवाला नहीं.
कविता हैलोजन की चकाचौंध नहीं
जो जली तो जली बुझी तो बुझी
और शेष रह गया वही घुप्प अँधेरा
काव्य शब्द-ज्योति है जो भाव प्रकाश फैलाती
एक लौ से सहस्र लौ जलती है और
देखते देखते भावों का मशाल बन जाती है
मशालची का यही हलचल
जब शब्दों में ढल जाता है तब
एक नूतन काव्य का सृजन हो जाता है
हाँ यह  है कविता कुछ करती नहीं 
परन्तु सब कुछ कराती तो वही है .

डॉ जयप्रकाश तिवारी

Wednesday, September 17, 2014

वर्ण से अभिव्यक्ति तक =================


वर्ण हैं लिपि का रेखा चित्र जो 
समाजशास्त्रीय चाक पर चढ़कर
अनुभवों अनुभूतियों की आंच में पककर
धारण करता है-  'शब्द का रूप'. 
शब्दों से काव्य शिल्पी अपने अंतर के 
चिंतन, स्फुरण, गुंजन और नर्तन को 
करता है मूर्तमान भाव सम्प्रेषण द्वारा। 
ये विपुलशब्द सम्प्रेक्ष्ण ही 
कहलाते हैं - 'काव्य और साहित्य'. 
शब्द यदि ज्यामितीय की भांति 
स्पष्ट और निर्भ्रांत है तो 
मूर्ति की भांति रहस्य्मयी और गूढ़तर भी. 
साहित्य की सम्यक समझ के लिए 
करना पड़ता है -'शब्दार्थों का  संधान '. 
व्याख्याओं का विशिष्ट विधान. 
क्योंकि यही शब्द अन्य अर्थों से अलग 
नए परिप्रेक्ष्य में , नवीन अर्थ स्फुरण में भी
होते हैं दक्ष, सर्वदा समर्थ। 
ये कुलांचे भी मारते हैं -
कला से विज्ञान और प्रकृति तक 
विज्ञानं से नीरा लोक संस्कृति तक।  
  
डॉ  जयप्रकाश तिवारी 

Saturday, September 13, 2014

आओ अतिथि

कौन तुम? क्यों खड़े हुए हो

इस तरह से मौन हो कर ?

कौन तुम? क्यों अड़े हुए हो 

इस तरह से त्रिभंग हो कर ?

आ भी जाओ खुला है द्वार 

यहाँ भेद नहीं कुछ मेरे द्वार 

मान है, सम्मान है, अपमान है

धिक्कार है, फटकार है, सम्मान है

ये समाज से मिले हुए उपहार हैं

पर ये है सभी मेरे लिए ही

तेरे लिए केवल यहाँ सत्कार है.

अथिथि हो शुभ सत्कार तेरा

कुछ भी कहो आभार तेरा

यूँ अभी टक क्यों खड़े हो ?

जिद पे अपनी क्यों अड़े हो?

कौन हो तुम - छाया ? प्रतिछाया ?

आत्मा - परमात्मा - प्रेतात्मा ?

सत्य हो तुम ? या हो आभास?

या अंतर्मन की कोई आस ?

हो कोई चाहे भी तुम


गर आये हो तो आ जाओ

मेरी उलझन में हाथ बताओ

हो सके तो राह दिखाओ

मैं तो हूँ उलझन में कब से

सोच में डूबा हूँ तब से

जब से देखा है यहाँ - चीत्कार

व्यभिचार, भ्रष्टाचारों का व्यापार

कमजोर नहीं, न साहस कम है

नहीं कोई मरने का डर है

पर निरर्थक यूँ नहीं चाहता हूँ मरना

सोच रहा हूँ यही निरंतर

क्या मुझे अब प्रारंभ करना?

अब आये हो तो आ जाओ

कुछ उलझन तो सुलझा जाओ

पर तुम क्या मेरी मदद करोगे

तुम तो स्वयं उलझे लगते हो।


डॉ जयप्रकाश तिवारी

कौन हो तुम? सत्य या आभास

कौन हो तुम?  सत्य या आभास 
कौन हो तुम ? ताम या प्रकाश 
कहाँ हो ? सन्निकट या सुदूर 
सर्वशक्तिमान हो या हो मजबूर> 

क्यों है तुम्हारी सृष्टि में अराजकता? 
जबकि तेरी ही शिक्षा है नैतिकता 
दरिंदों में क्यों नहीं जगाते  नैतिकता ?
कैसे दयालु? छोड़ देते अबला को तड़पता 

हे सर्वशक्तिमान ! कृपालु ! दयानिधान !
यह तेरा कैसा है - 'संविधान - विधान' ? 
जगा दो प्रभु सौंदर्य - शिवत्व - नैतिकता 
फिर  देखो यही कितना सुगन्धित महकता 

डॉ जयप्रकाश तिवारी 

Saturday, September 6, 2014

संवेदनशून्यता


जब पौधा था तुम पत्ते नोचता रहे
जब बड़ा हुआ तो डाली तोड़ते रहे
कलियों को भी कहाँ छोड़ा तुमने...
फूलों पर तो एकाधिकार ही था
कोई देख भी लेता तो घूरते रहते
उसकी छाया में बैठकें करते रहे
प्रगतिशील योजनायें बनाते रहे
सुविधाओं का उपभोग करते रहे
उसी के बदन में कील ठोकते रहे
उसकी आंसुओं को लासा कहते रहे
उस 'लासा' का व्यापर करते रहे
वह बार बार रोता रहा हँसता रहा
तुम्हारी सारी हरकतों को सहता रहा
तेरी करतूतों ने उसे असमय बुढा कर दिया
तुमने उस बूढ़े को ठूंठ भी नहीं होने दिया


अरे उसके मौत की प्रतीक्षा तो कर लेते
शर्म नहीं आई तुम्हे आरी चलवा दिया
लेकिन तुझे शर्म आती भी कैसे
उसे तो जाने कब का घोलके पी चुके हो
तुम वही हो न ? सफ़ेद कोठी वाले ?
जिसने माँ-बाप को आश्रम भिजवा दिया है
अरे ओ संवेदनशून्य ! स्वार्थ के आराधक
तुम्हे किसी पेड़ से संवेदना कैसे होगी
जब अपने माँ - बाप से ही संवेदना नहीं
कहा जाता है कि खून असर दिखाता है
लेकिन तूने तो विज्ञान को भी फेल कर दिया
तेरे ऊपर न पेड़ के खून ने असर दिखाया
न बेचारे माँ - बाप के पवित्र खून ने ही ..

डॉ जयप्रकाश तिवारी

Saturday, August 30, 2014

गंगा को निर्मल बहने दो


लक्ष्मीपति का चरणोदक यह तो, ब्रह्म कमंडल वासिनी है 
शम्भू की जटा सुशोभित यह तो, भगीरथ की आराधिनि है 
भागीरथी अलकनंदा सहित जाह्नवी धार उज्जवल रहने दो 
नदी नहीं, सुरसरि है यह तो, इसको तुम निर्मल रहने दो । 

तट पर गाँव औ नगर  बसाकरसुन्दर-सुन्दर घाट बनाकर 
समृद्धिशील बनाने वाली, सभ्यता - संस्कृति सिखानेवाली 
कल्याणी विपुल जलराशि को, कल - कल निनाद करने दो
नदी नहीं, सुरसरि है यह तो, इसको तुम निर्मल रहने दो । 

यह तूने क्या कर दिया मानव? बाँध बनाकर रोक दिया !
नाले, सीवर, कूड़ा, कचरे से, इसको कितना शोक दिया 
कब तक सहेगी अत्याचार? तुम माँ के धैर्य को मत मापों 
नदी नहीं, सुरसरि है यह तो, इसको तुम निर्मल रहने दो ।

होकर अंध-श्रद्धा के वशीभूत, तुम मूर्ति विसर्जित करते हो 
पत्र - पुष्प विसर्जित करते, शव भस्म विसर्जित करते हो  
मल-मूत्र विसर्जित करके, यह कैसा कुकृत्य तुम करते हो?
नदी नहीं, सुरसरि है यह तो, इसको तुम निर्मल रहने दो । 

चाहते नहीं यदि सत्यानाश, चाहते जीवन में यदि उल्लास 
तो अपने हाथों, अपने विनाश का, सूत्रपात क्यों करते हो?
इस तारणहार, पावन धारा को, अविरल तुम बहते रहने दो 
नदी नहीं, सुरसरि है यह तो, इसको तुम निर्मल रहने दो । 

सुरसरि यदि इसे नहीं मानते, एक बड़ी नदी तो मानोगे 
लेकर नाम विज्ञान जगत का, कर ली तूने खूब विकास 
कहकर विकास, स्व विनाश का, कपटी सिद्धांत रचते हो
नदी नहीं, सुरसरि है यह तो, इसको तुम निर्मल रहने दो । 

    - डॉ जयप्रकाश तिवारी