Sunday, February 9, 2014

मैं, तुम और माँ (भाग २ )



 (गतांक से आगे .....)

एक बात और,
तुझे पता भी है, क्या होता है –
यह पाणिग्रहण? यह विवाह संस्कार?
कोई खेल नहीं, यह महत्वपूर्ण संस्कार
स्रोत से जुडने का सामाजिक उपक्रम,
दाम्पत्य से होता प्रारम्भ यह क्रम ।
जिस बिंदु से उपजे हैं हम सब
जिस सत्य से भटके हैं हम सब
उसी सत्य से जुडने को, उसी तत्व को पाने को  
उसी आनंद मे डूबने को, अंश प्रवाहित अंशी ओर,
संगीत प्रवाहित वंशी ओर, चिति होकर चैतन्य जहाँ,
पुनः सब एक हो जाते हैं, जो थे अब तक
अपूर्ण - अधूरे / संपूर्णता को पाते हैं,
यही है सिद्धांत, यही उपक्रम,
होता पूर्ण यहाँ, संस्कार का यह वैवाहिक क्रम। 

मैं इस संस्कार और परम्पराओं की
उर्वरता से आश्वस्त, मंत्रमुग्ध निहारता रहा
अमूर्त सपने को / ढूँढता रहा तेरे ही भीतर
गहराई मे डूबकर अपने को।
पर मुझे क्या पता था?
कि सपने कभी मूर्तमान नहीं होते  
स्वप्न, स्वप्न होते यथार्थ नहीं होते ।
सच है - मोती सीप मे ही होते  
परंतु हर सीप मे तो नहीं होते, 
जिसने चखी नहीं स्वाति की एक भी बूंद  
वह दृष्टि कैसे देख पाएगी संस्कारित सृष्टि?
संस्कारों का अभाव ही
तुझे नचा रहा / तुझे यहाँ से वहाँ भटका रहा।
क्या हुआ यदि - बंगला गाड़ी नहीं दे पाया तुझे
शिमला, शिलोंग नहीं घुमा पाया तुझे
तुम्हारे रहने विचरण के लिए आखिर
क्यों छोटा पड़ गया स्नेहिल विशाल हृदय?
माना कि पैसे मे होती है शक्ति
लेकिन उतनी नहीं, तूने समझी है जितनी,
मैं लाचारी का मारा, बेकारी का मारा
कटौती कर-कर के दी हर संभव सुविधा...

क्या याद है तुम्हें?
कितने हर्षोल्लास से लाया था उस दिन
मंदिर से प्रसाद... फूलों की वह माला
अपनी पहली-पहली छोटी सी कमाई से,
डिब्बा दिया माँ को, तुम्हें दी थी माला
माँ ने उसे था सिर से लगाया
तूने था उसे, उस खूंटी पर डाला,
शायद अपेक्षा थी तुम्हें आभूषण की
या चमकते मोतियों की माला की।
लेकिन तुम्हें शायद पता नहीं है  
मैं भी तैयार करता रहा था देने की
उपहार मे तुझे एक विशिष्ट माला
हाँ! अमूर्त सी मोतियों की माला
जिसका सुमेरु है -
मर्यादा पुरुषोत्तम-सा एक पत्नीव्रत
जिसे गढ़ पाया हूँ अथक श्रम से
संस्कार, परंपरा और अध्यात्म से
गूँथा है उसे अरमानों के धागों से,
डरता हूँ.. कहीं तोड़ न डालो तुम
उसे अपने ही इन नासमझ हाथों से।

             
सोचता हूँ- आज इंसान
और प्याज मे जो गहरा नाता है वह
भोले-भाले इंसान को देर मे समझ आता है,
खुशहाल-घरौंदे, अटूट-बंधन जब जाते दरक
बाजी जब जाती है हाथ से सरक  
तब जाकर होश ठिकाने आता है।
पड़ताल करके भी क्या करोगे अब?
था जिसपर बहुत भरोसा  
उसी का नाम बार-बार आता है ।  
मत निहारो, एकटक ध्यान से
मत दुलारो इतने अरमान से
किसी को धरती से आसमान तक
न मानो उसे इंसान से भगवान तक,
क्योकि जब उतरती जाएगी
लबादे की एक-एक परत,  
हर परत देगी एक अजीब सी टीस
नेत्रों मे भर आएंगे ढेर सारे अश्रु  
पहचान नहीं पाओगे, है मित्र या शत्रु  
पत्नी है, प्रिया है, पुत्री है या पुत्र ।
तथापि संस्कारों मे पला बढ़ा
मैं परम्परावादी कैसे नकार दूँ दायित्व?
मुझे तो निभाना ही है उत्तरदायित्व,
और तुम प्रगतिवादी जहाँ स्नेह-प्रेम
भावनात्मक नहीं वैभवात्मक होता
ऐश्वर्य मे अपनी जगह ढूँढता
इसको ही प्रगति-पुरुषार्थ वह कहता ।
परंपरा मे अंकुरित होता प्रेम विवाहोपरांत
अतएव चिरायु होता... ,
दीर्घायु होता जन्म-जन्मांतर तक। 
अंतर देखो न! स्वयं ही
तुम जा चुकी, मैं बुलाने की सोच रहा
तुली हो तुम नकारने पर,
मैं फिर भी स्वीकारने की सोच रहा ॥

              
याद आती है – माँ,
कृशकाय सी, निस्तेज लेकिन बोलती आँखोंवाली माँ
माँ को हँसते नहीं देखा / वह कभी रोई भी नहीं
कहाँ से पाया था- यह धैर्य, संतुलन, सामंजस्य?  
सोचता हूँ - माँ क्यों थी इतनी सहनशील?
न बहू से लड़ी, न सौत से / न परिवार से लड़ी, न मौत से,
कभी लड़ी भी तो अपनी जिंदगी से / और यदि तोड़ा भी
तो अपने ही जीवनभर का ढोया संस्कार।
देखो न! संस्कारों की दुहाई देने वाली माँ
एक ही झटके मे बदल गयी थी / तेरी मेरी खुशी के लिए  
तो क्या माँ कायर थी? पुरातनपंथी थी?
कायर होती तो इतना बड़ा निर्णय कैसे लेती?
थी वह जीवटवाली? प्रगतिशील? या क्षमाशील थी?
माखन सी मुलायम थी? या लोहे की मजबूत कोई कील थी?
अरे! मेरी माँ कितनी बलशाली थी, कितनी स्वाभिमानी भी,
साथ ही साथ मर्यादा की कितनी बड़ी रक्षक – संरक्षक भी।
आखिर वह लड़ती भी तो किससे? नारी होकर एक नारी से?
पत्नी होकर कथित पति से? दुनियावाले तो देते ही हैं गाली  
क्या वह भी दे गाली? किसी नारी को? किसी पुरुष को?
बात यदि अधिकार की है तो नहीं चाहिए उसे छद्म अधिकार,
यह दृढ़ आत्मबल है उसका, यह साहसिक निर्णय है उसका ।   
क्या करेगी वह ऐसे आधे-अधूरे पति को पाकर भी  
जिसके पास विवेक नहीं, संवेदना, साहस और शक्ति नहीं ॥          
            
       
सोचता हूँ-
क्या मेरे पास विवेक नहीं, संवेदना, साहस और शक्ति नहीं?
गुंज रही है माँ की शिक्षा, माँ का संस्कार, माँ की ही सीख
पुरुष और स्त्री, दोनों ही तो हैं, आधे-आधे, एक अर्द्ध वृत्त
अपनी–अपनी अर्द्ध परिधि / अर्द्ध सोच, अर्द्ध विचारों के साथ
दोनों निहारते भी हैं, ढूंढते भी हैं / एक दूसरे को ललक के साथ
बसाते हैं, घर-परिवार भी उत्साह से / फिर आता कहाँ से यह भाव
विजित होने या विजित करने का? दमित होने या दमित करने का?
कहती औरत, उसे नचा रहा यह पुरुष / उँगलियों पर सदियों से
पुरुष कहता, यह स्त्री नचाती आ रही / उसको भृकुटी निक्षेप से
छोड़ो भी, बहुत हो चुका नाचना-नचाना / कब होगा बंद यह ड्रामा? 
यह प्रश्न आधुनिक नहीं, परंपरागत है / नया नहीं, है बहुत पुराना
परंतु अनुत्तरित ही रहा है अब तक / और रहेगा न जाने कब तक?
कहा जाता है- परंपरागत मे स्त्री / सुरक्षित अधिक थी, स्वतंत्र कम
आधुनिकता के चोले मे, वही स्त्री / स्वतंत्र अधिक है, सुरक्षित कम
तय करना है अब स्त्री को / उसे चाहिए क्या, सुरक्षा या स्वतन्त्रता?
अथवा सुरक्षा और स्वतन्त्रता दोनों / सहभागी बनकर पति-पुरुष का?

             
और... अब तुम!
मेरी प्रिया भी, अर्द्धांगिनी भी, मान-मर्यादा भी, सबकुछ एक साथ   
तेरी चाहत है - सितारों को पाना / अपने पंखो से गगन मे उड़ना
प्रिये! कौन समझाये तुम्हें? जिस वैभव, ऐश्वर्य के पीछे तू भाग रही
वही तो तुझे बंधन मे डाल रहा / छेद रहा अंगों को, बाहर-भीतर से
मन को भी करके भ्रमित अब यह / तेरा नारीत्व सिहासन छीन रहा
जिसपर था तुझे अभिमान बहुत / वह तेरा मातृत्व सिहासन छीन रहा  
तेरी चाहत है - तारों को पाना / अपनी पंखो से अन्तरिक्ष को लांघना
माना पंख उड़ने के लिए होता / जोश कुछ कर गुजरने के लिए होता
उड़ो! मगर श्रेष्ठता की खोज मे उड़ो / अंबर के कोने - कोने तक उड़ो  
यह स्वतन्त्रता तुम्हारी, अधिकार तुम्हारा / किन्तु जोश मे होश भी रहे
ऐसा न हो संपाती बन जा / औधे मुँह गिरके, दो दाने को तरस जा ।
यह नकारात्मकता नहीं, अवरोध नहीं, टोक नहीं, औचित्य का प्रश्न है
सोचने के लिए विवेक भी होता / और इसे देता वही, जो पंख है देता,
डरती क्यों हो इस सरल प्रश्न से? / हो लो संतुष्ट इस सरल प्रश्न से
पाओगी तुम अकेले नहीं, साथ बहुत से / बदलने को तैयार बहुत से
गगन चूमना जोश है, बुराई नहीं / तारों की चाह उमंग है बुराई नहीं
बुराई वांछित तैयारी के अभाव मे है / आवेश मे संपाती बनने मे है
सफलता हनुमत संस्कार पाने मे है / तू आ जा, शुभकामनायें ले जा
प्रशिक्षण से झोली भर जा / परिवार-राष्ट्र का नाम उज्ज्वल कर जा
मुँह न छिपा दुनिया से / आधिकारिक रूप से तलाक पत्र ले जा ।   
तुम यह न समझना उदास हूँ / यह न समझो हताश हूँ, निराश हूँ
मैं भी खुश हूँ क्योकि तू खुश है / खुशी मे मन के भीतर फूटते है
गीत और संगीत, गजल और गान / मैं भी तो देखो गुनगुना रहा हूँ
पूरे लय मे एक फिल्मी गीत –  “कोई जब तुम्हारा हृदय तोड़ दे
तड़पता हुआ जब तुम्हें छोड़ दे / तब तुम मेरे पास आना प्रिये ...॥

                        - डॉ॰ जयप्रकाश तिवारी 

Sunday, January 19, 2014

मैं, तुम और माँ




सत्य और आभास,
यथार्थ और सपने
दिन और रात,
पराये और अपने
मैं, तुम और माँ,
त्रिभुज के तीन कोण 
जो जुड़े थे -
प्रेम, सद्भाव, विश्वास से.






त्रिभुज के
शीर्षाभिमुख कोण पर बैठा
देखो न! उलझा हुआ हूँ बहुत से
खट्टे मीठे, चटपटे अटपटे से
लगने वाले बहुत से सवालों से.


तुम्ही बताओ !
यह भी कोई बात हुई
स्वयं से ही लगा हूँ पूछने
कब आओगी तुम?
और उत्तर देता हूँ मैं ही,
तुम गयी ही कब हो?
आज भी तो खड़ी हो यहाँ
याद बन के, संवाद बन के.
क्या मै नहीं जनता
सत्य कि तुम यहाँ नहीं हो
लेकिन दिल मनाता क्यों नहीं?
क्या मेरी सहायता कर सकती हो?
उलझन की इस कठिन घडी में?



तुम्हे याद हो या न हो
मुझे याद है, उसदिन परीक्षा थी
अंतिम वर्ष की प्रयोगात्मक परीक्षा
और मैं भूल गया था
लाना अपना डिसेक्शन बॉक्स
भूल तो गया था माँ के हाथ का
कभी न भूलनेवाला बॉक्स भी.
लेकिन तूने ही दूर किया था
वह समस्या मेरी, उलझन मेरी
अपना डिशक्शन बॉक्स देकर,
डिसेक्शन बोस तो लौटा दिया था
किन्तु मुझे भ गया था तेरा वह लंच
शायद खिला न पाया तुझे वैसा लंच.



माँ कहती थी -
बाहर का खाना मत खाना
किसी का दिया कुछ मत खाना
माँ मुझे रखना चाहती थी
सबसे बचाकरम छिपाकर 
अपने स्नेहिल आँचल के प्रकोष्ठ में,
पहलीबार तूने तब माँ से छीना था.
मैं इस अनजाने कैद को नकारता रहा
बार - बार फटकारता रहा, रास्ते भर,
घर पहुँचा, माँ दौड़ी आयी, डाँट पिलाई
गरम -गरम हलवा बनाकर मुझे खिलाई
लेकिन माँ तो ठहरी माँ, जाने कैसे ताड़ गई?
पूछ बैठी- क्या खाना तूने कहीं और खाई?
हाँ -हाँ और ना -ना के बीच मैंने
सही - सही तेरी सारी बात बताई,
माँ ने झट ले लिया एक निर्णय -
जिसने मुझसे भी अच्छा लांच बनाया
मैं करुँगी अब उसी से तेरी सगाई



और आज..... 
इतने वर्षों  बाद सोचता हूँ
ठगा कौन गया - माँ, मैं या तुम?
माँ तो नहीं है अब इस दुनिया में
लेकिन तुम हो, मुझे नकार कर
ना जाने किस शहर, किस गांव में?
यथार्थ यही है कि तुम यहाँ नहीं हो
सच क्या है - तुम हो या नहीं हो?
नहीं हो तो बात किससे कर रहा ?
हो तो कुछ खिलाती क्यों नहीं?
सदा की भांति खिलखिलाती क्यों नहीं?
क्या आज दूर नहीं करोगी मुझे,
मेरी इस जटिल समस्या से?
जीवन की इस कठिन परीक्षा से?


तब… माँ कहती थी -
किसी का दिया मत खाना
बहार का खाना मत खाना
कोई छीन लेगा मुझे उससे
माँ का डर बेवजह नहीं था
किसी ने छिना था माँ से
मेरे पिता को, कौन थी वो?
माँ ने कभी बताया नहीं,
आज तूने मुझे कहीं का न छोड़ा
माँ ने बड़े विश्वास से रिश्ता था जोड़ा
और तूने उसी विश्वास को तोड़ा,
तेरे व्यक्तित्व का कैसा विरोधाभास?
इसमें क्या है सत्य? क्या आभास?


चाहता हूँ एकबार तू आ जा
मेरी उलझन को सुलझा जा
दुनिया कह रही तुझे बेवफा
आ ! उन्हें कुछ तो बता जा.
वाद रहा, तुझे विदा कर दूँगा
शौक से अपने इन्हीं हाथों, बस
एकबार मुझे मेरा दोष बता जा।
क्या मेरा दोष यह था
कि मैं तुम्हारा सहपाठी था
माँ से तेरी प्रशंसा की थी ?
क्या माँ का दोष यह था
कि तेरे व्यक्तित्व को
उसने मेरे आईने से देखा?
न जाति देखा, न धर्म देखा
न कुल देखा, न स्वभाव देखा,
देखा तो केवल स्नेह देखा
अंतर की कोमल कोपल देखा
संवेदनाएं देखि, प्यार देखा
तेरा वह नेह, समर्पण देखा।


नारी ! तेरे रूप हैं कितने?
ऊपर- ऊपर कितना उज्ज्वल
अंतर में तिमिर घनेरे इतने?
एक औरत ने माँ का घर लूटा
दूसरी ने मुझ पुरुष को लूटा,
यह कैसा चरित्र है जिसने
नर - नारी दोनों को लूटा?
मिट गए माँ - बेटे के सपने
लेकिन फिर भी चाहता हूँ तू आ
टूटने नहीं दूंगा तेरे सपने।
तू जा, वहीँ जा., जहाँ तेरे अपने
किन्तु, वहाँ अब चोरी से न जा
दुनिया कहेगी पता नहीं क्या- क्या?
धोखेबाज, कुलटा और बेवफा भी,
शायद मुझे भी क्रोध आता
वह भी इतना, पता नहीं कितना
यदि तुम मेरी पसंद होती
तू माँ कि पसंद है, इसलिए
तेरी यह ऐडा भी पसंद है।


माँ ने
मुझसे आश्वासन माँगा था
तुझे हमेशा खुश रखने का
बोलो! नाराज हो भी कैसे सकता?
इसलिए शांत भाव से कहता हूँ -
तू आ जा ! मुझसे तलाक-पत्र ले जा
अपना कलंक मुझे थोप जा।
धारण करूँगा यह कालिमा भी
सहर्ष अपने दिव्य भाल पर,
तेरे लिए, हॉ तेरे ही लिए
आखिर मुझे रखना है मान नारी का
हो चाहे वह- प्रेयसी, पत्नी या माँ । 
 

- डॉ जयप्रकाश तिवारी

Sunday, January 12, 2014

चट्टान और सरिता

अभी अकड़ा हुआ सा
कठोरपर्वत की
एक चट्टान हो तुम!
..और … मै...?
पहचानते तो हो न मुझे?
वही, तुम्हारे ही आगोश में
बहती एक पथरीली नदी,
क्षुद्र सरिता; चाहती आश्रय,
जिसे नकारते हो तुम.
मेरी बूँद को अर्थहीन ही
अब तक मानते हो तुम.
 
हाँ, जानता हूँ, तुम अतिचंचला,
कलकल-शीतल, बहती एक सरिता,
हिमशिखर त्याग, गृह छोड़नेवाली.
मैं अटल-अविचल टिक रहनेवाला,
निभेगा कैसे? कहो, हे मतवाली!
 
हाँ, ठीक कहा तूने लघु गिरिवर !
शैल की एक चट्टान ही, हो तुम !
चेतन होकर भी, बने हो जड़मति
मिथ्या गुमान, अभिमान हो तुम !
याद रखो, गाँठ बाँध लो तुम भी !
समय के साथ-साथ जब तुम भी-
घिसोगे, पिसोगे, रगड़े जाओगे और
एक दिन बालुका-कण बन जाओगे,
रेत बनकर इधर-उधर बिखर जाओगे.
पावोंतले, जूतों के नीचे रौंदे जाओगे,
तब तरसोगे, मेरी एकबूँद जल के लिए.
 
जब बहेगी हवा और तुम्हे नचाएगी,
बारम्बार इस छोर से उस छोर दौडायेगी,
जो अहंकार था तुम्हे, अविचल रहने की,
न झुकने की, न हिलने की, न डोलने की,
और तूफानों की दिशा को भी बदल देने की.
जब वह चूर होगा, टूटेगा, तब तरसोगे तुम,
हाँ, तुम ! मेरी ही एक बूँद जल के लिए...
 
जिस स्थिरता का अभिमान था,
स्वभाव था, आदत थी, उसी को
पुनः  पुनः पाने को, तडपोगे तुम!
कोई दिखेगा नहीं, तब रोओगे तुम!
हाँ तुम! मेरी एक बूँद जल के लिए.
 
तुझे मिलेगी स्थिरता, चैन औ आराम
मेरी ही तलहटी में बैठकर और सोकर.
क्योकि तब हवा तुम्हे उड़ा नहीं पायेगी,
मनमाने ढंग से तब नचा नहीं पायेगी
तब बदलेगी धारणा, इस बूँद के लिए.
हाँ, हाँ, उसी मेरी ही एक बूँद के लिए.

मेरी ही क्षमता है-
तुमको फिर से कठोर और
बहुपयोगी बना देने की.
तुम्हारा पुराना स्वरुप और  
खोया गौरव लौटा देने की.
जानते भी हो तुम?
रेत और जल के साथ मिलेंगे
जब स्नेह-सौहार्द्र-विश्वास की सीमेंट,
व्यावहारिकता की गिट्टी एक साथ,
तब तुम्ही, हाँ तुम !
बन जाओगे, अब गुणी, आश्रय प्रदाता.
तब समझोगे, महत्व मेरी इस बूंद का.
 
फिर कहती हूँ, सुनो ! ध्यान से
कोई हार नहीं है, शिखर छोड़ना.
सीखो इससे अभिमान तोडना.
तू क्या जाने, ओ अहंकारी !
क्या जाने तू, प्रेम? तपस्या?
सीखा कब तूने अहम् छोड़ना?
नारी-जीवन तो परमार्थ सरीखा,
सूखे मन, सूखे क्षेत्र को सींचा,
नवपल्लव, सुरभित सुगंघ को
धरती से व्योम तक किसने सींचा?
तू हठी, मंदमति, एक जढ़ी पुरुष!
क्या जानो तुम नारी उल्लास?
रीता करके, निज भरे ह्रदय को,
जिसने पाया है- एक प्यास.
 
यह प्यास ही उसकी श क्ति है 
यह प्यास ही उसकी भक्ति है
इस भक्ति में है जो दृढ विश्वास 
उस के मूल में यही प्यास              
क्या पता यह समझ,
तुम्हे अब भी आएगी?
या अकड में मेरी बात
यूँ ही फिर बह जाएगी..?

    

डॉ. जयप्रकाश तिवारी, भरसर, बलिया (उ. प्र)    

Wednesday, October 30, 2013

मेरी पहचान


मत कहे कोई मुझे चिन्तक
समीक्षक लेखक या कवि,
मत रचे कोई अपने मन में
मनमोहक सी कोई छवि.
मैं तो केवल पथिक तत्त्व का,
वही साध्य, वही लक्ष्य है मेरा.
धूल-धूसरित अब गात है मेरा....

साधन है बनाया प्रेम पंथ को
चलता हूँ, फिर फिर गिरता हूँ
यहाँ बारम्बार फिसलता हूँ.
कितना निर्मल, शांत, सरल पथ,
कैसे बढे कलुषित मन का रथ?

उठ पुनः - पुनः डग भरता हूँ,
चलने का प्रयास ही करता हूँ.
लम्बे - लम्बे डग हैं उनके
पथ बना गए जो चलकर इसपर.
उनका साथ मै दे नहीं पाता.
छोटा सा मार्ग एक स्वयं बनाता.
यही बस एक पहचान है मेरा.
कैसे कहू 'तत्त्व प्रेमी' नाम मेरा?
जब भी लगी जीवन में बाजी
हर बाजी मैं अब तक हारा.
कुछ बजी मै सचमुच हारा,
बहुत कुछ जानबूझ कर हारा.

इस हार को 'हार' बना रखा है,
संवेदना यही अब पाल रखा है.
जग हारा-हरा मुझको खुश होता,
मै हार मान कर खुश हो लेता.
यह अपनी-अपनी ख़ुशी की बात,
क्यों करूँ किसी मन पर आघात?
वह मन भी आखिर अपना ही है,
वह तन भी आखिर अपना ही है.
अब मेरे - तेरे की बात कहाँ ?
जो जैसा भी है, अपना ही तो है.

- डॉ. जयप्रकाश तिवारी

Sunday, October 27, 2013

बात सभ्यता और संस्कृति की


सभ्यता और संस्कृति ही है
देश जाति की विशिष्ट पहचान.

सभ्यता है सतत परिवर्तन शील,

विज्ञान के संग - संग चलती है.

बदलते रहते हैं मानक इसके

जीवन के मूल्य बदलते इसके .

क्षेत्र इसका खान पान रहन सहन से

वेश भूषा - राजनीति - व्यवसाय तक.

वास्तुकला स्थापत्यकला माडर्नआर्ट

नाट्यमंच, चलचित्र से मीडिया तक.

लौकिक विकास भौतिक विकास ही

है मुख्य मापदंड, इस सभ्यता का.

वैभव - ऐश्वर्य सर्वोपरि इसमें

भावनाएं - संवेदनाएं घुटती हैं.

करने को अर्जित अधिक शक्ति

आपस में होड़ ये रखती है.

इस आपसी प्रत्द्वान्द्विता में

अंतर का कलुष बाहर आ जाता.

अपना गाल फुलाने खातिर

कमजोर राष्ट्र गप्प भी कर जाता.

उन्माद वर्गभेद- जाति भेद का

रह - रह कर यहाँ उभरता है.

कलह उपद्रव और संघर्ष का

वातावरण ही प्रायः रहता है.

है बैंक भरा और भरी तिजोरी

फिर भी सुख की नीद नहीं आती.

जीवन बीतता बड़ी बेचैनी में

क्षणभर भी शान्ति नहीं आती.

संस्कृति की इससे अलग बात

वह अकिंचन बनना है सिखलाती,

धन से इसको कोई बैर नहीं

त्यागमय भोग का पाठ पढाती.

होती आद्धृत यह तत्त्व ज्ञान पर

स्नेह - सौन्दर्य का रस बरसाती.

अंधकार से दिव्य प्रकाश का,

यह मृत्यु से अमरत्व तक का,

सुन्दर सुलभ मार्ग बतलाती.
संस्कृति नहीं वस्तु प्रदर्शन की

अपेक्षा है इसमें आत्म दर्शन की.

मानवता इसका अनिवार्य तत्त्व

सहयोग सद्भाव संतोष मूल तत्त्व.

इन्हीं मानकों पर आद्धृत संस्कृति

जो दृढ, उनमे आती नहीं विकृति.

छोड़ दिया जिसने अपनी संस्कृति

जा कर देखो, वहाँ कैसी विकृति?
धर्म - अर्थ और काम - मोक्ष

हमारी संस्कृति का आधार है.

है अर्थ नहीं सर्वोपरि इसमें.

मोक्ष प्राप्ति यहाँ सर्वोपरि है.

विश्वबंधुत्व इस संस्कृति की देन

विश्व की अद्भुत एक धरोहर है.

रखनी है संभाल कर,यह धरोहर,

जगत कल्याणी है, यह धरोहर.
सभ्यता है क्षैतिज विकास यदि

ऊर्ध्व विकास यह संस्कृति है.

हमें करनी प्रगति दोनों क्षेत्रों में

युक्ति युक्त सहचरी एक बन कर.

हम हैं अब भी आशावादी, सहभागी

इस सम्पूर्ण समन्वित विकास की.

परिस्थियां हों चाहे जितनी विकट

यहाँ फूटेगी किरण धवल प्रकाश की.


- डॉ. जयप्रकाश तिवारी