Sunday, January 12, 2014

चट्टान और सरिता

अभी अकड़ा हुआ सा
कठोरपर्वत की
एक चट्टान हो तुम!
..और … मै...?
पहचानते तो हो न मुझे?
वही, तुम्हारे ही आगोश में
बहती एक पथरीली नदी,
क्षुद्र सरिता; चाहती आश्रय,
जिसे नकारते हो तुम.
मेरी बूँद को अर्थहीन ही
अब तक मानते हो तुम.
 
हाँ, जानता हूँ, तुम अतिचंचला,
कलकल-शीतल, बहती एक सरिता,
हिमशिखर त्याग, गृह छोड़नेवाली.
मैं अटल-अविचल टिक रहनेवाला,
निभेगा कैसे? कहो, हे मतवाली!
 
हाँ, ठीक कहा तूने लघु गिरिवर !
शैल की एक चट्टान ही, हो तुम !
चेतन होकर भी, बने हो जड़मति
मिथ्या गुमान, अभिमान हो तुम !
याद रखो, गाँठ बाँध लो तुम भी !
समय के साथ-साथ जब तुम भी-
घिसोगे, पिसोगे, रगड़े जाओगे और
एक दिन बालुका-कण बन जाओगे,
रेत बनकर इधर-उधर बिखर जाओगे.
पावोंतले, जूतों के नीचे रौंदे जाओगे,
तब तरसोगे, मेरी एकबूँद जल के लिए.
 
जब बहेगी हवा और तुम्हे नचाएगी,
बारम्बार इस छोर से उस छोर दौडायेगी,
जो अहंकार था तुम्हे, अविचल रहने की,
न झुकने की, न हिलने की, न डोलने की,
और तूफानों की दिशा को भी बदल देने की.
जब वह चूर होगा, टूटेगा, तब तरसोगे तुम,
हाँ, तुम ! मेरी ही एक बूँद जल के लिए...
 
जिस स्थिरता का अभिमान था,
स्वभाव था, आदत थी, उसी को
पुनः  पुनः पाने को, तडपोगे तुम!
कोई दिखेगा नहीं, तब रोओगे तुम!
हाँ तुम! मेरी एक बूँद जल के लिए.
 
तुझे मिलेगी स्थिरता, चैन औ आराम
मेरी ही तलहटी में बैठकर और सोकर.
क्योकि तब हवा तुम्हे उड़ा नहीं पायेगी,
मनमाने ढंग से तब नचा नहीं पायेगी
तब बदलेगी धारणा, इस बूँद के लिए.
हाँ, हाँ, उसी मेरी ही एक बूँद के लिए.

मेरी ही क्षमता है-
तुमको फिर से कठोर और
बहुपयोगी बना देने की.
तुम्हारा पुराना स्वरुप और  
खोया गौरव लौटा देने की.
जानते भी हो तुम?
रेत और जल के साथ मिलेंगे
जब स्नेह-सौहार्द्र-विश्वास की सीमेंट,
व्यावहारिकता की गिट्टी एक साथ,
तब तुम्ही, हाँ तुम !
बन जाओगे, अब गुणी, आश्रय प्रदाता.
तब समझोगे, महत्व मेरी इस बूंद का.
 
फिर कहती हूँ, सुनो ! ध्यान से
कोई हार नहीं है, शिखर छोड़ना.
सीखो इससे अभिमान तोडना.
तू क्या जाने, ओ अहंकारी !
क्या जाने तू, प्रेम? तपस्या?
सीखा कब तूने अहम् छोड़ना?
नारी-जीवन तो परमार्थ सरीखा,
सूखे मन, सूखे क्षेत्र को सींचा,
नवपल्लव, सुरभित सुगंघ को
धरती से व्योम तक किसने सींचा?
तू हठी, मंदमति, एक जढ़ी पुरुष!
क्या जानो तुम नारी उल्लास?
रीता करके, निज भरे ह्रदय को,
जिसने पाया है- एक प्यास.
 
यह प्यास ही उसकी श क्ति है 
यह प्यास ही उसकी भक्ति है
इस भक्ति में है जो दृढ विश्वास 
उस के मूल में यही प्यास              
क्या पता यह समझ,
तुम्हे अब भी आएगी?
या अकड में मेरी बात
यूँ ही फिर बह जाएगी..?

    

डॉ. जयप्रकाश तिवारी, भरसर, बलिया (उ. प्र)    

Wednesday, October 30, 2013

मेरी पहचान


मत कहे कोई मुझे चिन्तक
समीक्षक लेखक या कवि,
मत रचे कोई अपने मन में
मनमोहक सी कोई छवि.
मैं तो केवल पथिक तत्त्व का,
वही साध्य, वही लक्ष्य है मेरा.
धूल-धूसरित अब गात है मेरा....

साधन है बनाया प्रेम पंथ को
चलता हूँ, फिर फिर गिरता हूँ
यहाँ बारम्बार फिसलता हूँ.
कितना निर्मल, शांत, सरल पथ,
कैसे बढे कलुषित मन का रथ?

उठ पुनः - पुनः डग भरता हूँ,
चलने का प्रयास ही करता हूँ.
लम्बे - लम्बे डग हैं उनके
पथ बना गए जो चलकर इसपर.
उनका साथ मै दे नहीं पाता.
छोटा सा मार्ग एक स्वयं बनाता.
यही बस एक पहचान है मेरा.
कैसे कहू 'तत्त्व प्रेमी' नाम मेरा?
जब भी लगी जीवन में बाजी
हर बाजी मैं अब तक हारा.
कुछ बजी मै सचमुच हारा,
बहुत कुछ जानबूझ कर हारा.

इस हार को 'हार' बना रखा है,
संवेदना यही अब पाल रखा है.
जग हारा-हरा मुझको खुश होता,
मै हार मान कर खुश हो लेता.
यह अपनी-अपनी ख़ुशी की बात,
क्यों करूँ किसी मन पर आघात?
वह मन भी आखिर अपना ही है,
वह तन भी आखिर अपना ही है.
अब मेरे - तेरे की बात कहाँ ?
जो जैसा भी है, अपना ही तो है.

- डॉ. जयप्रकाश तिवारी

Sunday, October 27, 2013

बात सभ्यता और संस्कृति की


सभ्यता और संस्कृति ही है
देश जाति की विशिष्ट पहचान.

सभ्यता है सतत परिवर्तन शील,

विज्ञान के संग - संग चलती है.

बदलते रहते हैं मानक इसके

जीवन के मूल्य बदलते इसके .

क्षेत्र इसका खान पान रहन सहन से

वेश भूषा - राजनीति - व्यवसाय तक.

वास्तुकला स्थापत्यकला माडर्नआर्ट

नाट्यमंच, चलचित्र से मीडिया तक.

लौकिक विकास भौतिक विकास ही

है मुख्य मापदंड, इस सभ्यता का.

वैभव - ऐश्वर्य सर्वोपरि इसमें

भावनाएं - संवेदनाएं घुटती हैं.

करने को अर्जित अधिक शक्ति

आपस में होड़ ये रखती है.

इस आपसी प्रत्द्वान्द्विता में

अंतर का कलुष बाहर आ जाता.

अपना गाल फुलाने खातिर

कमजोर राष्ट्र गप्प भी कर जाता.

उन्माद वर्गभेद- जाति भेद का

रह - रह कर यहाँ उभरता है.

कलह उपद्रव और संघर्ष का

वातावरण ही प्रायः रहता है.

है बैंक भरा और भरी तिजोरी

फिर भी सुख की नीद नहीं आती.

जीवन बीतता बड़ी बेचैनी में

क्षणभर भी शान्ति नहीं आती.

संस्कृति की इससे अलग बात

वह अकिंचन बनना है सिखलाती,

धन से इसको कोई बैर नहीं

त्यागमय भोग का पाठ पढाती.

होती आद्धृत यह तत्त्व ज्ञान पर

स्नेह - सौन्दर्य का रस बरसाती.

अंधकार से दिव्य प्रकाश का,

यह मृत्यु से अमरत्व तक का,

सुन्दर सुलभ मार्ग बतलाती.
संस्कृति नहीं वस्तु प्रदर्शन की

अपेक्षा है इसमें आत्म दर्शन की.

मानवता इसका अनिवार्य तत्त्व

सहयोग सद्भाव संतोष मूल तत्त्व.

इन्हीं मानकों पर आद्धृत संस्कृति

जो दृढ, उनमे आती नहीं विकृति.

छोड़ दिया जिसने अपनी संस्कृति

जा कर देखो, वहाँ कैसी विकृति?
धर्म - अर्थ और काम - मोक्ष

हमारी संस्कृति का आधार है.

है अर्थ नहीं सर्वोपरि इसमें.

मोक्ष प्राप्ति यहाँ सर्वोपरि है.

विश्वबंधुत्व इस संस्कृति की देन

विश्व की अद्भुत एक धरोहर है.

रखनी है संभाल कर,यह धरोहर,

जगत कल्याणी है, यह धरोहर.
सभ्यता है क्षैतिज विकास यदि

ऊर्ध्व विकास यह संस्कृति है.

हमें करनी प्रगति दोनों क्षेत्रों में

युक्ति युक्त सहचरी एक बन कर.

हम हैं अब भी आशावादी, सहभागी

इस सम्पूर्ण समन्वित विकास की.

परिस्थियां हों चाहे जितनी विकट

यहाँ फूटेगी किरण धवल प्रकाश की.


- डॉ. जयप्रकाश तिवारी

Tuesday, October 15, 2013

दसहरा और रावण

१ - दशहरा है
रावणत्व की हार
राम की जीत.

२ - कैसा अधर्म...
रावण घर - घर
पालता कौन?

३ - क्या मरेगा भी
दशानन रावण?
लगता नहीं.

४ - विजy व्यर्थ
रावण भ्रमणशील
क्रियाशील भी.

5 - दीखते राम
रावानी साम्राज्य में
लाचार से, क्यों?

६ - बोलो रावण
तू कब मरेगा?
अभी तो नहीं.

७ - आखिर क्यों?
क्योकि आश्रय मेरा
तेरे अन्दर.

८ - दोष न दो
झांको अंतर्मन में
दुषि तुन हो.

९ - तुम मरोगे
तब भी न मरूँगा
अनुवांशिक.

१० - मैं दशानन
व्यभिचारी नहीं
पूछ सीता से.

११ - टिक पायेगा
समक्ष क्षण भर
भोगी इन्द्र तू.

१२ - अंतर जानो
मैं रानी बनता था
भोग के पूर्व.

१३ - रावण तो था
मर्मज्ञ शास्त्रों का
पतित कैसे?

१४ - शास्त्र मर्मज्ञ
बन जाते रावण
चूकते जब.

१५ - शौर्य नहीं था
पर नारी हरण
प्रतिशोध था.

डॉ. जयप्रकाश तिवारी

Friday, October 11, 2013

नवरात्रि पर्व एक खोज है

काली और महाकाली
अर्थात डार्क इनर्जी
बौद्धिक विज्ञान जगत में
अभी भी अज्ञात
यह ‘गहनगूढ़ कालिमा,’
यह 'डार्क एनर्जी'.
यह 'डार्क-मैटर',
कालिमा की
चेतना-संचेतना....
हम खोज ही पाए हैं
अभी तक कितना?
मात्र छ: प्रतिशत,
इस गूढ़ रहस्य का.
चौरानबे प्रतिशत तो
अभी भी अनजान.

कौन करेगा आगे,
अब इसकी पहचान?
नवरात्रि पर्व खोज है-
इसी रहस्य की.
शैल-चट्टानों में ढूँढा
हमने अग्निशक्ति.
इसी शक्ति को शैलपुत्री
नाम दिया था,
अलग विशिष्ट
पहचान दिया था.
और जो सिद्धांत
गुम्फित है इसमें
है नाम उसी का है
“ब्रह्म चारिणी”.

स्वर-संगीत को
जाना हमने
इस 'चन्द्र घंटा' के
गहन सूत्र से,
शब्द –अर्थ –
निहितार्थ -संकेतार्थ.
इस शब्द औ अर्थ के
गहन मंथन से-
निकला जो कुछ,
वह गीत हुआ,
संगीत हुआ,
नवनीत हुआ...,
आगे चलकर
मनमीत हुआ.

जब मीत हुआ
तो भीत मिटा,
जब बदली दृष्टि,
चिंतन बदला.
इस शब्द अर्थ के
मंथन से ही,
चिंतन - संवेदना के
कम्पन से ही
जो थी क़ाली,
अब वह गोरी हुई.
हुई गौर वर्ण,
वह - 'गौरी' हुई.
वह 'दुर्गा' हुई..,
'नव दुर्गा' ..हुई.

डॉ. जयप्रकाश तिवारी

Wednesday, October 2, 2013

२ अक्तूबर: हाइकु पुष्पमाला



१ - मात्र तारीख

नहीं दो अक्टूबर

इतिहास है.

 

२ - दिव्य रत्न दो

प्रकटे इसी दिन

गाँधी व शास्त्री.

 

३ - बड़ा है कौन

वह मोहन दास

या यह गाँधी?

 

४ - क्या थे गाँधी

समाजसुधारक?

राजनीतिज्ञ?

 

५ – हाशिये पर

आज क्यों हैं गांधी जी?

चूका मोहरा.

 

६ - सत्य अहिंसा

ही तो था मूलमंत्र

गांधीवाद का.

 

७ – कहाँ है आज

विचार गांधी जी के?

सोचो तो जरा.

 

८ - भूल गए हैं

जो विचार उनके

अनुयायी वो.

 

९ – उपेक्षा ही है

बढती हुई हिंसा

गाँधीवाद की.

 

१० – आदर्श नहीं

दिखावा है अब तो

गाँधी दर्शन.

 

११ – क्या कहें इन्हें

कृतज्ञ या कृतघ्न?

“तुम्ही” बताओ!

 


-डॉ. जयप्रकाश तिवारी

Thursday, September 26, 2013

कुछ हाइकु बेटियों के नाम

१ - कौन समझे
    
     माँ-बाप का दरद
    
     बेटी के बिना
 
 
२ - रोशन करे
 
      दोनों ही कुल को जो
 
      बेटी है वह
 
 
३ - बेटियाँ शान
 
      सँवारे दोनों कुल
 
      संस्कार यह
 
 
४ - साकार करे
 
     स्वप्न परिवार का
 
     बेटी ही वह
 
 
५ - मर जायेगी
 
     संवेदनशीलता
  
     बिन बेटी के
 
 
६ -  कौन कहता
 
      लडकियां दुर्बल?
 
     जूझ के देख
 
 
७ - बगिया यह
 
     हरी-भरारी रहती
 
    बेटी से ही
 
 
८ -  घर महके
 
     बेटी और बहु से  
 
    अब दो कहाँ?
 
 
९ -  तोड दो हाथ
 
      दमनकारी है जो
     
       रक्षक तुम.
 
 
१० - मान लो अब  
 
      भेद न कोई अब
 
      बेटा - बेटी में.  
 
 
डॉ. जयप्रकाश तिवारी