Sunday, October 27, 2013

बात सभ्यता और संस्कृति की


सभ्यता और संस्कृति ही है
देश जाति की विशिष्ट पहचान.

सभ्यता है सतत परिवर्तन शील,

विज्ञान के संग - संग चलती है.

बदलते रहते हैं मानक इसके

जीवन के मूल्य बदलते इसके .

क्षेत्र इसका खान पान रहन सहन से

वेश भूषा - राजनीति - व्यवसाय तक.

वास्तुकला स्थापत्यकला माडर्नआर्ट

नाट्यमंच, चलचित्र से मीडिया तक.

लौकिक विकास भौतिक विकास ही

है मुख्य मापदंड, इस सभ्यता का.

वैभव - ऐश्वर्य सर्वोपरि इसमें

भावनाएं - संवेदनाएं घुटती हैं.

करने को अर्जित अधिक शक्ति

आपस में होड़ ये रखती है.

इस आपसी प्रत्द्वान्द्विता में

अंतर का कलुष बाहर आ जाता.

अपना गाल फुलाने खातिर

कमजोर राष्ट्र गप्प भी कर जाता.

उन्माद वर्गभेद- जाति भेद का

रह - रह कर यहाँ उभरता है.

कलह उपद्रव और संघर्ष का

वातावरण ही प्रायः रहता है.

है बैंक भरा और भरी तिजोरी

फिर भी सुख की नीद नहीं आती.

जीवन बीतता बड़ी बेचैनी में

क्षणभर भी शान्ति नहीं आती.

संस्कृति की इससे अलग बात

वह अकिंचन बनना है सिखलाती,

धन से इसको कोई बैर नहीं

त्यागमय भोग का पाठ पढाती.

होती आद्धृत यह तत्त्व ज्ञान पर

स्नेह - सौन्दर्य का रस बरसाती.

अंधकार से दिव्य प्रकाश का,

यह मृत्यु से अमरत्व तक का,

सुन्दर सुलभ मार्ग बतलाती.
संस्कृति नहीं वस्तु प्रदर्शन की

अपेक्षा है इसमें आत्म दर्शन की.

मानवता इसका अनिवार्य तत्त्व

सहयोग सद्भाव संतोष मूल तत्त्व.

इन्हीं मानकों पर आद्धृत संस्कृति

जो दृढ, उनमे आती नहीं विकृति.

छोड़ दिया जिसने अपनी संस्कृति

जा कर देखो, वहाँ कैसी विकृति?
धर्म - अर्थ और काम - मोक्ष

हमारी संस्कृति का आधार है.

है अर्थ नहीं सर्वोपरि इसमें.

मोक्ष प्राप्ति यहाँ सर्वोपरि है.

विश्वबंधुत्व इस संस्कृति की देन

विश्व की अद्भुत एक धरोहर है.

रखनी है संभाल कर,यह धरोहर,

जगत कल्याणी है, यह धरोहर.
सभ्यता है क्षैतिज विकास यदि

ऊर्ध्व विकास यह संस्कृति है.

हमें करनी प्रगति दोनों क्षेत्रों में

युक्ति युक्त सहचरी एक बन कर.

हम हैं अब भी आशावादी, सहभागी

इस सम्पूर्ण समन्वित विकास की.

परिस्थियां हों चाहे जितनी विकट

यहाँ फूटेगी किरण धवल प्रकाश की.


- डॉ. जयप्रकाश तिवारी

Tuesday, October 15, 2013

दसहरा और रावण

१ - दशहरा है
रावणत्व की हार
राम की जीत.

२ - कैसा अधर्म...
रावण घर - घर
पालता कौन?

३ - क्या मरेगा भी
दशानन रावण?
लगता नहीं.

४ - विजy व्यर्थ
रावण भ्रमणशील
क्रियाशील भी.

5 - दीखते राम
रावानी साम्राज्य में
लाचार से, क्यों?

६ - बोलो रावण
तू कब मरेगा?
अभी तो नहीं.

७ - आखिर क्यों?
क्योकि आश्रय मेरा
तेरे अन्दर.

८ - दोष न दो
झांको अंतर्मन में
दुषि तुन हो.

९ - तुम मरोगे
तब भी न मरूँगा
अनुवांशिक.

१० - मैं दशानन
व्यभिचारी नहीं
पूछ सीता से.

११ - टिक पायेगा
समक्ष क्षण भर
भोगी इन्द्र तू.

१२ - अंतर जानो
मैं रानी बनता था
भोग के पूर्व.

१३ - रावण तो था
मर्मज्ञ शास्त्रों का
पतित कैसे?

१४ - शास्त्र मर्मज्ञ
बन जाते रावण
चूकते जब.

१५ - शौर्य नहीं था
पर नारी हरण
प्रतिशोध था.

डॉ. जयप्रकाश तिवारी

Friday, October 11, 2013

नवरात्रि पर्व एक खोज है

काली और महाकाली
अर्थात डार्क इनर्जी
बौद्धिक विज्ञान जगत में
अभी भी अज्ञात
यह ‘गहनगूढ़ कालिमा,’
यह 'डार्क एनर्जी'.
यह 'डार्क-मैटर',
कालिमा की
चेतना-संचेतना....
हम खोज ही पाए हैं
अभी तक कितना?
मात्र छ: प्रतिशत,
इस गूढ़ रहस्य का.
चौरानबे प्रतिशत तो
अभी भी अनजान.

कौन करेगा आगे,
अब इसकी पहचान?
नवरात्रि पर्व खोज है-
इसी रहस्य की.
शैल-चट्टानों में ढूँढा
हमने अग्निशक्ति.
इसी शक्ति को शैलपुत्री
नाम दिया था,
अलग विशिष्ट
पहचान दिया था.
और जो सिद्धांत
गुम्फित है इसमें
है नाम उसी का है
“ब्रह्म चारिणी”.

स्वर-संगीत को
जाना हमने
इस 'चन्द्र घंटा' के
गहन सूत्र से,
शब्द –अर्थ –
निहितार्थ -संकेतार्थ.
इस शब्द औ अर्थ के
गहन मंथन से-
निकला जो कुछ,
वह गीत हुआ,
संगीत हुआ,
नवनीत हुआ...,
आगे चलकर
मनमीत हुआ.

जब मीत हुआ
तो भीत मिटा,
जब बदली दृष्टि,
चिंतन बदला.
इस शब्द अर्थ के
मंथन से ही,
चिंतन - संवेदना के
कम्पन से ही
जो थी क़ाली,
अब वह गोरी हुई.
हुई गौर वर्ण,
वह - 'गौरी' हुई.
वह 'दुर्गा' हुई..,
'नव दुर्गा' ..हुई.

डॉ. जयप्रकाश तिवारी

Wednesday, October 2, 2013

२ अक्तूबर: हाइकु पुष्पमाला



१ - मात्र तारीख

नहीं दो अक्टूबर

इतिहास है.

 

२ - दिव्य रत्न दो

प्रकटे इसी दिन

गाँधी व शास्त्री.

 

३ - बड़ा है कौन

वह मोहन दास

या यह गाँधी?

 

४ - क्या थे गाँधी

समाजसुधारक?

राजनीतिज्ञ?

 

५ – हाशिये पर

आज क्यों हैं गांधी जी?

चूका मोहरा.

 

६ - सत्य अहिंसा

ही तो था मूलमंत्र

गांधीवाद का.

 

७ – कहाँ है आज

विचार गांधी जी के?

सोचो तो जरा.

 

८ - भूल गए हैं

जो विचार उनके

अनुयायी वो.

 

९ – उपेक्षा ही है

बढती हुई हिंसा

गाँधीवाद की.

 

१० – आदर्श नहीं

दिखावा है अब तो

गाँधी दर्शन.

 

११ – क्या कहें इन्हें

कृतज्ञ या कृतघ्न?

“तुम्ही” बताओ!

 


-डॉ. जयप्रकाश तिवारी

Thursday, September 26, 2013

कुछ हाइकु बेटियों के नाम

१ - कौन समझे
    
     माँ-बाप का दरद
    
     बेटी के बिना
 
 
२ - रोशन करे
 
      दोनों ही कुल को जो
 
      बेटी है वह
 
 
३ - बेटियाँ शान
 
      सँवारे दोनों कुल
 
      संस्कार यह
 
 
४ - साकार करे
 
     स्वप्न परिवार का
 
     बेटी ही वह
 
 
५ - मर जायेगी
 
     संवेदनशीलता
  
     बिन बेटी के
 
 
६ -  कौन कहता
 
      लडकियां दुर्बल?
 
     जूझ के देख
 
 
७ - बगिया यह
 
     हरी-भरारी रहती
 
    बेटी से ही
 
 
८ -  घर महके
 
     बेटी और बहु से  
 
    अब दो कहाँ?
 
 
९ -  तोड दो हाथ
 
      दमनकारी है जो
     
       रक्षक तुम.
 
 
१० - मान लो अब  
 
      भेद न कोई अब
 
      बेटा - बेटी में.  
 
 
डॉ. जयप्रकाश तिवारी

Wednesday, September 18, 2013

क्या खो चुके हैं अर्थ अब?

दिवस बीते है आस में तेरी
और रजनी बीती यादों में,
सुभह दोपहरी शाम भी बीती
जो बचा गया फरियादों में.

वादों पर तेरे विश्वास किया
वादों ने बहुत निराश किया.
तूने तोड़े वादे अनेक बार
पर टूटी आस न एक बार.

इस आस में उपहास क्यों है?
इस आस में परिहास क्यों है?
इस आस में जो हास है
वह हास आज उदास क्यों है?

इस हास पर यह बंधन क्यों?
दीखता नहीं अब स्पंदन क्यों?
तेरी आस दे गयी वेदना क्यों?
खो गयी सारी संवेदना क्यों?

औरों के गम से भी कभी
ग़मगीन हो जाता था जो,
अपनों के दर्द को आज वह
अनुभूत क्यों करता नहीं?
 
 
- डॉ. जयप्रकाश तिवारी

Saturday, September 14, 2013

बिंदी बन हिंदी के माथे चिपक जा


ओ मेरी संवेदना!
तू मौन क्यों है?
सता रही जो वेदना,
अरे! वह कौन है?
उठाओ अपनी दृष्टि
एक नजर देख तो सही,...
सामने यह खड़ा कौन है?
ओ मेरी संवेदना!
ओ मेरी संवेदना!!

हाँ, ठीक कहा तूने
तेरा स्थूल शरीर हूँ मैं.
लेकिन जगह ढूंढ इसमें
जहाँ कोई जख्म नहीं है.
फिर भी विहँस रहा हूँ यदि
तो इसका भी कारण है.
कहीं कोई है जो
इस दर्द का निवारण है.

दर्द मेरे पास भी
था दौड़ कर आया.
देख इतने जख्म यहाँ,
वह खुद शरमाया.
टिकने की कोई जगह
न अब तक उसने पायी.
पोर-पोर में अन्दर मेरे
वह बेदर्द समाई.

ओ मेरी संवेदना!
अब दर्द बाहर खड़ा
बड़ी देर से कराह रहा है.
पतीक्षा सूची का दर्द
धीरे-धीरे उसकी भी
समझ में आ रहा है.

ओ मेरी संवेदना!
कोई गीत बन कर
अधरों को तो खोल.
कोई गजल बन कर
अपने दिल के ताले खोल.
शब्दों की गठरी को तौल,
प्रज्ञान विज्ञान की भाषा बोल.
वेदनाओं की दरिया बहा जा.
कैक्टस में भी फूल खिला जा.
भावनाओं की पौध उगा जा.
हिंदी दिवस पर कुछ
अपना दायित्व तो निभा जा.

ओ मेरी संवेदना!
तू मौन क्यों है?
आज तू अल्पना बन कर
चहुँ ओर बिखर जा.
रंगोली बन कर फ़ैल जा.
कल्पना बन कर संवर जा.

ओ मेरी संवेदना!
यह कल्पना ही तो
सृजन का आधार है.
तेरी यह वेदना,
सृजन की वेदना है.
अल्पना-रंगोली-कल्पना
बन कर बाहर आ जा.
कोई प्यारी सी बिंदी बनके
हिंदी के माथे चिपक जा
ओ मेरी संवेदना!
ओ मेरी संवेदना!!

- डॉ. जय प्रकाश तिवारी
भरसर, बलिया