Tuesday, August 21, 2012

शब्दों के अरण्य में: चक्रमण - परिभ्रमण (भाग- ३)


घूमा हूँ  खूब, इन शब्दों के अरण्य में
रचनाओं ने ले लिया अपनी  शरण में.
तभी से उन शब्दों को तोलने लगा हूँ
 अभीतक था मौन, अब बोलने लगा हूँ.
 
      सच है दांपत्य और ‘प्यार में / कभी कोई खाली नहीं होता / प्यार हमेशा व्यस्त रहने का नाम है’. देखिये ना अभी-अभी जिस पुरुष-स्त्री सम्बन्ध, दाम्पत्य जीवन पर बात कर रहे थे, वह बात तो पूरी भी नही हो पायी थी कि कानों में सुनाई पड़ा, किसी स्त्री का एक निर्णयात्मक स्वर.. यह स्वर निर्णयात्मक तो था लेकिन उसमे बेबसी, हताशा, निराशा और किसी भंवरजाल से बाहर निकल कर एकला चलो की मजबूरी और छटपटाहट भी थी. इन शब्दों के गठन और प्रेषण शैली में दृढ़ता तो थी, मगर दिखावे की. कम्पनमान हृदय को आवेश की चादर से ढककर, एक कृत्रिम दृढ़ता के अतिरिक्तबल के साथ सुनाया गया किसी अतृप्त पत्नी का यह निर्णय - ‘आज मैं / मुहब्बत की अदालत में / खड़ी होकर तुम्हें / दर्द के सहारे / उस रिश्ते से मुक्त करती हूँ / जो बरसों तक हम दोनों के बीच / मजबूरी की चुन्नी ओढ़े / खामोश सिसकता रहा...’. एक औरत होने के नाते वह अच्छी तरह से जानती है कि – ‘पति से बिछुड़ी औरत / निगाहें नीची करके चलती है / अपने कलंक से झुक गह है उसकी गर्दन’. लेकिन बदलते युग के साथ इस अवधारणा के एक पक्षीय लबादे को वह ढोना नहीं चाहती अब, आखिर वह कब तक कुढती रहे, घुटती रहे?. वह भी जागरूक है और २१वीं सदी की शिक्षित एक महिला. नारी सशक्तिकरण की आबो हवा ने उसे एक नया बल नई सोच जो दिया है. लेकिन दूसरी और पुरुष पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसको भी देखना होगा? मैं देखता हूँ, यहाँ पुरुष मन तो एकदम हतप्रभ सा है यह अप्रत्यासित निर्णय सुनकर... वह सोचता है, उसने तो हमेशा अपने दायित्वों को निभाया, और प्रदर्शन भी किया है अपने नेह का, स्नेह का... भावनाओं का प्रदर्शन यदि छोड़ दिया जाय तो मानवमन जो प्रेम का अवगाहन करता है, आपस में उसका आदान-प्रदान करता है, वे भावनाएं तो एकदम उदास होकर केवल पतीक्षारत ही रह जायेंगी और वह मन बस यही बोल फूटेगा, इतना ही कहता रहेगा उदास मन से... कि ‘बात जब तेरी उठी / दर्द हो गए हरे / हो गए बयन निःशब्द / नयन ताकते रहे /.. रंग मेहदी देखकर / कसक अंतस् में जगी / याद भी गहरा गए / स्वप्न सालते रहे /.. नयन सागर में उठा / डूब साहिल भी गया / चिथड़े टुकड़ों में हम / स्वप्न बांधते रहे’.
       
      नारीमन पर पुरुषमन की इस वेदनापूर्ण सफाई का, अपनी पक्ष प्रस्तुति का, अपने एकनिष्ठ प्रेमी होने के शब्द-प्रमाण का क्या प्रभाव पड़ा? यह तो नहीं पता, लेकिन वह इस समर्पित शब्द-तर्क को कहाँ मानती है?... और पुरुष की एकनिष्ठता का यह भाव कितना सच्चा है और कितना गल्प? यह तो केवल दम्पति की अपनी अनुभूति ही बता सकती है. उसमे हम-आप आखिर कर भी क्या सकते हैं? लेकिन वह नारीमन इस पुरुषमन के प्रेम प्रदर्शन को अच्छी तरह जनता है, वह इसे स्वीकर भी करता है कि तुम मुझसे प्रेम करते हो, मुझे चाहते हो, छिप-छिपकर देखते-निहारते भी रहते हो. तू मेरे आंसू और उदासी तो क्या, तुझे तो किसी गैर की उदासी भी देख नहीं पाते हो. इतने नर्मदिल इंसान हो, इतना महान दृष्टिकोण है तुम्हारा. सब जानती हूँ मैं – ‘तुम्हे आँसू नहीं पसंद / चाहे मेरी आँखों में हो या किसी और के / चाहते हो हँसती ही रहूँ / भले ही / वेदना से मन भरा हो / .. कई बार महसूस किया है / मेरे दर्द से तुम्हे आहत होते हुये / देखा है तुम्हे / मुझे राहत देने के लिए / कई उपक्रम करते हुये’.

     लेकिन यहाँ विडम्बना यह है कि इतनी खुली स्वीकारोक्ति के बावजूद भी दाम्पत्य जीवन में इतनी खटास, इतनी जटिल-वेदना का प्रवेश कब, कहाँ और कैसे हो गया? यह बात तो मैं नहीं जनता, किन्तु इस तर्क में भी दम है और सच्चाई का पुट भी कि – ‘यूं ही अचानक कुछ नहीं घटता / अंदर ही अंदर कुछ रहता है रिसता / किसे फुर्सत कि देखे फुर्सत से जरा / कहाँ उथला कहाँ राज है बहुत गहरा’. अन्वेषीमन को एक संकेत मिल गया और वह निकल पड़ा इस राज को ढूँढने... और आखिर पा ही लिया उसने इस दम्पति कि आपसी दूरी, असंतुष्टि का गहराराज इस रूप में – ‘समझाते हो मुझे अक्सर / इश्क से बेहतर है दुनियादारी / और हर बार मैं इश्क के पक्ष में होती हूँ / और हर बार तुम अपने तर्क पर कायम’. तो यहाँ है ‘सपनों के महल’ और ‘जमीनी झोंपड़ी’ जैसे लंबी-चौड़ी खाई वाले सोच का बड़ा अंतर. कल्पना और यथार्थ का द्वन्द्व. पुरुष जिसके कन्धों पर कई भार है, जानता है वह अच्छी तरह कि भूखामन आखिर कब तक इश्क के सहारे परिवार की गाड़ी खींच पायेगा? नारीमन को शायद इस बात की या तो समझ नहीं.. या वह इसे समझना नहीं चाहती? बात जो भी हो, उसे अपने पति में प्रेम में पगे एक भावुक पति की अपेक्षा गृहस्वामी और सामाजिक कार्यकर्त्ता स्वरुप की झलक ही अधिक दीखती है. नारीमन स्वयं को समझते, समझाते.. समझाते.. समझा नहीं पाती.. वह अंतर्द्वंद्व में है- मन विरोध करता है, बुद्धि का- ‘कैसे कह दूं बेवफा तुमको?’ लेकिन बुद्धि फिर भी जोर मारती है और अंततः मन इस बुद्धि के चातुर्य से हार जाता है और हार कर, अंतिम अस्त्र के रूप में नारी उसे शाप दे देती है –‘जा तुझे ईश्क हो’. और अब यह शाप भी, वास्तव में शाप है, या शाप के नाम पर कोई वरदान? यह कहना नितांत कठिन है. शाप में तो हमेशा ही शापित के हानि की अपेक्षा होती है, चाहे वह हानि अल्प हो या दीर्घ. लेकिन यहाँ तो लाभ ही लाभ है, शापित को भी और शाप देनेवाले को भी. तात्पर्य यह कि यह दिखावे के रूप में यह ‘छद्म-शाप’ है जो सुधार और सकारात्मक दृष्टिकोण से किया गया एक सत्प्रयास ही है. जिसके द्वारा चाहता है वह नारीमन यह कहना कि प्यार का– ‘वो रिश्ता / उस जिस्मानी रिश्ते से / कहीं अधिक सगा होता है / जो अनुभूति से बनता है’.
   
      अब प्रश्न हैं, इस प्रयास से क्या पुरुष मन में ‘इश्क भाव’ जागृत हुआ? वह प्रेम की भाषा, प्रेम का स्वरुप, प्रेम का स्पंदन, प्रेम का निष्पंदन, कुछ भी समझ पाया? मैं इन्हीं लहरों में फँसा था कि कहीं कोने से शब्द-लहरों की आंधी सी उठी और मेरे सारे विचार उसी में उड़ गए. अब कोई स्वर, ध्वनि या आवाज यदि रह गयी तो केवल उसी ध्वनि की और उस ध्वनि में ही तो इस प्रश्न का यथेष्ट उत्तर समाहित था– ‘बताओ तो जरा / क्या-क्या नहीं कर डाला तुमने / किस-किस ग्रन्थ को नहीं खंगाल डाला / खजुराहो की भित्तियों में ना उकेर डाला / अजंता-अलोरा के पटल पर फैला मेरा / विशाल आलोक तुम्हारी ही तो देन है / कामसूत्र की नायिका के रेश-रेशे में / मेरे व्यक्तित्व के खगोलीय व्यास / अनन्त पिंड कई-कई तारा मंडल / क्या कुछ नहीं खोजा तुमने / पूरा ब्रह्माण्ड दर्शन किया तुमने / .. पर हाथ ना कुछ लगा / करते रहे तुम मर्यादाओं का बलात्कार / सरेआम हर चौराहे पर / फिर भी ना तुम्हारा पौरुष तुष्ट हुआ / जानते हो क्यों? / क्योकि तुमने सिर्फ बाह्य अंगों को ही / स्त्री के दुर्लभतम अंग समझा / और गूंथते रहे तुम उसी में / अपनी वासना के ज्वारों को /.. और श्राप है तुम्हे / नहीं मिलेगा कभी तुम्हे वरदान / यूं ही भटकोगे / करोगे बलात्कार / करोगे अत्याचार / ना केवल उसपर / खुद पर भी / जब तक नहीं बनोगे अर्जुन /.. बेशक मिलता रहे अर्द्धविराम / मगर तब तक / नहीं मिलेगा तुम्हे पूर्ण विराम’.
        
     यह शब्दलहरी पुरुष को उसके चिंतन और चरित्र का दर्पण दिखाती है. उसके कलुषि विचारों का संस्कृति के नाम पर वीभत्स कृतियों का. लेकिन यह दर्पण देखकर भी यदि समझ न आये तो.. तो उसे वही बनाना पड़ेगा जो नारी को अपेक्षित है, यानि प्रेम का. और प्रेम-प्यार-इश्क तो वही कर सकता है जो स्वयं ही प्रेमी हो. इसलिए यदि उसे शापित भी करना पड़े कि ‘जा तुझे इश्क हो जाय’ तो यह कहीं से अनुचित भी नहीं. और जब इस शाप का भी कोई प्रभाव न पड़े तो... तब तो उसे कहना ही पड़ता है, प्यार कि इस अदालत में – ‘मैं उन गम हुये पलों की / जंग छेडने नहीं आई यहाँ / न पानी की कमी से सूख गई नदी का / हवाला देने आई हूँ / उखड गई साँसों को अब रफ़्तार की जरूरत नहीं / ये तो बस मुक्ति मांगतीं हैं /.. हाँ! आज मैं / मुहब्बत की अदालत में खड़ी होकर / तुम्हे हर रिश्ते से मुक्त करती हूँ’. उधर मुहब्बत की अदालत से मुक्त पुरुष मन में भी शायद इश्क अब जागृत हो गया है, आंतरिक संवेदनाएं उछाल मारने लगी हैं. तभी तो वह सोचता है –‘कहने भर से क्या कोई अजनबी हो जाता है / उछाल मारते यादों के समंदर / गहरी नमीं छोड़ जाते हैं किनारों पर /.. आसान तो नहीं होता / हवा के रुख को मोडना / और जबकि हमारे बीच कुछ नहीं / सोचता हूँ कई बार / क्या सच में कुछ नहीं हमारे बीच’. तभी एक लहर और आती है, समस्या सुलझाती है –‘ये बेनाम रिश्ते हम नहीं चुनते / ये तो आत्मा चुनती है / और आत्मा जिस्म नही / आत्मा चाहती है’.

                                       क्रमशः ....
                                     डॉ. जयप्रकाश तिवारी
                                     संपर्क सूत्र: ९४५०८०२२४०


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Shabdon Ke Aranya Mein

(Hardcover, Hindi)
by 

Rashmi Prabha

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Publisher: Hind Yugm (2012)
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Monday, August 20, 2012

शब्दों के अरण्य में: चक्रमण - परिभ्रमण (भाग- २)


                                                                       



घूमा हूँ  खूब, इन शब्दों के अरण्य में
रचनाओं ने ले लिया अपनी  शरण में.
तभी से उन शब्दों को तोलने लगा हूँ
 अभीतक था मौन, अब बोलने लगा हूँ.

    सोचा! चलो मन कुछ शांत हुआ, परन्तु इस परिभ्रमण उसे विश्रान्ति कहाँ? एक आवाज अब भी गुंजित हो रही थी.. एक बेहद दर्दीली आवाज, सिसकती हुयी कराह... वह भी उपलाम्भों से भरपूर – ‘कूड़ेदान में मिलती / मासूम बेटियों के समाचार / कहीं भीतर तक नहीं उतरते अब / नहीं उठती है मन में सिहरन भी / और न ही कांपती है हमे आत्मा / बड़ा विशाल हृदय है हमारा / और स्वीकार्यता की तो कोई सीमा ही नहीं / कभी रीति–रिवाज, कभी दान-दहेज / अनगिनत कारण हैं हमारे पास / बेटियों के कूड़ा समझ लेने के’. सोचता हूँ क्या हो गया है समाज को? फिर मन तो ठहरा मन, कब कहाँ कुलांच मार दे उसका क्या भरोसा? तर्कशील और तुलनात्मक विवेचन का आग्रही तर्कशील मन तत्क्षण ही तर्क कर बैठता है – इस प्रकार की अधोगामी विकृति धरती पर ही है या और भी जगह? अभी मानव न तो मंगल पर जा पाया है. न चंद पर ही बस पाया है. ले दे कर अम्बर-असमान तक उसकी दृष्टि पहुचती है और वह लगत है तुलना करने. कौन जाने अपनी इस कुकृत्य की गहराई मापने की दृष्टि से, या इस कुकृत्य का समाधान ढूढने दृष्टि से? 

      लेकिन वहाँ असमान में भी ऐसी ही विकट स्थिति है. वहाँ भी धरती की ही तरह सभ्य, सुशील, सतवी, राजसी और तामसी प्रवृत्ति और प्रकृत्ति के विभिन्न प्रकार के मेघ हैं. ये राजसी और तामसी प्रवृति के मेघ प्रेम की आड में, वासनाओं के उन्माद में करते हैं उन्मुक्त प्यार, प्रणय व्यापार.. -‘क्या इसी प्रणय की परिणति / नहीं है – यह ‘बिजली’ और ‘शब्द’ / बादल सँभालते क्यों नहीं अपनी संतान? / क्या हैं वे संस्कृति विहीन, सभ्यता से हीन / जो जन्मते ही फेंक देते हैं नीचे / अपनी संतान धारा पर / कूड़ा समझ के... बिजली विरोध करती है तड़प कर / शब्द करता है विरोध गरज कर / लेकिन पुकार उनकी सुनता ही कौन? यानी की यह विकृति, यह समस्या वहाँ पर भी इसी रूप में है. इसमें ‘जिज्ञासा की बात यह है कि / संवेदनहीनता, स्वच्छंदता / और अनैतिकता का / यह पाठ किसने किसको सिखाया /इंसान ने बादल को / या बादल ने इंसान को? सभयता के बनने- बिगड़ने का प्रश्न सांस्कृतिक और ऐतिहासिक गवेषणा का प्रश्न है. इसमें सर्वाधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि जिसे हम निराजड़ मानते हैं, स्वयं अपने को विवेकी, संवेदी और चैतन्य मानते हैं. लेकिन संवेदना और चेतना के धरातल पर तो यह मेघ कई गुना श्रेष्ठ निकला मानव समज से. क्योकि- बादल तो फिर भी प्रायश्चित करते हैं / वे तो इस आचरण पर फिर भी रोते हैं / आत्मग्लानी कि बरसात करते हैं / और धरती को उर्वरा बना जाते हैं / लेकिन इंसान भूल गया है करना / आत्मग्लानि और पश्चाताप / आखिर क्यों? कब ? और कैसे?
    
       सम्बन्ध पुरुष और स्त्री का. होता है बड़ा कोमल और भावनात्मक. जिसमे उठती हैं लहरें उमंग की, प्यार की,  हास की, परिहास की. जैसे करते हैं पक्षी कलोल, कभी जल में तैरते, हवा में उड़ते. जमी पर फुदकते, घोसले में दुबकते. पुरुष तो होता जल रूप वह अपने शोणित से करता है अभिसिंचित, उर्वरा मिटटी को, नारी कोख को. करता है चरितार्थ,  और देता है एक अर्थ, उसके नाम को, मान को, सम्मान और अभिमान को. स्त्री भी फूली नहीं समाती, अर्थवत्ता पर, इस अर्थबोध पर. वह है गर्विता और आह्लादित.... अब है, सिंचित करने की उसकी है बारी. वह सींचती है पुरुष के सत्व को. पोषित - पल्लवित करती है, उसके तत्त्व को, पुन्सत्त्व को. पुरुष और स्त्री के स्नेहिल वाटिका में, खिलते हैं वहाँ - पुष्प, सहस्रदल कमल. जो सुगन्धित करते हैं, दोनों कुल को. तृप्त - संतृप्त करते हैं, सात पीढ़ियों तक को.
     
    परन्तु यही फूल, आज क्यों बन गया है शूल ? आज पुरुष का पुन्सत्त्व और माँ की मातृत्व, क्यों कर रही है एक भारी भूल? भयंकर भूल ? विज्ञान की एक जांच मशीन ने हिला दी है, बहुत गहराई तक पूरे समाज की चूल. लिंग अनुपात की बढती विसंगति, आज सभी को मुह चिढाने लगी है. माँ हो या पिता, उनकी भावनाओं की, कोमलता पर, बार - बार प्रश्न उठाने लगी है. हां! भावों की कोमलता - स्निग्धता – ममता आज क्रूरता और हिंसा में, क्यों बदल गयी? उससे इतनी वितृष्णा - घृणा आखिर क्यों? जो है अपने ही खून का सरताज? जब चर्चा चलाई, की पड़ताल, तो बात दहेज़ प्रथा की सामने आई. क्या दहेज़ का दानव क्या विधि की रचना है, जिसे हम हटा नहीं सकते? मिटा नहीं सकते? आखिर हमने ही तो कभी शुरू किया होगा उसे, नाम इसका, 'उपहार' या 'व्यवहार' देकर. क्या आज हम इस दहेज़ दानव का, समूल नाश नहीं कर सकते? वह कौन सी चीज है जो मानव, चाहे और... कर न सके ? परन्तु पहला कदम कौन उठाएगा? सब देख रहे एक दूजे को. क्या कोई अजूबा आसमा से आएगा, जो राह हमें दिखाएगा? पहला कदम हमारा होगा, तुमको भी सभी को साथ निभाना होगा. यदि रहना है मानव जाति को धरती पर. यह कदम अंततः सभी को उठाना होगा. हाँ, यह कदम अंततः सभी को उठाना होगा.

                                 क्रमशः ....
                              
                                                                                        डॉ. जयप्रकाश तिवारी
                              
                                                                                         संपर्क सूत्र: ९४५०८०२२४० 


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Saturday, August 18, 2012

शब्दों के अरण्य में: चक्रमण-परिभ्रमण


(भाग- १)

घूमा हूँ  खूब, इन शब्दों के अरण्य में
रचनाओं ने ले लिया अपनी  शरण में.
तभी से उन शब्दों को तोलने लगा हूँ
 अभीतक था मौन, अब बोलने लगा हूँ.

     प्रश्न और उत्तर दोनों ही, सम्मिलित स्वरलहरियों में गुंजित थे वहाँ, शब्दों के अरण्य में. इन स्वरलहरियों में ही खोया हुआ संवेदी मन अपने में ही मस्त और आनंद के सागर में हिचकोलें ले रहा था... तभी सुनाई पड़ा – ‘भाव सुमन लिए हुये / नैवेद्य दीप सजे हुये / प्रेम की पुष्पांजलि को / मैं किसे अर्पण करूँ?’ किसी ने सुझाया, इसे मर्यादा पुरुषोत्तम राम को अर्पित कर दो. प्रतिवाद तुरंत आया, ‘राम! तुम सर्व पूजित मर्यादा पुरुषोत्तम कैसे?’ वे तो स्वयं कठघरे में हैं अपने ही बच्चों के प्रश्नों की अदालत में. आखिर इस प्रश्न का कोई उत्तर भी है क्या? ‘तुमने / कौन सा कर्त्तव्य वहन किया / हमारे लिय / क्या तुम्हारी अयोध्या में / सिर्फ जंगल ही शेष थे / हमारे प्रसव को / ... हमारी माँ / तुम्हारी अर्द्धांगिनी / आखिर उसको ही क्या / दे पाए तुम?. यूँ तो सीता ने स्वयं राम पर आरोप तो नहीं लगाया किन्तु यह कसक और पीड़ा उनके मन में कहीं न कहीं आज भी है – ‘मैं ये जानती हूँ मेरे राजा राम कि / सत्ता और प्रभुता का विष बहुत मीठा है जहाँ जिन्दगी की बिछी विसात पर तुमने स्वयं अपने ही मोहरे को पीटा है’. इतना ही नहीं, राम को लेकर आरोप तो माता सुमित्रा के मन में भी है और वाणी में भी. नारी मन की सहज तुलनात्मक वृत्ति उनके मन के कोने से निकल कर जिह्वा पर आखिर आ ही जाती है और कातर भाव में वह कौशल्या से पूछ ही तो बैठतीं है – ‘नहीं समझ पाती जीजी / रक्ताश्रु तो मैंने भी / चौदह वर्षों तक तुमसे / कम नहीं बहाए हैं / फिर मेरे दुःख को कम कर / क्यों आँका जाता है / केवल इसीलिए कि / मैं राम की नहीं लक्ष्मण की माँ हूँ.’ इसमें राम स्वयं सम्मिलित भले ही न हों, लेकिन युगबोध, युगआंकलन, घटनाओं का जिम्मेदार अंततः राम ही बनते हैं.
    
     फिर मन निह्श्वांस छोड़ते हुये सोचता है, चलो प्रेम की यह पुष्पांजलि, अलौकिक प्रेम का पाठ पढाने वाले, रासरसइया कान्हा को ही क्यों ना अर्पित किया जाय? लेकिन यहाँ कान्हा के नाम पर भी प्रतिवाद कम नहीं है, उपालंभ है कान्हा पर – ‘महवार में डूबकर / मैं मीरा बनी थी / और तेरे युग को खिंच लायी थी / पुनश्च / राजनीती के दमन चक्रों में / मेरा कोमल सखा भाव / एक बार फिर / रख दिया गया विष के प्याले में / ..लोम हर्ष से कह उठी थी दुनिया / कि तूने विष को किया अमृत / कुछ झूठी नहीं थी लोकश्रुति / विष क्या तेरा हाथ अमृत हुआ?’
     
     मैं इस प्रश्नों में ही उलझ उन्हें सुलझाने का प्रयत्न कर रहा था कि किसी ने सुझाव दिया कि इसे भोले शंकर को अर्पित कर दो. आखिर श्रद्धा-भक्ति भाव से हाथ में पूजा की थाल लिए कब तक खड़ी रहती, कब तक प्रतीक्षा करती मैं? औधडदानी-आशुतोष शिवशंकर को पुष्पांजलि श्रद्धा-भक्ति भाव में अर्पित कर दिया. इस अर्पण के बाद भी प्रश्न था और वह प्रश्न कम महत्पूर्ण नहीं था – ‘शिवरात्रि के रोज / पत्तों और फलों से / विरक्त कर दिया गया बेल का पेड़ / एक स्पर्श के बाद / पत्तों फलों की / जगह थी / कचरे का डिब्बा’. मन सोचने लगा, सोचने क्या लगा, सोचते-सोचते अब तो यह दिखने भी लगा- ‘श्मशानी निश्तब्धता छाई है / उभरी दर्द भरी चहचहाहट / नन्हे – नन्हे परिन्दों की / शायद उजड गया था उनका बसेरा / मनुष्य ने पेड़ जो काट दिए थे’. अचानक सुनायी दी मुझे चेतावनी भरी आवाज – ‘रे मनुष्य! मैंने तुझे बनाया / तेरी सुरक्षा के लिए पेड़ बनाये / पेड़ों का करके विनाश / क्यों कर रहा है / सृष्टि का महाविनाश !. तभी दूसरी आवाज भी आई, जिसने मानव की नादानी, उसकी ऐष्णाओं की परिणति और त्रासदी की बात दूसरे तरीके से बताई,- ‘जिसने सुनाई उसे / सभ्य मानव की बर्बर कहानी / मीरा से / सुकरात तक / फिर किस तरह काटे हमने / पहाड, जंगल / और आदमी का सर’. लगा सोचने मैं; तो फिर किया क्या जाय? मानवमन तो संवेदी है, चिंतनशील है और भावनाओं के प्रकटीकरण का प्रबल आग्रही भी .. तो ऐसा क्या किया जाय, जिससे मानव मन की तृष्णा भी तृप्त हो जाय और प्राणवायु प्रदायिनी वन और प्राकृतिक सम्पदा का विनाश भी न हो? ... तत्क्षण ही आवाज एक समाधान के रूप में आयी – ‘जीवन जब भी जटिल कठिन लगे / शून्य में खो जाओ / शून्य से फिर आरंभ करो / जीवन को नई ऊर्जा / नई स्फूर्ति का अहसास / शून्य को अंकों में बदल देता है.

एक अन्तः चेतना जगी, नई स्फूर्ति का एहसास भी हुआ. शून्य! अरे प्रलय ही तो शून्य है और सृष्टि है अंक, चाहे वह एक हो या अनन्त. मूलरूप में संख्या केवल दो ही हैं- एक (१) और शून्य (०). समझने और समझाने की दृष्टि से व्यावहारिक रूप में अनंत () को इसमें भी सम्मिलित किया जा सकता है. इससे सृष्टि की व्याख्या में सरलता होगी. परमतत्व एक (१) है; तत्वरूप में भी और इकाईरूप में भी. इस परमतत्व का प्रकटन और विलोपन होता रहता है. प्रकटरूप में वह अनंत है, गतिज ऊर्जा है और विलोपन (प्रलय) की स्थिति में वही शून्य है. प्रलयावस्था में यह अनंत निष्क्रिय और अर्थहीन हो जाता है और तब केवल शून्य ही शेष बचता है. इस स्थिति में कोई माप नहीं, कोई मान नहीं, कोई दृश्य नहीं, कोई सृष्टि नहीं, कोई दृष्टि नहीं, कोई द्रष्टा नहीं. परन्तु अस्तित्वमान का अस्तित्व है, मूलऊर्जा विद्यमान है- स्थितिज ऊर्जा के रूप में. इसके अस्तित्व को कहीं से भी नकारा नहीं जा सकता. अरे ये सारे अंक तो ‘शून्य’ और ‘अनन्त’ के बीच का विवर्त हैं. शून्य के साथ अंक जुड जाने से वह भौतिक रूप से मूल्यवान–रूपवान हो जाता है, सगुण हो जाता है. यह सगुण तो निर्गुण में ही प्रतिष्ठित है. मृत्यु इसीलिए बड़ी है किसी भी जीवन से. जीवन, इस मृत्यु में विश्राम पाता है और यह प्रकृति और सृष्टि, प्रलय में, शून्य में. यही पुरुष और प्रकृति का खेल है. प्रकृति यदि शक्ति है तो पुरुष शिव. शिव-शक्ति का युग्म ही तो शिवलिंग है, प्रतीकात्मक विग्रह है अर्धनारीश्वर का.
     
    प्रज्ञान और विज्ञान नितांत विरोधी नहीं, वे तो पूरक हैं. ढूंढो रब को किसी अरण्य में, किसी यज्ञशाला या प्रयोगशाला में; यदि शोध कार्य पूरी सच्चाई, ईमानदारी, निष्ठां और तन्मयता से हो तो ये विधाएं एक ही निष्कर्ष तक पहुचती हैं, इसमें संदेह नहीं. आइंस्टीन प्रणीत प्रसिद्ध सूत्र E=mc2 में इस सिद्धांत ढूंढा जा सकता है. आइये देखें- E=mc2  को. यहाँ -  (E= energy,   m=mass,   c=velocity of light). यदि यहाँ गति या क्रियाशीलता का मान शून्य (०) हो जाय, तब इस गतिहीन अवस्था में E=m x (0)2  = 0  (शून्य) होगा. लेकिन यहाँ शून्यता (०) का तात्पर्य अभाव नहीं है, केवल उसका मान शून्य है, उसकी वैल्यू शून्य है. E (ऊर्जा) अब भी अस्तित्वमान है, स्थितिज ऊर्जा के रूप में. यही प्रज्ञान विद्या का ‘शक्ति- सिद्धांत’ है. विज्ञान जगत में ‘ऊर्जासंरक्षण का सिद्धांत’ भी यहीं है.  
      
   इसका तात्पर्य यह कि शून्य ही ब्रह्म है, अनन्त ही सृष्टि है और अंक ही ईश्वर है, रब है. ओह! कितने घाट-प्रतिघात झेलने पड़ते हैं? रब बने रहना कितना कठिन है? उत्तर में संगीत लहरी एक विशिष्ट आती है और अपनी बात बताती है – ‘रब बने रहना आसान नहीं / असंभव को संभव बनाने से मुक्ति नहीं मिलती / एकबार भी चुके / तो प्रश्नों के अचूक बाणों की शय्या पर रात गुजरती है / अखंड दीप / याद दिलाने को जकाए जाते हैं / रब का दीया रब को दिखा कर /  अपनी पूजा की इति मानने वाले / रब को चैन से सोने नहीं देते हैं /... समय रहते संभल जाओ / और विचारों / जिसने स्रष्टि कि अद्भुत रचना की / वह सृष्टि के सारे स्रोत सुखा दे / तब तुम क्या करोगे?.. नहीं ! ऐसा होने नहीं देंगे... ऐसा होने नहीं देंगे. नहीं ! नहीं !!.. .. ऐसा होने नहीं देंगे...  नहीं !!! ऐसा होने नहीं देंगे..

      ईश्वर को पाना कठिन होता है- ज्ञानियों के लिए, विज्ञानियों के लिए.. वे तो ज्ञान–विज्ञान के मिथ्याभिमान में डूबे रहते है. लेकिन एक स्नेह भरा दिल, सेवा   को समर्पित तन और माधुर्य छलकाता मन तो ढूंढ लेता है प्रकृति में ही ईश्वर को. और कर ही देता है समर्पित अपनी भावभरी पुष्पांजलि को, उसके श्री चरणों में. तो क्या निर्गुण-निराकार की पूजा-अर्चना निराकार मानसिक नहीं हो सकती? क्यों नहीं हो सकती? सोच को बदलना होगा. मंदिर के महत्व को, उसकी सीमा को समझना होगा. मंदिर तो अध्यात्मिक विद्यालय है. अध्यात्म बोध के बाद साधक भक्त के लिए मंदिर की अनिवार्यता नहीं. मंदिर जाने में कोई हानि भी नहीं. बात केवल तोष-परितोष की है. तो क्यों न भावनात्मक पूजा को प्रोत्साहित किया जाय? या पत्रं-पुष्पं को सीमित, मात्र प्रतीकात्मक रूप में ही उपयोग किया जाय. जिससे मन को संतोष भी होगा, भक्तिभाव में कोई आक्षेप भी नहीं आएगा और प्राकृतिक सम्पदा भी सुरक्षित रहेगी. स्व-संतुलन का विशिष्ट गुण प्रकृति में विद्यमान है जिससे प्रकृति थोड़े-बहुत विनष्टि को संतुलित करती रहती है. भक्त अब प्रकृति में ही देखता है अपने ईश को, अपने रब को... और अब वह स्व से ऊपर उठकर करता है यह मंगलकामना – ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः’ की.
                                                     

                                           क्रमशः
                                      
                                    -डॉ. जयप्रकाश तिवारी
                                    संपर्क: ९४५०८०२२४०


शब्दों के अरण्य में: चक्रमण - परिभ्रमण

(भाग- १)

घूमा हूँ  खूब, इन शब्दों के अरण्य में
रचनाओं ने ले लिया अपनी  शरण में.
तभी से उन शब्दों को तोलने लगा हूँ
 अभीतक था मौन, अब बोलने लगा हूँ.

     प्रश्न और उत्तर दोनों ही, सम्मिलित स्वरलहरियों में गुंजित थे वहाँ, शब्दों के अरण्य में. इन स्वरलहरियों में ही खोया हुआ संवेदी मन अपने में ही मस्त और आनंद के सागर में हिचकोलें ले रहा था... तभी सुनाई पड़ा – ‘भाव सुमन लिए हुये / नैवेद्य दीप सजे हुये / प्रेम की पुष्पांजलि को / मैं किसे अर्पण करूँ?’ किसी ने सुझाया, इसे मर्यादा पुरुषोत्तम राम को अर्पित कर दो. प्रतिवाद तुरंत आया, ‘राम! तुम सर्व पूजित मर्यादा पुरुषोत्तम कैसे?’ वे तो स्वयं कठघरे में हैं अपने ही बच्चों के प्रश्नों की अदालत में. आखिर इस प्रश्न का कोई उत्तर भी है क्या? ‘तुमने / कौन सा कर्त्तव्य वहन किया / हमारे लिय / क्या तुम्हारी अयोध्या में / सिर्फ जंगल ही शेष थे / हमारे प्रसव को / ... हमारी माँ / तुम्हारी अर्द्धांगिनी / आखिर उसको ही क्या / दे पाए तुम?. यूँ तो सीता ने स्वयं राम पर आरोप तो नहीं लगाया किन्तु यह कसक और पीड़ा उनके मन में कहीं न कहीं आज भी है – ‘मैं ये जानती हूँ मेरे राजा राम कि / सत्ता और प्रभुता का विष बहुत मीठा है जहाँ जिन्दगी की बिछी विसात पर तुमने स्वयं अपने ही मोहरे को पीटा है’. इतना ही नहीं, राम को लेकर आरोप तो माता सुमित्रा के मन में भी है और वाणी में भी. नारी मन की सहज तुलनात्मक वृत्ति उनके मन के कोने से निकल कर जिह्वा पर आखिर आ ही जाती है और कातर भाव में वह कौशल्या से पूछ ही तो बैठतीं है – ‘नहीं समझ पाती जीजी / रक्ताश्रु तो मैंने भी / चौदह वर्षों तक तुमसे / कम नहीं बहाए हैं / फिर मेरे दुःख को कम कर / क्यों आँका जाता है / केवल इसीलिए कि / मैं राम की नहीं लक्ष्मण की माँ हूँ.’ इसमें राम स्वयं सम्मिलित भले ही न हों, लेकिन युगबोध, युगआंकलन, घटनाओं का जिम्मेदार अंततः राम ही बनते हैं.
    
     फिर मन निह्श्वांस छोड़ते हुये सोचता है, चलो प्रेम की यह पुष्पांजलि, अलौकिक प्रेम का पाठ पढाने वाले, रासरसइया कान्हा को ही क्यों ना अर्पित किया जाय? लेकिन यहाँ कान्हा के नाम पर भी प्रतिवाद कम नहीं है, उपालंभ है कान्हा पर – ‘महवार में डूबकर / मैं मीरा बनी थी / और तेरे युग को खिंच लायी थी / पुनश्च / राजनीती के दमन चक्रों में / मेरा कोमल सखा भाव / एक बार फिर / रख दिया गया विष के प्याले में / ..लोम हर्ष से कह उठी थी दुनिया / कि तूने विष को किया अमृत / कुछ झूठी नहीं थी लोकश्रुति / विष क्या तेरा हाथ अमृत हुआ?’
     
     मैं इस प्रश्नों में ही उलझ उन्हें सुलझाने का प्रयत्न कर रहा था कि किसी ने सुझाव दिया कि इसे भोले शंकर को अर्पित कर दो. आखिर श्रद्धा-भक्ति भाव से हाथ में पूजा की थाल लिए कब तक खड़ी रहती, कब तक प्रतीक्षा करती मैं? औधडदानी-आशुतोष शिवशंकर को पुष्पांजलि श्रद्धा-भक्ति भाव में अर्पित कर दिया. इस अर्पण के बाद भी प्रश्न था और वह प्रश्न कम महत्पूर्ण नहीं था – ‘शिवरात्रि के रोज / पत्तों और फलों से / विरक्त कर दिया गया बेल का पेड़ / एक स्पर्श के बाद / पत्तों फलों की / जगह थी / कचरे का डिब्बा’. मन सोचने लगा, सोचने क्या लगा, सोचते-सोचते अब तो यह दिखने भी लगा- ‘श्मशानी निश्तब्धता छाई है / उभरी दर्द भरी चहचहाहट / नन्हे – नन्हे परिन्दों की / शायद उजड गया था उनका बसेरा / मनुष्य ने पेड़ जो काट दिए थे’. अचानक सुनायी दी मुझे चेतावनी भरी आवाज – ‘रे मनुष्य! मैंने तुझे बनाया / तेरी सुरक्षा के लिए पेड़ बनाये / पेड़ों का करके विनाश / क्यों कर रहा है / सृष्टि का महाविनाश !. तभी दूसरी आवाज भी आई, जिसने मानव की नादानी, उसकी ऐष्णाओं की परिणति और त्रासदी की बात दूसरे तरीके से बताई,- ‘जिसने सुनाई उसे / सभ्य मानव की बर्बर कहानी / मीरा से / सुकरात तक / फिर किस तरह काटे हमने / पहाड, जंगल / और आदमी का सर’. लगा सोचने मैं; तो फिर किया क्या जाय? मानवमन तो संवेदी है, चिंतनशील है और भावनाओं के प्रकटीकरण का प्रबल आग्रही भी .. तो ऐसा क्या किया जाय, जिससे मानव मन की तृष्णा भी तृप्त हो जाय और प्राणवायु प्रदायिनी वन और प्राकृतिक सम्पदा का विनाश भी न हो? ... तत्क्षण ही आवाज एक समाधान के रूप में आयी – ‘जीवन जब भी जटिल कठिन लगे / शून्य में खो जाओ / शून्य से फिर आरंभ करो / जीवन को नई ऊर्जा / नई स्फूर्ति का अहसास / शून्य को अंकों में बदल देता है.

एक अन्तः चेतना जगी, नई स्फूर्ति का एहसास भी हुआ. शून्य! अरे प्रलय ही तो शून्य है और सृष्टि है अंक, चाहे वह एक हो या अनन्त. मूलरूप में संख्या केवल दो ही हैं- एक (१) और शून्य (०). समझने और समझाने की दृष्टि से व्यावहारिक रूप में अनंत () को इसमें भी सम्मिलित किया जा सकता है. इससे सृष्टि की व्याख्या में सरलता होगी. परमतत्व एक (१) है; तत्वरूप में भी और इकाईरूप में भी. इस परमतत्व का प्रकटन और विलोपन होता रहता है. प्रकटरूप में वह अनंत है, गतिज ऊर्जा है और विलोपन (प्रलय) की स्थिति में वही शून्य है. प्रलयावस्था में यह अनंत निष्क्रिय और अर्थहीन हो जाता है और तब केवल शून्य ही शेष बचता है. इस स्थिति में कोई माप नहीं, कोई मान नहीं, कोई दृश्य नहीं, कोई सृष्टि नहीं, कोई दृष्टि नहीं, कोई द्रष्टा नहीं. परन्तु अस्तित्वमान का अस्तित्व है, मूलऊर्जा विद्यमान है- स्थितिज ऊर्जा के रूप में. इसके अस्तित्व को कहीं से भी नकारा नहीं जा सकता. अरे ये सारे अंक तो ‘शून्य’ और ‘अनन्त’ के बीच का विवर्त हैं. शून्य के साथ अंक जुड जाने से वह भौतिक रूप से मूल्यवान–रूपवान हो जाता है, सगुण हो जाता है. यह सगुण तो निर्गुण में ही प्रतिष्ठित है. मृत्यु इसीलिए बड़ी है किसी भी जीवन से. जीवन, इस मृत्यु में विश्राम पाता है और यह प्रकृति और सृष्टि, प्रलय में, शून्य में. यही पुरुष और प्रकृति का खेल है. प्रकृति यदि शक्ति है तो पुरुष शिव. शिव-शक्ति का युग्म ही तो शिवलिंग है, प्रतीकात्मक विग्रह है अर्धनारीश्वर का.
     
    प्रज्ञान और विज्ञान नितांत विरोधी नहीं, वे तो पूरक हैं. ढूंढो रब को किसी अरण्य में, किसी यज्ञशाला या प्रयोगशाला में; यदि शोध कार्य पूरी सच्चाई, ईमानदारी, निष्ठां और तन्मयता से हो तो ये विधाएं एक ही निष्कर्ष तक पहुचती हैं, इसमें संदेह नहीं. आइंस्टीन प्रणीत प्रसिद्ध सूत्र E=mc2 में इस सिद्धांत ढूंढा जा सकता है. आइये देखें- E=mc2  को. यहाँ -  (E= energy,   m=mass,   c=velocity of light). यदि यहाँ गति या क्रियाशीलता का मान शून्य (०) हो जाय, तब इस गतिहीन अवस्था में E=m x (0)2  = 0  (शून्य) होगा. लेकिन यहाँ शून्यता (०) का तात्पर्य अभाव नहीं है, केवल उसका मान शून्य है, उसकी वैल्यू शून्य है. E (ऊर्जा) अब भी अस्तित्वमान है, स्थितिज ऊर्जा के रूप में. यही प्रज्ञान विद्या का ‘शक्ति- सिद्धांत’ है. विज्ञान जगत में ‘ऊर्जासंरक्षण का सिद्धांत’ भी यहीं है.  
      
   इसका तात्पर्य यह कि शून्य ही ब्रह्म है, अनन्त ही सृष्टि है और अंक ही ईश्वर है, रब है. ओह! कितने घाट-प्रतिघात झेलने पड़ते हैं? रब बने रहना कितना कठिन है? उत्तर में संगीत लहरी एक विशिष्ट आती है और अपनी बात बताती है – ‘रब बने रहना आसान नहीं / असंभव को संभव बनाने से मुक्ति नहीं मिलती / एकबार भी चुके / तो प्रश्नों के अचूक बाणों की शय्या पर रात गुजरती है / अखंड दीप / याद दिलाने को जकाए जाते हैं / रब का दीया रब को दिखा कर /  अपनी पूजा की इति मानने वाले / रब को चैन से सोने नहीं देते हैं /... समय रहते संभल जाओ / और विचारों / जिसने स्रष्टि कि अद्भुत रचना की / वह सृष्टि के सारे स्रोत सुखा दे / तब तुम क्या करोगे?.. नहीं ! ऐसा होने नहीं देंगे... ऐसा होने नहीं देंगे. नहीं ! नहीं !!.. .. ऐसा होने नहीं देंगे...  नहीं !!! ऐसा होने नहीं देंगे..

      ईश्वर को पाना कठिन होता है- ज्ञानियों के लिए, विज्ञानियों के लिए.. वे तो ज्ञान – विज्ञानं के मिथ्याभिमान में डूबे रहते है. लेकिन एक स्नेह भरा दिल, सेवा  को समर्पित तन और माधुर्य छलकाता मन तो ढूंढ लेता है प्रकृति में ही ईश्वर को. और कर ही देता है समर्पित अपनी भावभरी पुष्पांजलि को, उसके श्री चरणों में. तो क्या निर्गुण-निराकार की पूजा-अर्चना निराकार मानसिक नहीं हो सकती? क्यों नहीं हो सकती? सोच को बदलना होगा. मंदिर के महत्व को, उसकी सीमा को समझना होगा. मंदिर तो अध्यात्मिक विद्यालय है. अध्यात्म बोध के बाद साधक भक्त के लिए मंदिर की अनिवार्यता नहीं. मंदिर जाने में कोई हानि भी नहीं. बात केवल तोष-परितोष की है. तो क्यों न भावनात्मक पूजा को प्रोत्साहित किया जाय? या पत्रं-पुष्पं को सीमित, मात्र प्रतीकात्मक रूप में ही उपयोग किया जाय. जिससे मन को संतोष भी होगा, भक्तिभाव में कोई आक्षेप भी नहीं आएगा और प्राकृतिक सम्पदा भी सुरक्षित रहेगी. स्व-संतुलन का विशिष्ट गुण प्रकृति में विद्यमान है जिससे प्रकृति थोड़े-बहुत विनष्टि को संतुलित करती रहती है. भक्त अब प्रकृति में ही देखता है अपने ईश को, अपने रब को... और अब वह स्व से ऊपर उठकर करता है यह मंगलकामना – ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः’ की.
                                                     

                                             क्रमशः
                                      
                                        -डॉ. जयप्रकाश तिवारी
                                         संपर्क: ९४५०८०२२४०

Wednesday, August 8, 2012

प्रेम गीत


प्रेम गीत को गाता हूँ मै
राधा - राधा रटता हूँ मैं
मजबूरी यह नहीं है मेरी
खुद प्रेम की यह कमजोरी.

यह प्रेम चाहता आश्रय केवल
बिन आश्रय नहीं टिक सकता
अब हुआ प्रेम है राधा से जब
क्या कभी वह मिट सकता?

सांसारिक यह प्रेम क्षणिक 
यह प्रेम नाम पर धोखा है.
नाम-रूप सब मिटने वाले
यह भ्रम है, एक झरोखा है.

कान्हा तो केवल प्रेम पियारा
सब ग्रंथन में देखो उजियारा 
जिसने ढूँढा उसने ही पाया
जानि लेउ सब जाननिहारा.

इस भाव गीत को गाता हूँ मैं
नंगा यह ढोल बजता हूँ मै
अश्रुधार बहता रहता हूँ मैं
विरह लिए छपिटाता हूँ मैं.

जानने वाले जानते हैं सब
हालत मेरी पहचानते हैं सब
अब आयेंगे वे खुद दौड़े-दौड़े
इस बात को भी जनता हूँ मैं.

प्रेम गीत को गाता हूँ मै
राधा - राधा रटता हूँ मैं
मजबूरी यह नहीं है मेरी
खुद प्रेम की यह कमजोरी.