Sunday, August 5, 2012

कविता और गीत


कविता
और गीत
तो अन्यतम
साधना है -
शब्दों का.

और शब्द?
शब्द तो
आराधना है -
अक्षरों का.

इन अक्षरों
और शब्दों के
युग्म ने ही रचा है -
साहित्य, सदग्रंथ
और सृष्टि ग्रन्थ .

ये अक्षर ही हैं
जिन्हें हम कहते
"पञ्च महाभूत"

'अ' से अग्नि,
आ' से आकाश
'ग' से गगन,
ज' से जल
'स' से समीर,
'प' से प्रकाश

क्या इन्ही से
नहीं हुआ है
इस सृष्टि
का विकास

रचा सृष्टि ने
मानव को
मानव की अपनी
अलग सृष्टि है.

अपनी - अपनी
व्याख्या है अब
परख - परख
की अपनी दृष्टि.

Wednesday, August 1, 2012

शब्द सृजन की वेला


होती है जब मन में हलचल
हिलोर तरंग जब लेती है.
भाषा के रूप में बाहर आ वह
लिपि के रूप झलकती है.

तरंगे कुछ फंस भवर जाल में
मन के अन्दर ही घुमड़ती हैं,
जो चंचला हैं, प्रतीक रूप में
अंगों से भी, वे छलकती हैं.

हैं सभी रूप, कविता के ये
यह जीवन भी एक कविता है,
इस धरा पर जितनी कवितायें
सर्जक उसका यह सविता है.

सविता का रूप प्रखर तेजस्वी
रश्मियाँ हैं उसकी बड़ी ऊर्जस्वी,
उलटी बात वह नहीं मानता
जगत को उसका मजा चखाता  .

ऐसे ही बहती है यह कविता
यह आह - वाह का संगम है,
पढ़लो रचलो चाहे जो कविता
क्या गम? जब है यह सविता.


                                      डॉ. जयप्रकाश तिवारी 

Monday, July 30, 2012

भारतीय चिंतन प्रवाह है कैसा?


उठता है प्रश्न मन में कुछ ऐसा,
भारतीय चिंतन का प्रवाह है कैसा?
जब - जब सोचा बही उलटी धार
ले गयी खीच, यह बुद्धि जो अपनी
वैदिक-पौराणिक चिंतन बीच धार.

देखा मैंने वहाँ भौतिकवाद
जड़वाद के बीच अध्यात्मवाद.
इन वादों के बीच कुछ और वाद
अनीश्वरवाद - निरीश्वरवाद ..

आत्म-अनात्म, विकट द्वंद्व का
मंथन जो चला है, सुदीर्घ चला..
मिल गए इसमें अनेक विचार
कुछ अलग थलग भी पड़े विचार 

फिर वाद-वाद की बातों में
अवसर आये हैं बहुत बार
तपोभूमि से राजभवन तक
हुए तर्क -वितर्क अनेक बार.

जडवाद की यात्रा मानव तक
उपलब्द्धि मानव की बुद्धिवाद.
बुद्धिवाद ले गया इन्द्रियभोग तक
हुआ सीमित मानव निजइन्द्रिय तक.

जब इन्द्रिय भोग ने बहुत सताया
बहुत.. नचाया, बहुत ही तड़पाया.
न जाने कितनी बार..एडियाँ..
रगड़ - रगड़ कर उसे रुलाया.

जब लगी ठोकर जागी मेधा 
तन मन ने जाना तब स्वधा.
स्वधा ने ही फिर राह दिखलाई
तन माँ बुद्धि आगे बढ़ पायी.

मन बुद्धि से सूक्ष्म आत्म तत्त्व 
सूक्ष्मतर उससे है- 'जगदात्मा'. 
सूक्स्म्त तात्व जो मूल तत्त्व है
संस्कृति ने कहा उसे ही परमात्मा.

परमात्मा गति थी पूर्णता की
चरमोत्कर्ष उसका धनात्मक था.
था इसमें केवल सुख ही सुख
परमानन्द - आनन्दमहा था.

खो गयी चेतना इस आनन्द में
इतनी खोई की डूब सी गयी.
डूबे डूबे फिर जाने कैसे ऊब गयी?
इस चिति ने ही तब प्रश्न उठाई 
आनन्द से बाहर खीच कर लायी.

आनन्द ही है जब परम शुभ
आया कहाँ से जग में अशुभ?
जब सत्ता केवल यह आनन्द
जगत में व्याप्त क्यों है अवसाद?
मानव मन में क्यों अनेक विषाद?

अवसाद विषाद यह किसकी देन?
अब उठो!  जागो!  न करो प्रलाप!
यह तो विषय है आत्म बोध का.
ज्ञान बोध का, सत्य बोध का.

मेधा की अपनी सीमा है
आगे उसके नहीं जा सकती.
है ज्ञान की अपनी शर्त अलग
"न मेधया न बहुना श्रुतेन.."?

दूसरा पार्श्व भी जानना होगा
अवसाद निवारण करना होगा.
तब इस बोध के कारण ही
हुआ अनुसन्धान यहाँ -
सत्यं शिवं और सुन्दरम का.

इस आनन्द के तीन है अंगम
है वह-  'सत्यं शिवं सुन्दरम'.
शिवं के लोप में यही बन जाता
विकृत - विभत्स - असुन्दरम.

शिवं तत्त्व है, लोक-कल्याण
विभु - व्यापक है, यह कल्याण.
छोड़ दिया आज इस पक्ष को हमने
खो दिया मूल को दम्भ में हमने.

पहले हुए हम भौतिक वादी
अब बन गए हैं इन्द्रियवादी.
इन्द्रिय ने हाहाकार मचाया
श्रृग से गर्त में हमें गिराया.

यही है भष्टाचार का कारण
दुराचार अनाचार का कारण.
भौतिकता उसका सिद्धांत पक्ष
इन्द्रियवाद  पतन का कारण.

भौतिक पक्ष भी नहीं अचेतन
उसमे सुषुप्त चेतना, अवचेतन.
आनन्द नहीं सर्वोच्च उपलब्द्धि
यह बोध का केवल एक पक्ष.

आनंद तो सृजन का सर्वोच्च पक्ष
लेकिन जब सृजन नहीं, सर्जना नहीं
कोई क्रिया नहीं, कोई कार्य नहीं,
जानो, तब यह आनन्द भी नहीं.

सब शांत - विश्रांत - निष्क्रियता
संज्ञा इस अवस्था की 'शून्यता'.
इसका का अर्थ अस्त्तिवहीनता नहीं
है सब कुछ..., मात्र एक क्रिया नहीं.

सभी कार्य-क्रिया, आनन्द-विषाद
विलीन सभी इस शून्यता में.
इस सत्य को माना है सब ने
अध्यात्मवाद  और भौतिकवाद ने.
सुखवाद और शून्यवाद ने.

लेकिन जब तक क्रिया जगत में
नाम - रूप - कृति फैला जग में.
आनन्द की सत्ता ही सर्वोच्च,
यही सत्य सनातन आत्मबोध.

सत्यं को शिवं बनाना होगा
सुदर्म धरा पर लाना होगा.
भारतीय चिंतन का यही सार,
अपना ले यदि जगत संसार,
सुखी - आनन्दित बने संसार.
विश्वबंधुत्व का यही आधार.

आइन्स्टीन और हाकिंग ने
बहुत हद तक इसे सुलझाया है.
एक समन्वय पुल भी बनाया है.
प्रज्ञान- विज्ञान का दायित्व यह
उसे ही मिलकर कदम बढ़ाना है.

मिटती मानवता को बचाना है
मानस को पहुचा अतिमानस तक 
हाँ, दिव्य मानव उसे बनाना है.
हाँ, दिव्य मानव उसे बनाना है.

    
   -डॉ. जय प्रकाश तिवारी  












Sunday, June 24, 2012

...कितना है कठिन?


सात फेरों के बाद भी
जब सुर नहीं मिलते यहाँ.
दुनिया के इस सफ़र में
साथ बैठने से ही, साथ हैं हम,
कहना यह कितना है कठिन?

जब निवाला भी
छिन जाता हो मुह से,
थाली में राखी यह रोटी
हमारी ही है.
यह दावा करना आज 
कितना है कठिन?

हम निकलते है 
घर से बाहर प्रतिदिन,
लौटकर सकुशल आएंगे ही
करना यह आश्वस्त
आज कितना है कठिन?

सुरक्षित चलते हैं,
नियमों को पलते है, ठीक है.
ये भागम भाग वाले,
मोबाईल धारक चालक,
सुरक्षित चलेंगे ही,
करना यह विश्वास 
आज कितना है कठिन?

करते हो नमस्कार,
यह आदत और शालीनता तेरी,
अगला तुरंत सोचता है,
कोई काम होगा.
वह जवाब भी देगा,
कहना आज यह कितना कठिन?

         जय प्रकाश तिवारी
         संपर्क: ९४५०८०२२४० 

Saturday, June 23, 2012

भटक गए है आज लक्ष्य से,


हम भटक गए है आज लक्ष्य से, 
निज संस्कृति से हम दूर हो रहे.
अध्यात्म शक्ति को भूल गए, 

भौतिकता में ही मशगूल रहे.
पूर्वजों की उपलब्धियों में, 

छिद्रान्वेषण ही नित करते रहे.
परिभाषाएं स्वार्थ परक, 

परम्पराएँ सुविधानुकुल गढ़ते रहे
मोक्ष - मुक्ति, निर्वाण - कैवल्य, 
फना -बका में ही उलझे रह


श्रेष्ठतर की प्रत्याशा में, 
वर्चस्व की कोरी आशा में;
अंहकार - इर्ष्या में जलकर, 

अरे ! देखो क्या से क्या हो गए?
बनना था हमें 'दिव्य मानव', 

और बन गए देखो- मानव बम'.
इससे तो फिर भी अच्छा था, 
हम 'वन - मानुष' ही रहते.
शीत-ताप से, भूख -प्यास से, 

इतना तो नहीं तड़पते.


अरे! भटके हुए धर्माचार्यों, 
हमें नहीं स्वर्ग की राह दिखाओ.
कामिनी- कंचन, सानिध्य हूर का, 
भ्रम जाल यहाँ मत फैलाओ.
दिव्यता की बात भी छोडो, 
हो सके तो; मानव को मानव से जोडो.

अब रहे न कोई 'वन मानुष', 
अब बने न कोई ' मानव बम'.
कुछ ऐसी अलख जगाओ, 
दिव्यता स्वर्ग की; यहीं जमीं पर लाओ.
अब हमको मत बहलाओ ...
दिव्यता स्वर्ग की; इसी जमीं पर लाओ.

Friday, June 15, 2012

शरणागत हुआ अंगुलिमाल




ओ जाने वाले युवक सुनो !
रुको ! ठहरो ! तुम परिचय दो ! 
सुन्दर ललाट झोली भी सुन्दर
पट के अन्दर तन भी सुन्दर.

दिखने में तुम जितने सुन्दर 
झोली का माल उतना सुन्दर?
धन छिपा रखे इस झोली में,
देते धोखा बन साधु - फकीर.

अभिजात्य वर्ग के लगते हो
कोई बड़ा व्यापारी लगते हो.
बड़ा व्यापार जो करता है
यह छद्मरूप वही धरता है.

छिप - छिप करते हैं व्यापार
कर देने से करते हैं इनकार,
मैं मार- पीट के छिन लेता हूँ
अपना  हक  यूँ  ले  लेता हूँ.

मैं लेता छिन उनका सब धन
क्यों धनी हैं वे और हम निर्धन?
तुम भी रख दो चुपचाप यहाँ
हीरे -मोती जो लाये हो.

लूंगा  अगर,  मैं  खुद  तलाशी,
लूँगा उंगली, यदि करूँ तलाशी.
रहना है तुम्हे यदि सही सलामत
रख दो माल, टालो ये  क़यामत.

देखकर, माला उँगलियों की
भय से काँप तुम जाओगे,
निकालो झट -पट हीरे मोती
नहीं तो बहुत पछताओगे.

नहीं दिया किसी को अवसर इतना 
जितना तुमको मैं दे रहा हूँ,
कभी दया नहीं करता हूँ मै,
जाने क्यों आज मैं कर रहा हूँ?

बोलते नहीं, झोली उतारते नहीं
क्यों मंद - मंद मुस्काते हो?
हो गाँव के वासी या शहरी हो?
शठ हो? कृपण हो? या बहरे हो?

देखो ! मेरे इस तरकश को
तीर -तलवार और भाले को,
इसी के बल करता हूँ राज
यह अरण्य है मेरा साम्राज्य.

अरे... रे..., क्या गजब हुआ?
अब आगे बढ़ते मेरे पाँव नहीं,
अब चाहे मैं जोर लगाऊं जितना
उठते धरती से मेरे पाँव  नहीं.

ओ युवक ! क्या जादूगर हो तुम?
क्या यह जादू की माया है?
मैं अभी निकालता धनुष - बाण
न समझो तुम मुझको लाचार.

अरे..रे ...कहाँ गए मेरे सब तीर?
क्यों खाली हो गया मेरा तुणीर?
ठहरो !  तलवार  उठाता  हूँ,
तेरी  गर्दन  अभी   उडाता हूँ.
अरे..तलवार भी अकड़ गयी क्यों अब?
अब संग छोड़ रहे क्यों आयुध सब?
क्या सामने वाला कोई महापुरुष?
हाँ, हाँ. लगता है कोई दिव्य पुरुष.

मैं रगड़ आँख फिर देखता हूँ
वह तो जस का तस है खडा हुआ,
भाल पर उसके नहीं कोई भय
निश्चिन्त खडा, एकदम निर्भय.

जैसे जीवन से कोई मोह नहीं
धन जाने का भी क्षोभ नहीं,
मन में उसके हलचल ही नहीं
कहीं से भी, वह विकल नहीं.

मन में विचार क्यों आता है
जैसे वह मेरा मनमोहन हो,
खो गए थे जो इस जंगल बीच
जो कभी गाय चराया करते थे
माखन -मिसरी खाते थे नित.

नहीं - नहीं मुझको भरमाओ
ओ युवक बढ़ो ! मेरे पास आओ !
मैं मारूंगा अभी नहीं तुझको
इसलिए बढ़ो! मत शंका लाओ !

हाँ हाँ आओ ! इसी प्रकार से
हड़प लूँगा माल मैं इसी प्रकार से,
मन में यह सोच रहा था लुटेरा
सामने खड़ा युवक था निर्विकार.

जाने फिर क्या ऐसी बात हुई..
नयनों से नयनों की बात हुई,
क्या तुम मोहन को जानते हो?
क्या कर्मफल को मानते हो?

जा पूछो ! बीवी -बच्चों से
जो माल पाप कर लता हूँ,
परिवार का पेट मैं पालता हूँ
क्या 'पाप के दंड' को बांटेंगे?

हाँ, हाँ, ठीक ही तो यह कहता है
नहीं, नहीं, चाल कोई यह चलता है,
नहीं, नहीं, हमें चाहिए जरूर पूछना
मेरा कर्मफल है किसको  भोगना?

लेकिन युवक को जाने न दूँगा
आने तक तरु में बाँध रखूँगा,
क्यों युवक ! मेरी शतर स्वीकार?
हाँ भाई ! मुझे है यह स्वीकार.

बोलो.. बच्चों. ! .सब .. बोलो  ..
मेरे मन की राधिका तुम भी बोलो,
जो छिन के माल मैं लाता हूँ
जो पाप कर्म नित मैं करता हूँ.

जिसकी रोटी तुम सब खाते हो
घर  बैठ  के  मौज  उड़ाते  हो,
उसका दंड भी क्या तुम भोगोगे?
उसमे क्या साथ मेरा निभाओगे?

देखो बापू ! हम बच्चे हैं...
ये गूढ़ बात हम क्या जाने ?
लेकिन जैसा सुना है हमने
जो करता है, वही भरता है.

बीवी मुखर हुई, वह भी प्रखर हुई 
बीवी ने बच्चों का साथ निभाया,
कर्मफल भोग से पिंड छुड़ाया
पति को देर तक कुछ समझाया.

तुम मुखिया हो परिवार के
परिवार पालना दायित्व तेरा,
अब पाप-पूण्य को तुम जानो
योग - भोग सब तुम जानो.

कर्म चयन में मानव स्वतंत्र
पर फल के भोग में वह परतंत्र
यहाँ ऋषि - मुनि जो रहते हैं
सभी एकमत से यही तो कहते हैं.

सबका अपना - अपना कर्म
सबका अपना - अपना कर्मफल,
व्यक्ति स्वयं अपना उत्तरदायी 
फलभोग का, वही है उत्तरदायी .

एकबार हुआ था भागवत कथा
आचार्य ने यही सुनाया था,
ईश्वर ने दिया है क्यों विवेक?
सोच समझकर करो प्रयोग.

तुमसे भी कहा था चलने को
लेकिन  मेरी  कब  सुनते  हो?
किया है हमेशा ही मनमानी
अब भी तो वही सब करते हो.

जब वापस लौटा अंगुलिमाल
एकदम से बदला -  बदला था,
गायब थी ऊँगली की माला.
वेश भी बहुत कुछ बदला था.

अंतर में ज्योति सी जल रही थी
मलिनता सारी स्वतः घट रही थी,
अब पाप -पूण्य का बोध हो रहा था
कृत कर्म उसे अब कचोट रहा था.

क्यों भोगूँ मैं, कर्मफल अकेले?
हाय! कितने जन्मों तक भोगूंगा,
मन में स्नेहिल फिर एक भाव जगा
चलो उस युवक से ही अब पूछूंगा.

आखिर प्रश्न उसी ने उठाया है
अब आगे राह भी दिखलायेगा,
चाहे  वह  जो  कोई  भी  हो..
गीता सी उत्तम बात बताया है.
आज  गुरु  उसे  ही  मानूँगा
नहीं रार उससे कभी ठानूंगा,
वह सचमुच है कोई दिव्य पुरुष
आह ! मिला मुझे आज सतपुरुष.

युवक ने भी अपनी कथा सुनाई
गौतम से बुद्ध तक की बात बताई,
देखकर समर्पण और अनुराग
कर दीक्षित संघ में, राह बतायी.

उसकी सब बिगड़ी बात  बनायी
अंगुलिमाल  अब  बन  गया  भिक्षु,
बुद्धं शरणं गच्छामि, संघं शरणं गच्छामि,
धम्मं शरणं गच्छामि, धम्मं शरणं गच्छामि. 




Thursday, June 14, 2012

मेरी रचना पुष्पों की माला



हे चिन्तक! तुझे प्रणाम!!, आज प्राप्त हुए मुझे,'अनुभूति के विभिन्न सोपान'.
चाहता हूँ उन्हें दीप मालाओं से सजा दूँ, क्योकि अब पूरे हुए मेरे अरमान, 

होती है जब मन में हलचल, तो करती है यह यात्रा: संदेह से सत्य तक का.
देख गुरु-शिष्य बदलते समीकरण, आया ध्यान 'समीकरण: तम और प्रकाश का. 

पूछता हू समीक्षकों- परीक्षकों से, आज के प्रखर चिंतकों से एक छोटा प्रश्न.
यह बसंत क्यों हुआ असंत? और कैसा है सितारों के उस पार का संसार? 

यह बात शब्द सम्प्रेषण की है, अब करो चाहे मुखर हो के या मौन वार्तालाप.
अब बहुत हो गया , ज्यादा बक - बक मत करो, शब्दों को अपने सरल करो.

कहते हो तो मान लेता हूँ, मेरी बात भी मानो, अँधेरी गुफा को दीपक बना लो.
हिम्मत न हार, यदि चुनौती दे रही है रात,  रे मन! अपना कदम बढ़ाओ तुम!

कमाल है, इस कविता की ऐसी महिमा, देखो गधे तक बन गए इंसान.
लेकिन आदमी, आदमी नहीं बन पाया, आखिर तड़प यह छोड़ दूं कैसे?

होती है जब मन में हलचल, उठते हैं भाव, होता है संवेदनाओं का उत्कर्ष.
प्रेम ही सृष्टि में गति का कारण, ऐसी ही है,यह प्रेम गति आदि से अब तक. 



                                                        डॉ. जय प्रकाश तिवारी
                                                        संपर्क: ९४५०८०२२४०