Monday, April 30, 2012

गीतामृत अर्जुन को ही क्यों?




युद्धिष्ठिर तो धर्म धुरंधर थे
गदाधर भीम थे बलशाली,
पर गीताज्ञान अर्जुन को क्यों
पूछे यह प्रश्न मन का माली.

ज्ञान उसी को मिलता है
जो होता है, उसका अधिकारी,
उसको भी सहज ही मिल जाता
जो 'वरण' यथेष्ट को करता है.

कन्या करती वरण है वर को
करता है शिष्य गुरु को वरण,
वारनेय अपना धर्म निभाता
देता है उसको उर में शरण.

योगी पाते जिसे कठिन योग से
तपसी जिसे कठिन तपस्या से,
पाता जिसे पुरुषार्थी कर्मयोग से
शरणागत पाता उसे वरेण्यं से.

अर्जुन ने मान श्रुति का निर्देश
किया था वरण, सखा कृष्ण को
ठुकराके धनबल जनबल सैन्यबल 
वारनेय धर्म ही हुआ प्रस्फुटित 
रणक्षेत्र मध्य वहाँ, कुरुक्षेत्र के.     


Friday, April 27, 2012

बात अब कविता की


कविता की 
बात अब मत पूछ यार!
वह है सम्पूर्ण जीवन व्यापार.
जिसने सुनी नहीं, पढ़ी नहीं
लिखी नहीं कोई कविता.
समझो बही ही नहीं उसके
जीवन में रस की कोई धार.
सुखट्टू ..और निखट्टू ..
है वह, केवल जीता है,
क्योकि जीना है उसे.
मरना वह जनता ही नहीं.
और जो मरना नहीं जनता,
वह जीना क्या खाक जानेगा?

यह जीवन 
तो कविता नहीं, 
जीवन तो है क्षणभर का.
कविता मगर नहीं क्षणिका .
जी ले जीवन जो क्षण भर ही 
जीवन उसका समझो कविता.

कविता 
तो शब्द सरिता है जो 
स्रोत से फूट कर बहती है.
जिसमे शब्द ध्वनि उछलती है
कूदती है, फुदकती है, डूबती है
तैरती है...फूटती है..पुनः पुनः
उगती.बनती और .रंग बदलती है....

कविता,

शब्दों में ही नहीं बहती
संकेतों में ही नहीं झरती
बादलों में ही नहीं कड़कती.
मेघों से ही नहीं बरसात.
भाव- स्वभाव में भी बहती है.
जीवन में हर रंग घोलती है.

कविता,
अश्रु जल से यदि 
मित्रता के पाँव पखारती है 
मित्रभाव शिखर तक पहुचती है
तो नयनों की धार में
इस धरा को डुबोती भी है.
अन्त नहीं इस कविता की 
ऊंचाई और गहराई का.


कविता,
संकेत प्रतीकों में भी बहती है,
झरना प्रपात सा उछलती कूदती है.
और सबसे प्यारी कविता तो वह है
जो प्रेषक और संग्राहक के बीच.
संकेत और मौन में बहती है.
संकेतात्मक कविता जीवन की सौगात
सुना नहीं है?  क्या पता नहीं है ?
'भरे भवन में करत हैं नैनं ही सो बात'.

कविता 
कोई विकार नहीं
मानसिक तरंगों का आकार है. 
ध्वनि ऊर्जा से भाव ऊर्जा तक
आसानी से पहुचती है और
बड़ी प्रबलता से अपनी बात कहती है.

कविता है 
वीरांगना, चंडी रणचंडी 
जो जगाती है -
जोश शौर्य साहस सत्साहस.
शत्रु दमन तो सरल है, 
शस्त्र भी कर सकता है यह.
परन्तु कविता शत्रुता 
और दुश्मनी मिटती है.
शत्रु को भी मित्र बनाती है.
कवता सिखाती है जीने की 
कला, और मरने का ढंग.

कविता, 
केवल कागजों डायरियों और 
कनवास पर ही नहीं लिखी जाती.
य्ह्पूरी प्रकृति एक काव्य है.
आकाश धरती चाँद सितारे
उपवन खिलते फूल ये सारे
इन्द्र धनुष पतझड़ बसंत
शीत ग्रीष्म ये रूप अनंत.
ये एक-एक सर्ग, अध्याय हैं
इस प्रकृति महाकाव्य के.

कविता,
लय राग और छंद की भूखी नहीं.
इसलिए प्रत्येक संवेदी व्यक्ति
एक मन पसंद कविता गुनगुनाता है.
कुशल गायक भले संतुष्ट न कर सके उसे.
लेकिन स्व-गायन संतुष्ट कर जाता है.
अपनी उलझनों का समाधान
वह इस कविता में ही पा जाता है,'




 .

Thursday, April 26, 2012

हाँ, सो रहा था मैं


कहते हो प्यारे!
तो मान लेता हूँ,
हाँ, सो रहा था मैं.
चहरे पर देखा होगा 
रंग तूने हास का.
मगर तुझे क्या पता?
तब रो रहा था मैं.
हास के दर्द को
तब ढो रहा था मैं.

हर बार आंसू गिरना ही 
रोना नहीं होता.
हर हास भी ख़ुशी का 
प्रतीक नहीं होता.
जैसे हर आंसू भी 
दुःख में सना नहीं होता.
आंसू हर्ष - उल्लास के 
अतिरेक में भी बहते हैं.
शबनम के मोती झरते है.
क्या रोना.. 
उसे तब भी कहते हैं.?

हाँ, सो रहा था मैं..
लेकिन खुले हुए थे नैन.
खुले हुय्र थे बैन,
खुला हुआ था कान.
सोया था या जगा हुआ, 
अब तू ही इसे पहचान.

कुछ जप रहा था, 
कुछ तप रहा था.
क्योकि 
पलायन वादी नहीं,
समाज का रोगी हूँ.
क्या करूँ भोगी नहीं
कर्मठ योगी हूँ.

जब देखती दुनिया 
वाह्य जगत को,
योगी अन्तः जगत 
को देखता.
जब सारी दुनिया 
नींद में होती
योगी दुनिया की 
गति देखता.

                          जय प्रकाश तिवारी
                             26 - 04- 2012



Wednesday, April 25, 2012

तख़्त और दरख़्त


तू वहीँ रह !
वह जो ऊंचा तख़्त तेरा.
अपनी जगह को 
खूब पहचानता हूँ मै.

शोभायमान तू खूब है
इस ऊंची जगह पर,
अवतरण हो तेरा,
मुझ नाचीज खातिर,
हरगिज नहीं चाहता हूँ मै.

देखकर आहें न भरना
मेरी दशा का कारण तू नहीं.
चाहो तो लुढका देना एक कंकरी.
अब कब शांति चाहता हूँ मै?

मेरे लिए क्या कम है यह?
हो विराजमान जिस तख़्त पर;
सूखा उसका दरख़्त हूँ मै.

                                जय प्रकाश तिवारी 
                                संपर्क: ९४५०६०२२४० 

Tuesday, April 24, 2012

कहनेवाले इसी को कालोनी/शहर कहते हैं.

जहां रहता हूँ मैं वहाँ कुछ ही वर्षों में कट गए हरे पेड़.
उग आये हैं अब नए - नए पेड़, बाग़, उपवन और बगीचे.

सजीव लताओं के नहीं, पत्थरों कक्रित, मौरंग सीमेंट के.
यहाँ हरियाली भी है क्योकि लोगों ने पुतवा रखीं हैं दीवारें.


यहाँ चिड़िया नहीं चहकती, यहाँ महिलाएं चहकती है.
यहाँ भौरे नहीं गुनगुनाते, यहाँ मनचले गुनगुनाते हैं.
यहाँ मधुमक्खियों के छत्ते, दूर तक भी नजर नहीं आते, 

लेकिन कमी खलती नहीं, यहाँ आदमी ही डंक मारते है.

इस बाग़ में स्वच्छ  सुरभित वायु नहीं मिलती.
यहाँ पर मिलती है - नालियों की सड़ी बदबू.
सड़कों से उड़ते कागज़ पन्नी, पाउच के टुकडे.


सावन में यहाँ कजरी नहीं होती, 
छत पर भी कभी झूले नहीं पड़ते.
लोग जरूर झूल जाते है पंखों से. 

लोग आपस में न गले मिलते हैं
न लट्ठ चलते है, गाव की तरह.
यहाँ कट्टे और आग्येयास्त्र चलते हैं.

पालतू चौपाया भी सड़कों पर घूमते हैं.
स्पंदन - संवेदनाएं तो कहीं दीखती नहीं.
आखिर हम पत्थरों के बाग़ में रहते हैं,
कहनेवाले इसी को कालोनी/शहर कहते हैं.

Monday, April 23, 2012

बात की बात

बात की बात में हम 
यूँ ही बोल जाते हैं कई बात.
लेकिन क्या जानते हैं-
उस बात की पूरी बात ?

कोई बात: मात्र एक बात नहीं,
यह होती है उसकी - 'औकात'.
होती है पहचान उससे ही
उसके व्यक्त्तित्व की,
देश की, धर्म की, जाति की.

जिस बात में न हो दम,
मत करो उसकी कोई बात.
करना हो तो करो उसकी बात
जो बात की बातों में दे दे,
बड़ो - बड़ों को भी मात.
कुछ कर दे ऐसी बात कि
चतुर्दिक हो उसी की बात.

बात तो दरअसल वह 
जो बना दे बिगड़ी बात.
लाये सबकी ख़ुशी के लिए
एक से बढकर एक सौगात.

हमें याद है माँ की सिखाई बात,
बात वह जो न पहुचाये आघात,
लेकिन कर दे करामात.
जगा दे झकझोर कर उन्हें 
जो अभी भी निद्रा और तंद्रा में.

इतना तो जनता हूँ -
बात वह शक्ति, बिगाड़ा काम बना दे,
बात वह शक्ति, बनता काम बिगाड़ दे.
बात से मिलती यहाँ, सोने की जंजीर,
मिलती यहाँ बात से ही, लोहे की जंजीर.

आखिर बात में ऐसी क्या बात है?
क्यों करता दोनों तरफ आघात है?
यदि बात मिल जाय तो पूछू उससे,
अरे यार! किस मिटटी का बना है तू?
किस कालेज में आखिर पढ़ा है तू?

अरे प्यारे !  इतना तो बता दे-
क्या है तेरी असली राज की बात?
कुछ सिखा दो न हमें भी...,
बन जाए जिससे हर बिगड़ी बात.







Sunday, April 22, 2012

यादें



आज फिर
जाने क्यों
तेरी याद आई
तो बहुत.. आई.

खो गए थे
जो पुराने शब्द.
अपने साथ वे,
भावार्थ लाये
बहुत कुछ
निहितार्थ लाये.

जनता हूँ
खो गयी है
पहचानने की
शक्ति तेरी.

जानकर
यह स्थिति
मेरे अनुराग,
मेरी प्रीति
और भक्ति
और भी
बढ़ गयी है.