Wednesday, October 26, 2011

जलाओ एक दिया उनके नाम का भी




जलाओ  दिए  पर, रहे ध्यान उनका,
सीमा से लौट के, जो घर को न आये.

किया था जो वादा, हम अबकी जो आये.
गले  में  तेरे हार, अबकी  पहनाएंगे  हम.


उसने पूरा किया, अपना वादा वह निभाया.
गले धर्मपत्नी के, 'परमवीर चक्र' पहनवाया.

झुकाती रही थी बीबी सिर, अब तक सभी को.
आज पूरे देश ने, झुककर शीश उसको नवाया.



यूँ  पूरा  किया,  अपना  वादा  भी  निभाया.
निभाया वह सब कुछ, बस लौट के न आया.

तुम जलाना एक दिया, ऐसे वीरों के नाम.
होगी यह एक कृतज्ञता, शहीदों के नाम.



जलाना एक  दिया,  उन  बेनामों  के  भी  नाम.
हमारी आजादी के लिए, अपना सब कुछ मिटाया.

हमारे स्नेह का एक दीप, यह समर्पित है उन्हें.
हमारे प्रेम का एक दीप,  यह  अर्पित  है  उन्हें.



हमारे ये श्रद्धा-सुमन, पहले उन्ही को अर्पित.
हे राष्ट्र नायक! यह तन - मन तुम्हे समर्पित.



Sunday, October 23, 2011

अबकी दीपावली कुछ यूँ मनाते हैं

दोस्तों! आइये इस वर्ष,
दीपावली कुछ यूँ मनाते हैं -
तन को अपने दिया बनाकर 
सत्कर्मों का घी जलाते हैं.
सद्विचारों की बाती बनाकर,
मंत्रो से प्रज्ज्वलित करके,
इस दीपक के उज्जवल प्रकाश में -
निर्मल-प्रशांत-निर्विकार भाव से,
वेद-पुराण-कुरान-ग्रन्थ को मिलबैठ,
साथ - साथ फिर से, इसे दुहराते हैं.
अबकी दीपावली कुछ यूँ मनाते हैं.

करते आह्वान हम -
व्यास, याज्ञवाल्क्य, दधीचि को, 
ईसा - मूसा - मुहम्मद को भी. 
कबीर, रैदास, नानक, समर्थ को,
गार्गी,मैत्रेयी.भारती, मीरा 
और राबिया को आदर सहित बुलाते हैं.

बुद्ध, महाबीर, और शंकराचार्य से,,
विवेकानंद - दयानंद से;समझते हैं आज -
उनके कथनों का मर्म, अर्थ, निहितार्थ.. 
अपनी ईर्ष्या, मूढ़ता, द्वेष को जलाते हैं.
अबकी  दीपावली  कुछ  यूँ मनाते हैं.

देखा है हमने -
यहाँ कभी आस्था के नाम पर,
कभी धर्म और मजहब के नाम पर,
प्यारे से घरौंदे, हैं तोड़ दिए जाते,
खुदा के बन्दों द्वारा खुदा के नाम पर,
बस्तियाँ रौदे जाते, जला दिए जाते.
लोग मानव से हैवान बन जाते हैं.
इस पर्व पर उन्हें एक राह दिखाते हैं.
अबकी दीपावली कुछ यूँ मनाते हैं.

देखा है हमने -
करके कुकर्म ये मजहबी लोग,
खुदा के घर में ही छिप जाते. 
पर, खुदा है क्या? नहीं जानते.
वह चाहता क्या? नहीं जानते.
धर्म तत्त्व को नहीं पहचानते.

कराह रही मानवता कब से?
चित्कार रही कब से इंसानियत?
लेकिन मानव दिल नहीं पिघलता.
अभी भी, बम फोड़ने की है -
कुत्सित, कलुषित उसकी इच्छा.
हो गए हम कितने पतित आज,
बनना था हमें, एक 'दिव्य मानव',
बन गए देखो, हम 'मानव बम'.

अब,
ऐसी अलख जगा देना है -
जगमग हो जाये धरा यह,
सद्भाव, स्नेह की रौशनी से.
सत्कर्मों के उज्ज्वल प्रकाश से,
इस धरा को हम चमकते हैं.
ईर्ष्या, वैमनस्य, द्वेष दूर भागते हैं,
अबकी दीपावली कुछ यूँ मनाते हैं.

Thursday, October 20, 2011

दीपक तेरे रूप अनेक


दीपक, 
तन ही नहीं जलाता, 
वह मन भी है जलाता.
धूम-धूम जलता दीपक, 
नहीं किसी को भाता.

जब तक 
शोणित की हर बूँद 
न निकल जाय.
जब तक तेल की 
हर बूँद न जल जाय.
दीपक, हार नहीं मानता, 
तो फिर नहीं मनाता.

दीपक का ताप ही,
सागर में बडवानल है.
दीपक का ताप ही,
काया में जठराग्नि है.

दीपक का 
ताप ही धरा को 
फोड़कर बाहर आता.
यही कभी सुप्त, 
और कभी धधकता
ज्वालामुखी कहलाता.

प्यारे !
केवल दीपक का 
यह लौ मत देखो,
लौ का रूप देखो,
बदलता स्वरुप देखो.

आज 
रामलीला मैदान में,
राम के तीर और
रावण के सिर में
उसी की आग है.

दीपक को
प्यार दो! भरपूर दुलार दो!!
उसे कौतुहल मत बनाओ.
दीपक तो स्वयं जल रहा, 
उसे तुम और न जलाओ.

दीपक
जब तक है मर्यादित,
घर की धवल चिराग है.
जब तोड़ दिया मर्यादा,
वह जंगल की आग है.


Friday, October 14, 2011

पहुचे बुद्ध यशोधरा द्वार




स्वागत, स्वागत, हे आर्यपुत्र !
वंदन  तेरा अभिनन्दन  तेरा.
कैसे  करूँ  मैं  तेरी  आरती?
रह गयी कहाँ पूजा की थाली?

पधारो ! पधारो ! हे भगवान् !
सबरी  की कुटिया के  श्रीराम.
मैंने त्याग दिया है वैभव सारा,
हुआ जब से ओझल राम हमारा.

 

रख  ली  लाज  तूने  अब  मेरी,
यह करुणा-अनुग्रह-दया है तेरी. हे नाथ ! तुच्छ  मैं  नारी  हूँ,
इस  गौरव  हेतु  आभारी  हूँ.


हे धरा के यश! मेरी बात सुनो,
नारी तुच्छ नहीं,  बड़ी  भारी  है.
तप में, त्याग में, शील-संयम में,
सेवा - कर्म - साधना - भक्ति में,
यह नर जब तक रहेगा धरा पर 
होगा वह नारी जाति का आभारी.

पुरुष तो है बस मानसिक ज्ञान,
यह नारी ही उसकी मनः शक्ति.
पहचान ज्ञान की इसी शक्ति से
जीवन भी उसकी इसी शक्ति से.
मात्रि  रूप  में  सर्जक  है  वह.
भार्या  रूप  में  मन  की  आशा.
बहन  रूप  में  स्नेह  वही  है,
पुत्री  रूप  वह  है - अभिलाषा.


जब  भिक्षु  रूप  में  आये  हो,
मुझको भी तुझे कुछ देना होगा.
करती  हूँ  अर्पित  राहुल  को,
शोणित के लाल को  झोली  में.
इसे  करो  तुम  अंगीकार,
हे नाथ !  हमारा  तुच्छ दान.
तेरी चरण धूलि को पा करके,
मैं  हुयी  धन्य  सब पा करके.


रोकूंगी नहीं तुम्हे पथ से,
निज हाथों तिलक लगाउंगी.
तेरा  पथ  है - 'विश्व कल्याण'.
नहीं चाहत मेरी निज कल्याण.
मैं   पंथ   निहारे   बैठी  हूँ,
हूँ गर्विता, भाग्य पर एंठी  हूँ.
तूने  लौटाया  मुझे  मेरा  मान,
एक क्षत्राणी का किया सम्मान.


अब नहीं बचा कोई उपालंभ,
देखते ही दूर सब क्रोध-दम्भ.
हुई  आज  फिर  सद्गति मेरी,
मुक्ति की हुई अभिलाषा  पूरी.
अब कह लो चाहे 'निर्वाण' इसे,
या कह लो निज मन का अर्पण.

जो  भी  है  अब,  सब  है  तेरा,
तुझको  अब  सर्वस्व  समर्पण.
कृत कृत्य हुयी, कोई  रंज  नहीं,
निर्वाण के  संग, कोई जंग  नहीं.
मेरा उद्देश्य भी अब जन कल्याण,
अनुगामिनी  तेरी, हे कृपानिधान !







यह  है एक नारी का  सम्मान,
ज्यों शबरी और द्रौपदी का मान.

तुम्हे  पूजती  दुनिया  सारी,
कहाँ  तुच्छ  मैं  गृहिणी नारी.
मैंने  आज सब  खोया  पाया,
तूने सर्वस्व मुझे आज लौटाया.