Wednesday, August 24, 2011

कुछ तो शर्म करो मेरे भाई !

कुछ तो शर्म करो मेरे भाई !

लड़ाई और जंग कौन लड़ता?
वह तो लड़े - 'सिपाही'.
अन्ना तो है, असल सिपाही
उसने अपनी फ़र्ज़ निभाई
तुम सो रहे घर में, क्यों भाई?

मिट्टी का कर्ज चुकाएगा,
वह अपना फर्ज निभाएगा,
वह भ्रष्टाचार मिटाएगा.
किया आवाहन जनता का,
जनता सड़कों पर निकल पड़ी.

बच्चों ने स्कूल है छोड़ा,
छोड़ी कालेज तरुणाई.
नौकरी से अपने छुट्टी लेकर
ले रहा युवा वर्ग अंगडाई.
सारे वर्ग हैं शामिल उसमे,
हिन्दू-मुस्लिम-सिक्ख-ईसाई.
तुम सो रहे घर में, क्यों भाई?

छोड़े किसान है, खेत-खलिहान
है नारी छोड़े सब चौका .....,
पहली बार कोई टीम है देखा
जिसमे, केवल छक्का- चौका.
चिपके हो सत्ता की कुर्सी से,
जैसे पूरी हो, फेविकोल लगायी.
कुछ तो शर्म करो मेरे भाई !

तीर - कमान, वे क्यों लावें ?
वे 'शब्द - तीर', ले निकल पड़े.
कुछ लेकर लेखनी निकल पड़े,
कुछ ब्रुश को लेकर निकल पड़े.
देखो, उनकी रचनाओं को ,
माइक पर कैसे उछल रहे ?

चहरे पर छपा तिरंगा देखो,
उसमे भारत एक नंगा देखो.
अब तक देखा तूने बहुतों को,
अन्ना, एक अलग तुम देखो.
अब तक देखा है, बहुतों को.
कथनी-करनी के अंतर को.
उनके वादों और ईरादों को.

अब अन्ना को, मैं देख रहा हूँ.
वाह्य की सादगी, अन्तः का बल,
उमड़ता देशप्रेम, देख रहा हूँ.
उनकी शक्ति, शौर्य, ऊर्जा को,
समर्पित जीवन राष्ट्र भक्ति को,
आशान्वित होकर देख रहा हूँ.
तुम क्यों सो रहे मेरे भाई?
कुछ तो शर्म करो मेरे भाई?

Monday, August 22, 2011

सोचो! फिर से उसदिन को सोचो !!


देशभर में, जगह - जगह पर,
गाँव-गाँव और शहर-शहर में
हाथ में कैंडिल लिए,
कहीं मौन - कहीं मुखर
इन जुलूसों में हैं -
सम्मिलित, बच्चे और बूढ़े,
लंगड़े-लूले, अमीर-गरीब
नर-नारियों का बड़ा हुजूम.
इस उमड़ते-घुमड़ते,
शांत जन सैलाब को केवल
जुलुस मानना, एक भूल है.
कैंडिल को कैंडिल कहना भूल है.


अरे!
अपनी नैसर्गिक प्रवृत्ति के विरुद्ध,
बच्चों ने चीखना-चिल्लाना छोड़ दिया,
और हो गए थे मौन, एकदम से मौन.
इस मौन को, इस निःशब्दता को,
इस रोष को, क्रोध को, इस तेवर को,
सन्देश विहीन मानना बड़ी भूल है.



इसमें सन्देश
मात्र उतना ही नहीं,
लिखा है जितना,
तख्तियों-बैनरों पर.
केवल उतना ही नहीं,
जितना...लिखा चिकने हाथ के
खुरदुरे छालों ने.
जितना लिखा,
पाँव में फटी बिवाइयों ने.


असली सन्देश तो
वह है जिसे,
दिल-दिमाग पर,
मजबूर आंसुओं ने,
लिखा है
अपने खून से,
दर्द की कलम से,
गहरे- घावों,
रिश्ते-जख्मों की लिपि में.


क्या होगा उस दिन?
जिस दिन हो जायेगी उग्र, यह जुलूस ?
टूटेगा उनके सब्र का तटबंध.

कौन रोक पायेगा,
उस ज्वाला को - ज्वार को?
उस दिन को सोचो!
फिर से उस दिन को सोचो !!

जब फूटेगी ज्वालामुखी,
जब...जब निकलेगा -
गर्म पिघला लावा और राख.
मचेगी एक भयानक
चित्कार.., हाहाकार..,

एक बार फिर...
उस दिन को सोचो!
फिर से सोचो!!
यूँ तो लोहा होता
बहुत कठोर और बेहद मजबूत,
लेकिन वह भी पिघलता है कैसे?
यह भी सोचो !!

Wednesday, August 17, 2011

चकवी की आस आज फिर टूटी


कूक रही है कोयक काली,
संध्या की रक्तिम ये लाली.
ऊपर नभ में घटा घिरी है,
नीचे फैली है - हरियाली.

देखो प्रकृति का खेल निराली,
सुरभित मंद पवन मतवाली.
छाई कपोल में देखो लाली,
तुम छिपे कहाँ हो बनमाली?

कूक पिक की हो गयी बंद,
मिल गया उसे पिया का संग.
जाने क्यों भाग्य उसकी है फूटी?
चकवी की आस आज फिर टूटी.

देखकर तप-त्याग चिरैया की,
तरु ने पत्ते भी त्याग दिया.
लेकिन वह कितना है निष्ठुर,
अब तक न उसे है याद किया.

सुनेगा कौन उसकी फ़रियाद?
न जाने कब से कर रही है याद?
कब छातेगी यह रजनी की बेला?
कब आएगा उज्ज्वल प्रात सवेरा?

Monday, August 8, 2011

दो पक्ष: मौन के

दो पक्ष: मौन के
निःशब्दता और मौन के,
दीखते है - दो पक्ष.
प्रथम मौन, शिशु की 'अज्ञता'.
द्वितीय, ज्ञान की - 'दिव्यता'.


बीच, इन्हीं दो पाटों के,
बिखरी और सिमटी पड़ी हैं-
हमारी अनुभूतियाँ, संवेदनाएं.
शब्द - प्रतीक और रचनाएं.


शब्दों से, अ-शब्द हो जाना,
निः शब्दता, मौन धारण करना.
प्रगति है; साधना की, आराधना की.
चेतना-दिव्यता की, ज्ञान- प्रज्ञान की.


जिसमे गति है, ऊर्जा है.
अनेकत्व तक से, एकत्व तक की.
अंततः, अलिंगी एकत्व का भी लोप.
निःशब्दता में, दिव्यता में शून्यता में.


यह तो रूपांतरण है,
गतिज ऊर्जा की, स्थितिज ऊर्जा में.
इस शून्यता में है, पतझड़ - बसंत.
जहां एक नहीं, सहस्रों अनंत.

Saturday, August 6, 2011

यदि मौन बड़ा तो लेखन-प्रवचन क्यों?

यदि मौन ही,
सत्य की अभिव्यक्ति है -
तो लेखक, चिन्तक, कलाकार और
कवि लेखनी क्यों है उठता ?
कैनवास पर ब्रश क्यों है चलाता ?
शब्दों का भ्रम - जाल क्यों फैलता ?
अपनी अनुभूतियों, अपने बोध को,
जन सामान्य के बीच क्यों है लाता ?

क्यों कि;
चिन्तक, कवि और सत्यद्रष्टा,
निरा-स्वार्थी नहीं; संचयी नहीं,
होता है वह - 'लोकमंगलकारी..
कामना लोकमंगल क़ी,
किये रहती है उसे
व्यग्र, बेचैन और परेशान.
संवेदनाएं शांत बैठने नहीं देती.
आंतरिक ऊर्जा के प्रवाह में ही,
वह ब्रश और लेखनी उठाता है,
पूरी क़ी पूरी कापियां, डायरियां
और कनवास को रंग जाता है..

वह जनता है -
सत्य ही परम है, परम ही सत्य है.
यह दृश्य तो अदृश्य का ही विवर्त है.
सत्य, गूंगे का गुड है.
सत्य अकथ्य अवश्य है, 'अबोध' नहीं.
दुर्बोध है, अदृश्य नहीं .
सत्य साक्षात्कार के लिए चाहिए,
दिव्य चक्षु, अंतर्दृष्टि, आत्मबोध.
और ...उस मौन को प्रखर रूप में,
सुनने, समझने क़ी क्षमता.

साहित्य, प्रतीक और चित्र..,
करते है विकास उसी क्षमता का.
साहित्य, प्रतीक और चित्र,
आधारशिलायें हैं, उपयोगी दवाएं हैं,
अंतर्दृष्टि की, संवेदना जागृति की.
अशब्द को जानने की ललक,
जागृत की जा सकती है -
शब्दों.- प्रतीकों - चित्रों से ही.
निहारा जा सकता है -
उन 'अरूप' को सरूप में ही.
निर्गुण के परख की विधा,
गुम्फित है इन गुणों में ही.

इसलिए,
चिन्तक, कवि और कलाकार,
निभाता है, अपना लोक धर्म.
अपनी अनुभूतियाँ बताते - बताते,
हो जाता है स्वयं, एक दिन -'मौन'.
और इस प्रकार, प्रलय से सृष्टि,
और सृष्टि से प्रलय का ,
पूरा एक चक्र, कुशलता से दुहरा जाता है.
सृष्टि के गूढतम - गुह्यतम - रहस्यमय,
सत्य को, बात की बात में ,
कितनी सरलता से समझा जाता है.

Thursday, July 28, 2011

दूर तक जाना है हमको

आशा है अलख जगा रही
अब आगे बढ़ते जाना है.
किया है जो मन में संकल्प
अब लक्ष्य उसे ही पाना है.
तिमिर की औकात कितनी?
परिव्याप्त हो चाहे ये जितनी.
वह जानती इस बात को भी
यहाँ अब है नहीं मेरा गुजारा.

यहाँ उषा की लालिमा
नभ के पटल जब छाएगी,
हो तिमिर या तम घनेरा
नजर क्या फिर आएगी?
यह जीवन महासंग्राम है
इसमें कहाँ विश्राम है?
फिर श्रृंग हो, या गर्त हो;
नाप लेंगे हम ये दूरी,
गगन का अवकाश हो,
अन्दर मही की पर्त हो.

रोक क्या पायेंगे हमको,
छल - कपट की ये बाधाएं.
दूर तक जाना है हमको
पार करके ये अवरोध सारे.
तिमिर की औकात कितनी?
परिव्याप्त हो चाहे ये जितनी.
दूर तक जाना है हमको
पार करके ये अवरोध सारे.

Saturday, July 23, 2011

हे ब्लोगर! तुम क्यों सुस्त पड़े एक शंख, जोर से फूंको न.

हे ब्लोगर! तुम क्यों सुस्त पड़े?
तुम ब्लोगर हो, एक सर्जक हो.
तुम इस देश के पीड़ा भंजक हो.
यह माना! तुमको अधिकार नहीं,
पर,
दायित्व को क्यों तुम भूलते हो?
अपनी शक्ति को क्यों तुम भूलते हो?
क्या इस देश से तुमको प्यार नहीं?

हे ब्लोगर! तुम क्यों सुस्त पड़े?
तुम्ही चिकित्सक, तुम सर्जन हो,
शिक्षक हो तुम, तुम हो सन्यासी.
तुम नदी - सरोवर तट के वासी.
रहते जो दूर गाँव में, तुम हो.
जो रहते शीत गृहों में, तुम हो.
विज्ञान रूप तू प्रयोगशाला में,
तुम यति रूप हो, यज्ञशाला में.
क्षमता को अपनी तुम पहचानो,
नया दायित्व अपना तुम जानो.

हे ब्लोगर! तुम क्यों सुस्त पड़े?
तुम को ही, अलख जगाना है,
भारत एक नया बनाना है.
ऐसा भारत, जो भ्रष्ट न हो,
ऐसा भारत, जो त्रस्त न हो.
जो मजबूर न हो, किसी कोने से,
जो भरपूर हो,, चांदी - सोने से.

हे ब्लोगर! तुम क्यों सुस्त पड़े?
एक शंख, जोर से फूंको न.
छेड़ो तान, जगें सब विस्तर से,
अब रहे न कोई, निद्रा में.
अब रहे न कोई, तन्द्रा में.
देशभक्ति का पाठ, पढ़े वे फिर से,
जो गए भटक, किसी कारण से.

हे ब्लोगर! तुम क्यों सुस्त पड़े?
छेड़ो ऐसा तुम, दीपक राग,
घर - घर में जलती रहे चिराग.
चाहे हो निर्धन या दुखियारा,
हो दोनों समय चूल्हे में आग.
अपनी रोटी मिल - बाँट के खाएं,
मिल- बैठ के बिगड़ी बात बनायें.

हे ब्लोगर ! तेरे हाथ मशाल,
ऐसा प्रस्ताव कोई लाओ न,
जनता को तुम समझाओ न.
क्यों लूट रहे हो अपना देश?
क्यों फूंक रहे हो, घर - दरवेश?
लूटकर अपनों को, क्या पाओगे?
आएगी समझ, बहुत पछताओगे.

हे ब्लोगर ! छेड़ो ऐसी झंकृत तान,
गर्जन हो जिसमे, हो स्वाभिमान..
हो देश का जिससे, दुनिया में नाम.
हम रहें सतर्क, करें खुद निगरानी,
हों विफल शत्रु, उनके अरमान.
एक खौफ सा, उनमे छा जाए.
फिर दुबारा, आने का लेवें न नाम.,
हे ब्लोगर ! छेड़ो ऐसी झंकृत तान,
एक शंख, जोर से फूंको न.
गर्जन हो जिसमे, हो स्वाभिमान..