सायंकाल की रक्तिम लालिमा
धरती की छिट-फुट हरीतिमा
के मध्य नीले आकाश में,
लय में पंक्तिबद्ध उड़ते हुए पंछी
जब मचाते हैं कोलाहल और
करते हैं - सामूहिक कलरव,
तो यह मात्र कलोल नहीं होता.
होती है उसमे सम्मिलित वह ख़ुशी
जो अपना पेट जाने भरने के बाद
लाते हैं चोंच में भरकर बच्चों के लिए.
अपना पवित्र दायित्व समझकर,
ममता के पवित्र बंधन में बंधकर.
कहीं रुकते नहीं, किसी दूसरे गाव में,
अजनवी बाग़ में, अजनवी घोसले में.
परन्तु,
इंसान का जब भी भरा होता है
पेट और भरी होती है - दोनों जेब;
वह जा घुसता है नामी होटलों में.
किसी अजनवी आशियाने में....
अजनवी लोगों के बीच पाने को ख़ुशी.
आखी वह ख़ुशी क्यों नहीं मिल पाती
उसे अपने ही भरे - पूरे परिवार में...?
क्यों बहक जाते हैं उसके कदम?
क्या है यह आधुनिकता या मजबूरी?
क्यों है वहाँ प्यार और स्नेह का अभाव?
क्यों है कडवाहट दाम्पत्य जीवन में?
क्यों है वह असंतुष्ट अपनी ही संतानों से?
कब रुकेंगे उसके पाँव बहकने से...?
कब बांटेगा वह अपनी प्रसन्नता,
अपना सुख - दुःख अपनों के बीच?
कब पंछियों जैसे हुए..गीत गाते ..
गुनगुनाते वह लौटेगा अपने नीद में?
आखिर कब..? आखिर..आखिर कब...?
Tuesday, July 5, 2011
Monday, June 27, 2011
आखिर यह पतन है किसका - शिक्षा का? शिक्षक का...समाज का या संस्कार का?.
अजी सुनते हो..... ?
विजयी मुद्रा में पत्नी ने आवाज लगायी.
तुम नाहक डरते थे, बोर्डिंग स्कूल पर भड़कते थे,
कोसते रहते थे, बच्चा बिगड़ जाएगा.
अर्थ का अनर्थ सीख कर घर आयेगा.
अब मैं जब भी करती हूँ पूजा - आरती,
पीछे खडा रहता है, प्रेम से भजनों को सुनता है.
मन ही मन कुछ गुनता है....दुहराता है ..
बाप ने प्रसन्न होकर बेटे को बुलाया, दुलराया,
बेटा! तुम तो बहुत समझदार हो गए हो,
संस्कारी भी बन गए हो पढायी के साथ-साथ,
पूजा - पाठ में भी मन लगाने लगे हो.
अपने विचार मुझे भी बताओ, माँ को समझाओ.
हां डैड ! वहाँ स्कूल की रीति बदल गयी है,
वहाँ टीचर अब भजन के साथ उसका
अर्थ भी बताते हैं, विस्तार से समझाते हैं-
जैसे - 'ॐ जय जगदीश हरे',
"हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे"
"हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे' का अर्थ.
इसका अर्थ हुआ कि भगवान् न गोरे हैं न सांवले,
वे तो हरे -हरे हैं, गाँधी जी वाले, एकदम कडकडिया.
डैड! नाराज क्यों होते हो ?
हनुमान चालीसा में भी तो लिखा है-
'होत न आज्ञा बिनु पैसा रे'.इसके बिना कुछ नहीं होता.
भगवान् ही जब लंका गए थे खाली हाथ क्या हुआ?
सीता जी से उधार लेना पड़ा था , भजनों में ही लिखा है-
"मार रावण को वहां उधार सीता का किया'.
इसी उधारी को चुकाने के लिए सोने की सीता बनानी पड़ी थी.
माँ - बाप ने बेटा के दिव्य ज्ञान पर सर पीट लिया .
जब प्रिंसिपल से की शिकायत,
क्या यहाँ यही पढ़ाया जाता है?
अर्थ और अर्थ में भेद नहीं बताया जाता?
उद्धार और उधार में अंतर नहीं बताया जाता?
प्रिंसिपल मुस्कुराते हुए बेशर्मी से बोला -
हम आज की आवश्यका, नीड़ और दरकार पढाते हैं.
तभी तो हमारे बच्चे मनेजमेंट कोर्स में धड़ल्ले से आते हैं.
संस्कार सिखाना हो घर पर सिखाइए,
बोर्डिंग में क्यों भेजते हो? हिंदी स्कूल में पढ़ाइये.
माँ-बाप ने नाम कटवा दिया और
छोटे बच्चे का नाम मोहल्ले के
एक हिंदी स्कूल में लिखवा दिया.
कुछ दिनों बाद 'नेचर' को 'नाचूरे'
याद करते सुन बाप का माथा ठनका.
विद्यालय जाकर शिकायत की.
प्रिंसिपल ने टीचर को बुलाया,
डांट की एक घुट्टी पिलाया -
तुम्हारी शिकायत आयी है..,
ठीक -ठीक पढ़ाया करो नहीं तो
तुम्हारा फचूरे (future) बिगाड़ दूंगा.
परमामेंती (permanent) के लाले पड़ जायेगे.
उधर बाप का बहुत बुरा हाल था अब वह कहाँ जाए?
आखिर यह पतन है किसका - शिक्षा का? शिक्षक का?
विद्यार्थी का? अभिभावक का? समाज का या संस्कार का?
विजयी मुद्रा में पत्नी ने आवाज लगायी.
तुम नाहक डरते थे, बोर्डिंग स्कूल पर भड़कते थे,
कोसते रहते थे, बच्चा बिगड़ जाएगा.
अर्थ का अनर्थ सीख कर घर आयेगा.
अब मैं जब भी करती हूँ पूजा - आरती,
पीछे खडा रहता है, प्रेम से भजनों को सुनता है.
मन ही मन कुछ गुनता है....दुहराता है ..
बाप ने प्रसन्न होकर बेटे को बुलाया, दुलराया,
बेटा! तुम तो बहुत समझदार हो गए हो,
संस्कारी भी बन गए हो पढायी के साथ-साथ,
पूजा - पाठ में भी मन लगाने लगे हो.
अपने विचार मुझे भी बताओ, माँ को समझाओ.
हां डैड ! वहाँ स्कूल की रीति बदल गयी है,
वहाँ टीचर अब भजन के साथ उसका
अर्थ भी बताते हैं, विस्तार से समझाते हैं-
जैसे - 'ॐ जय जगदीश हरे',
"हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे"
"हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे' का अर्थ.
इसका अर्थ हुआ कि भगवान् न गोरे हैं न सांवले,
वे तो हरे -हरे हैं, गाँधी जी वाले, एकदम कडकडिया.
डैड! नाराज क्यों होते हो ?
हनुमान चालीसा में भी तो लिखा है-
'होत न आज्ञा बिनु पैसा रे'.इसके बिना कुछ नहीं होता.
भगवान् ही जब लंका गए थे खाली हाथ क्या हुआ?
सीता जी से उधार लेना पड़ा था , भजनों में ही लिखा है-
"मार रावण को वहां उधार सीता का किया'.
इसी उधारी को चुकाने के लिए सोने की सीता बनानी पड़ी थी.
माँ - बाप ने बेटा के दिव्य ज्ञान पर सर पीट लिया .
जब प्रिंसिपल से की शिकायत,
क्या यहाँ यही पढ़ाया जाता है?
अर्थ और अर्थ में भेद नहीं बताया जाता?
उद्धार और उधार में अंतर नहीं बताया जाता?
प्रिंसिपल मुस्कुराते हुए बेशर्मी से बोला -
हम आज की आवश्यका, नीड़ और दरकार पढाते हैं.
तभी तो हमारे बच्चे मनेजमेंट कोर्स में धड़ल्ले से आते हैं.
संस्कार सिखाना हो घर पर सिखाइए,
बोर्डिंग में क्यों भेजते हो? हिंदी स्कूल में पढ़ाइये.
माँ-बाप ने नाम कटवा दिया और
छोटे बच्चे का नाम मोहल्ले के
एक हिंदी स्कूल में लिखवा दिया.
कुछ दिनों बाद 'नेचर' को 'नाचूरे'
याद करते सुन बाप का माथा ठनका.
विद्यालय जाकर शिकायत की.
प्रिंसिपल ने टीचर को बुलाया,
डांट की एक घुट्टी पिलाया -
तुम्हारी शिकायत आयी है..,
ठीक -ठीक पढ़ाया करो नहीं तो
तुम्हारा फचूरे (future) बिगाड़ दूंगा.
परमामेंती (permanent) के लाले पड़ जायेगे.
उधर बाप का बहुत बुरा हाल था अब वह कहाँ जाए?
आखिर यह पतन है किसका - शिक्षा का? शिक्षक का?
विद्यार्थी का? अभिभावक का? समाज का या संस्कार का?
Sunday, June 26, 2011
ख़ुशी
यह ख़ुशी भी
क्या चीज है भाई!
जिसे देखता हूँ
वही ढूंढता है...
नहीं मिलता तो
उसे छीनता है.
वह मुरख बेचारा
इतना भी न जाने
जिसे ढूंढता है,
जिसे छीनता है,
नहीं है ख़ुशी
वह जिसे छीनता है.
यह ख़ुशी
ढूँढने और छिनने
की वस्तु नहीं है,
यह अपने ही मन
की एक स्थिति है.
यह मिलती करम से
धरम से मिलती है.
यह खजाना तेरे
आचरण में निहित है.
अगर चाहते हो
ख़ुशी मेरे भाई!
तुम बाटो ख़ुशी को,
इसी में भलाई .
गर बांटोगे गम तो
मिलेगा वही गम,
बांटोगे ख़ुशी तो
मिलेगी ख़ुशी ही.
ये ख़ुशी छोटी -छोटी
जो तुम बाँटते हो,
ये वापस मिलेगी
कई गुना बन के.
खजाना कोई रहे न रहे,
यह खजाना ख़ुशी का
रहेगा हमेशा तेरे दिल में.
क्या चीज है भाई!
जिसे देखता हूँ
वही ढूंढता है...
नहीं मिलता तो
उसे छीनता है.
वह मुरख बेचारा
इतना भी न जाने
जिसे ढूंढता है,
जिसे छीनता है,
नहीं है ख़ुशी
वह जिसे छीनता है.
यह ख़ुशी
ढूँढने और छिनने
की वस्तु नहीं है,
यह अपने ही मन
की एक स्थिति है.
यह मिलती करम से
धरम से मिलती है.
यह खजाना तेरे
आचरण में निहित है.
अगर चाहते हो
ख़ुशी मेरे भाई!
तुम बाटो ख़ुशी को,
इसी में भलाई .
गर बांटोगे गम तो
मिलेगा वही गम,
बांटोगे ख़ुशी तो
मिलेगी ख़ुशी ही.
ये ख़ुशी छोटी -छोटी
जो तुम बाँटते हो,
ये वापस मिलेगी
कई गुना बन के.
खजाना कोई रहे न रहे,
यह खजाना ख़ुशी का
रहेगा हमेशा तेरे दिल में.
Wednesday, June 22, 2011
मानव जीवन: सुख की सरिता
जीवन के पुरुषार्थ है - चार,
धर्म - अर्थ - काम और मोक्ष.
अर्थ औ काम को शाषित करता
'धर्म - सिद्धांत' और यह 'मोक्ष'.
मानव जीवन सुख की है सरिता,
जब 'धर्म - मोक्ष' के बीच है बहता.
लेकिन जब वह तोड़ता मर्यादा,
'गन्धैला नाला' है जग कहता .
धर्म विहीन आचरण जो होता.
होता प्रतिगामी मर्यादा विहीन.
अर्थ लोभ की लालसा में देखो,
वे भी गिर जाते, जो होते प्रवीण.
चाहिए यदि सुख-शान्ति जीवन में,
चत्वारि पुरुषार्थ को मानना होगा.
धर्म और मोक्ष के कगार बीच,
जीवन सरिता को बहना होगा.
धर्म - अर्थ - काम और मोक्ष.
अर्थ औ काम को शाषित करता
'धर्म - सिद्धांत' और यह 'मोक्ष'.
मानव जीवन सुख की है सरिता,
जब 'धर्म - मोक्ष' के बीच है बहता.
लेकिन जब वह तोड़ता मर्यादा,
'गन्धैला नाला' है जग कहता .
धर्म विहीन आचरण जो होता.
होता प्रतिगामी मर्यादा विहीन.
अर्थ लोभ की लालसा में देखो,
वे भी गिर जाते, जो होते प्रवीण.
चाहिए यदि सुख-शान्ति जीवन में,
चत्वारि पुरुषार्थ को मानना होगा.
धर्म और मोक्ष के कगार बीच,
जीवन सरिता को बहना होगा.
Sunday, June 19, 2011
साहित्य और पाठक का मनोविज्ञान
हाथ में आने के बाद कोई भी साहित्य चाहे वह कविता हो, कहानी हो, या आध्यात्मिक सन्देश; जिसे रचा हो किसी अनामदास या भगवानदास ने अथवा किसी नवीनचंद और फकीरचंद ने. इस नाम का कोई विशेष फर्क नहीं पड़ता. फर्क इसका भी नहीं पड़ता कि इसका रचनाकार कौन है, कोई नया कवि या पुराना घिसा-पिटा कहानीकार, क्योकि पुस्तक हाथ में उठाने से पूर्व पाठक इस ऊहापोह की स्थिति और ग्रन्थ चयन की उधेड़बुन से कब का बाहर आ चुका है. अब सर्वाधिक महत्वपूर्ण यह है कि हम उस ग्रन्थ को पढ़ते कैसे हैं ? पढ़ते - पढ़ते सो जाते हैं? जागते हैं अथवा पात्रों पर हँसतें हैं ठहाका लगाकर ? करते हैं विचार, चलो अच्छा हुआ - वह दुष्ट था, विलेन था...मर गया. और वह बच गया. उसे तो अंततः बचना ही था. वह क्यों बच गया.. ? क्योंकि आप जानते हैं अच्छे बुरे का भेद. अच्छे और बुरे की शक्ति को. लेकिन क्या कभी सोचा है आपने, जो पात्र मरा, वह मर क्यों गया ? और आखिर कौन था वह ? क्या हमारे मन का ही, अपने अन्तःपुर का ही विकृत मनोभाव नहीं था ?
क्या समय - समय पर हमने भी जाने -अनजाने समाज से छिप -छिपाकर, कुहासे और अँधेरे में नहीं जिया है वैसा ही जीवन? यदि हाँ तो निश्चित जानिये, एक दिन वह भी आयेग, हमरा - आपका - सबका, जो भी हैं इन प्रवृत्तियों के संवाहक, एक दिन यही हस्र होगा. साहित्य की समझ का एक मात्र निहितार्थ यह है कि हम अपने अन्तः करन के रावण और कंस का वध करें. हँसते तो रहें हैं हम सदियों से, रावण जैसों का पुतला फूंककर. परन्तु प्रत्येक वर्ष वह आ धमकता है पूरे दल -बल और चमक -दमक के साथ. जब तक हम हँसते रहेंगे वाह्य रावण पर, रावण मरेगा नहीं .... और बढ़ेगा. आज रावण गली - गली में है, चौराहे - चौराहे पर है. अब तो वह घरों में भी प्रवेश कर चुका है और कर लिया है कैद उसने हमारी सुख - शान्ति को, हमारे चैन, हमारी संवेदनाओं को. कर लिया है अपहृत विश्वास रूपिणी सद्भावरूपी सीता का, और छोड़ दिया कंचन मृग को........उसी कंचन मृग के पीछे हम सब भाग रहें है.....तेज गति से....
राम तो गए थे सीता के आग्रह पर, परन्तु लक्ष्मण गया है, आज का राम पूरा माल हड़प न ले. तीर दोनों छोड़ते है, आपस में लड़ते हैं, एक दूजे को पछाड़ते हैं. यह कहानी या कविता घर-घर क़ी है. रामायण हो या महाभारत या फिर कोई आधुनिक रचना, जो उसे पढता है और हँसता है; समझो कहानी क़ी समझ नहीं है उसे. जो रोता है, कहानी क़ी परख उसे भी नहीं, और जो सीने पर रख कर सो जाता है, अब उसे क्या कहें ? क्या सोचते हैं आप ? वह मूर्ख है.. ? अनाड़ी.. है, कहानी और कविता उसके समझ में नहीं आयी ? अरे! खूब आयी समझ में......इतनी कि खुद पात्र बन गया वह. उसकी मनो विकृतियाँ जो मरने लगीं हैं......., वह पुलिस अधिकारी बने हीरो से बचने का उपाय ढूढने लगी है.
अब हो जाइये सावधान! जो व्यक्ति किसी साहित्य को, कविता या कहानी को सीने पर रख कर सो जाता है या करता है विश्राम. वास्तव में वह मन ही मन हो गया है परेशान ... अब उसका मन ही नहीं तन भी हो गया है शिथिल.. और अब वह कर रहा है आराम. वह भाग रहा है कहानी से, कविता से, सत्य से, दिन के उजाले से, अपने दायित्व और कर्त्तव्यों से...लेकिन कब तक भागेगा ? कहाँ तक भागेगा..? अंततः वह पकड़ा जाएगा और कृत कर्मों का फल पायेगा. लेकिन मूर्ख ही है वह...क्यों ? क्योकि अंततः जो बाजी जीतता है , वह कौन है? अरे! वह भी तो वही है, वह इसे जान ही नहीं पाता. दंड और प्रायश्चित ने उसकी विकृतियों को मार डाला है और वह अब बन गया है - 'कहानी का नायक', 'महा नायक' और 'असली हीरो'. दिव्य पुरुष, पुरुषार्थी और महा-पराक्रमी. और यही अंततः किसी भी कविता, किसी भी कहानी या साहित्य की जीत है. यही बर्बरता पर मानवता का जयघोष है..., विजय नाद है ..., छलकता निनाद है....
नोट: सभी चित्र गूगल के सौजन्य से.
Saturday, June 18, 2011
फूल और दीपक
मंदिर में देखो भक्तों ने नैवेद्य चढ़ाये फूल चढ़ाये दीप जलाये.
अपने सुगंध की मादकता में, हर्षित सब फूल बहुत इठलाये.
मंद पवन के झोंकों से, सुगंध यह दूर दूर तक फैला.
लेकिन जब हुयी हवा प्रतिकूल, सारा सुगन्ध उड़ चला.
तब भी इस प्रतिकूलता में, वह दीपक क्या खूब जला.
अब हुयी हवा प्रचंड मगर, लहर लहर कर दीप जला.
पानी गरज गरज कर बरसा, फिर भी दीपक बुझा नहीं.
तूफ़ान भी कमजोर न था,वह दीपक फिर भी उड़ा नहीं.
उड़े फूल नैवेद्य भी विखरा, लेकिन वह दीपक बुझा नहीं.
हुआ अन्धेरा संभले सब भक्त, कारण दीपक के गिरे नहीं.
हैरान फूल था देख रहा, पूछा वहीँ से ये राज है क्या?
हंसकर बोला नन्हा दीपक, जलेंगे जबतक साथ अपनों का.
सोचूंगा मै तब जब छोड़ेंगे साथ मेरा घी और बत्ती.
जब तक साथ है खूब जलूँगा, बात है बिल्कुल पक्की.
तुम डाली को छोड़ चुके थे, अहंकार से नाता जोड़ चुके थे.
आखिर टिकते फिर भी कितना, साथ अपनों का छोड़ चुके थे.
अपने सुगंध की मादकता में, हर्षित सब फूल बहुत इठलाये.
मंद पवन के झोंकों से, सुगंध यह दूर दूर तक फैला.
लेकिन जब हुयी हवा प्रतिकूल, सारा सुगन्ध उड़ चला.
तब भी इस प्रतिकूलता में, वह दीपक क्या खूब जला.
अब हुयी हवा प्रचंड मगर, लहर लहर कर दीप जला.
पानी गरज गरज कर बरसा, फिर भी दीपक बुझा नहीं.
तूफ़ान भी कमजोर न था,वह दीपक फिर भी उड़ा नहीं.
उड़े फूल नैवेद्य भी विखरा, लेकिन वह दीपक बुझा नहीं.
हुआ अन्धेरा संभले सब भक्त, कारण दीपक के गिरे नहीं.
हैरान फूल था देख रहा, पूछा वहीँ से ये राज है क्या?
हंसकर बोला नन्हा दीपक, जलेंगे जबतक साथ अपनों का.
सोचूंगा मै तब जब छोड़ेंगे साथ मेरा घी और बत्ती.
जब तक साथ है खूब जलूँगा, बात है बिल्कुल पक्की.
तुम डाली को छोड़ चुके थे, अहंकार से नाता जोड़ चुके थे.
आखिर टिकते फिर भी कितना, साथ अपनों का छोड़ चुके थे.
Sunday, June 12, 2011
मिटायेंगे देश से भ्रष्टाचार
जनता के दिल की आवाज हूँ मैं
अब तक था दबा अब नहीं दबूंगा.
जनता के ऊपर नित भ्रष्टाचार
बहुत सहा, अब नहीं सहूंगा..
हो रहे उजागर नित प्रतिदिन
भ्रष्ट आचरण और भ्रष्टाचार.
सुबह उठा और देखा पेपर
सुर्ख़ियों में छाया भ्रष्टाचार..
आचार विचार सब गौड़ हुए
हुआ प्रधान अब भ्रष्टाचार.
अब होती है इसपर चर्चा इतनी
लोकप्रिय न हो जाय भ्रष्टाचार.
रोज रोज जब जाप करोगे
परस्पर विरोधी बातकरोगे.
नियम कानून ताक पे रख
कहीं छा न जाए भ्रष्टाचार.
नयी पीढ़ी दीवानी शार्टकट की
उसे भा न जाए यह भ्रष्टाचार.
है कोढ़ समाज का भ्रष्टाचार.
मिटाना हमे है यह भ्रष्टाचार.
करो बात यदि भ्रष्टाचार की.
एक स्वर से फिर यही बात करो.
लो मिट्टी हाथ और करो संकल्प
मिटायेंगे इस देश से भ्रष्टाचार.
अब तक था दबा अब नहीं दबूंगा.
जनता के ऊपर नित भ्रष्टाचार
बहुत सहा, अब नहीं सहूंगा..
हो रहे उजागर नित प्रतिदिन
भ्रष्ट आचरण और भ्रष्टाचार.
सुबह उठा और देखा पेपर
सुर्ख़ियों में छाया भ्रष्टाचार..
आचार विचार सब गौड़ हुए
हुआ प्रधान अब भ्रष्टाचार.
अब होती है इसपर चर्चा इतनी
लोकप्रिय न हो जाय भ्रष्टाचार.
रोज रोज जब जाप करोगे
परस्पर विरोधी बातकरोगे.
नियम कानून ताक पे रख
कहीं छा न जाए भ्रष्टाचार.
नयी पीढ़ी दीवानी शार्टकट की
उसे भा न जाए यह भ्रष्टाचार.
है कोढ़ समाज का भ्रष्टाचार.
मिटाना हमे है यह भ्रष्टाचार.
करो बात यदि भ्रष्टाचार की.
एक स्वर से फिर यही बात करो.
लो मिट्टी हाथ और करो संकल्प
मिटायेंगे इस देश से भ्रष्टाचार.
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